हो – हल्ला मीडिया के सुर

पिछले दो दिनों में मुझे भारतीय मीडिया से काफी घृणा हो रही है|

हाल में एक घटना पर इस हो – हल्ला मीडिया ने अपने खुद के हल्ले पर जिस तरह सुर बदल कर बातें की हैं, वो मुझे निंदनीय लग रहीं हैं| शायद किसी ने इस बात पर गौर भी न किया हो|

जब कुछ महीने पहले एक उच्च सरकारी अधिकारी को जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया तो हो – हल्ला मीडिया उस दिन उनको बेईमान साबित करने पर तुला हुआ था| बाद में जब उनके कुछ परिवारीजन ने आत्महत्या की तो हमारा हो – हल्ला मीडिया ने कर्मफल सिद्धांत के पुलंदे बांधे| अब उन अधिकारी और उनके पुत्र ने भी आत्महत्या कर ली हो तो मीडिया ने अपने सुर बदल लिए है|

एक बड़े हो – हल्लाकार ने फेसबुक पर “आत्मग्लानि” से भरा पोस्ट डाला| उनके सुर के हिसाब से ऐसा लगता है कि उन्होंने भावना में बहकर गलत हल्ला मचाया और एक ईमानदार अधिकारी को दोषी ठहराया| एक वरिष्ठ पत्रकार (जिन्हें अभी भी मैं हो – हल्लाकार कहने से परहेज कर रहा हूँ) ने ट्विटर पर इन आत्महत्याओं के लिए जांच एजेंसी की प्रतारणा पर प्रश्न उठाया है| भगवान् जाने कैसे वो इस “कस्टोडियन मर्डर” कहने से रुक गए|

मुझे इस बात का भी दुःख है कि बहुत से लोग  – लेख़क – कवि – विचारक – पेशेवर – बुद्धिमान और बुद्धिहीन – इन पोस्ट और ट्वीट को लाइक कर रहे हैं|

…  ….

मैं हो हल्लाकारों से पूछना चाहता हूँ –

क्या गिरफ्तार होने से कोई दोषी हो जाता है? अगर नहीं तो आप हल्ला क्यों मचाते हो और पुलिस पर (कोर्ट पर तो बाद की बात है) सजा देने का आधारहीन दबाब क्यों बनाते हो? सूचना/समाचार देकर अपना मुखकमल शांत क्यों नहीं कर लेते?

क्या आत्महत्या करने से कोई निर्दोष सिद्ध हो जाता है? अगर नहीं तो अब आप ग्लानि भाव में क्यों हैं?

और प्रश्न नहीं पूछूंगा| मैं आज देश के सारे मीडिया की निंदा करना चाहता हूँ, भले ही वो मेरे खुद के हिसाब से “हो – हल्ला मीडिया” न हो|

 

काले काले भूत, काला धन लेकर

काली रात होती है… अमावस की रात…
बहुत काली रात है… पितर अमावस की रात…
इस साल 30 सितम्बर की रात एक बार फिर वही पितर अमावस की काली रात होगी…
 
इस साल की इस काली रात में काले- काले भूत निकलेंगे… काले काले भूत…
काला धन लेकर…. अपना काला काला कालाधन….
 
उनका इन्तजार करेंगे…. सदियों के भूखे बेताल… नहीं भाई…
उनका इन्तजार करेंगे… आयकर विभाग वाले…
उनका स्वागत होगा… उनका काला काला कालाधन सफ़ेद हो जायेगा…
उसके बाद, भूत और बेताल…
नहीं नहीं…
भूत और आयकर वाले सो जायेंगे…
अगली अखिल भारतीय काला-सफ़ेद- योजना आने तक…
 
अगर आपके पास भी कालाधन तो आप भी आइये…
इस बहुत काली अमावस की रात में
किसी को नहीं बताया जाएगा कि आप काले काले भूत हैं
 
– ऐश्वर्य मोहन गहराना
 
नोट– आयकर विभाग के काउंटर बीच काली रात यानि रात के बारह बजे तक खुले रहेंगे, जिस से काले भूतों के बारह न बजें|

गूगल के बहाने कंपनियों के जन्मदिन पर

आज २७ सितम्बर २०१६ को गूगल अपना अठारहवां (18 वां) जन्मदिन मना रहा है| मगर लगता है की कुछ लोचा है|

यूनाइटेड किंगडम के प्रख्यात अखबार द टेलीग्राफ की इस ख़बर के मुताबिक सन २००५ में गूगल ने अपना सातवाँ जन्मदिन सत्ताईस सितम्बर को नहीं वरन छब्बीस सितम्बर दो हजार पाँच (२६ सितम्बर २००५) को मनाया था| जबकि गूगल का छठां जन्मदिन सात सितम्बर दो हजार चार (७ सितम्बर २००४) को था| लेकिन गूगल का पांचवां जन्मदिन आठ सितम्बर दो हजार तीन (०८ सितम्बर २००३) को हुआ| खुद गूगल के मुताबिक गूगल ने अपना इनकारपोरेशन एप्लीकेशन चार सितम्बर उन्नीस सौ अठान्वै (०४ सितम्बर १९९८ को सरकार के पास दाखिल की थी| उधर गूगल डॉट कॉम पंद्रह सितम्बर उन्नीस सौ सतानवे (१५ सितम्बर १९९७) को पंजीकृत हुई|

बहरहाल, अब गूगल हर साल २७ सितम्बर को ही अपना जन्मदिन मनाने का सोच रही है|

ऐसा नहीं है कि कंपनी के जन्म दिन का मसला अकेला गूगल का मसला है|

सिद्धांततः कम्पनी दो या अधिक लोगों के मन में कंपनी बनाने की इच्छा के जन्म लेने के साथ उन सबके मस्तिष्कीय गर्भ में उत्पन्न होना शुरू होती है| इस प्रक्रिया में उसका रंग रूप आकार प्रकार कद काठी आदि तय की जाती है| सिद्धान्तः कंपनी उस दिन बन जाती है जिस दिन यह सब तय हो जाता है| इसके बाद कंपनी के नाम पर सरकार सरकारी मुहर लगवाई जाती है जो तकनीकि रूप से उस नाम से कंपनी बनाने की अनुमति होती है| अगले चरण में कंपनी के जन्मदाता – प्रमोटर उस नाम से कंपनी के इनकारपोरेशन के लिए अर्जी दाखिल करते हैं| यह सभी चरण देश और काल के हिसाब से आजकल के दो घंटे से लेकर पुराने ज़माने के दो एक साल तक हो सकते हैं|

परन्तु कानूनन कंपनी का जन्म उस दिन माना जाता है जिस दिन सरकार से इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिलता है| परन्तु, कंपनी के प्रमोटर इस आधिकारिक जन्मदिन का प्रायः इन्तजार नहीं करते और नाम तय होते ही कंपनी का कुछ न कुछ काम धाम शुरू भी कर देते है|

उदहारण के लिए अभी हाल में एक कंपनी खोलने के लिए प्रक्रिया शुरू की गई| कंपनी के प्रमोटर अपने इस बच्चे के लिए पिछले तीन साल से योजना बना रहे थे| इस साल फरवरी में उन्होंने कंपनी की पूँजी, कार्यकलाप, नागरिकता, निवास स्थान (कार्यालय), लोगो, पञ्चलाइन आदि मसलों पर अपना विमर्श पूरा किया| तमाम कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन युवा प्रमोटरों पर संसाधन (कागजात – जैसे पहचान पत्र) नहीं थे तो उन्हें बनाने की कार्यवाही हुई| इसके बाद एक दिन उन्होंने कंपनी बनाने संबंधी औपचारिक अनुरोध किया गया | तीन चार दिन में कंपनी के लिए नाम विशेष की सरकारी अनुमति मिली| अब प्रमोटर अपनी कंपनी के नाम और लोगो को लेकर इतने उत्साहित थे कि कहा गया कि जब तक बढ़िया सा लोगो न बन जाए तब तक कंपनी इनकारपोरेशन की औपचारिक एप्लीकेशन न लगाईं जाए| वो कंपनी के जन्म के दिन शानदार कार्यक्रम करना चाहते थे| इसके बाद एक दिन शाम को एप्लीकेशन इस हिसाब से लगाईं गई कि अगले दिन कंपनी को इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिले| मगर सरकारी कार्यालय उस दिन अच्छे मूड में था और कंपनी उसी दिन यानि योजना से एक दिन पहले बन गई| पुराने समय में एक और दिक्कत थी| कंपनी बनने के लगभग दस दिन बाद प्रमोटर को अधिकृत रूप से पता लगता था कि कंपनी बन चुकी है|

अब आप कंपनी का वास्तविक जन्म दिन तय करते रहिये| कानून वही मानेगा जो वो मानता है – सनद की तारीख़|

 

भारतीय प्रेमी के हृदय से

तुम्हारे हर न के लिए

मेरा प्रतिशोध होगा

चिर अनंत तक झूल जाना

पौरुष के भग्नावशेष के साथ |

क्योंकि टूटा पुरुष भारतीय

निराशा के क्षीरसागर से

निकलता हुआ तिमिर है |

और तुम असमर्पित!

गलबहियां डालना

नागवेणी बनकर |

मेरी माँ ने भी कदाचित

न नहीं कहा था निश्चित

मुझे धारण करने से पहले|

चिकुनगुनिया की रात

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तेरे प्यार की टूटन की तरह टूटता तन बदन,

पोर पोर से दर्द – दर्द से रिसता हुआ गगन,

मेरे अंतर उतरती प्यार की पहली पहली चुभन,

हौले हौले चुभती तेरी साँसों की बहकी पवन|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तंदूर की तलहटी में भुनता तंदूरी चिकन,

छिटक छिटक जाता चरमराता अंतर्मन,

इश्क़ की कड़ाही के जलते तेल में तलते

आखिरी उम्मीद का चढ़ता इश्क़न बुखार|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

चौपड़ की बिसात पर शकुनि का पासा,

धृतराष्ट्र की धूर्तसभा में विदुर की भाषा,

अंधे भीष्म का जोशीला सांस्कृतिक प्रलाप,

अस्पताल में दम तोडती मरीज की मुनिया|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

बन्दूक की नौक पर||

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

हर सुबह लाऊड स्पीकरों से सर्वव्यापी के कान फोड़कर

बता दूंगा जता दूंगा अपनी भक्ति

सर्वशक्तिमान को बचा लूँगा मैं शैतानी फंदों से

दुनिया के तमाम दरिंदों से, जो नहीं पूजते उसे,

या पूजते हैं उसे किसी और नाम से,

या चुपचाप रहकर उसे अपना काम करने देते हैं|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

दुनिया की हर रसोई में जाकर कच्चा चबा जाऊंगा

जो गाय खाता है जो सूअर खाता है

जो घोड़ा खाता है जो घास खाता है

जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है

चबा जाऊंगा उसका ज़िगर दिमाग कलेजा खून के थक्के

थूक दूंगा इंसानियत उसकी नीली पीली धूसर लाल लाश पर|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

फौड़ दूंगा उन घबराई सहमी आँखों को

जो नहीं देखेंगी वासना में छिपे मेरे प्रेम की ऊँचाई

फंसाना चाहती है मुझे अपने प्रेम जाल की गुलामी में

चीर दूंगा टांगों से छाती तक मखमली खूबसूरत बदन

जो मेरे मर्द को नहीं पहचान पायेगा मेरी मर्जी के वक्त

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

जूते

मेरे पिता उस दौर में जन्में थे, जब (उनके हिसाब से) जूते की पालिश की चमक आपके भाग्य की चमक को दर्शाती थी।
पापा जब भी चमकदार जूता देखते, खरीद लेते।
मगर बाद में उन्हें पोलिश करने का समय नहीं निकाल पाते।

यह बात  नीचे दी फेसबुक पोस्ट  की वजह से याद आई|