विश्व-बंदी १६ मई


उपशीर्षक – त्रियोदशी में करोना दावत

करोना काल की अच्छी उपलब्धियों में एक यह भी है कि देश में त्रियोदशी संस्कारों में भारी कमी आई है| परन्तु मेरे गृह नगर के बारे में छपी खबर चिंता जनक थी|

शहर के एक बड़े सर्राफ़ की माताजी का हाल में स्वर्गवास हुआ| इसके बाद स्वाभाविक है कि उनके पुत्र, और पुत्रिओं के परिवार इकठ्ठा होते| इसमें शायद किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए| परन्तु इस परिवार ने अपनी माताजी के लिए त्रियोदशी संस्कार का आयोजन किया, जिसमें शहर भर के काफ़ी लोग सम्मलित हुए| दो दिन के बाद सर्राफ़ साहब की करोना से मृत्यु हो गई| मृत्यु के समाचार के बाद सरकार ने तुरंत तीन प्रमुख थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू का ऐलान कर दिया जिससे कि बीमारी न फैले| साथ ही उन लोगों की जानकारी इकठ्ठा की गई जो त्रियोदशी में शामिल हुए थे| इस परिवार और समारोह में शामिल कई लोग करोना से संक्रमित पाए गए|

दुःख यह कि यह समाज का सभ्य और समझदार समझे जाने वाला तबका है| यह वह लोग हैं जो दूसरों के लिए आदर्श बनकर खड़े होते है|

इस पूरे इलाके में कर्फ्यू जारी है| कोई नहीं जानता कि सर्राफ़ परिवार के यहाँ मातमपुर्सी के लिए आए और बाद में त्रियोदशी समारोह में शामिल लोग कब कब किस किस से मिले| यह एक पूरी श्रंखला बनती है| यह सब जान पाना उतना सरल नहीं जितना लगता है| अलीगढ़ शहर ख़तरे की स्तिथि में अब लगभग एक महीने के लिए रहेगा| सरकार ने लगभग १५० लोगों के विरूद्ध मुकदमा कायम किया है|

कुछ अतिविश्वासी या अंधविश्वासी लोगों के कारण उनके सम्बन्धियों, मित्रों, परिवारों, पड़ौसियों, और यहाँ तक कि उनके आसपास से अनजाने में ही गुजर गए लोगों के लिए खतरा पैदा हुआ है|

अलीगढ़ वालों के समझदार होने का मेरा भ्रम इस समय कुचल गया है| मैं सिर्फ़ आशा करता हूँ कि जल्द सब ठीक हो|

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मणिराम हरिराम का चीला


जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

मोबाइल की वापसी


परसों मेरे पिताजी का मोबाइल कहीं खो गया| वो अलीगढ़ नुमायश से लौटते हुए खुश थे और वह खुश हम लोगों को फ़ोन पर बाँटना चाहते थे| जब पड़ोसियों ने फ़ोन कर कर मुझे बताया तो मैंने मोबाइल कंपनी को फ़ोन कर कर उनके नंबर से आउटगोइंग बंद करा दी| पिताजी ने किसी भी असुविधा से बचने के लिए घर के पास के थाने में भी सूचना दे दी| मगर पुलिस को सुचना तो दर्ज नहीं करनी थी तो नहीं की, अलबत्ता एक प्रति पर मोहर लगा कर वापिस जरूर दे दी|

बच्चों से दूर घर में अकेले रहने वाले बूढ़े व्यक्ति के लिए मोबाइल खो जाना अपंग होने जैसा ही है| अब दिल्ली से ही उनके लिए दूसरे सिम का भी इंतजाम करना था और फ़ोन का भी| अलीगढ़ में कूरियर कंपनी के ख़राब रिकॉर्ड के कारण में ऑनलाइन खरीद भी नहीं करना चाहता था|

जब मैं शाम को मोबाइल हैंडसेट पर विशेषज्ञता रखने वाली एक पत्रिका के पन्ने पलट रहा था तो अचानक मेरे मोबाइल पर एक सन्देश आया| यह किसी अनजान मोबाइल से आया था मगर उसके नीचे एक आईएम्आईई नंबर दिया हुआ था| पहले तो मुझे सन्देश समझ नहीं आया, मगर थोड़ी देर बाद मैंने सन्देश भेजने वाले नंबर पर फ़ोन किया| यह सन्देश “सिम चेंज अलर्ट” था, जिसे कई साल पहले मैंने इस मोबाइल में चालू किया था|

साधारण शिष्टाचार के बाद मैंने पूछा, भाई फ़ोन कहाँ से चुरा कर लाये हो? वो हकलाने लगा और फ़ोन काट दिया| मैंने दोबारा फ़ोन किया तो उसने बोला, सड़क पर पड़ा मिला है, मैं वापिस कर दूंगा| मैंने उसे अपने घर के पास की एक जगह पहुँचने के लिए बोला|

एक घंटे बाद भी जब कोई नहीं पहुंचा, तो मैंने दोबारा फ़ोन किया| इस बार उसने कहा वो सड़क पर जिस जगह फ़ोन मिला था वहां रख देगा, आप उठवा लो| मैंने उसे समझाया कि वो फंस गया है और अगर फ़ोन वापिस कर देता है तो पुलिस नहीं भेजी जाएगी| उसने फ़ोन काट दिया| उधर अलीगढ़ में पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होकर मोबाइल वापिसी का चमत्कार देखने के लिए बैठा था और मुझे दिल्ली से लाइव कमेन्ट्री देनी पड़ रही थी| मैंने सबको अपने अपने घर जाने के लिए कहा क्योंकि मोबाइल की वापसी का कोई पक्का समय मुझे नहीं मालूम था|

देर रात, अचानक मेरा मोबाइल फिर बजा| यह उसी नंबर से फ़ोन था| “मैं आपके बताये स्थान पर खड़ा हूँ, मुझे किधर पहुंचना है?” मैं उसे पड़ोस के एक घर का पता बताया| क्योंकि पापा के पास फ़ोन नहीं था, मैंने पड़ोस में एक दुसरे घर में फ़ोन किया| मैं किसे अकेले को मोबाइल चोर गिरोह से सामना करने नहीं छोड़ सकता था|

पांच मिनिट में मोबाइल पड़ोसियों के पास था| उसने बताया, आपका सिम मैंने पहले फैंक दिया था मगर अब ढूंड कर वापिस लगा दिया है|

अगले दिन पुलिस को मोबाइल मिलने की सूचना दी गई मगर उन्हें इसकी भी कोई ख़ुशी नहीं हुई| मगर पिताजी में कह कर एक प्रति पर मोहर लगवा ली| मैंने भी उसमें आउटगोइंग वापिस चालू करवा दी|

एक छोटी से सुविधा आपको खुश कर सकती है|