सन्नाटा

सन्नाटा शब्द से तो आप परिचित हैं| ध्वनि प्रदुषण के इस युग में सन्नाटा आप को डराता भी  होगा| परन्तु ब्रजमंडल में सन्नाटा अपनी अलग शान रखता है| कोई अच्छी दावत नहीं जो सन्नाटे के बिना पूर्ण हो सके| जड़ों के कटते हुए कुछ लोग जरूर दावतों में अजब गजब सा रायता रखने लगे हैं| परन्तु, हमारे यहाँ नाश्ता तो सन्नाटे के बिना आज भी पूरा नहीं होता| मैंने हाल में अलीगढ़ की कचौड़ी के ऊपर लिखी पोस्ट में सन्नाटे का जिक्र किया है|

सन्नाटा विश्व का पहला ऊर्जाहीन (low calories) प्रोबोइटिक पेय है, जिसमें आपके मस्तिष्क को शून्य स्तिथिप्रज्ञ में पहुँचाने की विकत क्षमता है| बेहतरीन सन्नाटा आपके दिमाग को सुन्न करता हैं, सभी नकारात्मक विचारों को दिन भर के लिए एवं सकारात्मक विचारों को थोड़ी देर के लिए दूर करता है और आँख कान जैसी इन्द्रियों को थोड़ी देर ले लिए अंधकार और असीम शांति में भेज देता है| बेहतरीन सन्नाटा आपको पौष मास की अमावस की गहरी काली रात में घने जंगल में प्राप्त होने वाली अनंत शांति का अहसास कराता है|

महत्वपूर्ण बात यह है कि सन्नाटा प्रोबोइटिक दही से बनता है| भगवान् कृष्ण के ब्रजमंडल में दही और प्रोबोइटिक दही क्या कमी| सन्नाटे की विधि से पहले संक्षेप में प्रोबोइटिक दही की विधि बता देता हूँ|

प्रोबोइटिक दही विधि

अच्छे से उबलाकर ठंडा किया गया गाय का दूध लें| अगर गाय का दूध न हो तो वसा-रहित कोई भी दूध ले लें| पहले सामान्य ढंग के दही जमाने  रख दें| जब दही खट्टा होने लगे तो उसे चार घंटे फ्रिज में रख दे|

यदि आपको सन्नाटा बनना है तो दही को बेहद खट्टा होने दे परन्तु ध्यान दे की ख़राब होने से पहले चार पांच घंटे फ्रिज में रहे|

सन्नाटा विधि

अब अच्छा खट्टा प्रोबोइटिक दही लें| कम से कम चार गुना पानी मिला ले| बेहद अच्छे से उसे चला ले जैसे सामान्य रायता चलाते है| स्वाद-अनुसार आप जितना नमक डालना चाहते हैं उससे बस थोडा सा ही ज्यादा नमक डालें| अब कुटी या पीसी पीला मिर्च (लाल काली नहीं) अपने स्वाद अनुसार डाल लें| फ्रिज में रख दें| ठंडा ठंडा पिए|

नोट –  में बेहद खट्टे मठ्ठे का प्रयोग करते हैं| जिसमें बिलकुल मख्खन न बचा हो|

अगर रायता फैलाना हो, तो नीचे कमेंट लिखकर रायतापसंद होने का सबूत दें|

लोरियां

बचपन में हम सबने सुनीं हैं लोरियां| माएं, दादियाँ, नानियाँ सुनातीं थी लोरियां| जब पिता के मन में ममता जागती है, तब भी लोरी सुनाई देती है|

लोरियां माँ के दूध के बाद ममता का सबसे मीठा भाव है| संगीत और शब्द का नैसर्गिक सरल और सुलझा हुआ रूप लोरियां| अधिकतर लोरियां स्वतःस्फूर्त होतीं है| शांत रात्रि में जब बच्चा गोद में आता है तब हृदय में पैदा होने वाले स्पंदन से निकलती हैं लोरियां| कभी धुन नहीं होती तो कभी शब्द नहीं होते… ध्वनि होती है, भावनाएं होती हैं| लोरियां बनती बिगड़ती रहती हैं| अक्सर याद नहीं रहती, याद नहीं रखीं जातीं|

फिर भी कई बार होता है, लोरियां कवि और गीतकार गाते हैं, शब्दों और धुनों में पिरोते हैं| कभी कभी माओं का हृदय शब्दों को यादगार लोरियों में बदल देता है| ऐसी लोरियां लोकगीत की तरह समाज में विचरतीं है, फिल्मों में गाई जातीं है| उनके संकलन भी आते हैं|

हाल में मैंने यह पुस्तक खरीदी है – लोरियां| एक छोटी सी बच्ची के पिता को खरीदना भी और क्या चाहिए? इसमें कुछ लोकलोरियां हैं तो महाकवियों की प्रसिद्ध लोरियां भीं हैं| हालाँकि कुछ गीतों को शायद गलती से लोरी कह दिया गया है| जैसे – जसोदा हरि पालने झुलावै|

कवियों और गीतकारों की लिखी लोरियों में ममता का भाव कम रह जाता है, काव्य और गीत का तकनीकी पक्ष मजबूत होने लगता है| इसमें कुछ अच्छे प्रयास भी हुए है| कई बार प्रसिद्ध गीतकार और कवि बेहतर शब्दों के जाल में उलझकर साधारण सी लोरी लिख पाते है| दूसरी ओर एक स्वतःस्फूर्त लोरी लिखे जाने पर उतनी सुन्दर नहीं जान पड़ती जितना वो ममतामयी गले से गाये जागते समय होती है|

आज जब लोरियां गाने का समय टेलीविजन के सामने निकल जाता है| लोरियों का अपना महत्व बरकारार है| यह हमारे शिशुओं का प्राकृतिक अधिकार है कि वो ममतामयी धुनें, शब्द और गीत सुने – लोरियां सुनें| यह पुस्तक इस दिशा में उचित कदम है|

शकुंतला सिरोठिया, कन्हैयालाल मत्त, प्रकाश मनु की लोरियां, लोरियों के नैसर्गिक सौंदर्य के निकट है| अन्य लोरियां गेय कम पठनीय अधिक हैं| कुल मिलकर पचास लोरियों की यह पुस्तक संग्रहणीय है|

 पुस्तक – लोरियां

लेखक – संकलन

प्रकाशक – राष्ट्रिय पुस्तक न्यास

प्रकाशन वर्ष – 2011

विधा – लोरी

इस्ब्न – 9788123761817)

पृष्ठ संख्या – 54

मूल्य –  45 रुपये

नीम का पेड़

नीम का पेड़ पढ़ते हुए आपको हिन्दुस्तान की उस राजनीति दांव –पेंच देखने को मिलते हैं, जो आजादी के बाद पैदा हुई| हमारी हिन्दुस्तानी सियासत कोई शतरंज की बिसात नहीं है कि आप मोहरों की अपनी कोई बंधी बंधी औकात हो| यहाँ तो प्यादे का व़जीर होना लाजमी है| व़जीर की तो कहते हैं औकात ही नहीं होती, केवल कीमत होती है| यूँ नीम का पेड़ सियासत और वजारत की कहानी नहीं होनी चाहिए थी, मगर हिन्दुस्तानी, खासकर गंगा- जमुनी दो-आब के पानी रंग ही कुछ ऐसा है सियासत की तो सुबह लोग दातून करते हैं| ऐसे में नीम के पेड़ की क्या बिसात, ये तो उस लोगों का कसूर है जो आते जाते उसे नीचे बतकही करते रहे होंगे| वर्ना तो जिस आँगन में उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ारी वहां गुजरा तो गुजरा कुछ होगा|

नीम का पेड़ इस उपन्यास में शायद अकेला ऐसा शख्स है, जो आज के ज़माने में नहीं पहचाना जा सकता| रही मासूम रज़ा की यहीं मासूमियत रही कि उन्होंने एक पेड़ को सूत्रधार होने का मौका दिया| यहीं काम अगर उस कलई के उस पुराने लोटे बुधई के आंगन में पड़ा रहा करता होगा, तो आप पहचान जाते कि ये कौन है| उस लोटे और उसकी घिसी हुई पैंदी का जिक्र न करकर रज़ा साहब ने इस देश की सियासत के पालतू टट्टुओं के साथ न इंसाफी कर दी है| आदर्शवादी लोगों से अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जातीं हैं|

ये कहानी उन दो पुराने रिश्तेदारों की है, जिनको जमींदारी के बैठे ठाले दिनों में सियासत खेलने का चस्का लगा होगा| जमींदारी जाती रही| जमींदारों और नबाबों को लगा कि बदल कर ओहदों का नाम बदलकर विधायकी और सांसदी में तब्दील हो गया है| हुआ दरअसल यूँ उलट कि विधायकी और सांसदी जमींदारी और नबाबी बन गई| बदलते वक़्त के साथ, नए प्यादे आते गए, वजारत बदलती रहीं और व़जीर बिकते रहे|

नीम के पेड़ की कहानी इतनी सरल है कि आप गौर भी नहीं करते कि सियासत में दांव खेल कौन रहा है| कहानी बदलते हिंदुस्तान की जमीन से उठती है| यह कहानी इन वादों का इशारा करती है जिनके बूते वोट खींच लिए जाते है| यह कहानी उस आदर्शवाद जिसके जीतने की हम उम्मीद करते हैं|

पुस्तक – नीम का पेड़

लेखक – राही मासूम रज़ा

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2003

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-0861-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट

जब से मैं लोदी रोड इलाके में रहने आया हूँ, यह मेरा पसंदीदा भोजनालय है| दिल्ली शहर के कई बड़े नामी दक्षिण भारतीय भोजनालय, मेरी राय में, स्वाद में इसके मुकाबले नहीं ठहरते| हर महीने मैं एक बार यहाँ से कुछ न कुछ गृह वितरण पर मंगाया जाता है| भोजन घर मंगाने का हमें थोड़ा नुक्सान है| एक तो वेलकम ड्रिंक रसम नहीं मिलता और दूसरा तीन चटनी की जगह एक से काम चलाना पड़ता है|

यहाँ पहुँचते ही आपको गर्मागर्म शानदार रसम पीने के लिए मिलती है| जब तक आपका मुख्य व्यंजन  आये, आप रसम के घूँट भर सकते हैं| रसम पीने से न सिर्फ भूख बढ़ती है, वरन पाचन क्षमता भी बढ़ती है| रक्तचाप वाले रसम न लें, यहाँ रसम में हल्का नमक ज्यादा रहता है| रसम पर भोजन की बात समाप्त क्या, शुरू भी नहीं हुई है| यहाँ सुबह के नाश्ते से रात के भोजन का इंतजाम है|

यहाँ सबसे बेहतरीन दही-बड़ा| यहाँ का दही-बड़ा दिल्ली की किसी भी चाट-पकौड़ी की दुकान से बेहतर है| निश्चित ही बड़ा, उत्तर भारतीय बड़े से भिन्न है| मगर सिर्फ इसलिए की यह बड़ा भिन्न है, मैं इसकी तारीफ नहीं कर रहा हूँ, वरन इसका स्वाद लाजबाब है| यहाँ की एकमात्र मिठाई केसरी-बात (सूज़ी-हलवा) बेहतरीन है| यहाँ केसरी-बात दिल्ली या उत्तर भारत में मिलने वाले सूजी-हलवे से थोड़ा अलग तरीके से बनता है| यहाँ नाश्ते में पोंगल मेरा प्रिय है| मसाला इडली का स्वाद भी बेहतर है|

खाने की बात करें तो रवा डोसा, मैसूर डोसा मसाला, नीलगिरी उत्तप्पम पसंद आते हैं| यहाँ आकर कहने वालों के लिए तीन तरह की चटनी है – नारियल, टमाटर और कड़ी-पत्ता| लेकिन आपको यहाँ मिलता है एक और पकवान – रागी डोसा, जो गर्म-गर्म खाने में आपको अलग और शानदार स्वाद देता है| रागी दक्षिण भारत में उगने वाला पोष्टिक अन्न है| रागी डोसा ठंडा होने पर उतना अच्छा नहीं लगता, इसलिए गप्पे मारते हुए खाने के लिए नहीं है| चिदंबरम रवा स्पेशल मसाला डोसा स्वाद पसंद लोगों के लिए है| यहाँ घर पर कुछ भी नहीं मंगाया जा सकता, कुछ चीजें यहाँ आकर ही खानी होतीं है|

यहाँ की थाली एक बार जरूर खानी चाहिए| दो सब्जी, चावल, निम्बू चावल, सांभर, रसम, दो पूड़ी, दही, केसरी-बात, पापड़, आचार के साथ यह कई लोगों के लिए खुराक से अधिक हो जाती है| मगर इसकी खास बात है, दक्षिण भारतीय तरीके से बनीं सब्जियां| थ्री –इन –वन डोसा और उत्तपम भी पसंद किये जाते हैं|

सन 1930 में दक्षिण भारतीय सरकारी अधिकारीयों को ध्यान में रख कर खोला गया यह भोजनालय 1950 से इस स्थान पर है| यह नई दिल्ली के सरकारी कार्यालयों में बहुत लोकप्रिय है| इस भोजनालय के बाहर दक्षिण भारतीय नमकीन भी मिलता है| जो निश्चित ही उत्तर भारतीय नमकीन से अलग स्वाद देता है|

स्थान: चिदंबरम’स न्यू मद्रास होटल, खन्ना मार्किट, लोदी रोड, नई दिल्ली,
भोजन: शाकाहारी
खास: दही-बड़ा, डोसा, पोंगल, रागी डोसा,
पांच: चार

शिब्बो की कचौड़ी, अलीगढ़

शिब्बो ने आठ साल की उम्र में सन 1951 में कचौड़ी बेचना शुरू किया – आज से छियासठ साल पहले| उनके बेटे ने रणजी खेला, उनका पौत्र ऑफलाइन-ऑनलाइन कचौड़ी बेचता है| दुकान का नाम जय शिव कचौड़ी भण्डार और वेबसाइट का नाम शिब्बोजी है| होते रहिये| हम अलीगढ़ वालों के लिए वो शिब्बो और उनकी दुकान की गद्दी पर बैठने वाला हर व्यक्ति शिब्बो|

शिब्बो – अलीगढ़ी कचौड़ी की पहचान है| अलीगढ़ी कचौड़ी आम कचौड़ी की तरह मुलायम और फूली हुई नहीं होती, वरन कड़क, भुरभुरी और चपटी होती हैं| अधिकतर इनके गोलाकार में भी कमी निकाली जा सकती है| अलीगढ़ वाले इतने सख्त आटे से कचौड़ी बनाते हैं कि इसका गोल होना मुश्किल और कटा-फटा होना आसान है| कचौड़ी के अन्दर कचौड़ी का मसाला इतना कम कि कई बार मालूम भी नहीं पड़ता| अलीगढ़ में अधिकतर कचौड़ी वाले आटे में ही मसाला मिला देते हैं| लेकिन शिब्बो का अपना अलग मानक है| आम अलीगढ़ी कचौड़ी से यह थोड़ा अलग और बेहतरीन है|

शिब्बो की कचौड़ी की महत्वपूर्ण बात है – देशी घी, कड़क कचौड़ी की भुरभुरी पपड़ी और चपटापन|

आम अलीगढ़ी कचौड़ी की तरह शिब्बो की कचौड़ी भी आलू की मसालेदार सब्जी के साथ मिलती है| लोहे की कढ़ाही में हींग और तेज गरम मसाले में बनी सब्जी अपनी श्यामल रंगत और तीखे स्वाद से अलग पहचान रखती है| इसे हम कचौड़ी वाली सब्जी कहते हैं| यह सब्जी आम आलू सब्जी की तरह पतली या रसेदार नहीं होती| यह काफी गाढ़ी होती है| कई बार लोग इसमें रस बनाने के लिए सन्नाटा (अलीगढ़ी रायता) मिलाते हैं| सब्जी और सन्नाटे के मिश्रण स्वाद को और अलग ऊँचाई पर पहुंचा देता है| सभी बड़ी कचौड़ी वालों की तरह शिब्बो के यहाँ भी हल्के और तेज मसाले की सब्जी मौजूद है| हल्के मसाले का अर्थ यह नहीं की सब्जी पूरी तरह हल्की हो जाए| भाई अपनी मसालेदार इज्जत का ध्यान पूरा रखा जाता है|

कचौड़ी- सब्जी के साथ में है – सन्नाटा| सन्नाटा – यानि बहुत खट्टे दही का पतला रायता| इसकी शोभा है पीला मिर्च| यदाकदा बूंदी भी मिलाई जाती है| जितना ज्यादा खट्टा दही और जितना ज्यादा पतला सन्नाटा हो, उतना ही स्वाद आता है| बेहतरीन रायते को पीकर आपके कान भले ही लाल पीले हों, मगर हम इसे सुपाच्य मानते हैं| और मिर्च को छोड़ दें तो यह है भी सुपाच्य, मगर मिर्च न होने पर दही के बर्तन की इस धोवन को कौन पीना चाहेगा?

अलीगढ़ी कचौड़ी अलीगढ़ में हर मोड़ पर मिल जाती है| मगर शिब्बो की बात अलग है| शिब्बो की दुकान अब पहले से ज्यादा बड़ी हो गई है| बैठकर खाने का प्रबंध हुआ है| पूड़ी सब्जी, लड्डू, हलवा और जलेबी भी बेहद स्वादिष्ट मिलती है|

स्थान: शिब्बो की कचौड़ी, जय शिव कचौड़ी भण्डार, बड़ा बाजार, अलीगढ़

भोजन: शाकाहारी

खास: अलीगढ़ी कचौड़ी, आलू सब्जी, सन्नाटा, जलेबी,

पांच: साढ़े चार

खौलते हुए बुलबुले

कचनार से कच्चे और कमसिन

नाजुक से कच्चे कोयले की

धीमे धीमे दहकती हुई

भुनी सुर्ख पंच्तात्त्विय अग्नि पर

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर[1] की सुन्दर सुडौल भगौनी

में नरक के कडुए काले कड़ाहों

में तपते हुए बसंत के भरमाये

घमंडी कडुए तेल[2] की मानिंद

खौलते हुए उस शुद्ध पंच्तात्त्विय

उपचारित निर्मल निर्लज्ज जल[3]

में जबरन जबरदस्त उबलते हुए

उस मासूम हल्के मुलायम निमिषवय

वायु के बुलबुले को देखा है कभी|

 

वो उबला हुआ बुलबुला

एक पल में हवा हुआ जाता है

और छोड़ जाता है अपने पीछे

हजारों मासूम कुलबुलाती सी

किल्लेदार ख्वाहिशे के

निमिषवय बुलबुले और

उन निमिषवय बुलबुलों की

हजारो कुबुलाती ख्वाहिशें

उबलते बुलबुलों की मानिंद

जिनमें मैंने डालें हैं रंगत के

दाने आसाम के चायबागानों

चुनवाकर से मंगवाए हुए|

 

मैं उन उबलती हुई हजारों करोड़ों

मासूम कुलबुलाती सी किल्लेदार

ख्वाहिशों का ख़ुदा हूँ खराब जो

इक ख़ूबसूरत रात के बाद की

अलसाई सुरमई सुबह से पहले

ब्रह्ममुहूर्त में खौलते पानी में

उबलते ख्वाहिशमंद बुलबुलों पर

धीर वीर क्षीर समंदर के बनाये

निहायत नमकीन नमक के

सोंधे स्वाद को छिड़कता हूँ|

 

मैं खौलते पानी में उबलते हुए

उन निमिषवय बुलबुलों की

उस तड़पती हुई कराह पर

आह कर उठता हूँ अक्सर

और बुरक देता हूँ चुटकीभर

मीठी शिरीन शक्कर के

घनाकार वजनी दमदार दाने|

 

वो खौलते हुए बुलबुले

हिन्दुस्तान के आमजनता

की मानिंद चुप हो जाते हैं

मीठी शीरीन शक्कर के

धोखे में उन्हें अहसास नहीं होता

वो अब भी खौलते पानी में

गर्मागर्म उबाले जा रहे हैं|

 

और उनके उबलते हुए कंटीले

नाजुक घावों से रिसते हुए दर्द

पर करहाते हुए नीबू के रस की

दो चार अम्लीय बूंदे छोड़ देता हूँ|

 

वो मासूम सावन की बरसात की

हरियल यादों में सहम जाते हैं

वो जानते हैं अब कुछ न होगा

मगर मिनमिनाने लगते हैं

मिन्नतें मजाकिया मजेदार|

 

मैं मजाहिया मुस्कान के साथ

उतार लेता हूँ उस नामुराद

होलिका सी डरी सहमी सिमटी

सिकुड़ी से बैठी हुई उस शर्मीली

सिल्बर की सुन्दर सुडौल भगौनी

जो पलभर में तपती आग में

भुनकर सुरमई हुई जाती है|

 

खुर्जा से खरीद हुई उस

संगमरमरी चीनी मिट्टी के

रंगदार सजावटी सुन्दर शाही

चाय की प्याली में उड़ेली हुई

उस खौलती चाय को सुड़ककर

पीते हुए सोचता हूँ क्यों न

नामुराद भाई ऐश अलीगढ़ी

दिल्ली के पीर ख्वाजा की

दरगाह के बाहर चौराहे पर

नीली छतरी वाले गुम्बद के

छोटे चारबाग़ में बैठकर

मकबरा हुंमायूं को देखते हुए

खुद अपनी मल्लिका मोहब्बत

की उस रोहानी याद में एक

रोमानी सी गजल की जाए|

 

[1] हंडोलियम को देहात सिल्बर कहते हैं इसमें सिल्वर से धोखा न खाएं|

[2] सरसों का तेल

[3] आपका प्यारा आरओ वाटर

अशोक चाट भंडार, चावड़ी बाज़ार

मैं अक्सर चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर ३ का प्रयोग नहीं करता| वरना सौ की पत्ती का खर्चा पक्का है| फिर भी यह बात अलग है कि मैं जब भी चावड़ी बाज़ार जाता हूँ तो यहाँ अक्सर पहुँच ही जाता हूँ| यह हौज़ काज़ी चौक है और यहीं है अशोक चाट भंडार|

मेरा यहाँ से भावनात्मक लगाव है| दर-असल मेरे नानाजी चाट पकौड़ी के इतने शौक़ीन थे कि खुद से बनाना सीखा था उन्होंने| उनके हाथ का बनाया कलमी-बड़ा मैंने एक ही बार खाया था बचपन में कभी, आज तक वो बेहतरीन कलमी बड़ा भुलाये नहीं भूला| तो अशोक चाट भंडार की ख़ासियत यह है कि कलमी – बड़ा बनाने वाली इस से बेहतर दुकान, या कहिये इस के अलावा कोई और दुकान मैं नहीं जानता| वैसे हिन्दू अख़बार में इस दुकान से बेहतर दुकान बताने के लिए सालों पहले एक पूरी कथा छापी थी| खाने वाले दोनों जगह खाकर बहस को जिन्दा रखे हुए हैं| उस दूसरी दुकान के बारे में बात फिर कभी|

यहाँ का मेनू कोई बहुत बड़ा नहीं है, चाट-पकौड़ी की दुकानों का होता भी नहीं| मगर यहाँ स्वाद खास है और चाट तो स्वाद पर ही बिकती है| यहाँ खास बात है भारत की देशी रतालू यहाँ चाट में प्रयोग होता है| विदेश से आया आलू तो खैर है ही|

मेरी पहली पसंदीदा चाट है यहाँ – कलमी-बड़ा| यह दरदरी पीसी गई चना दाल से बनता है और इसीलिए इसे बनाना कठिन काम है| सका अपना कुरकुरा स्वाद मुंह में घुलता हुआ इसे हर-दिल-अज़ीज़ बनता है| बेहतरीन दही, अध्-उबले रतालू और हलके मसाले इसे यादगार स्वाद देते हैं| मैं आपको सलाह दूंगा, अपनी पसंद से दही- चटनी कम ज्यादा कराने की जगह दुकानदार पर छोड़ दीजिये| उसे हमसे बेहतर पता है|

इसके बाद कचौड़ी चाट का मजा लिया जा सकता है| ऐसा नहीं कि यहाँ कचौड़ी सामान्य कचौड़ी से अलग है, अलग है उसका परोसना| सब जगह कचौड़ी सब्जी या चटनी के साथ मिलती है और प्रायः नाश्ते का अहसास देती हैं| बाकि जगह से अलग यहाँ कचौड़ी नाश्ता नहीं वरन चाट है और दही, चटनी, मसाले के साथ मिलती है|

और हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी साझा कमजोरियों में से एक यहाँ है – गोल-गप्पा, जिसके पानी पर दुनिया का हर पानी – पानी भरता है| यहाँ गोलगप्पे का पानी काफी मसालेदार है और आपकी हिन्दुस्तानी जीभ के लिए यह पूरी तरह सकूं देने वाला है|

आते रहेंगे इस सत्तर साल पुरानी दुकान में|

स्थान: अशोक चाट भंडार, हौज़ क़ाज़ी, चावड़ी बाज़ार, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: कलमी-बड़ा, कचौड़ी चाट, गोल-गप्पे,

पांच: पांच