हिंदी स्वर

से अनार, से आम
पढ़ले बेटा, आएगा काम।

से इमली, से ईख,
मम्मी देती, हमको सीख।

से उल्लू, से ऊन,
ज्ञान बढ़े दो गुणा दून।

ऋषि ज्ञान का दान,
कृषि बिना न होवे खान।

से एकम, की ऐनक,
आंख बिन न रंग रौनक।

ओखली, से औरत,
जोर से बोलो सुनले छत।

अं से अंग, अः पर अतः,
स्वर में जोड़े छः भई छः।

 

चा बार, कनॉट प्लेस

परिचित पूछते हैं कि क्या कभी कभी चाय पीने वाले को भी चाय के लिए पसंदीदा जगह ढूढ़नी पड़ती है| मुझे लगता है, चाय बेहतर हो तब ही उसका असली मजा है| चा बार, चाय के लिए दिल्ली में मेरी पसंदीदा जगह में से एक है|

जब मैं पहली बार गया था तब ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार स्टेटमेंट्स हाउस में हुआ करते थे| उन दिनों सर्विस में गजब की ट्रेडमार्क सुस्ती थी| आपके आर्डर करने के बाद भी वेटर दो चार बार पूछ जाता था कि कितनी और देर बार चाय लानी है| मकसद था आपको वहां बैठ कर आराम से पढ़ने लिखने देना| यह बात इसे चाय पीने वालों के साथ साथ पढ़ाकू और लिख्खाड़ लोगों का बेहद पसंदीदा बनती थी| स्टेटमेंट हाउस से चा बार बंद होने तक मैं लगभग हर महीने वहां गया|  मैंने इसके भारी भरकम मेनू में से बहुत सी चाय पी डालीं थीं – विश्रांति, हिबिस्कस, अश्वगंधा, नीलगिरी, इंडियन हर्बल और न जाने क्या क्या| कुल मिलकर सत्तर –अस्सी चाय तो हैं हीं| सबमें अपना अलग स्वाद है| ट्रक ड्राईवर चाय तो खैर सबसे पहले पी थी, उसका फ़ोटो भी सोशल मीडिया पर डाला था|

चा बार के दोबारा खुलने के बाद मैं पहले ही हफ्ते में यहाँ पहुंचा| नए स्थान पर चा बार और ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर दोनों का माहौल पहले से ऊर्जावान था| व्यंजन-सूची पहले से बेहतर प्रतीत होती थी| असल में सेवा पहले के मुकाबले बेहतर थी| शायद अब चा बार को सहायक इकाई की जगह एक लाभ-इकाई के रूप में स्थापित किया गया है| जहाँ पहले चा बार शांत माहौल का पर्याय था अब यहाँ एक ऊष्मा है| लोग मिलने, चाय पीने, बातें करने आते हैं| पुराने ज़माने की तरह, अब शांति से बैठकर आप दो चार पुस्तक पढने के लिए नहीं यहाँ नहीं बैठते| बैठकर पढने का विकल्प ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर अब भी देता है| आज कल ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर और चा बार सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है|

#Tea #ChaBar #OxfordBookStore #_soidelhi

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चलिए चाय की बात की जाए| शायद यह दिल्ली के किसी और भोजनालय, कैफ़े या बार से अधिक तरह की चाय उपलब्ध करता है| बेहतरीन है कि आपको चाय के बारे में सधे हुए सटीक शब्दों में व्यंजन-सूची से जानकारी मिलती है| व्यंजन सूची काफी बड़ी है और आपको बहुत परिश्रम पड़ता हैं  अपने मन, माहौल, मकसद के मिलान करती चाय पीने के लिए| मसलन अगर आप यहाँ से निकल कर डांस-फ्लोर पर उतरने वाले हैं तो अंतर मौन जैसी गंभीर शांत चाय पीने का कोई अर्थ नहीं| अगर आप गंभीरता से व्यंजन सूची पढ़ते और चाय की चुस्की भरते हैं तब यह अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त करते हैं| पुरानी कहावत हैं, पेय बहुत धीरे धीरे घूँट घूँट कर कर गंभीरता से पीना चाहिए| बेहतर चाय का आनंद आपको आपको आनंद प्रदान करता है|

स्थान: चा बार, ऑक्सफ़ोर्ड बुक स्टोर, कनाट प्लेस, नई दिल्ली,

भोजन: मुख्यतः शाकाहारी

खास: चाय,

पांच: साढ़े चार

भारतीय रेलवे जनता खाना

बचपन में जब भी लम्बी दूरी की यात्रा पर जाना होता – पूड़ी, आलू टमाटर की सूखी सब्जी, आम, मिर्च या नीबू का आचार और सलाद के नाम पर हरी मिर्च या प्याज हमेशा साथ होती| पता नहीं क्यों यूँ लगता था कि सफ़र के दौरान इस खाने का स्वाद कुछ अलग ही बढ़ जाता है| प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के आर्थिक सुधार और छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशें देश में कुछ ख़ुशहाली लायीं और पुरानी ख़ुशियाँ छिनने लगीं| भारतीय रेल की पेंट्री और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म का महंगा खाना खरीदने के पैसे लोगों के पास आ गए| कहिये कि संदूक का वजन कम करने के चक्कर में जेब का वजन भी भारी पड़ने लगा और हल्का किया जाने लगा|

भारतीय रेल नेटवर्क में मिलने वाले सभी खानों में स्वाद, मूल्य और उपलब्धता की दृष्टि से अगर किसी खाने का चुनाव करना हो तो जनता खाना उत्तम विकल्प हो सकता है| जिन दिनों मैंने जनता खाने का पैकेट पहली बार खरीदा तब यह सात या दस रुपये का था| आज भी यह पंद्रह या बीस रूपये में आ जाता है| जिन दिनों मैं अलीगढ़ – दिल्ली रोजाना यात्रा करने लगा, उन दिनों मुझे जनता खाने से प्रेम हुआ|  मुझे घर जल्दी छोड़ना होता था, अतः लगभग रोज जनता खाना खरीदता था|

भारतीय रेल का जनता खाना भारतीय खाद्य आदतों का परिचायक है| थोड़ा अच्छी तरह सिकी हुई पुड़ी, मिर्च वाली आलू टमाटर की सूखी सब्जी, मिर्च| पैकेट का आधिकारिक वजन लगभग डेढ़ सौ ग्राम – सात पूड़ी के साथ| साथ में मिलने वाली हरी मिर्च जिस प्रकार इन पैकेट के बाहर झांकती है, उसका भी अलग आकर्षण है| आम बाजारू आलू सब्जी से अलग इसमें तेल बहुत कम है और चूता तो लगभग नहीं ही है| गाढ़ी आलू सब्जी में पानी रिसने का भी प्रश्न नहीं अतः इसके पैकेट को लोग गोद में रखकर कहते खाते हुए भी मिल जायेंगे|

जनता खाना लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री काल की धरोहर है| आप लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक और निजी कारणों से नकारने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु उनके समय का कुशल रेल प्रबंधन का बिना शक सराहनीय रहा है| भारतीय रेल में खाना बेचना सरकार के लिए भले ही सरल हो मगर देश भर में इस काम में लगे छोटे विक्रेताओं के लिए परिवार के जीवन – मरण का प्रश्न है| एक विक्रेता एक मिनिट में चार से अधिक ग्राहक को सेवा नहीं दे पाता| एक स्टेशन पर दो मिनिट से कम देर रुकने वाली ट्रेन में जनता खाने के ग्राहक प्रायः कम ही होते हैं| ऐसे में संघर्ष बढ़ जाता है| ट्रेन समय से दो-एक घंटा देर से चल रही हो, पांच मिनिट या अधिक रूकती हो और निम्न मध्यवर्ग की सवारियों का बाहुल्य हो –  यह हर छोटे विक्रेता के जीवन यापन के लिए आवश्यक है| इन आदर्श परिस्तिथियों में एक ट्रेन से एक विक्रेता पांच मिनिट में बीस पैकेट बेचकर चालीस रुपये बनाने की उम्मीद कर सकता है|

एक दिन अचानक मैंने जनता खाना लेना बंद कर दिया| अलीगढ़ जंक्शन के चार नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर मगध एक्सप्रेस आना चाहती थी| सिंग्नल और अनाउंसमेंट हो चुका था| एक भूखा पेट वेंडर दो नंबर प्लेटफ़ॉर्म से लाइन पर कूदकर तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर जा चढ़ा और चार पांच जनता खाना डिब्बे लाइन पर ठीक वहां जा गिरे जहाँ नहीं गिरने चाहिए थे| ऐसे की किसी दिन को देखकर भारतीय रेलवे को बायो-टॉयलेट का विचार आया होगा| चार डिब्बे को छोड़ने का अर्थ अगले एक घंटे की कमाई गवां देना था| वेंडर वापिस पलटा, गिरे हुए डिब्बे संभाले और भागकर चार नंबर पर रूकती हुई मगध एक्सप्रेस के अनारक्षित डिब्बे के अन्दर गरम खाना – गरम खाना चिल्ला रहा था| भाषण मत दीजिये – अपने नामचीन विदेशी भोजनालय का दो दिन बासा खाना खाते हुए नीचे दिए हुए चित्र को देखिये और लालू प्रसाद के समाजवाद और नरेन्द्र मोदी के पूंजीवाद पर बहस करते रहिए| [i] [ii] [iii] [iv] [v] [vi] [vii]

[i] http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%9F-107042100105_1.htm

[ii] https://www.bhaskar.com/news/CHH-RAI-HMU-MAT-latest-raipur-news-042003-2972594-NOR.html

[iii] http://paisa.khabarindiatv.com/article/tag/janta-khana/

[iv] http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/ghaziabad/janta-food-eat-carefully

[v] http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/ratlam-railway-naptoll-janata-khana-1019510

[vi] http://indianexpress.com/article/trending/this-is-serious/dead-lizard-found-in-veg-biryani-on-train-tweeple-hit-out-at-indian-railways-4767682/

[vii] http://www.financialexpress.com/economy/cag-report-calls-railway-food-unfit-for-humans-10-steps-indian-railways-says-it-is-taking-to-ensure-quality/776532/

संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

रोशनआरा बाग़

यह बाग़ अपनी पहली मालकिन और संस्थापक मुग़ल शहजादी रोशन – आरा के नाम पर भले ही भुला दिया जाए, मगर दक्षिण एशिया के क्रिकेट का रवायती जन्म इसी बाग़ में हुआ था| जब मैं रोशनआरा बाग़ में था, तब भी इसकी बारादरी के चारों ओर बनीं नहरों और कुण्डों में इतिहास और विरासत से लापरवाह बच्चे क्रिकेट खेलते थे|

रोशन- आरा बाग शाहजहानाबाद की बसावट के दौर की यादगार है जो शाहजहानाबाद के बाहर मुग़ल शहजादी रोशन-आरा ने बनबाया था| इस बाग़ में बनी हुई बारादरी पुरानी दिल्ली के शानदार दिनों में यह बाग़ मुग़ल स्थापत्य का नमूना है| दिल्ली के सभी पुराने शहरों से दूर जब शाहजहानाबाद बसाया जा रहा था तब दिल्ली में कई सारे बाग़ बनाये गए| पुराने शहरों के आस पास बाग़ बनाये जाने की रवायत बहुत पुरानी है जो आजतक फार्महाउस की थोड़ा विकृत शक्ल में मौजूद है| उन पुराने बाग़ों में आज नई दिल्ली के तमाम नामचीन मोहल्ले आबाद है|

रोशनआरा बाग़ की बारादरी में चित्रकारी।

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रोशनआरा बाग़ की बारादरी में हर बारादरी की तरह ही बारह द्वार हैं – चारों दिशाओं में तीन तीन| बारादरी की दीवारों पर पुरानी चित्रकारी खस्ताहाल सही, मगर मौजूद हैं| यहाँ मौजूद चित्रकारी में आपको सजावटी कला के दर्शन होते हैं| चित्रकारी में मौजूद फूल, पेड़ों और पत्तियों से आप किसी खास पेड़ या पौधे को नहीं पकड़ सकते| सीधे सपाट खम्बों की जगह कटावदार खम्बे लगे हुए हैं और उनपर सजावट हुई है| देखने में यह बारादरी एक मंजिला मालूम होती है मगर इसके चारों कोनों पर मौजूद कमरे दोमंजिला हैं| बारादरी के चारों तरह पानी का कुंड है जो आजकल के हिसाब से स्विमिंग पूल का नक्श देता है| साथ ही बारादरी तक आती हुई चार पुरानी नहरों के निशान आज भी मौजूद हैं| यह उस दौर में प्रचलित बाग़ बनाने की चारबाग़ प्रणाली का सुबूत है|

इस बारादरी में कभी शाही खानदान सैरसपाटे के लिए रुकता था| आज शाहजादी रोशनआरा बारादरी के बीचोंबीच दो गज कच्ची जमीन में सोती है| यूँ पूरी बारादरी के ऊपर लाल पत्थर की मजबूत छत है, मगर शाहजादी रोशनआरा खुले आसमान के नीचे है, क्योंकि वो ऐसे ही सोना चाहती हैं|

दिल्ली की तमाम पुरानी इमारतों की तरह यहाँ भी पुरातत्व विभाग का बोर्ड मौजूद है जो पुरातत्व विभाग के होने की कुछ सम्भावना बयान करता है| चारों ओर का बाग़ उत्तर दिल्ली नगर निगम ली लापरवाही के हवाले है| आसपास वालों को राहत है कि सुबह की चहलकदमी के लिए कोई जगह तो है| इससे आगे परवाह किसे है?

शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, चांदनी चौक

अगर पुरानी दिल्ली में सुबह सुबह बेहतरीन उत्तर भारतीय शाकाहारी नाश्ते का दिल करे तो शिव मिष्ठान भंडार का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है| दिल्ली के बाहर आज भी जलेबी और हलवा नाश्ते का हिस्सा है| दूध जलेबी, दही-जलेबी, हलवा-पूड़ी, पोहा जलेबी, यह सब नाश्ते हैं| अगर आपको सुबह सुबह मीठे नाश्ते का मन करे तो भी यह जगह आपके लिए है|

दुकान कई बड़ी ब्रांड वाली दुकानों के साथ है, मगर उनसे ज्यादा भीड़ यहाँ पर है| नाश्ते की ज्यदातर दुकानों से अलग यहाँ बैठने का पूरा इंतजाम है क्योकि यह दिन भर खाने के लिए उपलब्ध है| मगर ध्यान दें, यहाँ का प्रसिद्ध नागौरी-हलवा नाश्ते में खाए जाने की चीज़ है और सुबह बनता है| यह जगह देर तक सोने वाले आलसियों के लिए नहीं है| नागौरी-हलवा सुबह दस बजे तक ख़त्म हो जाता हैं|

नागौरी हलवा में दो अलग अलग चीजें है| पहला नागौरी – यह एक तरह की पूड़ी है| यह साधारण पूड़ी और बेड़मी पूड़ी से एकदम अलग है| इसके साथ है – आलू सब्जी या छोले, जो शायद उन लोगों के लिए है जिन्हें हलवे से पूड़ी खाना गले नहीं उतरता| मगर असली चीज़ है हलवा| नागौरी को आप सब्जी या हलवे, जिस से मन करे खा सकते हैं| मैं सलाह दूंगा, हलवे के साथ जरूर खाएं|

जो लेट लतीफ़ लोग नागौरी-हलवा नहीं खा पाते या नहीं खाना चाहते, उनके लिए बेड़मी पूड़ी सब्जी बेहतरीन है| पूड़ी ठीक से सेंकना अपने आप में एक कला है| यहाँ आपको एकदम सही सिकी पूड़ी मिलती है|  मसाला बहुत हल्का है| इस कारण आलू सब्जी का अपना स्वाद निखर कर आता है| छोले – भठूरे, कचौड़ी, समौसा भी बेतरीन हैं|

जलेबी, इमारती, गुलाब जामुन, सूजी हलवा, मूंग दाल हलवा, और मालपूआ बेहतरीन हैं| गर्मियों में अगर जाएँ तो यहाँ की शानदार लस्सी का स्वाद लेना न भूलें|

सौ से अधिक साल पुरानी इस दुकान में देश के बड़े बड़े लोग अलग अलग समय में आ चुके हैं|

स्थान: शिव मिष्ठान भंडार, फ़तेहपुरी, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नागौरी-हलवा, पूड़ी-सब्जी,

पांच: साढ़े-चार

“दिन” “महीना”

हम अक्सर मौन रहते हैं| प्रकृति प्रदत्त  बहुत से उपहार और पीड़ाओं को कहते बोलते सुनते नहीं| मानो वह हो ही न| यह नकार दुर्भाग्य है| खासकर अगर यह बातें स्त्री से जुड़ी हों तो नकार एक स्वीकार की तरह मौजूद है| सबके अपने अनुभव है| पुरुषों के भी हैं|

उस समय में नवीं में था जब पड़ौस की किसी लड़की ने माँ से आकर कान में कुछ कहा| हर समय पढ़ने के लिए दबाब डालने वाली मेरी माँ ने मुझे जल्दी से बाजार से एक दवा लाने के लिए बोला| मेरे सामने दवा का नाम उन्होंने ही पर्चे पर लिखा था| क्योंकि मुझे बहुत सवाल पूछने की आदत थी, माँ ने बिना पूछे ही बता दिया कि यह लड़कियों और औरतों के पेट के निचले हिस्से में दर्द की दवा है| दवा का नाम बाद में मुझे याद हो गया था –बलार्गन|

मेरी माँ आसपास की लड़कियों और औरतों के सुख-दुःख की साझीदार थीं| इसलिए यदाकदा यह दवा मुझे लाने के लिए कहा जाता रहा| मैं बिना हिचक इसका नाम लेकर दवा मांग लाता था| परन्तु केमिस्ट की दुकान पर एक सिरफिरे नेतानुमा आदमी ने कुछ बकवास की| केमिस्ट ने मेरे पिता के पद और रुतबे की धमकी देकर उसे चुप करा दिया| मगर मेरे दिमाग में कई प्रश्न आये| माँ ने समझया, जिस प्रकार पृथ्वी या प्रकृति को साल में एक बार पतझड़ का दुःख झेलना होता है| उसी प्रकार हर लड़की को प्रकृति का प्रतिरूप होने के कारण हर महीने कुछ दर्द झेलना होता है|

मैं सालों तक इसे मात्र निचले पेट में तेज दर्द समझता था| ग्रेजुएशन के दौरान एक मित्र के साथ अस्पताल गया था| अचानक डॉक्टर ने अन्दर बुला कर मुझे वो सब बता दिया जो उनके हिसाब से एक अच्छे बॉयफ्रेंड, भाई, पति और पिता को जानना चाहिए| मैं उस दिन बहुत ज्यादा घबरा गया|

नौकरी में एक कंपनी की फैक्ट्री में कार्यरत था| मुख्यालय से मुझे मौखिक निर्देश थे कि अगर कोई लड़की अचानक आकर बिना कारण छुट्टी मांगे तो बिना कोई सवाल किये छुट्टी दे देनी है| कुछ लडकियां नियमित रूप से ऐसा करती थीं तो कुछ ने कभी छुट्टी नहीं मांगी| परन्तु गजब तब हुआ एक लड़की ने दो महीने चार बार ऐसा किया| मेरे गौर करने का प्रश्न नहीं था, मगर वेतन प्रक्रिया के दौरान टाइम कीपर के रजिस्टर की प्रति कई दिन फैक्ट्री और मुख्यालय घुमती रही| बाद में, कंपनी की मानव संसाधन प्रमुख ने आकर उसे चेतावनी दी|

जब पता चला लड़कियां इन दिनों पूजा नहीं कर सकती.. वगैरा वगैरा तो मुझे यह प्रकृति का और मातृत्व का अपमान लगा और आज भी लगता है| बाद में एक मित्र ने तर्क दिया कि अगर वो इन दिनों मंदिर जाएगी तो भगवान को सृष्टि रचने से पूर्व की वेदना याद आ जाएगी|