बुलावा गुजिया का

अगर मैं आप को गुजिया खाने का बुलावा दे रहा हूँ तो शायद आप भारतीय संस्कृति से पूरी तरह परिचित नहीं हैं| अगर आप को त्यौहार पर पकवान खाने का बुलावा देना पड़े तो आप या तो बाहरी व्यक्ति हैं या गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी, पितर, भूत, प्रेत जिन्न| अगर आप भारतीय या भारत प्रेमी हैं तो चले आइये गले मिलने और गुजिया क्या घर में जो कुछ रूखा सूखा होगा पाइयेगा|

यह बुलावा गुजिया बनवाने के लिए मेरे घर आने का है| अपना चकला बेलन साथ लाइए| होली के दो चार गीत भी याद कर कर आइये| होली सिर्फ रंग नहीं है| होली बाजार से गुजिया खरीदकर ले आने की औचारिकता का नाम भी नहीं है| समय के साथ हम सब यह करने लगे हैं, मगर यह अपने आप से और अपनी सामाजिक संस्कृति से खिलवाड़ है|

उन एक मंजिला मकानों की छतें कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी होतीं| पड़ोसी की रसोई से केवल खुशबू आपके आँगन तक नहीं आती थी, आपके लिए दिल खोल बुलावा लाती थी| खुशियाँ सिर्फ परिवार के साथ चुपचाप ढ़ाबे पर खाना खाने का नाम नहीं थीं| वरक, पापड़ और न जाने क्या क्या मिलकर बना करता था| माँ गरीब पड़ोसियों के घर रवा सूजी की गुजियाँ उतने चाव से बनवा आतीं जितने चाव से वो हमारे घर मेवा मखाने की गुजियाँ बनवाने आतीं| दोनों के अपने स्वाद थे| हम बच्चे सूजी की गुजियाँ मांग कर लाते और दूध में गला कर उसकी खीर बना कर खाते| हर घर पकवान का स्वाद अलग होता, अलग मजा होता और अलग अलग वाह वाह होती| आज कितना नीरस है हर दूकान एक सा पकवान|

सुबह से नहीं, हफ्ते भर पहले से बुलावा लगता| दिन तय रहता| दूध वाले से अतिरिक्त दूध का दिन भी सब तय रखते| बाजार में मावा कम हो जाए मगर घरों में दूध बराबर आता –  दो पैसे से दूधिये अमीर नहीं बना करते| बड़े कमरे या बरामदे में जमीन पर गद्दे और चादर बिछतीं| मोहल्ले भर के चकले बेलन सजते| औरतें होली गातीं आतीं और उनके बीच रसिया छिड़ता| कभी कभी हंसी मजाक हदें छूने लगता और दिल उछालें भरता| बच्चे बारी बारी से गुजियाँ सुलाते| बाद में गुजियाँ सिंकना शुरू होती तो पूरे मोहल्ले बंटा करतीं|

नोट – यह आलेख बाजार से लाई गुजिया खाते हुए अपराध बोध में लिखा गया हो सकता है, आप भी इन भावनाओं को साँझा कर सकते हैं|

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होली में भरें रंग

जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

शौर्य बनाम शहादत

शहीदों की जय है| वीरगति जैसे अधिक उपयुक्त शब्दों को छोड़कर शहीद का प्रयोग बढ़ गया है| वीरगति प्राप्त करने के लिए शौर्य की जरूरत हैं, शहीद होने के लिए एक मकसद और मरने की| शहीद शब्द के प्रयोग में बहुत सारी सुविधा रहती है| किसी दुर्घटना, आतंकवादी या छापामार हमले, से लेकर प्राकृतिक आपदा तक में बिना किसी वीरता का प्रदर्शन मारे जाने वाले सेनिकों या असेनिकों के किये शहीद का प्रयोग करने की सुविधा है|

आधिकारिक शब्दावली के किल्ड इन एक्शन में एक विशेष बात है| यह शब्द सेन्य मृत्यु को अनावश्यक चमकदमक से दूर रखता है| इसका अपना उचित कारण है| सोचिये अगर शहादत की चमकदमक सेन्य मृत्यु के साथ जोड़ दी जाए तो सेनिक लड़ेंगे या शहीद होंगे? यह बहुत ही चिंताजनक स्त्तिथि हो सकती है| सेनिक का काम शहीद होना नहीं है, शौर्य प्रदर्शन है| यह बाद सुनने समझने में निंदनीय लग सकती है कि कोई सेनिक शौर्य प्रदर्शन के स्थान पर शहीद होना पसंद करेगा| परन्तु यह निश्चित रूप से सही है कि एक अनावश्यक शब्द उसके लिए साहस और शौर्य बनाये रखने की प्रेरणा कम कर सकता है| उसकी साहसपूर्ण वीरगति का अगर सामाजिक मूल्य न रह जाए तो उसके लिए एक प्रेरणा की स्पष्ट कमी दिखाई देती है|

अगर आप समाचार माध्यमों पर गौर करें तो पाकिस्तान सीमा पर या कश्मीर में होने वाली सेन्य मृत्यु को जिस प्रकार चमकदमक प्रदान की जाती है उससे क्या ऐसा भाव नहीं आता कि अन्य क्षेत्र में होने वाली सेन्य मृत्यु कम गरिमावान हैं? यही और इसी तरह की बातें हमारी चिंता का विषय हैं|

वीरगति को प्राप्त करना एक वीर की कामना है| वह देश रक्षा करे, युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाए| वह अगर मरे तो कायर की मौत न मरे – ऐसा अक्सर वीर कहा करते हैं| क्या वो कायर होते हैं जो उन्हें कायर की जैसी मौत की चिंता होती है? नहीं, मगर वीर मृत्यु का उचित वरण जानते हैं|

कोई सेन्य मृत्यु कम नहीं होती| परन्तु युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाने का अवसर हर वीर को नहीं मिलता| यह दुर्भाग्य वीरों की चिंता और प्रेरणा है, कुछ वीरों को ही वीरगति दिखाने का अवसर मिलता है|

लच्छेदार शब्दजाल हानिकारक हो सकता है|

युद्ध का नशा

जब देश पिछले तीन युद्ध जीत चुके हो तब जनता के लिए युद्ध का विचार सरल होता है| परन्तु अगर देश पिछले पैतालीस साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा हो तो यह विचार युद्ध के उन्माद में बदलना सरल होता है| किसी को यह याद नहीं रहता कि विजेता पक्ष से कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए, कितने बंदी बना और लौटे नहीं, कितने भगौड़े घोषित किये गए| सब जीत की कहानियाँ कहते हैं, जीत के घाव सीने पर नहीं होते| यह सब उस जनता के लिए अधिक सरल होता है, जिसका युद्ध से वास्ता मात्र टेलिविज़न पर पड़ता है| जिन्हें घर में सोफ़े पर बैठकर रिमोट हाथ में लेकर युद्ध देखना होता है उनके लिए युद्ध का अर्थ किसी विडियो गेम से अधिक नहीं होता|

युद्ध मूर्खों का मनोरंजन है, महामूर्खों का बदला है, और अपरिपक्व राजनीतिज्ञ की रणनीति है|

बहुत मित्र गीता और महाभारत को बार बार युद्ध के समर्थन में सामने लाते हैं| परन्तु सब जानते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण युद्ध की तैयारियां होने के बाद भी शांतिदूत बनकर कौरवों से मिलने गए थे| उन्होंने सालों साल टलते युद्ध को एक बार फिर टालने का प्रयास किया| महाभारत में हुई तबाही कथा के रूप में सबके सामने है| क्या मानवता, क्या भारतवर्ष, क्या जम्बूद्वीप विजयी हुआ? जिन्हें लगता है कि भारत और पाकिस्तान भारतवर्ष का भाग नहीं हैं, उन्हें सिर्फ क्षणिक इतिहास का बोध है| वह भूल रहे हैं कि गंधार से गंगासागर तक भारतवर्ष का अमूर्त स्वरुप है, इस भूमि में राज्य बनते बिगड़ते रहते हैं| वह भूल रहे हैं, देशों के मानचित्र समय बदलता है| महाभारत में रहे राष्ट्र आज नहीं हैं, मगर भारतवर्ष आज भी अपने घाव सहला रहा है|

किसी भी युद्ध का अंत अंतिम विनाश से होता है या फिर वार्तालाप से| यह सही है कि विजेता इतिहास रचता है| बार बार बांग्लादेश का उदाहरण न दें, वहाँ का सत्य मात्र भारतीय सेना नहीं है, जन विद्रोह, गहन कूटनीति, गंभीर राजनीति, सामरिक रणनीति और उचित समय का इन्तजार उसका मूल था| मगर उस जीत से भी भारत को क्या मिला – अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी, असम समस्या, जलता हुआ उत्तर पूर्व, अप्रशिक्षित, घरेलू नौकर, और ढेर सारे युद्ध उन्मादी !!

किसी भी उन्माद से बचें| युद्ध की देवी बलि मांगती हैं – केवल दुश्मन की बलि नहीं|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा कुलश्रेष्ठ का मल्लिका ऐतिहासिक ताने बाने में बुना साहित्यिक पृष्ठभूमि का उपन्यास है| इस उपन्यास की नायिका मल्लिका के बारे में हिंदी में हमेशा चर्चाएँ रहीं हैं और उनके बारे में गंभीरता से छपता भी रहा है| परन्तु उनके बारे में बहुत कम वर्णन मिलता है| यह विडंवना है कि शुद्धतावादी भारतीय समाज हिंदी की प्रथम महिला साहित्यकार और अनुवादक मल्लिका का नाम बड़ी आसानी से भुला देता है| यह जानकारी तो मिल जाती है कि हरिश्चंद पत्रिका का नाम हरिश्चंद चन्द्रिका रख दिया गया था परन्तु चन्द्रिका यानि मल्लिका के बारे में हम मौन हो जाते हैं| दुर्भाग्य है कि हिंदी की प्रथम महिला होने का गौरव रखने वाली इस स्त्री को हम भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेमिका के आगे कोई परिचय नहीं दे पाते| प्रसंगवश कह दूँ कि हम प्लासी युद्ध में अंग्रजों के सहायक रहे अमीचंद के प्रपोत्र होने के लिए आज तक हरिश्चंद के पक्ष विपक्ष में चर्चा कर लेते हैं परन्तु मल्लिका के बारे में कोई चर्चा भी नहीं होती|

कहा सकता है कि यह उपन्यास उस महिला के बारे में है जिसने हिंदी में बंगला उपन्यासों का अनुवाद कर कर इस विधा से न सिर्फ हिंदी का परिचय करवाया, साथ ही हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास –  कुमुदनी – भी लिखा|

इस उपन्यास में मनीषा कुलश्रेष्ठ में मल्लिका के सामाजिक और साहित्यिक पक्ष को उभारने का प्रशंसनीय प्रयास लिया है| स्पष्टतः यह प्रयास जानकारियों के अभाव के चलते साहित्यकार मल्लिका के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाया है| परन्तु मेरा मानना है कि मल्लिका खुद भी अपने जीवन संघर्ष में अधिक नहीं टिक पाई| उस समय का समाज, देशकाल और घिसीपिटी परम्पराएँ हिंदी, राष्ट्र और स्वयं मल्लिका के लिए भारी पड़ीं| उन स्तिथियों में यह उपन्यास उनके समय के संघर्षों को उभारने में सक्षम रहा है|

उपन्यास में निजी वर्णनों में सच्चाई का पुट ढूँढना बुद्धिमत्ता नहीं होगी| लेखिका ने उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उन्हें वास्तविकता के साथ गढ़ा है और स्वाभाविकता प्रदान की है|

आम पाठक और हिंदी प्रेमी के लिए यह उपन्यास वरदान की तरह है जो उस समय के भाषाई संघर्षों, सामाजिक अवचेतना, सामाजिक पुनर्निर्माण, व्यक्तिगत और राजनैतिक विरोधाभासों को स्पष्टतः रेखांकित करने में सफल रहा है| यह उपन्यास एक बार में पूरा पढ़ लिए जाने ले लिए पाठक को प्रेरित करता है|

जिन पाठकों को अमीचंद, बंकिमचन्द्र, ईश्वरचंद विद्यासागर, भारतेंदु हरिश्चंद, हिंदी के आदिकाल के बारे में समुचित जानकारी है, उनके लिए इसे पढ़ना और गुनना बेहद रुचिकर है|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

 

पुस्तक – मल्लिका
लेखक – मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक – राजपाल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 9789386534699
पृष्ठ संख्या – 160
मूल्य – 235 रुपये
यह अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

टहलने वाली शामें

शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

किन्डल पुस्तक पढ़ने के तरीके

पहली बार स्मार्ट फ़ोन खरीदने, चालू करने और फोन के कुछ जरूरी क्रियाकलाप करने के तुरंत बाद मैंने किन्डल एप डाउनलोड किया था| मेरे जैसे किताबी कीड़ों के लिए अमेज़न को दुआएं देने का प्रमुख कारण उनकी ऑनलाइन शोपिंग नहीं, बल्कि उनका और हमारा पहला प्यार किताबें ही हैं|

सन १९९४ में अमेज़न का प्रारंभ ही किताबों की ऑनलाइन दुकान के रूप में हुआ था| आज अमेज़न सेकड़ों किताबें किन्डल फॉर्मेट में मुफ्त उपलब्ध कराता है| भारतीय भाषाओँ की पुस्तकें भी उपलब्ध रहती हैं|

इन सब किताबों को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका है किन्डल रीडर नामक उपकरण| इसे आप इस लिंक पर खरीद सकते हैं| मगर यह एकमात्र तरीका नहीं है| यह आपका चलता फिरता पुस्तकालय है, जिसमें सेकड़ों पुस्तकें एक साथ रखी जा सकतीं हैं| इसमें आप फॉण्ट का साइज़ घटाने बढ़ाने से लेकर कॉपी पेस्ट हाईलाइट शब्दकोष जैसी सुविधाओं का लाभ ले पाते हैं|

यदि आपके पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है या आपको यह छोटा लगता है तो आप क्लाउड रीडर का प्रयोग करते हुए पुस्तकें लैपटॉप या कंप्यूटर पर भी पढ़ सकते हैं| यह किसी भी ब्राउज़र में चल सकता है| आपको सिर्फ अपने अमेज़न अकाउंट से साइन इन या लोग इन करना है|

इसके अलावा भी अन्य तरीके हैं –

किन्डल लाइट एप भी अब उपलब्ध है| इसमें कुछ सुविधाएँ कम हैं परन्तु पढ़ने का आनंद कम नहीं होता| यह कम तेज मोबाइल नेटवर्क में अच्छा काम करती है|

इन सभी तरीकों से भी आपको पढ़ने का वही लुफ्त मिलता है, जैसा किन्डल उपकरणों पर पढ़ने में मिलता है| आपकी किताबें चोरी नहीं होतीं, न कटती फटती गलतीं, न दीमक उन्हें नुकसान पहुंचती| साथ ही आप पढ़ी हुई पुस्तकों को रिमूव कर सकते हैं| ऐसा करने पर भी दोबारा नहीं खरीदनी पड़ेगी|

आप इन किन्डल पुस्तकों को उपहार में और बहुत सी किन्डल पुस्तकों उधार में भी दे सकते हैं| उधार दी गई किन्डल पुस्तकें लौटने की आपको चिंता नहीं करनी होती| यह नियत समय में आपके पास खुद वापिस आ जाती हैं|

बहुत सी किन्डल पुस्तकों में सुनने की भी सुविधा आ रही हैं| इसका लाभ विदेशी भाषा छात्र उठा सकते हैं| जैसे हिंदी भाषी पाठक अंग्रेजी/फ्रेंच पुस्तक पढ़ते समय सुनते जाएँ तो पढ़ना और बोलना भी सीख सकते हैं| इसके अलावा टेक्स्ट तो स्पीच सुविधा भी उपलब्ध है|

किन्डल एप पर अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है|

अपने किन्डल स्टोर का चुनाव ध्यान से करें या जरूरत से हिसाब से बदलते रहें| अमेज़न डॉट इन पर पंजीकृत किन्डल उपकरण या एप किसी दूसरे देश के किन्डल स्टोर से पुस्तक खरीदने में दिक्कत महसूस कर सकते हैं| लन्दन में रहकर भी भारतीय किन्डल स्टोर से किन्डल पुस्तक खरीदी जा सकती है|

अब तो आप मेरी यह पुस्तक भी न सिर्फ़ खरीद ही सकते हैं बल्कि आसानी से पढ़ भी सकते हैं –

उम्मीद भरा घर

उम्मीद भरा घर

पुस्तक – उम्मीद भरा घर
लेखक – ऐश्वर्य मोहन गहराना
भाषा – हिंदी
पुस्तक रूप – किन्डल ई पुस्तक
वितरक – अमेज़न एशिया पेसेफिक होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – कहानी
पृष्ठ संख्या – १०६ (अनुमानित)
मूल्य – मात्र ४९ रुपये