३७१ और नगालैंड

पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|

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३७० से आगे

राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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प्लेटफ़ॉर्म का पेड़

कौन बड़ा कलाकार है, ईश्वर या मानव?

किसकी कलाकृति में अधिक नैसर्गिक सौंदर्य है? मानव सदा ईश्वरीय सुंदर में अपनी कांट छांट करता रहता है| मानवीय हस्तक्षेप बेहतर मालूम होता है तो गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाता है| आखिर मानव को हर बात में अपना हस्तक्षेप करने की क्या आवश्यकता है? मानव नैसर्गिक सौन्दर्य में अपनी सुविधा के हिसाब से सुन्दरता और कुरूपता देखता है|

चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म एक का दिल्ली छोर| इंजन से लगभग तीन चार डिब्बे की दूरी पर एक सुंदर सा पेड़ है जो स्टेशन के बाहर दूर से देखने पर बड़ा सुन्दर, छायादार, प्रेममय हरा भरा दिखाई देता है| मगर जब हम प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते हैं तो आधुनिक छत और उसकी अत्याधुनिक उपछत के चलते उसका तना ही दिखाई देता है|

अच्छी बात यह है कि मानवीय सौन्दर्यकारों ने इस पेड़ में महत्ता को स्वीकार और अंगीकार किया| उन्होंने हमारे कथित आधुनिक सुविधा भोगी समाज की प्रकृति से दूरी को भी अपने सौन्दर्य कार्य में समाहित किया| पेड़ की प्लेटफ़ॉर्म पर उपस्तिथि को सीमित किया गया है|

इस पेड़ का तना तीन रंगों से रंगा गया है, शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग अच्छा न लगा हो| शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग उन कीट पतंगों को आकर्षित करता हो जिन्हें मानव पसंद न करता हो| पेड़ के चारो उसकी सुरक्षा के लिए और उनकी जड़ों और तनों  के सहारे मौजूद मिट्टी से प्लेटफ़ॉर्म गन्दा होने से बचाने के लिए सुरक्षा बाड़ा भी बनाया गया है| पेड़ का मनोहर हरापन क्रूर आधुनिक की निगाह से बचा लिया गया है| मेरे मन के इस मरोड़ से बेख़बर पेड़ अपने में मगन है| पेड़ प्लेटफ़ॉर्म को आज भी छाया देता है| पेड़ पेड़ है – पिता की भूमिका में बना रहता है| मैं उसके पास बैठकर बोधिसत्व होने की प्रतीक्षा में हूँ|

 

कुली कुचक्र

रेलवे स्टेशन पर समय बिताने के लिए मैंने बेकार खड़े कुली को पकड़ा| इधर उधर की बातें होने लगीं| वह तो सुख दुःख भी साँझा करने लगा| उसका सबसे बड़ा दुःख बहुत छोटा सा था| हमारे बैग और संदूकची में लगे पहिये| मैंने सोचा भी न था कि छोटे से दो पहिये जमीन पर नहीं उसकी छाती को रोंदते हैं और आँतों पर चलते हैं|

पहले आदमी अपने सामान को हाथ में उठाये या कंधे पर लादे हुए थक जाता था| अगर उसके पास पैसा नहीं होता तो थका हारा सामान घसीटता हुआ तेलगाड़ी बना हुआ रेलगाड़ी तक पहुँच जाता| मगर अगर उसके पास थोड़ा भी पैसा होता तो अपने बच्चों की मिठाई का ख्याल छोड़ कुली के बच्चों की पढाई का साधन बन जाता| ऐसा आदमी कटता भी बहुत था|

खाते पीते घर के बाबू लोग सबसे ज्यादा कटते| उन्हें हमेशा लगता रहता कि कुली सब लूटता है और फिर थोड़ी देर मेहनत मशक्कत के बाद कुली उसे हनुमान बाबा का अवतार लगता| भले ही पैसा देते वक़्त वो शनिचर हो जाता मगर कुली का पेट पाल देता| भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर कुली की बहुत मांग रहती| कुली भी नखरे करते| कई बार बिना मांगे लिखित मजदूरी से दोगुना मिलता तो कई बार झगड़ा होता| पैसे वाले तो खैर अपना चाकर साथ लाते और साहब लोग की तरह दुनिया भर से बचते बचाते रेलगाड़ी तक पहुँचते| कई साहब तो इस बात का पैसा देते कि तीसरे दर्जे के लोगों से बचाकर दूसरे रास्ते से उन्हें गाड़ी तक पहुँचाया जाए या उतरा जाए| कई बार लोग लौटने वक्त का कुली जाते वक़्त पक्का कर जाते| क्या साहब, कुली पर तो फ़िल्म भी बन गई| कुली लोग तो पूरा दुबई बसा गए|

मगर जब से संदूकचियाँ गाड़ी हो गईं तो कुली कटने लगे| जिन्हें काम मांगने की जरूरत नहीं होती थी, आज काम की भीख माँगने लगे| लोग स्टेशन पर कुत्ते और भिखारी के बाद कुली को ही सबसे ज्यादा दुत्कारते हैं| दो पहिये नहीं साहब यह हमारे घर का बुझा हुआ चूल्हा है|

ऐसा नहीं कि कुली लूटते है मगर कुली की मजदूरी से काम नहीं बनता| जिन्दा रहने के लिए आपको महीने का पंद्रह हजार तो चाहिए ही| रोज का पांच सौ| दिन में कितनी गाड़ी लगती हैं एक प्लेटफार्म पर जब दस गाड़ी लगें तब कुली को पांच काम पकड़ में आते हैं| उन पांच काम में अब पांच सौ भी न बनें तो घर क्या लेकर जाएँ| लोग अपना सामान दौड़ते हुए चले जाते हैं| उनकी क्या गलती| हमारा भाग्य गलत है| पहियों ने हमारे काम की इज्जत कम कर दी|

न, यशोदा हरि पालने न झुलावै

आजकल प्रसूति गृहों, महिला चिकित्सालयों और जच्चा बच्चा केन्द्रों में भी पालने नहीं होते| महंगे चिकित्सीय उपकरणों के बोझ से दबा चिकित्सा तंत्र शायद इसे अनावश्यक खर्च मानता होगा| मेरे बचपन तक पालने, भले घरों में तो थे ही, चिकित्सालयों में दिखाई देते थे| मुझे बचपन का अपना लकड़ी का नक्काशीदार पालना आज भी याद है, हम तीनों बहन भाई उस में कुछ दिन रहे और बाद में वह शानदार पालना नष्ट हो गया| माँ कई बार काम करते समय अपनी कलाई या बांह से पालने की रस्सी बांध लेती थी, जिससे पालना बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के झूलता रहे| धीरे धीरे पालने का चलन ख़त्म हुआ|

आज न माँ बच्चों को पालने में सुलाती है, न पालना झुलाते हुए लोरी गाती है| माँ भी बच्चों को अपने बिस्तर पर सुलाना पसंद करती है| आज माएं शायद बच्चों से अधिक करीब हैं| बच्चे माँ, नानी दादी, धाय या किसी और की गोद में होते हैं या उनकी बगल में सोए रहते हैं| मजे की बात है कि आजकल दादी नानियाँ भी पालने के लिए जोर नहीं डालतीं| आखिर क्या हुआ कि एक और गौरवशाली भारतीय परम्परा नष्ट हो गई|

भारत में रोजगारपरक पलायन, छोटे घर का चलन और सयुंक्त परिवार का टूटना तीन ऐसी घटनाएँ थीं कि माँ बच्चों के अधिक निकट आने लगीं और बच्चे उनके अकेलेपन के साथी बनने लगे| यह सब न सिर्फ माँ के अकेलेपन का इलाज था बल्कि कई बार नापसंद या हिसक पति से राहत भी देता था| इससे बच्चों का क्या लाभ हुआ?

भारतीय विशेषज्ञों की बात आजकल के स्वदेशी जमाने में कोई सुनता नहीं है| इसलिए हम पश्चिमी विशेषज्ञों की बात करेंगे|

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स[1] पहले छः महीनों के लिए माँ को अपने बच्चे के साथ एक ही कमरा साझा करने की सलाह देता है। हालांकि यह संस्था माँ को बच्चे के साथ एक ही बिस्तर पर सोने की सलाह नहीं देती| उसके अनुसार, बच्चों को अपना खुद का क्षेत्र और अपनी नींद के लिए बिस्तर चाहिए| संस्था एक स्थिर पालने की सलाह देती है| यह भारत में चलन में रहे झूलने वाले पालनों से थोड़ा अलग है| संस्था के मुताबिक यदि आप पालना नहीं खरीद सकते या उसे रखने की जगह न हो तो बस्सिनेट लेने की सलाह दी जाती हैं|

यह तय है कि कपड़े से बने अस्थाई पालने जन्म के प्रारंभिक कुछ एक दो महीने में बच्चे को गर्भ जैसी सुरक्षा का अहसास देते हैं परन्तु उसके बाद वह उसके विकास क्रम में बाधा बनते जैसे करवट लेने में कठिनाई, रीढ़ को सीधा करना और रखना न सीख पाना|

फ़िनलैंड में १९३० से (तब फ़िनलैंड बहुत गरीब देश था) सरकार प्रत्येक बच्चे को जन्म के समय कार्डबोर्ड का एक डिब्बा देती है|[2] इसमें उसकी जरूरत की बहुत सी चीजें होती हैं जिन्हें बच्चा अपने शुरुआती जीवन में प्रयोग करता है| सामन निकालने के बाद यह कार्डबोर्ड का डिब्बा बच्चे का पालना होता है| यह माना जाता है कि फ़िनलैंड में शिशु मृत्युदर कम रखने में इस डिब्बे का बहुत योगदान है|

माना जाता है कि पालने में सोने वाले बच्चे जल्दी ही स्वतंत्र और विकिसित व्यक्तित्व बनने लगते हैं|

[1] https://www.webmd.com/parenting/baby/baby-prep-17/buying-baby-furniture

[2] https://www.bbc.com/news/magazine-22751415

हत्यारे तीमारदार!!

क्या कोई तीमारदार वाकई बीमार के मरने पर गुस्सा हो सकता है? ऐसा करने वाला पागल होना चाहिए या बेहद डरपोक| बीमारों के मरने पर डॉक्टर को पीटने वाले समाज की पतली गलियों में रहने वाले आवारा कुत्ते जैसे है| जिस प्रकार उन आवारा कुत्तों को पिटने का डर लगा रहता है, तीमारदारों को सामाजिक बुराई का डर लगा रहता है| डॉक्टर को पीटने में इनका मरीज से प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि मरीज तो कष्ट से मुक्त हो गया| उसके जीवन चक्र का एक चक्र समाप्त| शायद मोक्ष भी मिला हो|

हमारे तीमारदार को लगा रहता है – समाज क्या कहेगा, ठीक से इलाज नहीं कराया? सही जगह नहीं ले गए| पैसा नहीं खर्च किया होगा| अधिकतर तीमारदार का हल्ला यही होता है कि साले डॉक्टर जब पैसा फैंक रहे थे तो मरीज कैसे मर गया?

हमें इलाज कब चाहिए? हमें तो खर्च की फेहरिश्त चाहिए तो समाज के मुंह पर मार सकें| डॉक्टर पर हमला करने वाले तीमारदार अपनी रकम का जादू असफल होने का गुस्सा डॉक्टर पर उतार रहे होते हैं|

कोई कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर मरीज को क्यों मारेगा? कर्त्तव्यविमुख डॉक्टर के लिए तो खैर मरीज सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है| डॉक्टर तो इस जिद्दोजहद में लगे रहते हैं कि मरीज ठीक हो न हो मगर जिन्दा रहे| अगर मरीज जिन्दा रहे, आता जाता रहे, तो डॉक्टर का महीने का खर्च भी निकलता रहे| डॉक्टर को पता है इंसान चाहता क्या है – जिन्दगी| भले ही वो जिन्दगी कद्दू हो जाए| देश भर में लाइलाज बीमारियों के सालों महीनों से मराऊ पड़े मरीजों का लेखा जोखा करा लीजिये| बिना किसी सफलता की आशा के बाद भी उन्हें जिन्दगी की पगडण्डी पर घसीटा जा रहा है| आखिर क्यों? समाज का डर, क़ानून का कमीनापन, तीमारदारों का भोलापन और सबसे अंत में डॉक्टर का लालच|

वास्तव में डॉक्टर पर ऊँगली उठानी भी है तो पूछिए कि दस साल एक मरीज को वेंटिलेटर पर क्यों लटका रखा है? एक गोली के जगह अठारह गोली एंटीबायोटिक क्यों लिख दी? बिना मतलब के महीने महीने अलाना फलाना टेस्ट क्यों हो रहा है? बेचारा डॉक्टर दवा कंपनी का दबाव तो फिर भी सह ले मगर मरीज के मामा की गालियाँ कैसे सहे?

घसीट घसीट कर जिन्दगी जीता मरीज विज्ञान या चिकित्सक से अधिक समाज की असफलता है| इस पर कोई नहीं बोलना चाहता| अपने चिकित्सकों पर अविश्वास कीजिये – लम्बे इलाज पर अविश्वास कीजिये| कभी कभी यह भी सोचिये कि कहीं आपका डॉक्टर मरीज को जबरन जिन्दा रखने के सहारे आपका परिवार तो नष्ट नहीं कर रहा| मगर उसपर अपने मरीज की मौत का इल्जाम नहीं लगाइए|

मरती हुई नदी अम्मा

क्या आप एक पात्र में गंद या गन्दा पानी लेकर अपनी माँ के सिर पर डाल सकते हैं?

अगर आपका उत्तर नकार में है तो आप घटिया किस्म के झूठे हैं| अगर आप एक भारतीय हिन्दू हैं तो आप झूठे ही नहीं महापापी भी हैं| ईश्वर अनजाने में किये गए पाप को तो माफ़ कर भी दे मगर जानते बूझते अनजान बनने से तो काम नहीं चलेगा| ईश्वर के माफ़ करने से क्या माँ दिल से माफ़ करेगी|

नदियाँ, जिन्हें सारा भारत माँ कहता है और जिनका देवी कहकर मंदिरों में पूजन हो रहा है, उनके माथे ऊपर कूड़ा करकट कौन डाल रहा है?

माँ के दुर्भाग्य से यह सब उसकी अपनी धर्म संताने कर रही हैं| हभी हाल में माँ यमुना के किनारे पर उनके पूजन के नाम पर प्रदूषण करने वाले एक स्वनामधन्य हिन्दू धर्मगुरु ने तो अपनी गलती मानने और अदालत द्वारा लगाये गए जुर्माने को देने से इंकार कर दिया| सुबह सुबह नदियों में आचमन करने जाते पूंजीपति अपने कारखानों में प्रदुषण पैदा करते हैं और उसे बिना साफ़ सफाई के नदियों की गोद में डाल देते हैं| बहुत से तो इनता अच्छा करते हैं कि कारखाने में या उसके पास धरती की कोख में अपनी पैदा की गई गंद डाल देते हैं|

अगर किसी माँ का इतना अपमान होगा तो उनका मन मलिन न होगा| क्या वो माँ ये न कहने लगेगी कि ईश्वर उसे ऐसे संतान से मुक्ति दे? क्या वो अपने लिए मृत्यु की कामना न करने लगेगी?

शायद अब नदियाँ ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं हैं, हमें पानी मत देना मौला|