मणिराम हरिराम का चीला

जब भी अलीगढ़ जाना होता है तो ट्रेन से उतरने के बाद चीला खाना मेरा पसंदीदा शगल है| बचपन में चीला मेरे लिए अचरज था, क्योंकि मेरे सभी साथी अंडे वाला चीला पसंद करते थे, बल्कि कहें तो उसके दीवाने थे| घर पर माँ बेसन के चीले बनती थी जो इतने शानदार नहीं लगते थे कि उनके लिए दीवाना हुआ जाये| बाद में जब “स्ट्रीट फ़ूड” के लिए स्वाद विकसित हुआ तो उसे समझने के दौरान बेसन, मूंग दाल और अंडे का चीला और उनका अंतर समझ में आया|

बहुत से लोग चीले को उत्तर भारत का डोसा मानते हैं| मगर चीला चटनी के साथ खाने की चीज है| बेसन (साथ में कभी कभी रवा/सूजी भी) का चीला खाने में पतला मगर पेट में थोड़ा भारी होता है| अंडे का चीला मूल रूप से मूंग दाल का ही चीला है, मगर उसमें अंडा फैंट कर डाला जाता है|

अलीगढ़ में बेसन और अंडे के चीले में कटा हुआ उबला आलू, प्याज आदि भरकर थोड़ा सेका जाता है और बाद में इस तरह ग्यारह बारह टुकड़े कर दिए जाते हैं, जैसे भुर्जी बनाना चाह रहे हों| यह चीला सिकते समय देखने वाले को मसाला डोसा लगता है तो परोसे जाते समय आलू चाट जैसा| इसके उप्पर चटनी डालकर चम्मच से खाते हैं| (वैसे कुछ अलीगढ़ी लोग आमलेट चीले की भी मांग करते हैं)

मूंग की दाल का चीला, चीलों की दुनिया का बादशाह है| मूंग की दाल के चीलों में भी मुझे पहले अलीगढ़ में राजू का चीला पसंद था तो आज मनीराम – हरीराम का चीला|

सुदामापुरी क्रासिंग (अब सुदामापुरी पुल के नीचे) दो भाई अपनी अपनी ठेलों के एक साथ मिलकर खड़ी करते हैं, जिससे भाइयों का प्यार दीखता है| पहली ठेल पर मूंग दाल और दूसरी ठेल पर अंडे का चीला|

मेरी पसंद मूंग दाल का चीला|

आज अंडे का चीला बनाने वाला भाई बीमार है, मेरी दो मूंग दाल चीले की इच्छा रखी है| खुराक से हिसाब से दो चीले पांच रोटी के बराबर का मामला है| पांच चीले पहले हैं – मुझे बताया जाता है| मुझे छटवां और नवां चीला दिया जायेगा| अब हम गप्पे मारेंगे या बीस मिनिट टहल सकते हैं|

पीसी हुई मूंग की दाल को कटोरी भरकर लिया जाता है| और तवे पर फुर्ती से फैलाया जाता है, डोसे की तरह पतला नहीं करते, थोड़ा मोटा रहता है| बात चलती है, चीले को फ़ैलाने का समय और चक्कर दोनों एकदम पक्के हैं, कम या ज्यादा में वो मजा नहीं रहता| जो लोग फ़ैलाने को आसान बनाने के लिए दाल में पानी डालते हैं, वो अपने चीले और यश दोनों में पानी डाल लेते हैं|

जिस समय यह सिक रहा होता है, उसी समय इस पर अदरक, प्याज, मिर्च लगा कर हाथ से थपथपा और दुलार देते हैं| इसके बाद सीधे इसके ऊपर ही पनीर को कद्दूकस कर कर उसकी परत बनाते हैं| पहले से पनीर को घिसकर नहीं रखा जाता| इससे एक समान पर्त बनती है| वह इस को फिर से हाथ से थपथाकर दुलार देता है| यही दुलार तो चीले में जान डालता है| इसके बाद ५० ग्राम मक्कन की टिकिया सिकते हुए चीले के नीचे सरकी जाती है|

दो मिनिट के बाद चीला थोड़ी देर के लिए पलट दिया जाता है| यह भूख को जगा लेने का समय है| चीले के ठीक आठ बराबर हिस्से होते हैं, जी हैं पूरे सात कट| चीला आपकी थाली में परोसा जाता है| आपके सामने खट्टी (हरी) और मीठी (सौंठ) चटनी हैं|

मगर मैं पुराना ग्राहक हूँ| मैं शिकायत करता हूँ| अगर चटनी ग्राहक को अपने हाथ से लेनी पड़े तो वो प्यार मोहब्बत वाला स्वाद नहीं आता|

खाने की हर चीज कला और विज्ञान से भले ही बनती हो, जबतक दुलार न हो वो खाना बन सकती है, स्वाद नहीं| बेसन और अंडे के चीले अगर चम्मच से चाट की तरह खाए जाते हैं तो मूंग दाल चीला हाथ से खाने में स्वाद देता हैं| अगर मूंग दाल चीले के आठ की जगह बारह हिस्से हो तो बेहतर हो, मगर कहीं स्वाद न बदल जाए|

और इस प्यार और दुलार भरे एक चीले का मूल्य 60 रुपये| समय शाम दिन छिपने के बाद| अलीगढ़ की सुदामापुरी रेलवे फाटक (अब पुल)|

पुनः – किसी ज़माने में सुदामापुरी फाटक को खूनी फाटक कहते थे, मगर अब कुछ साल से पुल बन गया है|

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सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

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मोबाइल की वापसी

परसों मेरे पिताजी का मोबाइल कहीं खो गया| वो अलीगढ़ नुमायश से लौटते हुए खुश थे और वह खुश हम लोगों को फ़ोन पर बाँटना चाहते थे| जब पड़ोसियों ने फ़ोन कर कर मुझे बताया तो मैंने मोबाइल कंपनी को फ़ोन कर कर उनके नंबर से आउटगोइंग बंद करा दी| पिताजी ने किसी भी असुविधा से बचने के लिए घर के पास के थाने में भी सूचना दे दी| मगर पुलिस को सुचना तो दर्ज नहीं करनी थी तो नहीं की, अलबत्ता एक प्रति पर मोहर लगा कर वापिस जरूर दे दी|

बच्चों से दूर घर में अकेले रहने वाले बूढ़े व्यक्ति के लिए मोबाइल खो जाना अपंग होने जैसा ही है| अब दिल्ली से ही उनके लिए दूसरे सिम का भी इंतजाम करना था और फ़ोन का भी| अलीगढ़ में कूरियर कंपनी के ख़राब रिकॉर्ड के कारण में ऑनलाइन खरीद भी नहीं करना चाहता था|

जब मैं शाम को मोबाइल हैंडसेट पर विशेषज्ञता रखने वाली एक पत्रिका के पन्ने पलट रहा था तो अचानक मेरे मोबाइल पर एक सन्देश आया| यह किसी अनजान मोबाइल से आया था मगर उसके नीचे एक आईएम्आईई नंबर दिया हुआ था| पहले तो मुझे सन्देश समझ नहीं आया, मगर थोड़ी देर बाद मैंने सन्देश भेजने वाले नंबर पर फ़ोन किया| यह सन्देश “सिम चेंज अलर्ट” था, जिसे कई साल पहले मैंने इस मोबाइल में चालू किया था|

साधारण शिष्टाचार के बाद मैंने पूछा, भाई फ़ोन कहाँ से चुरा कर लाये हो? वो हकलाने लगा और फ़ोन काट दिया| मैंने दोबारा फ़ोन किया तो उसने बोला, सड़क पर पड़ा मिला है, मैं वापिस कर दूंगा| मैंने उसे अपने घर के पास की एक जगह पहुँचने के लिए बोला|

एक घंटे बाद भी जब कोई नहीं पहुंचा, तो मैंने दोबारा फ़ोन किया| इस बार उसने कहा वो सड़क पर जिस जगह फ़ोन मिला था वहां रख देगा, आप उठवा लो| मैंने उसे समझाया कि वो फंस गया है और अगर फ़ोन वापिस कर देता है तो पुलिस नहीं भेजी जाएगी| उसने फ़ोन काट दिया| उधर अलीगढ़ में पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होकर मोबाइल वापिसी का चमत्कार देखने के लिए बैठा था और मुझे दिल्ली से लाइव कमेन्ट्री देनी पड़ रही थी| मैंने सबको अपने अपने घर जाने के लिए कहा क्योंकि मोबाइल की वापसी का कोई पक्का समय मुझे नहीं मालूम था|

देर रात, अचानक मेरा मोबाइल फिर बजा| यह उसी नंबर से फ़ोन था| “मैं आपके बताये स्थान पर खड़ा हूँ, मुझे किधर पहुंचना है?” मैं उसे पड़ोस के एक घर का पता बताया| क्योंकि पापा के पास फ़ोन नहीं था, मैंने पड़ोस में एक दुसरे घर में फ़ोन किया| मैं किसे अकेले को मोबाइल चोर गिरोह से सामना करने नहीं छोड़ सकता था|

पांच मिनिट में मोबाइल पड़ोसियों के पास था| उसने बताया, आपका सिम मैंने पहले फैंक दिया था मगर अब ढूंड कर वापिस लगा दिया है|

अगले दिन पुलिस को मोबाइल मिलने की सूचना दी गई मगर उन्हें इसकी भी कोई ख़ुशी नहीं हुई| मगर पिताजी में कह कर एक प्रति पर मोहर लगवा ली| मैंने भी उसमें आउटगोइंग वापिस चालू करवा दी|

एक छोटी से सुविधा आपको खुश कर सकती है|

ढांचा पढ़िए!!

 

अलीगढ़ शहर का विष्णुपुरी और सुरेन्द्र नगर इलाका; जून १९८२ या जून १९८३; शाम के चार या पांच बजे हैं|

बिजली अगर आती भी तो रेडियो और पंखे चलते हैं; कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिज, टेलीविजन, नहीं| बिजली का पंखा ज्यादातर चलता नहीं और हाथ का पंखा जब तक है जान कि तर्ज पर झला जाता है, वरना गर्मी झेल ही ली जाती है| ज्यादा गर्मी होने पर सरकार को नहीं कोसा जाता, बल्कि भगवान् से दया मांगी जाती है; खुद को कोसा जाता है, पाप शांत कराये जाते हैं| सुबह सत्यनारायण की कथा, उसके बाद मोहल्ले का स्त्री –  सम्मलेन, और बाद में मोहल्ले का एक ही समय पर सामूहिक शयन| जागने के लिए किसी घड़ी की जरूरत नहीं है, न ही किसी अलार्म की| प्राग ऑइल मिल का सायरन समय बताता है| भले ही इस इलाके में कोई मिल में काम नहीं करता मगर इस इलाके पर प्राग ऑइल मिल का नहीं तो उसके सायरन की हुकूमत चलती है| गर्मी के इस हुकूमत की ताकत बहुत बढ़ जाती है| क्योंकि इस मिल में एक बर्फखाना भी तो है, जहाँ बर्फ की बड़ी बड़ी सिल्लियाँ बनती है और पैसे वाले लोग खरीदने के लिए इंतजार करते हैं|

दोपहर के साढ़े तीन बजे सायरन बजता है, आलस दम तोड़ता है, गर्मी में सुस्ताये घर जगने लगते हैं| लगता है दिन दोबारा निकल आया है| बच्चे बहुत जल्दी में हैं, माएं उनको काबू में रखने की मशक्कत में परेशान हैं| उसके बाद स्वर्ग का आनंद; सत्तू, फालसे, खरबूज, तरबूज, कुल्फी या सॉफ्टी, जलजीरा, लस्सी, मट्ठा, छाछ, और कई तरह के शर्बत| शर्बत; बेल, बादाम, सौफ, फालसे, और बाजार का रसना| विविध भारती पर गाने सुनते हुए, मजा दोगुना हो जाता है| स्वाद ले लेकर पिया जा रहा है, जन्नत को जिया जा रहा है| वक़्त की कमी नहीं है; मगर जीभ बहुत छोटी है, जितना देर इस पर स्वाद बना रहे, यह खुश रहेगी; वर्ना आने वाले कल तक लपलपाती रहेगी|

और सड़क पर आवाज गूंजती है:

मतलब अब धूप अपने उतार पर है| खेलने का समय है| बच्चे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ते हैं| कुछ बड़ी उम्र के बच्चे अखबार वाले की तरफ हाथ बढ़ा देते है और उन्हें एक अखबार मिल जाता है| न पैसा माँगा गया, न दिया गया| एक मुस्कराहट से कीमत वसूल हो गयी है| दिल खुश हो गए हैं| रास्ते में जो भी बच्चा, बूढ़ा, जवान, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, हाथ बढ़ा देता है, उसे अखबार मिल जाता है| आखें टकरातीं हैं, मुस्कराहट फ़ैल जाती है| मांगने वाला अपनी हैसियत के हिसाब से मांगता है, देने वाला उम्मीद से देता है| अगर कोई भी लगातार तीसरे दिन अखबार मांगता है तो अखबार वाला साईकिल से उतर जाता है, और घर का पता पूछता है| बिना और कुछ कहे सौदा तय, कल से सुबह घर पर अखबार आएगा| हाँ, वही, अमर उजाला|

एक शाम मैं हाथ बढ़ा देता हूँ, छोटा बच्चा अख़बार मांग रहा है| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है|

अखबार पढ़ोगे| पढ़ना आता है|

हाँ|

पढ़ कर दिखाओ|

मैं धीरे धीरे पढ़ता हूँ| सिर पर हाथ फेरा जाता है| अखबार मिल जाता है| बहुत सारे आशीर्वाद भी|

मैं अगले दिन फिर खड़ा हूँ| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है| कल का अखबार पूरा पढ़ा|

नहीं|

क्या किया|

फोटो देखे और रख दिया|

मेरे हाथ में अखबार का मुखपृष्ठ और सम्पादकीय है| केवल दो कागज| पूरा अखबार क्यूँ नहीं| मैं सोचता हूँ| मगर जितना मिला है, वो भी हाथ से न चला जाये|

कल ये पूरा पढ़ लेना तभी और अखबार मिलेगा| मैं अगले दिन, पूरा पढ़कर फिर खड़ा हूँ| अखबार सुनना पड़ रहा है|

अखबार वाला खुश है| अब हर हफ्ते अखबार मिलेगा| रोज नहीं| किसी भी एक व्यक्ति को लगातार तीन दिन मुफ्त में अखबार दिया जाता|

मुझे पढ़ने की लत लग रही है| गर्मी ख़त्म हो गयीं हैं| मुझे हर हफ्ते अखबार मिलता है| नियम बंध गया है| हफ्ते भर एक अखबार पढ़ो| सुनाओ और नया अखबार पाओ| मगर क्रम ज्यादा दिन नहीं चलता|

पंजाब में किसी को मार दिया गया है| पापा उसका अखबार रोज खरीदना चाहते हैं| वही अखबार वाला| वाही समय| पापा ने अखबार वाले को रोका| रोज का अख़बार तय हो गया| और मेरा हर हफ्ते अखबार मांगना भी|

मगर मुझे हर रोज आवाज सुनाई देती है| एक उम्मीद आवाज दे रही है| शायद कोई नया ग्राहक मिलेगा| कोई नया बंदा चाय पानी पिलाएगा| या नया बच्चा अख़बार मांगेगा| कई साल मैं उस आवाज को सुनता रहा| वो गुमनाम आवाज| आज भी याद है| उस आवाज का चेहरा नहीं है|  कई साल गुजर गए| पता नहीं चला, कब वो आवाज आना बंद हो गया| मगर मेरे कान आज भी पहचान सकते हैं, सुन सकते हैं|

अमर उजाला… ढांचा पढ़िए….||

 

आलू बीनता बचपन

दिनांक: 1 मार्च 2013

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कार्य विवरण:

कार्य: खेत में से आलू बीनना

कार्य अवधि: रोज 12 से 15 घंटा, (महीना – दो महीना सालाना)

आयु: 9 वर्ष से १२ वर्ष

लिंग: पुरुष (अथवा महिला)

आय: कुल जमा रु. 60/- दैनिक

वेतन वर्गीकरण: रु. 50/- माता – पिता को, रु. 10 अन्य देय के रूप मे कर्मचारी को

पता: जलेसर जिला एटा, उ. प्र.

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कर्मचारी विवरण

नाम: अज्ञात

शिक्षा: कक्षा 2 से 5 (हिंदी माध्यम)

ज्ञान: मात्र वर्ण माला, गिनती,

भोजन: रूखी रोटी, तम्बाकू गुटखा, पानी, (और बेहद कभी कभी दारु, आयु अनुसार)

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मैंने यह स्वयं ऊपर दी गयी दिनांक को स्वयं देखा| जलेसर से सिकंदरा-राऊ के बीच कई खेतो में आलू बीनने का काम महिला और बच्चे कर रहे थे, पुरुष बोझ धो रहे थे| खेत मजदूरों के लिए तो चलिए ये सपरिवार बोनस कमाने के दिन हैं, मगर दुःख की बात थी कि कुछ अन्य लोग भी अपने बच्चों से काम करने में गुरेज नहीं करते|

किस घर में बच्चे माँ – बाप का हाथ नहीं बंटाते हैं?

क्या बच्चे से एक वक़्त पंसारी की दुकान से सामान मांगना बाल मजदूरी नहीं है?

क्या बच्चे काम करने से नहीं सीखते? अगर नहीं तो स्कूलों में लेब किसलिए होतीं हैं?

क्या फर्क पड़ता है कि बच्चे जिन्दगी की पाठशाला में कमाई का कुछ पाठ पढ़े, कुछ बोझ उठाना सींखे?

क्या बुराई है अगर बच्चे साल भर की अपनी किताबों, पठाई लिखाई का खर्चा खुद निकाल लें?

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रेलवे की साजिशाना लूट

 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा

अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)

मेरी छोटी बहन पूनम : एक श्रृद्धांजलि

उस दिन माँ ने हम दोनों भाई बहनों से पूछा था कि बहन चाहिए या भाई? हम दोनों का क्या विचार था मुझे याद नहीं आता मगर हम उस दिन अपनी अपनी तरह प्रसन्न थे| एक दिन जब मौसम में हल्की सी तरावट थी पापा हमें महिला चिकित्सालय ले गए और हम नन्ही बहन से मिल कर खुश थे| जब हम जीप में बैठ कर घर पहुंचे तो बहन से नाराज थे क्योकि वो हमारे साथ नहीं खेल रही थी और हमारी माँ से ही चिपकी हुई थी| बाद में जब वो थोड़ा बड़ी हुई तो मेरी यह नाराजगी बनी रही क्योकि वह या तो माँ के साथ रहती थी या अपनी बड़ी बहन के साथ|

उसका बचपन मेरे लिए एक बीमार मंदबुद्धि लड़की का बचपन था; वह शुरू के पाँच वर्ष ज्वर से लेकर खसरा, टायफायड तक से संघर्ष करती रही और कई बार चिडचिडी हो जाती थी| माँ से उसका विशेष लगाव था| किसी और से उसका बोलना चालना तभी होता था जब बेहद अपरिहार्य हो जाता था| प्राथिमिक शिक्षा के लिए जब उसे पड़ोस के निजी विद्यालय में भेजा गया तो शिक्षिकाओं की शिकायत थी की वह सभी आदेश मानती है, काम भी पूरा रखती है मगर बोल कर किसी भी बात का जबाब नहीं देती| मेरी माँ के कहने पर अध्यापिकाओं ने उसके सामने माँ के लिए भला बुरा कहा; और वो सबसे लड़ पड़ी| इसके बाद वो अध्यापिकाओं की लाड़ली, अपनी अलग दुनिया में मगन अपने रास्ते चलती रही और पढाई करती रही|

मेरा उसका वास्ता शुरु में इतना था कि मैं रोज रात उसको कहानियां सुनाया करता था| इनमें ध्रुवतारे से लेकर सियाचिन की लड़ाइयों तक होती थीं| मुझे नहीं याद कि बचपन में कभी मैंने उसे ठीक से पढ़ाया हो मगर रोजाना के लिए एक किस्सा कहानी तय था| वह दस वर्ष की आयु आते आते पढ़ने लिखने के प्रति अपनी रूचि का विकास कर चुकी थी और सामाजिक संघर्षों के प्रति उसकी जानकारी बढ़ रही थी| बोफोर्स, अयोध्या और मंडल आदि के बारे में वह अपने हमउम्रों से कहीं अधिक जानकारी रखती थी| बारहवीं तक आते आते उसका रुझान अध्यापिका बनने के स्थान पर चिकित्सक बनने की और हो गया था| मगर बारहवीं के परिणाम आशा के विपरीत थे|

इसके ठीक बाद उसका स्वास्थ्य फिर साथ छोड़ गया| उसको बारहवीं उत्तीर्ण करने के कुछ महीने बाद बीमारियों में घेर लिया| पूरे साल उसने बिस्तर पर रहकर ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विधि विभाग में प्रवेश परीक्षा की तैयारी की| उसका नाम चयनित छात्रों की सूची में चौबीसवें स्थान पर था जो यक़ीनन एक बढ़ी उपलब्धि थी| मगर संघर्ष जारी था और लड़ाई लंबी थी|

हिंदी माध्यम से पढ़ी उस होनहार छात्रा को सभी कुछ समझ नहीं आता था और वह घर आकर अपने सारे नोट्स हिंदी में समझने की कोशिश करती थी| वर्तनी, उच्चारण, घसीट लेखन, घटता आत्म विश्वास, घर से विश्वविद्यालय की दूरी, बेहद बीमार शरीर के लिए उत्तर भारत की गर्मी, सर्दी और बरसात, सभी परीक्षा लेने पर उतारू थे| प्रथम छःमाही में वह बेहद कठिनाई से उत्तीर्ण हो पायी थी| परन्तु उसने मुझसे कहा की मैं उसे यह गणना कर कर बताऊँ कि अगले हर छःमाही में उसे कितने अंक लाने है कि वह अपनी विधि स्नातक की उपाधि प्रथम श्रेणी में पा सके|

इसी बीच माँ को कैंसर हो गया और साल भर में वो चली गईं| किसी भी छात्र के लिए माँ का देहावसान दुखद है; उसने किसी तरह से अपने आपको टूटने से बचाया| मगर वह प्रथम श्रेणी चूक गयी|

उसे विधि के स्नातकोत्तर पाट्यक्रम में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया’ दोनों जगह स्थान मिल गया और उसने फिर अलीगढ़ में प्रवेश ले लिया| इस बार वो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई| और उसने पी. सी. एस. (न्यायायिक) प्रारंभिक परीक्षा भी उत्तीर्ण की| मगर दुर्भाग्य आसानी से समाप्त नहीं होता|

ठीक इसी वर्ष, अपनी माँ के कैंसर का शिकार होने से पाँचवे वर्ष उसे कैंसर हो गया|

पूनम, उम्र चौबीस वर्ष, स्तन कैंसर||

हर चिकित्सक बातचीत का प्रारंभ आश्चर्य से करता| इस उम्र में स्तन कैंसर लगभग नहीं ही होते| अनुवांशिक मामलों में भी शायद इस उम्र में नहीं होते|

बहुत से मित्र और सम्बन्धी साथ छोड़ गए| चिकित्सकों में जल्दी ही कैंसर मुक्त घोषित कर दिया मगर… टूटा हुआ मन , तन, समाजिक सम्बन्ध, मष्तिष्क| ईश्वर है भी या नहीं?

उसे कई संबंधों और समाज के बिना बेहद लंबा अवसाद झेलना पड़ा| मगर बहादुर हार नहीं मानते; जी!! कैंसर और ईश्वर से भी नहीं|

उसने दिल्ली के भारतीय विधि संस्थान में प्रवेश लिया; परन्तु परीक्षा नहीं दे सकी| उसने दूसरी बार पी. सी. एस. (न्यायायिक) प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण की और मुख्य परीक्षा में भी अच्छे अंक लायी; परन्तु साक्षात्कार में उत्तीर्ण नहीं हो सकी| इलाहबाद विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की पढाई प्रारम्भ की और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट परीक्षा भी उत्तीर्ण की| उसने दुमका में “स्वच्छ जल का अधिकार: संवैधानिक एवं विधिक विचार” विषय पर अपना आलेख प्रस्तुत किया|

मुझसे काफी छोटी होने के बाद भी, मेरे विवाह की सारी व्यवस्था करना भी उसने सहर्ष स्वीकार किया और ढेर  सारे व्यवधान से बाद भी सभी कार्य ठीक से पूरे किये| किसी ने यह सोचा भी नहीं कि भागती फिरती यह लड़की कैंसर से जूझ चुकी होगी और…

परन्तु, एक बार फिर कैंसर में आ घेरा| पन्द्रह दिन के भीतर चिकित्सकों ने निजी रूप से मुझे उसके ठीक न हो पाने की संभावना के बारे में बता दिया| अब छः माह से एक वर्ष की आयु शेष थी| समाज एक बार फिर साथ छोड़ रहा था| एक मित्र में मुझे कहा, उसका जो होना है हो ही जायेगा, आप क्यों हम अपना समय नष्ट करते है|

उसने इस दौरान भी सामान्य बने रहने का पूरा प्रयास किया| अपने फेसबुक प्रोफाइल पर लगाया हुआ उसका यह फोटो उसे कैंसर हो जाने के बाद का है|

पूनम (25 सितम्बर 2011)

 

उसके अंतिम दस वर्षों में कुछ गिने चुने लोग ही उसके साथ थे; और मुझे बताना ही चाहिए कि वो लोग, ओ उसके साथ रहे, बहुत पढ़े लिखे लोग नहीं है|

ऐश्वर्य के घर शिशु जन्म

यह दुनिया बहुत बड़ी है| इसमें एक छोटी सी दुनिया है, जिसमें हम रहते हैं| यह दुनिया एक दम अनोखी है: यहाँ बड़े बड़े दर्द और छोटी छोटी खुशियां है, अपनी लहरें, अपना पानी है; वक्त की अपनी रवानी है| हमारी यह छोटी सी दुनिया बड़ी सी दुनिया में जगह जगह फैली हुई है: अलीगढ़, दिल्ली, देहरादून, इलाहाबाद और मुंबई| यह दुनिया रेडियों, टेलिविज़न, मोबाइल फोन, इन्टरनेट, ट्विट्टर, फेसबुक, तक फ़ैल जाती है| यह दुनियां हाथ फैला कर बहुत कुछ अपने में समां लेती है| इस दुनिया में हम रहते है, यह दुनिया हमने बनाई है, इस दुनिया ने हमें बनाया है| यह सूरज, चाँद, सितारों वाली दुनिया है|

इस दुनिया में एक अन्तरंग गहमागहमी है जिस पर किसी भी अखबार की दखल नहीं है; न ही इसकी दरकार है| इस दुनिया में पत्रकार भी हम है और चित्रकार भी| रिपोर्ट भी हमारी है और सटायर भी| हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है|

इस छोटी सी दुनिया में एक नए प्राणी का आगमन है| काफी समय पहले जब मेरी पत्नी ने इस बारे में कुछ महसूस किया तब हम किसे अन्य कार्य में व्यस्त थे और महीने भर तक चिकित्सक से सलाह मशविरा लेने के लिए समय नहीं निकाल पाए| समय बीत रहा था पर जीवन सांस लेने की अनुमति नहीं दे रहा था| तभी अचानक हमें एक शनिवार की शाम बाहर जाना था और दिन में हमारे पास समय था और हमने इस समय का सदुपयोग करने का निर्णय किया| उस दिन दोपहर को चिकित्सक में हमें बधाई दी और कुछ जाँच आदि करने के लिए कहा| इस के बाद सभी व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी हम अपने अंदर एक बदलाव महसूस करने लगे| यह एक सुखद अनुभव रहा|

कुछ समय बाद जब हमारी अन्य व्यस्तताएं कम हुई हमने नए प्राणी के बारे में और अधिक सोचने शुरू कर दिया| पत्नी ने गर्भावस्था के बारे में एक पुस्तक पढ़नी प्रारम्भ कर दी तो मैंने इंटेरनेट पर काफी जानकारी इक्कठा की| कई बार ऐसा लगता था कि हमारे अलावा तो कोई और कभी माँ-बाप नहीं बना है| समय के साथ हमारी उन्त्सुक्ता बढ़ रही थी तो पत्नी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, जो कि मानसिक तनाव और शारीरिक समस्याओं को लेकर थी| चिकित्सक इस सब में पैसा बना रहे थे और हम खुश थे| मैंने अपने जीवन का काफी समय चिकित्सालयों के चक्कर काट कर बिताया है पर इस बार हमें इस बात पर कोई दुःख नहीं हो रहा था| हमारी दुनिया में तमाम के बाद भी कुछ था जो नया था और जोश भर रहा था| पत्नी अपने कार्यालय, घर और गर्भवती माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बैठने में लगभग नाकाम हो रही थी और यही परीक्षा थी| पत्नी को सास का अभाव खाल रहा था|

हमने तय किया कि हमारे शिशु का जन्म उसकी माँ के जन्म स्थान देहरादून में होगा| इसके कई कारण रहे| अब नई समस्याएं थी; कार्यालय से अवकाश, दिवाली और अन्य त्यौहारों का मौसम, देहरादून कि ठण्ड, दिल्ली से देहरादून कि यात्रा, सही चिकित्सक का चुनाव| धीरे धीरे इन सभी को सुलझाया गया| चिकित्सकों ने बताया कि शिशु ने गर्भ में तिर्यक स्थिति अपना ली है और यह स्थिति यदि बनी रहती है तो समस्या हो सकती है|

इस समय हमने एक और निर्णय लिया; बच्चे के स्टेम सेल को परिरक्षित करवाने का| यह निर्णय हमारे पुराने अनुभवों और चिकित्सकीय अनुसंधानों के नए कारनामों का नतीजा था| इस क्षेत्र में कार्यरत कई सेवा प्रदाताओ से बात की और एक का चुनाव कर लिया| इस निर्णय से हमें लगभग एक लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च करना था पर भविष्य का डर सदा ही वर्तमान के गणित पर भारी पड़ता है|

पत्नी जी ने 23 अक्टूबर 2011 के लिए देहरादून शताब्दी के एक्स्क्युतिव श्रेणी डिब्बे में अपना आरक्षण करवाने का निर्णय सुनाया| यह एक यादगार यात्रा थी| उस दिन कि विशेष बात थी कि चाय न पीने का दवा रखने वाली पत्नीजी ने कम से कम तीन बड़ा कप चाय पी| दूसरा पहली बार ऐसा हुआ कि गाड़ी किसी स्थान पर पांच मिनिट से अधिक रुकी और मैंने प्लेटफोर्म का दौरा नहीं किया| (देहरादून शताब्दी सहारनपुर पर आधा घंटा रूकती है) इस प्रकार पत्नी जी अपने मायके जा पहुंची|

नए स्थान पर नए चिकित्सकों ने पुनः जांचें की और नए निर्णय दिए| शिशु में अपनी तिर्यक स्थिति को सुधार लिया था पर नै समस्या थी कि अब नाल उसके गले पर लिपटी हुई थी| चिकित्सकों को अब अपने अनुभव और ज्ञान पर कम भरोसा था और वो किसी भी प्रकार का दांव नहीं खेलना चाहते थे| इसमें उनका पैसा भी बनता है और इज्जत जाने का डर भी नहीं होता| उनका कहना था कि शल्य क्रिया होनी चाहिए और हमें उसके लिए समय का निर्णय करना था| इस समय सभी प्रकार की शंका और समाधान सामने थे| पत्नीजी का रक्तचाप इस दौरान महंगाई से तेज बढ़ने लगा| मैंने कई बार अनुभव किया है कि पत्नीजी कठिन समस्याओं का समाधान जल्दी कर लेती है और सरल निर्णय लेने में रक्तचाप बढ़ा लेती है|

अनुभव ने मुझे सिखाया है कि भले आप कोई अंधविश्वास न माने मगर इस भारतीय समाज में उसको अवश्य पूरा करें, वरना समाज आपको जरूर परेशां कर लेगा| इस कारण, गुरुवार नकार दिया गया क्योकि मान्यता के मुताबिक, गुरुवार को किया गया काम दुहराया जाता है और कोई भी बार बार शल्यक्रिया नहीं चाहता है| उसके बाद मूल नक्षत्रों का समय है जो कि शनिवार संध्या काल में समाप्त होता है| इस समय में पैदा हुआ शिशु परिवार के लिए कठनाई का सन्देश लाता है| परन्तु वास्तव में यह हिंदू ब्राह्मणों की आय का एक और स्रोत है| यह मूल दोष, कुछ पूजा पाठ करने के बाद भगवान के इन दूतों (ब्राह्मणों) को खिलाने, पिलाने और दान दक्षिणा देने से दूर हो जाता है| परन्तु यह पूजा – पाठ शिशु की माँ के लिए कष्टकारी समय होता है| अतः अब रविवार का समय तय हुआ है|

रविवार को प्रातः 7 बजे हम चिकित्सालय पहुँच गए और शल्य क्रिया की तैयारी शुरू हो गई| ठीक 8 बजे पत्नी को शल्यकक्ष में ले जाया गया और फिर 9 बजे उपचारिका (नर्स) नन्हे शिशु को लेकर उपस्तिथ हुई; “बेटा आया है|” यह खुशी के क्षण थे| लिखित संदेशों और फोन के जरिये सभी को सूचित किया गया| मैंने लिखा; “हमारे घर बेटा आया है|” लोगों के बधाई सन्देश और फोन आने लगे| एक अजब माहौल था: नन्हा शिशु, बेहोश माँ, उनका बढ़ता रक्तचाप, खुश परिवार, भागते दौड़ते नाना, उछलती कूदती नानी, हँसते-फूलते बुआ, मौसी, मामा, और चिंतित बाबा के बजते फोन, शिशु रुदन, बधाई सन्देश, लंबी फोन वार्ताएँ, दवाएं, मिठाइयां, अजब – गजब होता मैं| नयी मांगें हो रही थी : मित्र-सम्बन्धी लोग फोटो की, शिशु भोजन की, माँ शांति की, परिवार उत्सव की| मेरी छोटी बहन ने शिशु के लिए पुकारू नाम तय कर लिया गया था; “आदि; जो मेरे और पत्नी ले नामों ले प्रथमाक्षर ऐ-दि का परवर्तित हिंदी रूप है|

शाम को पत्नी ने पूरी तरह होश आने पर अपने मित्रों को भी सन्देश दिए| मैंने मित्रों को भेजने के लिए सांयकाल एक फोटो लिया, जिसे अगली प्रातः 5.45 भारतीय मानक समय पर http://twitter.com/AishMGhrana और उसके तुरंत बाद http://www.facebook.com/#!/aishwaryamgahrana?sk=info पर यह चित्र सम्बन्धियों और मित्रों को भेज दिया| अब बधाइयों का नया सिलसिला था|

अगले पांच दिन शिशु चिकित्सालय में इस विश्व को समझने में लगा रहा और हम उसको| नए शिशु को स्वस्थ्य सम्बन्धी छोटी मोटी समस्यायें भी परेशां कर रही थी, इसलिए शिशु चिकित्सा विशेषज्ञ भी बुलाये गए| उसकी पहला रोना, पहली जम्हाई, पहली डकार, सब इंगित किये गए| क्योंकि उसकी माँ दूध नहीं पिला सकती थी तो उसको शिशु आहार दिया गया| उसकी माँ ने उसे मंगलवार को पहली बार दूध पिलाने का प्रयास किया|

शुक्रवार को सभी लोग उसकी नानी के घर पहुँच गए| हिंदू रीति के हिसाब से छठी का कार्यक्रम किया गया| बुआ के द्वारा खरीद्वाए गए कपडे पहनाए गए| शाम को महिला संगीत हुआ|

अब मुझे नन्हे शिशु आदि के साथ एक रात बिता कर दिल्ली वापस लौटना था|