बूढ़े घर

बूढ़े घर चुपचाप खड़े रहते हैं, बूढ़े सन्यासी की तरह ध्यान मग्न| बूढ़े घर क्रोध नहीं करते| पुराने बरगद की तरह पनाह देते हैं किसी को भी| जिन घरों पर कभी जमींदार, साहबी और दौलत का नशा तारी था, आज अपनी झुकी और टूटी कमर पर हाथ रखे चुपचाप देखते रहते हैं, बूढ़ी दीवार के किनारे सहारा लेने वाले अजनबी को बच्चे की तरह| क्या पता इनमें से कोई अपना ही बच्चा हो, बुढ़ापे में ठीक से पहचान नहीं आता| बूढ़े घर को हर बच्चे से उम्मीद है, उसे अपने पराये का फ़र्क नहीं| जो आ जाये वह ही उसका अपना बशिंदा हैं| कौन गैर, कौन पराये, कौन अजनबी, और अनजान जब अपने ही छोड़ गए तो क्या कौन, क्या क्यों?

पुराने शहर के हरे भरे हाट बाजार के सहारे कोई भूलाबिसरा आज भी उन्हें याद करता है| सोचता है, उस बूढ़े हर के पुराने बाशिंदे आज कैसे होंगे? कोई नहीं सोचता वो पुराना घर आज कैसा होगा| होगा, होगा या नहीं होगा, किसे बूढ़े घरों की परवाह है|

पुराने घर दालान की दीवार पर लगी वो बंद पड़ी हुई पुरानी चाबी वाली घड़ी कोई चोर नहीं चुराता| कोई उसमें चाबी नहीं भरता| कोई उनके नीचे बैठ कर हुक्का नहीं गुड़गुड़ाता| मगर वो घड़ी आज भी चलती हैं, घड़ी दर घड़ी, पहर दर पहर| ये बूढ़ा घर आज भी उसमें अपना वक़्त देखा करता है|

वक़्त बूढ़े घर की छाती पर चुपचाप मूँग दलता है| वक़्त की चक्की में दो पाट नहीं होते, ये बूढ़ा घर निचला पाट है| बूढ़े घर की छाती से वक्त का चूना झड़ा करता है| यादों की सीलन पपड़ी छोड़ जाती हैं| पुरानी मुहब्बत लौन बनकर बुरकती रहती है|

बूढ़े घर बूढ़ी माँ की तरह होते हैं| कोई आये तो आँचल में पनाह देते हैं| कोई न आये तो दुआ देते हैं| बूढ़े घर के पुराने आँगन में आज भी गिलहरी दाना ढूढ़ती| तोते आज भी आकर कोई पुराना किस्सा सुनाते हैं| बिल्लियाँ अक्सर चहलकदमी करतीं हैं| छिपकलियाँ आज भी उन्हें मलेरिया और डेंगू के खतरनाक मच्छरों से महफ़ूज रखतीं हैं| बूढ़े घर के पुराने आंगन में पुराने जीने के सहारे आज भी रात में चोर उतरा करते हैं| ये चोर चुपचाप आज भी कोई पुरानी याद ढूँढते हैं, शायद मिल जाए छोटी चाची के नाक की वो पुरानी नथ को चाचा की हाथापाई में आँगन में ही कहीं गुम हो गई थी| शायद मिल जाए कोई पुराना खजाना को बाबा ने दीवार में चिनाई करा कर छिपा दिया था| पुराने घर के सहारे कभी कभी नए पियक्कड़ उतर आते हैं पीते हैं देशी ठर्रा| जिस घर में ठंडाई की बहार थी, कांजी की मौजें थीं, जहाँ घड़ों में शर्बत घुला करते थे, आज वहाँ बैठ आकर भडुए की महफ़िल में कडुआ पिया जाता है|

जिन लोगों की ये बूढ़ा घर विरासत में मिला था आज अपने सपनों के घर में सपने देखते हैं इस बूढ़े घर के| उन्हें अक्सर याद आता है इसके आँगन में लड़कियों का गुट्टे खेलना, लड़कों का छत पर पतंग उड़ाना, बूढों का बरामदे में बढ़िया गप्पा और लम्बी  डींग मारते हुए हुक्के गुड़गुड़ाना, दादियों का छत पर आचार के आम की फांकें सुखाना, चाचियों का आँगन में बैठकर दाल बीनना, माँ का रसोई में कचोड़ी बनाना| वातानुकूलित सपने आज भी याद करते हैं भरी सर्दियों में रजाई में बैठकर गरमागरम मूंगफलियाँ चबाना|

वक़्त अक्सर देखता है, नई पीढ़ी का जाते जाते एक पुराना घर छोड़ जाना| ये पुराने घर अक्सर मायूस मिलते हैं| ये अक्सर मायूस मिलते है, गिरा दिए जाने तक या फिर एक हेरिटेज हवेली बना दिए जाने तक|

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मैं भी

मैं भी, साल २०१८ के दो ख़तरनाक शब्द| पुरुषों में डर है कि इन दो शब्दों के साथ उनका नाम न लिखा हो| प्रवृत्ति विशेष के पुरुष बुरी तरह घबराये हुए हैं तो अन्य पुरुष अकारण परेशान किये जाने की आशंका से ग्रसित हैं| इन दोनों प्रकार के पुरुषों में एक बात का संतोष भी है – उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने की अकेला और असहाय महसूस नहीं कर रहें होगीं| तो एक मूर्खतापूर्ण चिंता भी है कि कहीं उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने प्रति अन्याय की बात बात उठाकर परिवार की योनि अर्थात इज्जत दाँव पर न लगा दें और शोषित होने के जन्मजात अभिशाप के मुक्त न हो जाएँ|  

मुद्दे की राजनीति, मुद्दे की राजनीति, मुद्दे से जुड़े क़ानून और उनके संभावित दुरूपयोग चर्चा में हैं| किस कानून या आन्दोलन का दुरूपयोग नहीं होता? हमारा ध्यान सकारात्मक पहलू पर होना चहिये| युवा लड़कियों के परिवार सुरक्षित वातावरण महसूस कर रहे हैं| जिन कंपनी या संस्थानों में यौन शोषण सम्बन्धी समिति का गठन नहीं था या ठीक से नहीं था, वो सलाह के लिए संपर्क कर रहे है|

जिस प्रकार के आवाजें उठ रहीं हैं, आन्दोलन में गंभीरता आएगी और यौन शोषण सम्बन्धी कानून के लैंगिकसंतुलन की ओर बढ़ने में भी मदद मिलेगी| उम्मीद है कि शोषण का शिकार रहे पुरुष भी शोषक पुरुषों और महिलाओं के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत करेंगे|

इस समय कई प्रकार की भ्रान्ति जनता में फैली हुई है| बहुत से लोग यह मान कर चल रहे हैं कि आपकी हँसी मजाक भी इस प्रकार के आरोपों का आधार बन सकते हैं| वास्तव में ऐसा नहीं है| इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण आरोप दुर्भावनावश लगाये तो जा सकते हैं परन्तु यह कानून की लड़ाई में नहीं टिक पाएंगे| परन्तु आपसी हँसी मजाक की परिभाषा सत्ता और समाज के अलग अलग पायदान खड़े हर व्यक्ति के लिए अलग हो जाती है| भाभी और साली के साथ भारत में मजाक का रिश्ता माना जाता है| मगर आप अपनी साली से जो मजाक करते है वो भाभी से नहीं करते, यह एक सत्य है| मजाक आप अपनी बहन से भी कर लेते हैं मगर यह वह मजाक नहीं होते जो आप भाभी या साली से कर लेते हैं| यही बात महिला मित्र के साथ लागू होती है| प्रायः पुरुष महिला सहकर्मियों के साथ शुरुआत से ही भाभी या साली वाले रिश्ते तक पहुँचने की कोशिश करते हैं| देखने की बात है कि सम्बंधित महिला इस हँसी मजाक को किस तरह ले रहीं हैं| यदि आप ही मुख्यतः मजाक प्रारम्भ करते रहे हैं तो आप फँस सकते हैं क्योंकि महिला आपके साथ अपनी ओर से मजाक नहीं कर रही| सहकर्मी के कपड़ो, श्रृंगार, अंगों आदि पर बात करना गलत है, कम से कम जब यह सब पिछली बार की बात में पसंद न किया गया हो|

एक बात और कहनी पड़ती है| भारत को कामसूत्र का देश माना जाता है| देश में कामसूत्र छिप कर पढ़ने की पुस्तक रही है| सब पाठक जानते हैं कि इस पुस्तक के कौन कौन से अध्याय उन्होंने पढ़े हैं| मगर कामसूत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, किस स्त्री से सम्बन्ध रखने चाहिए, किस से नहीं| कामसूत्र पुराना ग्रन्थ है| समय के साथ इस सूची में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अवश्य बनी होगी, मगर प्रासंगिकता बरक़रार है| हर स्त्री आपके लिए नहीं है| स्त्री की सहमति के लिए कामसूत्र में जोर दिया गया है| सहमति के प्रयासों पर और उनकी हद समझने की भारतीय पुरुषों की जरूरत है| भारतीय समाज को यौन शिक्षा की आवश्यकता है| यौन शिक्षा के पाठ्यक्रम को समझने की उस से भी बड़ी आवश्यकता है|

जिन दिनों हम यह सब बातें कर रहे हैं, भारतवासी नारीशक्ति के सबसे बड़े उत्सव नवरात्र के उत्साह में डूबे हुए हैं| हर वर्ष प्रश्न उठते हैं कि स्त्रीशोषक पुरुष किस मूँह किस  शृद्धा से नवरात्रि मना पाते हैं| कन्याभ्रुण हत्या करने वाले अपनी पाप मुक्ति के लिए जोर शोर से कंचक जिमाने और नवरात्रि के भण्डारे करते पाए जाते हैं| नवरात्रि का यह त्यौहार एक बात की भी याद दिलाता है कि पुरुषसत्ता सर्वोपरि नहीं हैं और पुरुषसत्ता को मानवता का अस्तित्व बचाने के लिए नारीशक्ति की शरण लेनी पड़ी है और उसे अपनी समस्त शक्तियों से भी नवाजना पड़ा है|

आइये बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाएं|

https://gahrana.com/2013/11/29/sexual-abuse-in-the-corporate-world-hindi/

https://aishmghrana.me/2013/03/06/ring-the-bell-stop-violence-against-women/

https://gahrana.com/2015/12/21/do-not-sit-quiet-hindi/

https://gahrana.com/2013/08/02/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

वडपलनी मुरुगन मंदिर

कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

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चेन्नै की एक सुबह ईश्वर (मेरे वरिष्ठ और मित्र) से मिलने जाते समय देव का बुलावा आया। पहले पाँच रुपये के टिकट से दूरदर्शन हुए तो आदेश हुआ पास आओ तो बीस का टिकट लिया। छोटी से बात कही गई, साथ के साथ सुन ली गई। मुरुगन से पिछले दस साल में पहली मुलाकात थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों में उत्तर भारत के मंदिरों के मुकाबले अधिक सफाई है और पैसे भी रसीद के साथ लिए जाते है। पुजारियों ने खुद बुला कर आशीर्वचन कहे और न धन मांगा न दिया गया, और बाद में किसी पुजारी ने आँख न ततेरी। सिर्फ़ दो पुष्पमालाओं से पूजा सम्पन्न हुई। खाद्य का प्रसाद ने चढ़ा, न पाया। बाहर आकर स्थानीय चाय नाश्ता हुआ और मन के साथ तन भी संतुष्ट हुआ। #chennai #murugan #vadapalani

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तिवारी जी की सरकारी हत्या

तिवारी जी की सरकारी हत्या “उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग” के लिए कानफोड़ू धमाका साबित हुए।

सवाल को कई थे मगर पूछे न गए, न जाएंगे। वो तो तिवारी की की सहकर्मी मुस्लिम हुईं, वरना “मुहब्बती जिहाद” का मीडियाई मामला बन जाता। ख़ैर ये तो बाद में किस्से गढ़ने की बात हुई कि मुस्लिम लड़कियां जिहादी क्यों नहीं होती और मुहब्बत वाला जिहाद क्यों नहीं करतीं। प्याज, सरकारी फ़ाइल और मीडियाई मामलों की परतें तो खुलती उतरती रहतीं हैं, सो अभी के लिए मामले का यह पहलू मुल्तवी। मुद्दा खास पर चलते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग को तिवारी जी की सरकारी हत्या के कानफाड़ू धमाके से झटका ऐसा लगा है कि हलाल हुए जाते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग इंसानी बिरादरी का वो हिस्सा है जो स्वयंपोषी बने रहने के लिए कुत्ते की दुम की तरह डोलने और कबूतर की तरह मिचमिचाने का आदि है।

यह हिंदुस्तानी समाज का जो नासूर है जिसे हर तरह के भेदभाव ढूंढ लेने में महारत है। बस इनकी चाकरी बनी रहे और इनके मालिकान की काली सफेद आमदनी।

सरकारी गोली से आदिवासी मरें तो यह पुलिसियों से पहले उन्हें नक्सल का दर्जा दे दें। दलित, पिछड़ा, मुसलमान, पूर्वोत्तरी, कश्मीरी, झोपड़पट्टी, किसान, मज़दूर, दाढ़ीवाला, सांवला, काला, औरतजात, औरतबाज, कुछ भी इनके निशाने पर आ सकता है। वो तो गनीमत हैं आजकल राष्ट्रवाद के जोर के चलते सैनिकों की इज्ज़त है वरना रेलवे की दूसरा दर्जा बोगी तबादले पर जा रहे दस सैनिक बैठा कर के देखिए।

अन्नदाता किसान भले ही उच्च कुलीन ब्राह्मण या सूर्यवंशी क्षत्रिय क्यों न हो, उसकी रैली में सरकारी लाठी तो चलवा दीजिये। उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे सब्सिडी वाला तिलचट्टा जूते से कुचल कर मारा जा रहा हो। सब्जी किसान को सब्सिडी न दो, और उस से प्याज़ दो रुपये किलो खरीद कर दिल्ली मुम्बई में पच्चीस रुपये किलो बेच दो। इनके पास दारू, दावत, टीवी, कार, मोबाइल सब के लिए बड़ा बटुआ है, बस किसान मज़दूर और रिक्शेवाले ही लुटेरे हैं। उन पर गोली चलाते रहो।

मुझे तिवारी जी से बैर नहीं है वरन उस मानसिकता पर है तो तिवारी ही की अपना मानकर हो – हल्ला कर रही है|मगर उस वक़्त सब को साँप सूंघ जाता है जब “कोई और मरता” है| दर्द केवल अपनों के मरने पर होता है| 

आख़िर क़ानून के राज्य में पुलिस द्वारा किसी की भी हत्या क्यों हो? सब गिरफ्तारियाँ हों, मुकदमा चले और सजाएँ मिलें या बरी हो जाएँ| मगर इस के लिए पूरा तंत्र चाहिये| सबूत जुटाने के लिए पूरा विभाग खड़ा करना होगा| गवाहों की सुरक्षा का मसला है| उस से ऊपर फ़र्जी मुकदमों और झूठे आरोपों के के मामलों में भी उचित कानून होने चाहिए|

ये मीडिया ट्रायल बंद होने चाहिए| पुलिस को शिकारी कुत्ता समझने की प्रकम वृत्ति ख़तरनाक है कि पट्टा खोला और शिकार हाज़िर| पुलिस को तहकीकात का समय मिलना चाहिए और अपनी तहकीकात पर अच्छे से सोच विचार का भी| यहाँ तक की नामजद मामलों में भी कम से कम हफ्ते भर का समय पुलिस के पास होना चाहिए| पुलिस को तत्काल जनता, नेता, पत्रकार, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि दबावों से मुक्ति मिलनी चाहिए| हो सके तो दैनिक कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों की तहकीकात दोनों के लिए तुरंत अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए|

वरना सौ पचास “और लोगों” के बाद फिर कोई तिवारी जी या गुप्ता जी मारे जायेंगे और आप को दुःख झेलना होगा|

 

रणछोड़

रण छोड़ दिया और भाग निकले, कायर!!

किसी ने तो कहा ही होगा उन्हें; “रण छोड़ दिया और भाग निकले कायर!!”
धिक्कारा गया होगा। क्षत्रिय होने का धर्म, जीवन का मर्म बताया गया होगा।
सोचा भी न गया होगा कि रणछोड़ 64 कलाओं के ज्ञाता हैं।

जीवन में बहुत से रगड़े झगड़े होते हैं। हमें अपने मतलब के रगड़े झगड़े चुनने होते हैं। मतलब नहीं कि रगड़े में हम अपना दिमाग़ रगड़ने लगें। मतलब नहीं कि बेकार के झगड़े में जीवन की लंबी लड़ाई गवां दी जाए।
अर्थ यह नहीं कि सिद्धान्त से समझौता करना है। नहीं। सिद्धान्त पर कायम रहें। अपना विचार दृढ़ता से रखें। अगर यह छोटी लड़ाई है तो इस से हट जाएं। शांति रहेगी। बड़ी लड़ाई की ताकत और समझ बनी रहेगी।
मगर ये छोटे मोटे झगड़े और रोज रोज के रगड़े छोड़ देना सरल काम नहीं है। आदत नहीं लत हो जाती हैं इनकी। रोज रोज के रगड़े में किसी को रगड़ देना संतोष देता है। इस संतोष का अपना सुख और नशा है। यह संतोष है कि कुछ तो किया प्रतिपक्ष का हमने, रगड़ दिया उसे। छोटी मोटी जीत भी यही आनंद प्रदान करती है।
मगर इन छोटे मोटे रगड़ो झगड़ों में हम खोते भी बहुत कुछ हैं। यह उन झगड़ों में हार जाने और रगड़ों में रगड़ जाने के कहीं ज्यादा है।
आप दिमाग़ का बेकार प्रयोग करते हैं जो कई बार नकारात्मक भी हो सकता है। आप को मन की शांति खो देनी होती है। आप का अहम आप पर राज करने लगता है कि आप को पता नहीं चलता।
हाल में मैंने ऐसा ही एक और झगड़ा छोड़ दिया। इस तरह जब आप झगड़ा छोड़ कर चल देते हैं तो आपका प्रतिपक्ष हार जाता है। उन्हें जीत का नहीं उन के झगड़े को महत्व न दिए जाने का दुःख होता है। वो अक्सर हार महसूस करते हैं।
आप का झगड़े से हट जाने शायद ही कभी उनकी जीत होती है।
सावधान रहें, यह झगड़ा दोबारा आप के सामने नहीं आएगा, अगर खुद न चाहें।

वो रात गुजरी थी

वो रात गुजरी थी खड़ामा खड़ामा
किसी चोर पुराने की तरह गुपचुप,
उम्मीद में लौ ए चराग़ शमा ए सुब
दिल बैठे बैठे जाता रहा जाता रहा।

चुपचुप चीखते चटखते तलवे तले
जमीन थी भी कुछ बोझिल बोझिल
उम्मीद के लम्बे साये से डरता हुआ
हौसला हमसाया बैठा रहा बैठा रहा।

दूर सितारे की गर्मी से भरमता हुआ
धड़कन भर धड़कते हुए धधकता रहा
नाउम्मीदियों में रात कुछ बाकी रही
यूँ गुजर रही जागता रहा जागता रहा।

उड़न गाथा

हवाई यात्रा का बेहतरीन पहलू है समय की बचत और बेकार पहलू है समय की बर्बादी।

पहली पहली उड़ान से यह बात समझ आ गई थी। आप सोलह घंटे की रेलयात्रा को घटा कर दो घंटे की हवाई यात्रा में बदल सकते है। लेकिन समय की बचत कितनी हुई, यह सीधा गणित नहीं होता। आप चौदह घंटे नहीं बचाते।

आपका प्रस्थान बिन्दु जो अक्सर आपका घर होता है से लेकर गन्तव्य बिन्दु तक का समय और आराम का विश्लेषण करना होता है। उदाहरण के लिए दिल्ली से मुम्बई की उड़ान दो घण्टे की है। आपको एयरपोर्ट पर किसी भी हालत में एक घण्टा पहले पहुँचना होता है वरना आपको उड़ान में बैठने की अनुमति नहीं मिल पाएगी। रास्ते के ट्रैफिक और किसी भी असंभावना के लिए भी समय का थोड़ा ख़्याल रखना होता है। इसी लिए ज्यादातर लोग दो घण्टे पहले हवाई अड्डे पर पहुंचते हैं। नई दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल तीन जैसे बड़े टर्मिनल पर आपको डिपार्चर गेट तक पहुंचने में भी थोड़ा बहुत समय लगता है।

इस प्रकार सुबह साढ़े सात बजे की उड़ान पकड़ने के लिए आपकी घर से ढाई तीन घंटे पहले निकलना सुनिश्चित करना होता है। यानि आपको देर से देर पाँच बजे घर छोड़ना होगा। पाँच बजे घर से निकलने के लिए आपको एक या दो घण्टे पहले उठना होता है, यह समय इस पर निर्भर है कि कितने लोगों के तैयार होना है। बच्चों को इतनी सुबह जगाना भी आजकल टेढ़ी खीर है।

एक अकेले इंसान को भी अगर हवाई यात्रा करनी है लगभग तीन घंटे पहले जागना होता है। यानि साढ़े सात की उड़ान के लिए चार बजे के आसपास। अगर सुबह नींद से परेशान नहीं होना चाहते तो छः घण्टे पहले सोना भी सुनिश्चित करें।

इसी तरह विमान से उतरने के बात सामान पट्टी से सामान लेने में भी पंद्रह से तीस मिनिट का समय लग जाता है। इसके बाद वाहन अपना हो या किराये का, आप दस पंद्रह मिनट लगते हैं।

इस तरह आपको दो घण्टे की उड़ान के लिए वास्तव में छः घण्टे का समय लगाना होता है। यदि यह उड़ान सुबह सबेरे की है तो रात भर नींद का तो न पूछिये। करवट बदल बदल रात बात जाती है। यदि यह उड़ान दोपहर की है तो दिन न यहाँ का रहता है न वहाँ का।

रेल यात्रा मुझे सुविधाजनक लगती है क्योंकि रेल आपको यात्रा के दौरान सोने का एक अच्छा अवसर प्रदान करती है।