मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा कुलश्रेष्ठ का मल्लिका ऐतिहासिक ताने बाने में बुना साहित्यिक पृष्ठभूमि का उपन्यास है| इस उपन्यास की नायिका मल्लिका के बारे में हिंदी में हमेशा चर्चाएँ रहीं हैं और उनके बारे में गंभीरता से छपता भी रहा है| परन्तु उनके बारे में बहुत कम वर्णन मिलता है| यह विडंवना है कि शुद्धतावादी भारतीय समाज हिंदी की प्रथम महिला साहित्यकार और अनुवादक मल्लिका का नाम बड़ी आसानी से भुला देता है| यह जानकारी तो मिल जाती है कि हरिश्चंद पत्रिका का नाम हरिश्चंद चन्द्रिका रख दिया गया था परन्तु चन्द्रिका यानि मल्लिका के बारे में हम मौन हो जाते हैं| दुर्भाग्य है कि हिंदी की प्रथम महिला होने का गौरव रखने वाली इस स्त्री को हम भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेमिका के आगे कोई परिचय नहीं दे पाते| प्रसंगवश कह दूँ कि हम प्लासी युद्ध में अंग्रजों के सहायक रहे अमीचंद के प्रपोत्र होने के लिए आज तक हरिश्चंद के पक्ष विपक्ष में चर्चा कर लेते हैं परन्तु मल्लिका के बारे में कोई चर्चा भी नहीं होती|

कहा सकता है कि यह उपन्यास उस महिला के बारे में है जिसने हिंदी में बंगला उपन्यासों का अनुवाद कर कर इस विधा से न सिर्फ हिंदी का परिचय करवाया, साथ ही हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास –  कुमुदनी – भी लिखा|

इस उपन्यास में मनीषा कुलश्रेष्ठ में मल्लिका के सामाजिक और साहित्यिक पक्ष को उभारने का प्रशंसनीय प्रयास लिया है| स्पष्टतः यह प्रयास जानकारियों के अभाव के चलते साहित्यकार मल्लिका के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाया है| परन्तु मेरा मानना है कि मल्लिका खुद भी अपने जीवन संघर्ष में अधिक नहीं टिक पाई| उस समय का समाज, देशकाल और घिसीपिटी परम्पराएँ हिंदी, राष्ट्र और स्वयं मल्लिका के लिए भारी पड़ीं| उन स्तिथियों में यह उपन्यास उनके समय के संघर्षों को उभारने में सक्षम रहा है|

उपन्यास में निजी वर्णनों में सच्चाई का पुट ढूँढना बुद्धिमत्ता नहीं होगी| लेखिका ने उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उन्हें वास्तविकता के साथ गढ़ा है और स्वाभाविकता प्रदान की है|

आम पाठक और हिंदी प्रेमी के लिए यह उपन्यास वरदान की तरह है जो उस समय के भाषाई संघर्षों, सामाजिक अवचेतना, सामाजिक पुनर्निर्माण, व्यक्तिगत और राजनैतिक विरोधाभासों को स्पष्टतः रेखांकित करने में सफल रहा है| यह उपन्यास एक बार में पूरा पढ़ लिए जाने ले लिए पाठक को प्रेरित करता है|

जिन पाठकों को अमीचंद, बंकिमचन्द्र, ईश्वरचंद विद्यासागर, भारतेंदु हरिश्चंद, हिंदी के आदिकाल के बारे में समुचित जानकारी है, उनके लिए इसे पढ़ना और गुनना बेहद रुचिकर है|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

 

पुस्तक – मल्लिका
लेखक – मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक – राजपाल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 9789386534699
पृष्ठ संख्या – 160
मूल्य – 235 रुपये

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टहलने वाली शामें

शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

किन्डल पुस्तक पढ़ने के तरीके

पहली बार स्मार्ट फ़ोन खरीदने, चालू करने और फोन के कुछ जरूरी क्रियाकलाप करने के तुरंत बाद मैंने किन्डल एप डाउनलोड किया था| मेरे जैसे किताबी कीड़ों के लिए अमेज़न को दुआएं देने का प्रमुख कारण उनकी ऑनलाइन शोपिंग नहीं, बल्कि उनका और हमारा पहला प्यार किताबें ही हैं|

सन १९९४ में अमेज़न का प्रारंभ ही किताबों की ऑनलाइन दुकान के रूप में हुआ था| आज अमेज़न सेकड़ों किताबें किन्डल फॉर्मेट में मुफ्त उपलब्ध कराता है| भारतीय भाषाओँ की पुस्तकें भी उपलब्ध रहती हैं|

इन सब किताबों को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है किन्डल रीडर नामक उपकरण| इसे आप इस लिंक पर खरीद सकते हैं| मगर यह एकमात्र तरीका नहीं है| यह आपका चलता फिरता पुस्तकालय है, जिसमें सेकड़ों पुस्तकें एक साथ रखी जा सकतीं हैं| इसमें आप फॉण्ट का साइज़ घटाने बढ़ाने से लेकर कॉपी पेस्ट हाईलाइट शब्दकोष जैसी सुविधाओं का लाभ ले पाते हैं|

यदि आपके पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है या आपको यह छोटा लगता है तो आप क्लाउड रीडर का प्रयोग करते हुए पुस्तकें लैपटॉप या कंप्यूटर पर भी पढ़ सकते हैं| यह किसी भी ब्राउज़र में चल सकता है| आपको सिर्फ अपने अमेज़न अकाउंट से साइन इन या लोग इन करना है|

इसके अलावा भी अन्य तरीके हैं –

किन्डल लाइट एप भी अब उपलब्ध है| इसमें कुछ सुविधाएँ कम हैं परन्तु पढ़ने का आनंद कम नहीं होता| यह कम तेज मोबाइल नेटवर्क में अच्छा काम करती है|

इन सभी तरीकों से भी आपको पढ़ने का वही लुफ्त मिलता है, जैसा किन्डल उपकरणों पर पढ़ने में मिलता है| आपकी किताबें चोरी नहीं होतीं, न कटती फटती गलतीं, न दीमक उन्हें नुकसान पहुंचती| साथ ही आप पढ़ी हुई पुस्तकों को रिमूव कर सकते हैं| ऐसा करने पर भी दोबारा नहीं खरीदनी पड़ेगी|

आप इन किन्डल पुस्तकों को उपहार में और बहुत सी किन्डल पुस्तकों उधार में भी दे सकते हैं| उधार दी गई किन्डल पुस्तकें लौटने की आपको चिंता नहीं करनी होती| यह नियत समय में आपके पास खुद वापिस आ जाती हैं|

बहुत सी किन्डल पुस्तकों में सुनने की भी सुविधा आ रही हैं| इसका लाभ विदेशी भाषा छात्र उठा सकते हैं| जैसे हिंदी भाषी पाठक अंग्रेजी/फ्रेंच पुस्तक पढ़ते समय सुनते जाएँ तो पढ़ना और बोलना भी सीख सकते हैं| इसके अलावा टेक्स्ट तो स्पीच सुविधा भी उपलब्ध है|

किन्डल एप पर अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है|

अपने किन्डल स्टोर का चुनाव ध्यान से करें या जरूरत से हिसाब से बदलते रहें| अमेज़न डॉट इन पर पंजीकृत किन्डल उपकरण या एप किसी दूसरे देश के किन्डल स्टोर से पुस्तक खरीदने में दिक्कत महसूस कर सकते हैं| लन्दन में रहकर भी भारतीय किन्डल स्टोर से किन्डल पुस्तक खरीदी जा सकती है|

अब तो आप मेरी यह पुस्तक भी न सिर्फ़ खरीद ही सकते हैं बल्कि आसानी से पढ़ भी सकते हैं –

उम्मीद भरा घर

उम्मीद भरा घर

पुस्तक – उम्मीद भरा घर
लेखक – ऐश्वर्य मोहन गहराना
भाषा – हिंदी
पुस्तक रूप – किन्डल ई पुस्तक
वितरक – अमेज़न एशिया पेसेफिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – कहानी
पृष्ठ संख्या – १०६ (अनुमानित)
मूल्य – मात्र ४९ रुपये

उम्मीद भरा घर

मानवता का इतिहास केवल युद्धों और राजाओं का इतिहास नहीं है| बीमारियों का अपना अलग इतिहास और ऐतिहासिक प्रभाव रहा है| एक ही बीमारी का असर हर किसी व्यक्ति पर अलग अलग होता है| समय के साथ बीमारी भी रूप बदलती है तो बीमारी के नए इलाज भी इजाद होते हैं| परन्तु बीमारियाँ पूरे परिवार को हिलाकर रख देतीं है| कई बार घर बीमारियों की वजह आर्थिक रूप से बर्बाद हो जाते हैं, तो कभी उन्हें मानसिक रूप से बीमारी लम्बे समय तक परेशान करती है| ऐसा तब भी होता है जब बीमार व्यक्ति पूरी तरह ठीक हो जाए| अगर बीमारी बनी रह जाए तब समस्या है ही|

मैंने इस कथा पुस्तक में एक बीमारी से प्रभावित घर के बारे में बात की है| यह लगभग हर घर की कथा है जिसने बीमारियों का सामना किया है|

घर बीमारियों के कुछ गम्भीर अनुभवों से गुजरता है और अपनी भावनात्मक कथा कहता जाता है| घर द्वारा भोगी हुई इस पीड़ा के साथ हम परिवार और समाज के संघर्षों से गुजरते हैं| कोशिश रही है कि गंभीर परिस्तिथियों में भी कथा बोझिल नहीं हो जाए| पूरी कथा में घर अपनी उम्मीद नहीं खोता है|
अलग ही शैली में लिखी गई यह कथा स्वाभाविक रूप से सरल सहज भाषा में आगे बढ़ती है और पाठक को बाँध कर रखने का प्रयास करती है|

यह पुस्तक पाठकों के लिए प्रकाशित की गई है| इस समय यह इ-बुक फॉर्मेट में अमेज़न किन्डल पर उपलब्ध है| इसे मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप, कंप्यूटर, आदि विभिन्न उपकरणों के किन्डल एप पर पढ़ा जा सकता है| खरीदें पढ़े और अपना विचार अवश्य साँझा करें| विशेष आग्रह है कि पुस्तक पढ़ने के बाद अमेज़न पर इसका रिव्यु अवश्य दें|

पुस्तक प्राप्त करने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं|

उम्मीद भरा घर

उम्मीद भरा घर

पुस्तक – उम्मीद भरा घर
लेखक – ऐश्वर्य मोहन गहराना
भाषा – हिंदी
पुस्तक रूप – किन्डल ई पुस्तक
वितरक – अमेज़न एशिया पेसेफिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – कहानी
पृष्ठ संख्या – १०६ (अनुमानित)
मूल्य – मात्र ४९ रुपये

चिकित्सा सेवा सुधार

यह लेख पिछले लेख स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा की आगे की कड़ी है|

दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाएँ देना एक बेहद महंगा कार्य है| उस से भी अधिक महंगा है किसी भी बड़ी बीमारी के लिए मूलभूत ढांचा खड़ा करना| एक समय था कि सरकारें ही इस प्रकार के बड़े खर्चे वहां करने की स्तिथि में थीं| आज दुनिया भर में गरीबी कम हुई है और व्यवसायिक स्वास्थ्य दे पाना संभव हुआ है| मगर, आज भी बेहद बड़ी बीमारिओं के लिए व्यावसायिक तौर पर स्वास्थय सेवाएं दे पाना कठिन है| यह बड़े और महंगे खर्च वाले चिकित्सालय बेहद बड़े शहरों में ही उपलब्ध हो पा रहे हैं| दूसरी तरफ अच्छे अस्पतालों में इलाज कराने की चाह के चलते छोटे शहरों और गाँवों के अस्पतालों में मरीजों की कमी है| मरीजों की इस कमी के चलते अच्छे इन अस्पतालों के लिए अच्छे चिकित्सक ला पाना कठिन होता जा रहा है| इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों को छोटे और बेहद बड़े अस्पातालों और इलाजों में निवेश करने की आवश्यकता है|

बीमा मरीज को इलाज सस्ता या मुफ्त दे सकता था, मगर इलाज नहीं दे सकता| इलाज उपलब्ध करने का काम सरकार का है, चाहे यह पूंजीवादी सरकार हो या साम्यवादी| निजी क्षेत्र को साथ लेकर चलना उचित है, परन्तु स्वास्थय सेवाओं की निजी क्षेत्र ही पर छोड़ देना उचित नहीं जान पड़ता| बीमा सम्बन्धी कोई भी सरकारी योजना आज केवल निजी चिकित्सालयों के दम पर सफल नहीं हो सकती|  उदाहरण के लिए आज तक निजी क्षेत्र एम्स जैसे एक भी संस्थान को खड़ा नहीं कर पाया है| टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई जैसे एक दो उदहारण को छोड़ दें तो निजी क्षेत्र का पूरा लक्ष्य स्वास्थ्य सेवाओं का व्यवसायिक दोहन तक ही सिमटा हुआ है|

मेरा सुझाव यह है कि

  • राज्य सरकारें (स्वास्थ्य राज्य का संवैधानिक विषय है) स्वास्थ्य सेवा की उपसेवा के रूप में बीमा पूल तैयार करें और उस से इक्कठा होने वाले धन से स्वास्थय सेवाए प्रदान करे|
  • हर नागरिक को इस सरकारी बीमा पूल से सरकारी और निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा सुविधा मिले|
  • सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा मूल्य लिया जाये और चिकत्सकों को भी सरकारी बीमा पूल से व्यवसायिक सेवामूल्य दिया जाए|
  • निजी क्षेत्र को चिकित्सा अनुसन्धान जैसे क्षेत्रों में आने के लिए प्रेरित किया जाए और उसका व्यवसायिक उपयोग करने की अनुमति हो|
  • दवाओं और अन्य उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण हो परन्तु इतना नहीं कि यह क्षेत्र लाभ का सौदा नहीं रहे|
  • चिकित्सा उत्पाद क्षेत्र में आपसी प्रतिस्पर्था को बढ़ावा दिया जाये|

स्वास्थ्य बीमा बनाम स्वास्थ्य सेवा

बीमा, पूँजीवाद का सर्वाधिक साम्यवादी उत्पाद है| इसमें पूँजीवाद की लम्पटता और साम्यवाद की अनुत्पादकता का दुर्भाग्यपूर्ण सम्मिश्रण है|

बीमा का सीमित प्रयोग सफलता की कुंजी है| उदारहण के लिए केवल शुरूआती जीवन में लिया गया सावधि जीवन बीमा आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है| अन्य जीवन बीमा उत्पाद बीमा कंपनी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं|

मैं जिन बीमा उत्पादों का समर्थक हूँ उनमे स्वास्थ्य बीमा शामिल है| परन्तु कबीर दास जी बीमा के बारे में ही कह गए हैं: अति का भला न चुपड़ना| यहाँ हम केवल स्वास्थ्य बीमा की बात करेंगे|

पहली बात यह है कि इस बात का ख्याल रखा जाए कि बीमार न पड़ा जाए| उस तरह न सोचा जाये जिस तरह हम दिल्लीवाले वायु प्रदूषण सम्बन्धी बीमारियों के बारे में कभी कभी सोच लेते हैं – बीमा के खर्चे पर इलाज कराएँगे| ध्यान रखें चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और दवाओं के दुष्प्रभाव आपको ही झेलने होंगे – बीमा कंपनी को नहीं| अच्छे पर्यावरण के लिए सरकार, साम्यवाद और पूँजीवाद से लड़िये– यह बहुत बड़ा बीमा है|

दूसरी बात, स्वास्थ्य बीमा केवल इस बात का आश्वासन है कि अगर आप कोई स्वास्थ्य सेवा लेंगे तो उसका खर्च बीमा कंपनी उठाएगी| यह बात तो हम सभी जानते हैं कि अधिकतर बीमा कंपनी बड़ी और खर्चीली बीमारियों को सामान्य स्वास्थ्य बीमा से बाहर रखतीं हैं| इस बीमारियों के लिए आपको अलग से बीमा लेना होत्ता है या फिर रामभरोसे बैठना होता है| अगर फिर भी बीमारी हो जाती है तब आपकी बचत खर्च होने लगती है| बीमा चाहे निजी हो या सरकारी, इस बात का ध्यान रखें|

तीसरी बात, अगर आप दुनिया की सारी बीमारियाँ अपने बीमा में शामिल करवा भी लेते हैं तो बीमा कंपनी इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकती कि किसी बीमारी का इलाज आपके देश में या फिर इस दुनिया में कहीं भी है| इस बारे में सोचने की गंभीर आवश्यकता है|

क्या हमारे पास स्वास्थ्य सेवा का मूलभूत ढाँचा है?

आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|