दंगानामा

भैया रे, अब तो सुना है कि विलायत के लन्दन शहर में भी दंगा हो गया| चलो जी अब हमारा अलीगढ और लन्दन भाई भाई हो गए इस नाते| चलो पहले अपने दर्द दिखा कर मन हल्का कर ले फिर लन्दन देखेंगे|

बचपन में अगर कोई पूछता कि तुम्हारे अलीगढ में दंगा क्यों होता है, तो मन करता कि पूंछू कि तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों होता है| अगर हम किसी नाते रिश्तेदारी में जाते और बच्चों का हुडदंग होता तो नाक चढ़ा कर कोई न कोई जनानी बोलती, अलीगढ वाले आये है; सबको पता चल रहा है| एटा वाली मौसी के पडोसी बोलते भाई, हमारे यहाँ भी तो मुसलमां उतने ही है जितने अलीगढ़ में; मगर हमारे यहाँ तो दंगा नहीं होता| अब भाई दंगा करने के लिए भी ज़िगर चाहिए होता है, कारण ढूँढना पड़ता है, तमाम बातें होती है| फिर चुनाव वगैरह के समीकरण भी देखने होते है| ऐसा थोड़े है कि मन आया और; अइयो रे और दइयो रे; शुरू धूम-धडाका, फटे पटाखा|

बारह तेरह साल पहले के दंगे को लें, क्या बात थी क्या नजारा था| मैं धर्मसमाज कालिज में पढ़ता था, सकूं भर बसंत बहारी दिन थे| सुबह पढ़ने निकले और अचलताल होकर क्लास रूम पहुँच गए| अभी दस मिनट हुए थे कि बूढ़ा चपरासी भागता आया, प्रिंसिपल साब ने बोला है दंगा हो गया है, पढ़ाई बंद करो, बच्चन को घर भेज दो| अब हमारा सनकी प्रोफेसर, बोला कब हुआ दंगा, अभी दस मिनिट पहले तो घर से आ रहा हूँ, कहीं कोई चर्चा तक नहीं थी| ये साला बूढ़ा सनक गया है| चपरासी अपना सा मुहँ और फटा कलेजा लेकर चला गया| पीछे पीछे लिखित फरमान आ पहुँचा| पता लगा कि आधा घंटा पहले बाहर अचल पर दंगा हुआ है, सराय सुल्तानी पर आगजनी भी हो गयी है| अब मैं सोचूँ, भाई आधा घंटा पहले दंगा हुआ, पन्द्रह मिनिट पहले मैं ठीक अचल पर था, दस मिनिट पहले आगजनी भी हो गयी| चलो खैर, कुछ सोचते विचारते घर को निकल गया| रस्ते में हर किसी को घर लोटने की जल्दी थी, एक दुसरे कि चिंता थी| हिन्दू इलाके के लोग मुसलमान को देख कर जल्दी घर जाने कि सलाह दे रहे थे तो एक नातेरिश्ते ले दुश्मनों से बचकर चलने की सलाह भी मुफ्त दे रहे थे| इन मौको पर रंजिश निकालने का खूब मौक़ा रहता है| घर मेरा लाइन पार दस मिनिट दूर था| बे मौक़ा घर पर देखकर माँ को गुस्सा आया जब बताया कि दंगा है तो उनकी चिंता बढ़ गयी| बोली दौड़ कर बहन को देख ला वो तो कलिज से नहीं लोटी, तब तक मैं सामान कि लिस्ट बना देती हूँ, बाजार से ले आना| मैं उलटे पाँव लौट लिया वापस कॉलिज पहुँचा| वहाँ पर चपरासी ने बोला सब लड़कियों को पिछले दरवाजे से लाइन पार करा दिया है अब तक तो लली घर पहुँच गयी होगीं| लौटे तो रास्ते में फ्लैग मार्च शुरू हो चुका था| आगे आगे एक जीप में कर्फू का एलान हो रहा था और जनता से जल्द घर पहुँच जाने की अपील थी| जनता सुन नहीं रही थी, सबको गल्ला राशन जो खरीदना था| पीछे पुलिस की खाली गाड़ियां थीं और उनके पीछे डरे सिमटे पैदल सिपाही| अलीगढ  पुलिस के इस साहसिक शक्ति प्रदर्शन पर मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी| आखिर ये पुलिस वाले भी तो इंसान ही तो  है| जब घर पंहुचा तब तक बहन घर पर पहुँच गया| तभी माँ ने आकार सामान की लिस्ट पकड़ा दी| अनुभव बताता है कि अगर घर में सामान नहीं रहा तो दंगे बहुत भारी पड़ सकते है| अगर आपके घर में पूरी रसद है तो आप सुरक्षित है|

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि अलीगढ़ में दंगा हुआ है, मुझे लगता था कि कोई सरकारी मजाक है| मगर शाम को आकाशवाणी, दूरदर्शन और बीबीसी ने भी दंगो की पुष्टी कर दी थी| विदेश के किसी अखबार में लिखा गया कि भारत की राजधानी की नाक के ठीक नीचे गृहयुद्ध की स्थिति बन रही है| खैर, अब यह टीवी पर सिनेमा देखने, सड़क पर क्रिकेट खेलने और मन करने पर पढाई करने का दिन था| इस समय दुनिया की कोई भी ताकत अलीगढ़ में बिजली काटने का आदेश नहीं दे सकती थी| पानी नल से खत्म नहीं होता था| जिन इलाको में पूरा कर्फू था वहाँ पर जरूर बच्चे चोर सिपाही या आई स्पाई का खेल रहे थे जिसमे गलियों में उंघते पुलिसिये वास्तविक सिपाही थे|

 

एक और दंगे की याद है| मैं एक चार्टर्ड अकाउन्टेंट फर्म के साथ काम कर रहा था| हम अपने जिस क्लाइंट के दफ्तर में थे वो मुस्लिम थे और एक को छोड़ कर उनके सारे मुलाजिम भी| दंगे की खबर आते ही उनका हुक्म आया की पास की दूकान से समौसे मांगा कर हम लोग खा पी लें| जैसे पुलिस की गाड़ी आती है वह हमें खुद हमारे मुहल्लों तक छोड़ देंगे| हमारा एक ट्रेनी अलीगढ़ के बाहर का था, बोला कहीं मुसल्ला मार तो नहीं देगा| मैंने कहा, घर बुलाएं मेहमान को कौन मारता है| खैर, जब पुलिस की गाड़ी आयी हम क्लाइंट की गाडी में थे और पुलिस की गाड़ी हमारे आगे आगे| आखिर वो हमें पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ सकते थे, क्या पता नेताओं के क्या आदेश हों|

इस तरह अलीगढ़ के दंगे कुछेक मौतों के अलावा आराम से बीत जाते है| मगर देश भर नफरत का गंदा जलील खेल और बढ़ जाता है| लोग अपनी आपसी रंजिश निपटा लेते है, और मरने वाले के घरवाले मुआवजे के लालच में चुप भी रहते है और अगले दंगे का इन्तजार करते है|

अलीगढ़ का आखिरी बुरा दंगा १९९२ वाला था|

(सभी विचार मेरी निजी समझ पर आधारित है, राजनितिक, सरकारी और अन्य निजी विचारों से कतई मेल नहीं खाते|)

Advertisements

दंगानामा&rdquo पर एक विचार;

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s