आरक्षण बेचारा!!

मानसून और चुनाव हमारे राष्ट्रीय मौसम हैं| इन मौसम में मेढ़क और नेता अपने बिल और बंगलों से बाहर निकल आते हैं| मॉनसून और चुनावों के बाद दिवाली शुरू हो जाती है, इसलिए पुराने साज-सामान और वादों को धो पौंछ कर चमकाया जाता है|

इस बार प्रधानमंत्री जी ने पुराने वादे को वादों के कब्रिस्तान से खोदखाद कर खड़ा कर किया है| गरीबों को दस फ़ीसदी आरक्षण मिलने जा रहा है| बधाईयाँ… , … …. … थोड़ी देर बाद|

सवाल यह नहीं रहा कि पिछले पच्चीस साल में कितने लोगों की आरक्षण का लाभ मिला और आरक्षित श्रेणी के कितने पद खाली छूट गए? सवाल खास ये है कि नौकरियां कहाँ हैं? आज बेरोजगारी का आंकड़ा ९ फीसदी के पास पहुँच चुका है| सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, तो आरक्षण के वास्तविक अवसर कम होते रहे हैं| सरकारी खर्च में कटौती के नाम पर अधिकतर सरकारी काम ठेके पर हैं या व्यवसायिक करार दिए जाकर निजी क्षेत्र को बिक चुके हैं|

आरक्षण की इस घोषणा का सबसे खूबसूरत पहलू है – गरीबी का पैमाना|

सालाना आठ लाख की पारवारिक आय आरक्षण वाली गरीबी का पहला मापदंड है| गरीबी रेखा तो बेचारी आरक्षण वाली गरीबी आगे पानी मांगती है| यह आंकड़ा देश की प्रति व्यक्ति आय से बहुत अधिक है| देश की लगभग नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी इस आय निर्धारण के हिसाब से गरीब घोषित हो गई है| सरकार ढ़ाई लाख से उपर सालाना आय पर आयकर वसूलती है| बहुत से शहरी मित्र कहते हैं कि आयकर सीमा प्रतिव्यक्ति है और आरक्षण सीमा प्रतिपरिवार| मगर पति पति दोनों चार चार लाख से कम कमायें तो दोनों आयकर अमीर और आरक्षण गरीब होंगे|

मैं इस बात से सहमत होना चाहता हूँ कि गरीबी रेखा से नीचे वाले व्यक्ति को आरक्षण देने का कोई फायदा नहीं होगा| कारण वास्तविक गरीबी रेखा से नीचे वाले गरीब का बच्चा इतना पढ़ लिख नहीं पाता कि किसी सरकारी पद के लिए वास्तव में योग्य घोषित हो पाए| चपरासी के लिए भी कम से कम आठवीं पास उम्मीदवार चाहिए होता है| अगर किसी की वास्तव में लाभ देना है तो इस आरक्षण के लिए गरीबी की सीमा रेखा वास्तविक गरीबी रेखा से निश्चित ही ऊपर होनी चाहिए| मगर यह आठ लाख इस रेखा से बहुत ऊपर है|

जमीन या घर के पैमाइश भी बड़ी अजीब है| सौ एकड़ का सिचाई विहीन ऊसर किसी परिवार को अमीर नहीं बना सकता तो मरीन ड्राइव पर दस फुट का घर या दफ्तर लेना बहुत से अमीरों के बस की बात नहीं| कुल मिलाकर संपत्ति के आधार पर गरीबी का कोई वैज्ञानिक निर्धारण नहीं हो सकता|

ध्यान देने की बात है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का न मुद्दा नया है न प्रयास| यह मुद्दा संविधान सभा के सामने भी आया था और प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने बाकायदा नियम भी बनाया था| पहले संविधान सभा और बाद में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान सम्मत नहीं पाया| संसद में विधेयक पास हुआ है, विधानसभाओं में भी हो जाएगा| मगर… … नौकरी हो तो मिलेगी|

शेष कुशल हैं| चुनाव की चुनावी बधाई|

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गाजर का हलवा

अगर आप पकवान विधियाँ पढ़ने के शौक़ीन हैं तो गाजर का हलवा सबसे सरल पकवानों में से एक हैं| अधिकतर विधियाँ कद्दूकस की गई गाजर में मावा (खोया) और चीनी मिलकर आंच पर चढ़ाने की सामान्य प्रक्रिया से शुरू होती हैं और मेवा मखाने की सजावट पर ख़त्म हो जाती हैं| मेरे जैसे स्वाद लोभी लोगों के लिए यह विधियाँ कूड़ा – करकट से आगे नहीं बढ़ पातीं|

गाजर का हलवा बनाना जितना सरल है, गाजर का अच्छा हलवा बनाना उतना कठिन और समय लेने वाला काम है| कोई भी हलवा बनाने समय यह ध्यान रखने की बात है कि हलवा मूँह में जितना जल्दी घुल जाए उतना बढ़िया| दूसरा हलवा चबाने में कम से कम श्रम की आवश्यकता हो| गाजर हलवे का लक्ष्य यह हो कि न दांत को चबाने में कष्ट हो न आंत को पचाने का कष्ट हो, स्वाद और ताकत पूरी आये|

गाजर का हलवा अधिकतर सस्ती गाजर के इन्तजार में टलते रहने वाला काम है| गाजर के हलवे के लिए अधिकतर पकाऊ और मोटी गाजर का प्रयोग किया जाता है| मगर इससे हलवे के स्वाद में कमी आती है| कच्ची मीठी ताजा गाजरें सबसे बेहतर हलवा तैयार करती हैं|

दूसरा, खोये का प्रयोग हो सके तो न करें| दूध का प्रयोग दो तरह से फ़ायदेमंद हैं| पहला आपको खोये की गुणवत्ता पर कोई संदेह नहीं करना पड़ेगा| दूसरा, यह दूध गाजर के साथ उबलने में गाजर के कण कण में जाकर उसे बेहतरीन स्वाद प्रदान करेगा|

गाजर को अलग से उबालना भी उसके स्वाद को कमतर करता है| गाजर को हमेशा दूध के साथ ही उबालें| अगर खोये का प्रयोग कर रहे हैं तो खोये के साथ उबालें| खोया अगर लेना है तो कोशिश करने की कम से कम थोडा बहुत दूध गाजर के साध प्रारंभ से ही डालकर चलें| खोया या मावा, केवल आपके समय की बचत करता हैं| इससे स्वाद में कमी ही आती है, कोई बढ़ोतरी नहीं होती|

एक किलो गाजर के साथ दो किलो दूध अगर लेकर चलते हैं तो बेहतर है| जिन्हें खोया डालना है वह एक किलो दूध के लिए २५० ग्राम खोया के सकते हैं| हो सके तो शुद्ध समृद्ध दूध का प्रयोग करें| आधे अधूरे दूध के प्रयोग से आधा अधूरा स्वाद ही आना है| यही बात खोया की गुणवत्ता पर भी लागू होती है|

किसी भी भोज्य या पकवान के बारे में एक बात पूरी तरह तय है| आप उसे जल्दीबाजी में नहीं बना सकते| अगर आप प्रेशर कुकर में हलवा बनाना चाहते है, तो उस तरह के स्वाद के लिए तैयार रहे| माइक्रोवेब ओवन में बने हलवा का अलग स्वाद होगा| मैं यह नहीं कहता कि यह स्वाद अच्छे नहीं है| मगर हर पकवान का अपना एक शास्त्रीय स्वाद होता है| उस शास्त्रीय स्वाद की अपनी अलग ही बात होती है|

गाजर के हलवे का आनंद कढ़ाई में धीमी धीमी आँच पर इसे बनने देने में है| ठण्डा मौसम और धीमी आंच बेहतरीन गाजर हलवा का सब से पुख्ता वादा है| सही आंच का कोई भौतिक मापदंड नहीं हो सकता क्योंकि जाड़े के मौसम का तापमान और रसोई में हवा का उचित बहाव भी इसमें अपना योगदान रखता है| आँच इतनी धीमी हो कि गाजर या दूध कढ़ाई के तले से न लग जाए| किसी भी तरह का जलना या जलने की गंध जैसा कुछ न हो| साथ ही यह आँच इतनी तेज भी हो कि पर्याप्त मात्रा में वाष्पीकरण होता रहे| बेहतर है कि आप हर दस पांच मिनिट में करछल को कढ़ाई के तले तक इधर से उधर चला लें| सामिग्री की उलटते पलटते रहें| साथ थी साथ आंच को अपने मन के हिसाब से हल्का या बहुत हल्का करते रहें – बोरियत नहीं होगी|

चीनी या मीठा डालने का भी अपना समय और मात्रा है| चीनी अगर अपने पसंदीदा स्वाद से हल्का सा कम रखेंगे तो हलवे का शानदार स्वाद ले पायेंगे| वरना हम सब लोग, रोज ही किसी न किसी मिठाई में चीनी का स्वाद लेते ही रहते हैं| कहना यह कि हलवे का स्वाद बना रहे, चीनी का स्वाद उस के सर पर न चढ़ जाए| मैं आजकल सफ़ेद चीनी के मुकाबले भूरी चीनी लेना पसंद करता हूँ| इसका स्वाद हलवे में चार चाँद लगा देता हैं|

कई बार हम हलवा पूरी तरह पकने का इन्तजार करते हैं फिर मीठा डालते हैं| इससे हलवा में मीठा स्वाद आने की जगह हलवे के चाशनी में पग जाने का स्वाद आने लगता है| हलवे के रस के पूरी तरह सूखने से ठीक ठाक पहले मीठा डाल दें| अधिक पहले मीठा डालने में स्वाद पर अधिक अंतर भले ही न आये, करछल चलाने में श्रम थोड़ा अधिक हो जाता है| अतः ऐसा न करें| हर पकवान और रिश्ते को पकने का उचित समय चाहिए होता है|

इलायची और अन्य मेवा अधपके हलवे में डालने से अधिक स्वाद और खुशबू पैदा करते हैं| हो सके हल्की भुनी इलायची का प्रयोग करें| मेवे हल्के हल्के तले हुए हों| किशमिश न डालें – अगर जबरदस्ती डालें तो कंधारी किशमिश का स्वाद ठीक रहेगा|

बहुत बार हम मेवे को अपनी और अपने हलवे की समृद्धि के दृष्टिकोण से डालते हैं| मेवा हलवे के स्वाद में कोई वास्तविक वृद्धि नहीं करता| मेवा वाला हलवा हमें मानसिक संतुष्टि देता है – स्वादेंद्रिय की संतुष्टि नहीं| मेवा मखाने का यह स्वाद हम अलग से भी ले सकते हैं|

गाजर का हलवा हो या कोई अन्य पकवान बार बार गरम होने से उसका स्वाद बदलता रहता है| बार बार गर्म होने से पकवान अपना बेहतरीन स्वाद खो देते हैं| गाजर का हलवा अगर बढ़िया बना है तो ठंडा भी बहुत बढ़िया लगता है|

एक प्रश्न बार बार आता है.. गाजर हलवे में घी कौन सा हो? अगर आपने भैंस का शुद्ध सम्पूर्ण प्राकृतिक दूध प्रयोग किया है तो इस प्रश्न का कोई अर्थ नहीं| अन्य स्तिथि में गाजर हलवे को आँच से उतारते समय जी भरकर देशी घी का तड़का लगा दें|

साल २०१८ में हमारा हाल

गहराना – विचार वेदना की गहराई की मई २०११ में शुरुआत बहुत सादा और चुपचाप हुई थी| अक्टूबर २०११ आते आते एक पाठक रोजाना का औसत आया और पहली बार सौ पाठक जून २०१२ में मिले मगर जनवरी २०१२ के बाद ही माहवार सैकड़ा पक्का हो पाया| साल २०१५ इस माने में खास था कि ब्लॉग-अड्डा के मुताबिक यह हिंदी के पांच अच्छे ब्लॉग में था| साल २०१६ में पढ़े गए पृष्ठों की संख्या पांच हजार साल को पार कर पाई| मगर एक महीने में हजार के पार पहुँचने पहुँचते मार्च २०१७ आ लगा|

साल २०१८ में लगभग पंद्रह हजार पाठकों ने इसके सत्ताईस हजार पृष्ठों को पढ़ा| इस वर्ष २०१८ में इस ब्लॉग को हिंदी के श्रेष्ठ ब्लॉग में शामिल किया गया|

इनमें से सोलह हजार पृष्ठ भारत और आठ हजार पृष्ठ यूनाइटेड स्टेट्स में पढ़े गए जबकि डेढ़ हजार पृष्ठों के साथ कनाडा तीसरे स्थान पर था| यूनाइटेड किंगडम से पाठकों का न आना समझ से परे है|

अधिकतर पाठक गूगल आदि सर्च इंजन से आते हैं या उन्हें ख़ुद यूआरएल याद है| इस साल कम से कम दो हजार बार इस ब्लॉग को मोबाइल पर पढ़ा गया है| सनद रहे कि शुरुआत से अब तक कुल छियासठ हजार पाठक यह ब्लॉग पढ़ चुके हैं|

यूँ ही बात दूं कि साल २०१८ में लिखी गईं ५० पोस्ट के साथ अब तक कुल ३७६ हो गईं| आप भी आयें कभी हमारे ब्लॉग पर|

चतुर सहायक, सकुशल जीवन

जिन्दगी की रफ़्तार पर दौड़ने के लिए वक़्त से आगे दौड़ना होता है| ज़िन्दगी रोज रफ़्तार बढ़ा देती है| इसी रफ़्तार को पाटने और बढ़ाते जाने की कोशिश का नाम विज्ञान और तकनीक है| इस तकनीक का कुशल प्रयोग करना चतुर होना है, चतुर  होना है|

इंसान के लाखों सालों के इतिहास में कुछ हजार ही हुए हैं पहिया ढूंढे हुए| पिछले हजार साल में इंसान में बैलगाड़ी से लेकर चतुर कार तक का सफ़र तय किया है|

इंसान को अपनी जिन्दगी के थपेड़ों का सामना करने के लिए जिस सच्चे साथी की जरूरत हैं, वह वैज्ञानिक तकनीक ही है| जब गहरी नींद के बाद आँख नहीं खुलती, कलाई में पड़ा हुआ कड़ा हौले हौले आपकी कलाई सहला कर ही जगा आपको देता है| आपकी रात भर की नींद का पूरा खाका आपके सामने है| अपने दिन की योजना करने से पहले आपको अपनी आज की क्षमता और स्वास्थ्य का पता चल चुका है| आपका चतुर  कड़ा आपसे कहता है, आज थोड़ा सा और पैदल चलो मेरे आका|

चतुर पहनावा (Smart Wearable)

आप तैयार होकर ताकत और ऊर्जा से भरा कलेवा करते हैं| अपनी लखटकिया बाइक पर बैठते ही आपका हेलमेट गंतव्य का ट्रेफ़िक मुक्त रास्ता बताने लगता है| आप निश्चित ही सुरक्षित और मित्रवत हेलमेट के साथ है| लम्बे और शांत मार्गों पर अपने इस मित्र से कुछ गाने या कहानी सुनाने की फ़रमाइश भी कर सकते हैं|

दिन भर आप अपने लिए रोजी रोटी, ऐश-ओ-आराम, शान-ओ-शौकत और ढेर सारा अहम कमाने के लिए परिश्रम करते हैं| शाम तक आपका थकना स्वाभाविक है|

शाम को कार्यालय से आप अपना चतुर ऐनक लगा कर निकल लेते हैं| आपका ऐनक आपको राग भैरव में “मोहे भूल गए साँवरिया” सुना कर आपका मन हल्का कर रहा है और आप अपने साहब को “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम” गाते गाते कार्यालय से निकल लेते हैं|

चतुर घर  (Smart Home)

घर में घुसते हुए आपको पता लगता है की बच्चों ने धमाचौकड़ी मचा रखी है| आपके बैठक में जलती हई तेज नर्तक रोशनियाँ, आपकी आँखें बहुत दूर से ही चौंधा देती हैं| मगर घर के अन्दर आपका पहला कदम एकदम शानदार हैं| आप पाते हैं कमरे में शांत संगीत हैं, मध्यम रौशनी हैं और आपके कुछ प्यारे प्यारे से दो बच्चे मुस्कुरा रहे हैं| आप खुश होते हैं कि यह कमाल बच्चों का नहीं, आपका है – आपके चतुर  घर का है| आपका कॉफ़ी पीने का मन है और कमरे की रोशनियाँ अपना रंग बदल कर उस रंग में रंग जाती है|

सामने दीवार पर लगा मोनिटर बता रहा है, आपके घर के दरवाजे पर आपका बचपन का वो यार आया है, जिसके साथ बचपन में आपने मंदिर के पिछवाड़े बैठकर पहली बार दारू पी थी| ये पठ्ठा खुद तो दारू पीता नहीं, मगर आपको पीना सिखा गया| आप खुश है, थकान उतर गई है| आप सोफे पर बैठे बैठे ही दरवाजे को खुल जाने का हुक्म दे देते हो| वो अन्दर आकर अपने मोबाइल रिमोट से आपके टेलिविज़न पर सहगल के “ग़म दिए मुस्तकिल” की जगह “देशी दारू इंग्लिश बार” लगा देता है|

बात से बात निकलती है, बातों में वक़्त बदलता है| आप याद करते हैं, जब आप जब भी दिल्ली या कलकत्ता जाते थे तो रास्ता भूल जाते थे| कभी समझ नहीं आता था कितनी रेड लाइट के बाद वो तीसरी रेड लाइट आएगी जिससे तीसरा लेफ्ट कट लेना है| अब हाल ये है कि न रास्ता पूछने की जरूरत, न याद रखने की| आपको हर कदम पर रास्ता बताने वाला मौजूद है| अनजान शहरों में भी आप सिर्फ एक ऐनक के सहारे अपने रस्ते चले जाते हैं| यह रास्ते शायद ही गलत होते हैं| कोई गलती हो तो आप उसे सुधारने में मदद कर सकते हैं|

चतुर रोशनियाँ (smart lights)

अब तो हाल यह की घर के बाहर तो क्या घर में भी तकनीक आपको राह दिखाती है| आपका ख्याल रखती है| अब आपकी जरूरत के हिसाब से घर अपने आप की ढाल लेता है| रंग, रोशनियाँ, गीत, संगीत, फिल्म सब आपके मूड के हिसाब से बदल जाते है| जब आप यह महसूस करते हैं कि आपके मन के हिसाब से आपका घर अपने को ढाल लेता है तो अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं| आप के घर में आज टेलिविज़न ही नहीं, और भी उपकरण चतुर  होते जा रहे हैं| इस सब से दैनान्दिक जीवन पहले की अपेक्षा और अधिक सरल होता जा रहा है| यह अलग बात है कि यह तकनीक आज भी बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर है|

आपको अपने कैमरे को बार बार निर्देश नहीं देने पड़ते, आपके घरेलू उपकरण अपने काम पहले की अपेक्षा अधिक सरलता से और स्वयं ही कर लेते हैं|

तकनीक से शिकायतें भी हैं| बचपन की बहुत सी शरारतें अब मुश्किल हो गई हैं| आजकल के बच्चों को तो वो मजे भी नहीं कि दोपहर में किसी का दरवाज़ा खटखटा कर छुप जाए और पकड़े न जाएँ| अब तो दरवाजे दरवाजे कैमरा लगा है| अब बच्चे और चोर दोनों ही किसी बुजुर्ग को परेशान नहीं कर सकते|

बातों के साथ आपका मूड बदल जाता है और एक बार फिर आप कमरे की रौशनी का रंग और चमक बदल देते हैं| नाचने का मन भी होना ही चाहिए| आपके दुनिया भर के गानों का संग्रह है| आप अपने पालतू जिन्न को हुक्म देते हैं, पुराने गाने और हल्का पंखा चलाने के लिए| तकनीक की अदृश्य शक्ति आपके हुक्म की तामीर करने के लिए मौजूद है|

आप आज दुनिया के किसी भी कौने से अपने माता पिता के संपर्क में रह सकते हैं| उनकी यादों को अपने पास संजो सकते हैं| बूढ़े माँ-बाप को बार बार न रौशनी जलाने के लिए उठना, न दरवाजा खोलने के लिए| इस तरह की बहुत सी सुविधाएँ हैं| बस इतना है कि वो थोड़ा बहुत हाथ पैर चलाते रहे, आरामतलबी में बिस्तर न पकड़ लें| तो इस सब के लिए भी उनके पास नया कड़ा है तो कलाई में पड़ा पड़ा उनको चेताता रहता है|

आज सबसे जरूरी है किसान का चतुर होना| किसान को कब कहाँ क्या बोना है, कब कितना बोना है. अन्य किसानों की बीज बुआई के हिसाब से दाम की संभावित घट बढ़ का कुछ अंदाजा रहे, कब कहाँ भण्डारण करना है, कब उसे बेचने का फायदा है, क्या लागत क्या दाम, यह सब बताने के लिए चतुर  उपकरण हों| ट्रेक्टर या अन्य उपकरण खेत में स्वचालित तरीके से काम कर पायें| न अधिक खाद पानी लग जाये न अधिक जहर की खेत में फ़ैल पाए, इसका इंतजाम होना चाहिए| चतुर घर से ज्यादा जरूरी है चतुर खेत| खेतों को चतुर बनाने के काम में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए| भोजन ऐसी जरूरत है, जिसका विकप्ल हाल फ़िलहाल नहीं है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए|

यह नई तकनीक आराम भी है तो संभावित आलस्य भी| इस बीच चाय आ गई| बात लम्बी चलती रही| और तभी ख़त्म हुई जब टेलिविज़न ने आपका पसंदीदा सॉप ओपेरा चला दिया| टीवी पर जब भी #GetFitWithFlipkart अथवा #SmartHomeRevolution का विज्ञापन आता है आप प्रसन्नता से मुस्करा उठते हैं|

हिंदी भाषी मजदूर: विकास और वापसी

विकास किसे पसंद नहीं? विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नारा है – बिहार और उत्तर प्रदेश में तो विकास के नारे और विकास की सरकार को पहला स्थान मिला हुआ है| देश का समग्र विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे बड़ा सपना है| पान से लेकर चाय की दुकान तक पर हमारे क्षेत्र में विकास वार्ता होती रहती है|

कठिनाई है विकास करने की| ऐसा नहीं कि बिहार को विकास पसंद नहीं| जहाँ विकास की झलक भी दिखाई दे, हम पहुँच जाते हैं| देश का कोई नगर, कोई उद्योग, कोई सड़क, कोई भी विकास मंदिर ऐसा नहीं जहाँ हमारा श्रम न लगा हो|

हमारा विकास प्रेम भी ऐसा है कि जहाँ विकास की सम्भावना भी हो, वहाँ पहुँच जाते हैं| देश का विकास अगर हुआ है तो शायद हमारे मजदूरों के बाजुओं के बल पर ही हुआ है| मुंबई हो या चेन्नई उनकी सड़कों पर श्रम करता श्रमिक बिहार का नहीं तो हिंदी क्षेत्र का तो अवश्य ही है|

देश भर में हम हर स्थान पर हैं| विकास में हिंदी क्षेत्र के आप्रवासियों का योगदान मानने की जगह स्थानीय लोगों को लगता है कि हम उनके रोजगार छीनते हैं| अक्सर हम हम पर अपराध और गंदगी से हमें जोड़कर देखा जाने लगा है| किसी भी प्रदेश में स्थानीय अप्रशिक्षित मजदूरों की बेरोजगारी का कारण भी हमें ही माना जाने लगा है| पहले मुंबई और अब मध्यप्रदेश में हमारे विरुद्ध बातें उठने लगीं हैं| आज अनामंत्रित अतिथि का व्यवहार झेलना हमारी विडंवना है|

क्या हम जबरन वापसी के लिए विवश होंगे? क्या हमें उन गाँवों और शहरों में लौटना होगा जहाँ हम केवल यादें छोड़ आये हैं?

मगर ऐसा क्यों?

पहला यह कि अनामंत्रित अतिथि किसी को कोई पसंद नहीं करता| हम पहले पहुँचते हैं और फिर नौकरी ढूंढते हैं| अक्सर उन लोगों को टेड़ी निगाह से नहीं देखा जाता जिन्हें नौकरियाँ देकर आमंत्रित किया गया हो जैसे इंजिनियर या डॉक्टर|

दूसरा अप्रशिक्षित मजदूर आसानी से दिखाई दे जाने वाला समुदाय है| यह दिन भर सड़क या सार्वजानिक स्थानों पर दिखाई देने के कारण निगाह में जल्दी आता है| जब स्थानीय लोगों के मुकाबले आप्रवासी मजदूर अधिक दिखाई दें तो लोग सरलता से संज्ञान लेते हैं| हिंदी क्षेत्र में जनता और सरकारों के पास धन की कमी भी एक बड़ा कारण है| जब तक समृधि नहीं होती, लोग आदर नहीं करते| पंजाबी शरणार्थी हो या तिब्बती, सभी अपने साठ सत्तर के दशक की ऐसी कहानियां रखते हैं जब स्थानीय लोग हेयता का भाव रखने लगे थे| बाद में समृधि आने और हिंदी सिनेमा में पंजाबी दबदबे के चलते पंजाबी आज देश का प्रभावशाली सांस्कृतिक समुदाय है| इसी प्रकार, समृद्धि के साथ गुजरात का डांडिया और बिहार का छट भी प्रसिद्ध होने लगा है|

तीसरी और इन सब से बड़ी बात हैं – मतदाता के रूप में इस वर्ग की उदासी| यह तबका अपने स्थानीय चुनावों में ऐसा नेतृत्त्व नहीं चुन सका जो हिंदी प्रदेश विकास के सतत पथ पर ले जा सके| स्थानीय रोगजार, उद्योग और व्यवसाय नष्ट होते रहे| पलायन शुरू हो गया| हिंदी क्षेत्र सबसे बड़ा मानव संसाधन में सर्वाधिक धनी होने का कोई लाभ नहीं ले सका| दुर्भाग्य से देश की सरकारों का भी विकास सम्बन्धी नीति निर्माण गाँवों और छोटे कस्बे शहरों के हित में नहीं रहा| आज स्थानीय रोजगार की कमी के कारण हमें पलायन करना पड़ता है|

मुझे लगता है कि यह उचित है कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश ही नहीं, देश के सभी राज्यों की सरकारें और कंपनियाँ स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथिमिकता दें| पलायन को सस्ते मजदूर के लालच में बढ़ावा न दिया जाये| हिंदी प्रदेशों में विकास पर स्थानीय राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें|

 

चुनाव २०१८

उत्सवधर्मी भारतीय हर अवसर पर उत्सव का आनंद उठा ही लेते हैं| भारतीय त्योहारों में अलग अलग तरह के खेलों का आयोजन होता है| कभी पतंग के पेंच लड़ते हैं तो कभी तीतर बटेर और मुर्गे| चुनाव भी भारतीय लोकतंत्र का ऐसा ही त्यौहार है| इसके खेल में नेता लड़ाए जाते हैं| मजा ये कि लड़ने वाले खुद आगे आते हैं|

चुनाव के खेल में चौसर की बिसात है, क्रिकेट का पिच है, टेनिस का नेट है, हॉकी की छड़ी है, फ़ुटबाल का लक्ष्य है, शतरंज के वजीर हैं, साँप सीढ़ी के साँप हैं, कबड्डी का साँसे है, मुक्केबाजी का मुक्का है और कुश्ती की पटकनी है| किसी भी पल ठोंक पीट कर बाहर कर दिया जाना है| जो टिका उसके गले सोने का तमगा और सिर काँटों का ताज है| हर किसी की उँगलियाँ शुध्द देशी घी और सिर सरसों के खौलते तेल में है| हर किसी खेल में गणित का विज्ञान और जन संपर्क की कला है|

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हाल में चुनाव को आंकड़ों का गणित और गणित का खेल बताने के प्रयास चलते रहे हैं| प्रशांत किशोर में आंकड़ों के बूते जनता को अपने आंकड़े में जकड़ने का जंजाल बुना था| यह जाल जंजाल अगले चार साल में ही खुद प्रशांत किशोर के गले में पड़ता हुआ, मोदी शाह के गले से उतर छुआ लगता है| जिस गणित के दम पर शाह शहंशाह ज्ञात होते थे उसका शाह-मात उनके सामने है| पन्ना प्रमुखों के पञ्च-प्रमुख कुछ बोल नहीं पा रहे| ऐसा पहली बार नहीं हुआ है| चुनावों में सितारों का टूटना चलता रहा है| टूटे सितारों के नाम इतिहास में अंकित होते रहे हैं|

पहले दूसरी जाति या धर्म देश के दुश्मन नहीं मान लिए जाते थे, आज ऐसा हो रहा है| तकनीकि सामाजिक माध्यमों को असामाजिक स्तर पर गिराने के साथ राजनीति ने अपने आप को एक अंधकूप में धकेल दिया है| हाल फिलहाल राजनीति ने सामाजिक संबधों को धर्म और जाति की तरह ही विभाजनकारी रूप में विच्छेदित किया है| इस देश में सांड छुट्टे घूम रहे हैं और बैल बाप हो चुके है| यह देश गाय और सूअर का देश बनकर रह गया है|

मगर क्या स्थिति इतनी निराशाजनक है| नहीं, बिक्लुल नहीं| कम से कम पांच राज्यों के हालिया चुनाव आश्वस्त करते हैं| हिंदुत्व का नारा कमजोर हुआ कि न पुराने सिपहसालारों का राम मंदिर जनचर्चा में आया न नए सिपाही का मंदिर मंदिर भटकना| अंध विकास का मजबूत नारा छत्तीसगढ़ में खेत रहा तो अन्य जगह विकास के नारे का खोखलापन खुलकर सामने आया| मध्यप्रदेश में जनता ने चहुमुखी विकास का प्रश्न सामने रखा है जहाँ विकास के बाद भी जनता को अधूरी योजना कार्य और नेताओं के अहंकार का सामना करना पड़ा| यह परिघटना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जनता में सोचने समझने का काम हो रहा है| सामाजिक संचार माध्यम अपने हो हल्ले के बाद भी आम जनता को अपनी समस्याओं और उनके समाधानों के प्रति सोचने से विरत नहीं कर पा रहे|

सामाजिक संचार माध्यम अपनी प्रासंगिकता के बारे में सोचें, यह समय की आवश्यकता है|

पिंजड़ा

मेरे चारों तरफ एक पिंजड़ा रहता है| तुम पिंजड़े को गलत क्यों समझते हो? पिंजड़ा तुम्हे कैद नहीं करता| तुम्हें आजादी देता है – चैन से सोने की|

पिंजड़ा लोहे का नहीं होता|

सोने का पिंजड़ा देखा है तुमने? बड़ा सा सोने के पिंजड़ा, जिसमें भगवान रहता है| पिंजड़े के ऊपर भगवान की ध्वजा रहती है| भगवान उस पिंजड़े में आजाद रहता है| छप्पन भोग अपनी मर्जी से खाने को मिल जाए तो कौन भगवान प्रसन्न न हो? पुराने समय की बात है| भगवान अपने पिंजड़े से बाहर निकला और निर्गुण हो गया| अब वो पिंजड़े से बाहर नहीं निकलता|

चाँदी के पिंजड़ो में हमने बहुत लोगों को देखा है| किस किस के नाम लें? उनकी आजादी और नींद में ख़लल क्यों डालना? चाँदी के पिंजड़ो में हमारी सरकार सोती है और उसके हाकिम सोते हैं| उसे अपना भला करने की आजादी है| उसे कानून बनाने की आजादी है| उसे गोलियाँ चलाने की आजादी है| उसे अपने मन पसंद नारे सुनने की आजादी है|

हमने दिल्ली मुंबई में शीशे के पिंजड़े देखे हैं| उन पिजड़ों में रहने वाले गुलामी पर अपने हस्ताक्षर करते हैं| पिंजड़े से बाहर जाने का जुर्माना खुद अपने कलम से तय करते हैं| वहाँ चौबीस घंटे काम करने की आजादी है| शीशे के एग्जीक्यूटिव केबिन में शांत बीमारियों से शांतिपूर्वक मरने की आजादी है| लोग दिन भर कंप्यूटर पर टकटक करते रहते हैं जिससे शाम को नर्म बिस्तर पर बैठ कर नींद की गोली खा सकें| उन्हें नींद की गोली खाने की आजादी है|

आजकल बड़े बड़े मुहल्लों के बाहर लोहे के बड़े बड़े गेट देखते हो? नहीं, मैं कुछ नहीं बताऊंगा| ये मेरा पिंजड़ा है|

तुम पिंजड़े से बाहर जाना चाहते हो? पंख कट चुके हैं तुम्हारे| तुम एक उड़ान नहीं भर सकते| बेपर लोगों का जीवन आवारगी में बीत जाता है| तुम्हारा भोजन अपवित्र और तुम्हारा भोग अश्लील है| तुम्हारी सोच नक्कल है|

अपने पर उगाने की भूल न करना दोस्त| तुम्हारा आसमान अराजक है| तुम्हारी आजादी नारा है| तुम्हारी साँस गिरवी होने की मोहताज है|

लाओ अपने कटे हुए पंख दो, तुम्हारे लिए मुकुट बनायें| तुम वापिस आना पिंजड़े के राजा बनना|