कथाकहन-6


“मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा जयपुर में आयोजित कथाकहन केवल कहानी लेखन की कार्यशाला अपने आप में संवेदना और संवाद का उत्सव है” इस आयोजन के बारे में अधिकतर भागीदार इस तरह के शब्दों में अपनी राय रखते हैं। आज जब दुनिया भर में भारत के हर गली नुक्कड़ पर होने वाले साहित्य समारोह पर बात हो रही है, यह साहित्य समारोह की भीड़ और आयोजन शैली से कथा कहानी पर केन्द्रित बात करने का अवसर होता है।

अगर आप चैटजीपीटी से इस आयोजन के बारे में पूछते हैं तो यह बताएगा कि इस आयोजन में मनीषा जी कहानी सुनातीं हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह आयोजन कहानी लेखन की कार्यशाला है। इसके नाम में आया “कहन” उस भारतीय परंपरा का द्योतक है जहाँ हम कहानी या कविताएँ लिखते नहीं हैं – कहते हैं। यह शब्द हमें हमारी कहानी को लिपि पूर्व की श्रुति-परम्परा से जोड़ता है।

अब तक पाँच कथा-कहन आयोजित हो चुके हैं। इस वर्ष अप्रैल 2026 में इसका छठा आयोजन होने जा रहा है। पिछले पाँच में से तीन कथाकहन में मेरी भागीदारी रही है। मैं अपने अनुभव के आधार पर यहाँ अपने विचार रख रहा हूँ।

इस आयोजन के प्रति मुझे आकर्षित करने वाली बात है – विशेषज्ञ और भागीदार एक साथ एक जगह उपलब्ध होना। यहाँ मंच का होना यहाँ मात्र एक प्रतीक है। भागीदार किसी भी विशेषज्ञ कहीं भी कभी भी बात कर सकते हैं। भले ही विशेषज्ञ मंच से अपनी प्रस्तुतियाँ तैयार दें, मगर वह सभी भागीदारों के लिए पूरा समय उपलब्ध रहते है। अधिकतर विशेषज्ञ भागीदारों से भी नया सीखने की प्रवृत्ति रखते हैं।

वहाँ सभी लोग आमतौर पर अल-सुबह की चाय से लेकर रात्रि भोजन तक बातचीत, विमर्श और विवेचना करते हैं। यहाँ आप कहानीकारों, उपन्यासकारों, लघुकथालेखकों, पटकथालेखकों, नाटककारों, संपादकों और प्रकाशकों से एक साथ मिल सकते हैं। इसके अलावा आप मांगा, रेडियो कहानी और अन्य उभरती कथा विधाओं को भी जान पाते हैं।

प्रतिभागी के रूप में भी आशा की जाती है कि आप पूरे साठ सत्तर घंटे वहाँ पूरे मन से उपस्थित रहें। सूचना पत्र पर छपे कार्यक्रम के अतिरिक्त भी यहाँ आपको भागीदारी करनी होती है और कुछ छोटी-छोटी प्रतियोगिता में भाग लेना होता है। रोचक पहलू बहुत से कार्यक्रम का अघोषित रहना है। मैंने कई बार देर रात तक प्रतिभागियों को कहानियों पर चर्चा करते और सुधारते देखा है।

आम तौर पर प्रकाशक भी कहानी में आए परिवर्तनों को समझने में रुचि रखते देखे जा सकते हैं। यहाँ पत्रिकाओं के संपादक और बड़े प्रकाशक उन्हें प्राप्त होने वाली रचनाओं की चयन प्रक्रिया पर चर्चा करते देखे जाते हैं।

यहाँ बहुत महत्वपूर्ण होता है स्थापित और नवोदित लोगों को अपनी-अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए सुनना। इस चर्चा में अलग शैली में और अलग विषय पर लिखने वाले लोग शामिल होते हैं। मैंने यहाँ रात्रि भोज करते समय प्रियदर्शन, अलका सराओगी, प्रभात रंजन, उर्मिला शिरीष, आदि को प्रतिभागियों के साथ बात करते देखा है तो नवीन चौधरी, गौतम राजऋषि को शाम चाय के समय घिरा पाया है। तो उधर जयप्रकाश पाण्डेय, अखिलेश, और अन्य चर्चित वरिष्ठ लोगों को सुबह टहलते हुए प्रतिभागियों की जिज्ञासा शांत करते देखा है।

इस सब के लिए जरूरी है आप सारा समय सीखने के लिए तैयार रहें। थकान को दूर रखें और जयपुर घूमने के लालच से बचें। आपका मन और मस्तिष्क हर समय खुला रहना आवश्यक है।

कथाकहन में सफल भागीदारी के लिए आवश्यक है स्वयं का कहानीमय होना। रचनात्मक ऊर्जा बहुत आवश्यक है। आपके पास अपने कुछेक कथानक और कहानियाँ हों जिन पर आप सलाह लेना चाहें तो उन्हें साथ लाएँ। बिना सलाह माँगे भी आप उनपर अपने आप बेहतर विचार कर पाएंगे। कथानक पाँच दस पंक्तियों में लिखा मूल है जिसपर कोई कहानी खड़ी होती है।

इस बार छठे कथाकहन में आमंत्रित विशेषज्ञों अनंतिम सूची बेहद आकर्षक है। यहाँ मनीषा जी के अलावा दिव्या माथुर, तस्लीम खान, मुकेश नेमा, रचना यादव, नवीन चौधरी, राकेश बिहारी, जयप्रकाश पाण्डेय, सुजाता शिवेन, कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ, मनीष वैद्य, डॉ सत्यनारायण, यतीन्द्र मिश्र, पंकज सुबीर, पूनम अरोड़ा, कुश वैष्णव, रोहिणी कुमारी, प्रभात रंजन, उमा, तिग्मांशु धूलिया, युनूस खान, सीमा सिंह, संजीव पालीवाल आदि लोग उपस्थित रहने वाले हैं। आप इन सबके बारे में जानते ही होंगे। इसके अतिरिक्त यहाँ बहुत से प्रतिभागी स्वयं ही प्रकाशित कथाकार या कवि होते हैं।

इस वर्ष आयोजन में रघुनंदन त्रिवेदी की कहानियों पर विशेष चर्चा होने जा रही है। हर बार किसी कहानी का मंचन भी होता है तो इस बार रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी का मंचन होगा। मुझे स्वीकार करना चाहिए कि इस वर्ष कथाकहन की घोषणा होने तक मुझे रघुनंदन त्रिवेदी का नाम भी नहीं पता था। इन दिनों उनकी कहानियाँ पढ़ रहा हूँ और कोशिश करूँगा कि कथाकहन के पहले पूरा समग्र पढ़ सकूँ।

मेरा अनुभव यह सलाह देता है कि आप कार्यक्रम से पहले वाली देर शाम वहाँ पहुँच जाए। परंतु यह ध्यान रखें कि पहले वाली शाम को ही पहुँचें, पहले वाली दोपहर को नहीं। जल्दी पहुँचने वाले जयपुर घूम सकते हैं और इस फरवरी चर्चा में रही मटर-कचौड़ी का आनंद लेने जा सकते हैं।

आपको एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन से सरलता से कैब मिल जाती है। फिर भी कार पूल करने के लिए उत्सुक रहें। मौसम के हिसाब से हल्के कपड़े रखें। धूप से बचने के लिए टोपी रख सकते हैं। टहलने वाले जूतों में आप सुकून महसूस करेंगे।

पहले दिन के कार्यक्रम का घोषित समय कुछ भी हो, पहला दिन वास्तव में सुबह की चाय पर आपसी परिचय और अपनी कहानियों पर चर्चा से प्रारम्भ होता है। देर शाम की महफिल भी महत्व पूर्ण होती हैं, जहाँ साहित्य मनोरंजन और बुद्धिरंजन का माध्यम बनता है।

सभी घोषित कार्यक्रम अनुशासन माँगते हैं। किसी तरह का व्यवधान नहीं आने देना चाहिए।

इस आयोजन में यदि आपको परिवार या कार्यालय से आने वाले फोन या ईमेल देखने का सही समय रात्रि दस बजे से लेकर सुबह सात बजे का है। अन्यथा आप अपना नुकसान कर रहे होंगे। यहाँ अधिकांश विशेषज्ञ भी इस क्रम (नियम नहीं) का पालन करते हुए देखे जा सकते हैं। नौकरी, घर की चिंता, बच्चों की परवाह इन चार दिनों बस औरों पर छोड़ दीजिएगा, उसकी ग्लानि मन में नहीं रखनी है। यह वह समय है जो आपको अपने लिए मिला है। बस मुक्त होकर आएं, यहां खूब आनंद करें, मित्र बनाएं, लिखें सीखें सिखाएं।

आयोजन स्थल पर प्राकृतिक सौन्दर्य है। अपने कैमरा प्रेम को व्यवधान न बनाएँ। शाम पाँच बजे के बाद और सुबह नौ बजे तक आप खुलकर इस उपकरण का प्रयोग करें। इतना ध्यान रखें, किसी को कोई असुविधा न हो। यहाँ खाना बहुत शानदार होता है, तो मुझे तो जिह्वा पर बहुत नियंत्रण रखना होता है। बहुत सा पानी पीना आपको तरोताजा रखेगा। एक बात ध्यान रखने के लिए यह है कि आयोजन स्थल कनौता कैंप रिसोर्ट इस आयोजन का आधार स्तम्भ और प्रमुख आयोजक है। इसके मालिक बहादुर सिंह राठौर सारा समय आयोजक और भागीदार के रूप उपस्थित रहते हैं।

किनाया – मनीषा कुलश्रेष्ठ


इस किताब को पढ़कर एक बात तो साफ है – तुर्की और वहाँ बिखरी पड़ी यूनानी सभ्यता से आप को मुहब्बत हो जाती है। अगर आप इस किताब को पढ़ते समय तुर्की घूमे और यूनान छोड़ आए, तो आप उन इशारों तक नहीं पहुँचे जिन तक यह किताब आपको ले जा सकती है। किनाया यानी संकेत – जो सीधे नहीं होते, आपको उन्हें सुलझाना और खोलना पड़ता है।

इस का उपशीर्षक है – तीसरे पहर की सिम्फ़नी – इस उपन्यास को पढ़ते हुए मैं सोच पा रहा हूँ – ज्ञात इतिहास की सभ्यताएं अपने तीसरे पहर में है – ग्रीक साम्राज्य, तुर्क खलीफ़ा और अब एक बार फिर एशिया व यूरोप के बीच झूलता तर्कीए, साथ में साइप्रस और यूनान। खैर, सब यह इशारे करना इस खूबसूरत उपन्यास का सीधा मकसद तो नहीं लगता।

यह तो जीवन के तीसरे पहर की एक त्वरित मगर संभली हुई सुंदर प्रेम कथा है, जहाँ अनुभव का ठहराव है और बौद्धिक जिज्ञासा का भटकाव है। जी, इसमें पात्र प्रेम पिपासु नहीं ज्ञान पिपासु है। यह उपन्यास कथा और कथेतर के बीच संवाद करता हुआ वर्तमान और पुरातत्व से भी संवाद करता है। यह उपन्यास आधुनिक विचारशील वयस्क प्रेम की एक परिभाषा गढ़ने में सफल रहा है।

न सिर्फ उपन्यासकार बल्कि उपन्यास के सभी प्रमुख पात्र गज़ब के बौद्धिक (बुद्धिजीवी कहने से बचते हुए) हैं। सकारण, यह उपन्यास बहुत से सूक्ति वाक्यों से भरा हुआ है और अपने विन्यास में यह सूक्त कविता करते हैं।

इस उपन्यास में मेरी एक प्रिय बात और है – खूब सारे पेय, खाद्य और पकवान – मेरे लिए तो खाद्य पर्यटन ही सबसे बड़ा पर्यटन है। और यहाँ तो हर कुछ पन्नों के बाद कुछ न कुछ स्वादिष्ट पेय या खाद्य हैं। यह कहते मुझे संकोच नहीं करना चाहिए कि इसका तेरहवाँ पृष्ठ पढ़ने के बाद मैंने बेहद स्वादिष्ट डकार ली और फिर बहुत दिनों बाद असीमित खाया।

मनीषा कुलश्रेष्ठ के लेखन के प्रमुख आयाम शोध और घुमक्कड़ी ही रहे हैं। अपनी रचनाओं में कथावस्तु और ज्ञानवस्तु को साधना उनका अधिकतर श्रम लेता है। इस उपन्यास में उन्होंने अपनी कथावस्तु और ज्ञानवस्तु को सौन्दर्य के साथ साधने में पूरी सफलता प्राप्त की है।

इस उपन्यास का एक बहुत खूबसूरत पहलू है अंतरंग पलों का सौन्दर्यपूर्ण वर्णन। अश्लीलता अपनी कोई झलक तक नहीं दिखा पाती। किसी भी रचनाकार के लिए इसे साधना दुष्कर है। यह उपन्यास इन वर्णन में उत्तेजना नहीं शांति और प्रेम प्रदान करता है।

इस उपन्यास को पढ़ते हुए एक बात और मन में आती है अगर हमारे विद्यालय किसी गूढ़ विषय को इस तरह किसी प्रेम कहानी के साथ पढ़ते पढ़ाते तो कौन कक्षा छोड़ बाहर भटकता।

ऐश्वर्य मोहन गहराना

क्षमा पत्र -प्रदूषण जी के नाम


आदरणीय प्रदूषण जी,
सादर प्रणाम व सहृदय आभार,

क्षमा प्रार्थी हूँ, मैं उन लोगों में रहा जिन्होंने बहुत पहले, लगभग बीस बरस पहले से आप की कोप दृष्टि पाई और संभावित मृत्यु से बचने के लिए आपकी छत्र छाया से दूर जाने की चिकित्सीय सलाह पाई। यह वह समय था जब प्रदूषण जी आप समस्या तो थे आपकी भयाभयता दूर की बात हुआ करती थी। अलीगढ़ से आते हुए दनकौर तक आसमान आसमानी नहीं तो आसमानी सा हुआ करता था। इसलिए जिस समय चिकत्सीय मास्क के अलावा किसी भी मास्क को नहीं जाना जाता था उस समय मैंने आपकी कृपा से प्रदूषण रोधक मास्क को जाना-पहना और शूकर-मुखी कहलाया। इस कारण आपका निरंतर अपमान करता रहा।

माननीय, अब मैं उन लोगों में भी हूँ, जिनका जीवन फिलहाल आपके कारण बच गया है। मैं जानता हूँ, आप किसी और को मेरे किसी कष्ट का श्रेय किसी और कुटिल को नहीं लेने देंगे प्रभु।

प्रभों! इस सोमवार 10 नवंबर 2025 की दोपहर दिल्ली के बारहखंबा मार्ग पर एक कामकाजी मुलाक़ात के लिए गया था। मेरी जीभ लपलपाने लगी। पुरानी दिल्ली की दौलत की चाट याद आने लगी। साथ याद आने लगा मृदुला गर्ग जी का वह संस्मरण जिसमें उन्होंने पुरानी दिल्ली अन्य बातों के अलावा दौलत चाट का इतिहास भी दर्ज किया है। आप तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सर्वव्यापी हैं और पूरे आर्यवृत्त पर आप की अनन्य कृपा बनी रहती है। अतः आप जानते हैं, यह कायस्थ कुल कलंक भले ही “पीना” नामक सिद्धि न पा सका “खाना” “जीभ लपलपाना” और “लार टपकाना” नामक जिह्वाहिक सिद्धि उसे सहज प्राप्त होकर उस के मानस पर अधिकार कर बैठीं है।

माँ अन्नपूर्णा की इस कु-कृपा से हे स्वामी, उस दिन मेरी भ्रष्ट बुद्धि पुरानी दिल्ली की राह चलने लगी थी। जैसे तैसे भागते दौड़ते अधमन होकर जब मैं उस बैठकी से बाहर निकला – आप अपने वायुतत्त्व रूप में मेरे समक्ष प्रगट होकर कृपामान व्याप्त सहज प्राप्त थे। आप की अपरंपार क्षमता के आगे मेरा मास्क मात्र कपड़े की तुच्छ कतरन मात्र बनकर रह गया। हे सर्वव्यापी, मैं खाँसने लगा। मेरा गला दुखने लगा और सीना भारी होने लगा। फिर भी जिह्वा अपना रसना नाम साकार सार्थक कर ने से बाज नहीं आ रही थी। मुँह से लार टपकते हुए उदर पार उदरांत तक जा रही थी। मगर कुछ वार्तालाप करने के लिए जब मैंने मुख संचालन किया – आपने मेरे मुख में सार्थक प्रवेश किया।

हे आनंददाता! तत्क्षण मेरा मुख सूख गया – जिह्वा सूखे पात की भाँति उलटने लगी। जल के अभाव में जलन का एहसास होने लगा। मान्यवर मैं दिल्ली गेट नामक मेट्रो स्टेशन से आगे न जा सका और घर की ओर लौट चला। तब मन में असंतोष था, खीज थी, कहे तो आप से मानव मात्र को मुक्त करने की भावना भी थी।

हे महाकृपालू दयावान – जिस समय मैं घर पहुँच कर अदरक इलयाची युक्त चाय नामक काढ़ा पीकर अपने आप को संतुष्ट करने का प्रयास कर रहा था। मेरा मोबाइल छमछमाने लगा। और साथ में दयावान वह चमचमाने भी लगा। समाचार आ रहे थे कोई बड़ा विस्फोट हुआ था – कई लोग मारे गए। और उसके बाद वह सब हो इस तरह की घटना के बाद होता है।

माननीय कृपालू – इस के बाद अगले तीन दिन तक अपने आप को संयत करते के प्रयास करते हुए अब आकर आपका आभार व्यक्त करने में सक्षम हो पा रहा हूँ। दयानिधान, आप क्षमाशील हैं, मेरा मनोभाव समझेंगे।

अपनी गति – यात्रा स्थान – भीड़ आदि की गणना और अनुभव से मैं जानता हूँ – यदि आप कृपा न करते – उस दिन मेरा उस समय लगभग उस स्थान पर या उसके बेहद निकट होना तय ही था जब यह धमाका हुआ – लोग मारे गए।

हे मेरे जीवन दाता प्रदूषण, मैं आपका आभारी हूँ। जिस प्रकार आने मेरा जीवन इस समय बचाया है आप अपने आप से भी मुक्त करें और आपने जिन रोगों से मुझे उपकृत किया है – प्रभो उनसे भी मुझे बचाए।

आपका आभारी क्षमाप्रार्थी
ऐश्वर्य मोहन गहराना