आरक्षित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण न दिए जाने का मुद्दा जोरों पर है| यह नया मुद्दा नहीं है| पिछले साठ सत्तर सालों से यह मुद्दा उठता रहा है| सरकारी पत्राचार होता रहा है| स्थानीय सवर्ण हिन्दू हमेशा इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण के विरोध में रहे हैं| वास्तव में मुस्लिम समुदाय को इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण से कोई फ़र्क नहीं पड़ता|

जातिगत आरक्षण के मुद्दे का सरकारी पत्राचार से बाहर आना कई परिकल्पनाओं पर आधारित है:

  1. इस विश्वविद्यालय में मुस्लिम तबके के लिए आरक्षण है|
  2. जातिगत आरक्षण से विश्वविद्यालय में लगभग आधे लोग उस आरक्षित तबके होंगे जो हिन्दू है या कम से कम सरकारी कागजों में हिन्दू माना जाता है|
  3. मुद्दा उठाने वालों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलेगा|

यह विश्वविद्यालय वास्तव में कोई धार्मिक या जातिगत आरक्षण नहीं देता| पचास प्रतिशत का आंतरिक छात्रों के लिए दिया जाने वाला आरक्षण और गैर मुस्लिम समुदाय का यहाँ पढने की इच्छा न रखना इस को मुस्लिम बहुल विश्वविद्यालय बनाने का काम बखूबी करता है|

यहाँ पढाई वास्तव में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शुरू होती है और यह छात्र आगे चलकर पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ पाते कहते हैं| ज़ाहिर हैं, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अधिकतर छात्र मुस्लिम परिवारों से होते हैं| इनमें भी अधिकतर छात्रों के परिवार के परिवार खानदानी तौर पर यहाँ के छात्र हैं| इसके बाद बची हुई सीटों के लिए खुला मैदान है| देश विदेश का हर सुखी संभ्रांत मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को यहाँ पढ़ाने ले लिए दस दस साल से मेहनत का रहा होता है| उनके जेहन और यह गिने चुने विकल्प में होता हैं, जहाँ उनके बच्चे सुरक्षित होंगे| इस सोच में उनका दोष नहीं है न ही वो डरपोक हैं, यह असुरक्षा की भावना उनपर लादी गई है|

अभी तक इस विश्वविद्यालय में पढने वाले हिन्दू भी मुस्लिमों की तरह परिवार के परिवार पढ़ते रहे हैं| इसका कारण यह है कि सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा खड़े किये गए पारस्परिक अविश्वास के चलते अन्य हिन्दू परिवार यहाँ अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते| साथ ही अलीगढ़ में दंगों की संख्या भले ही बहुत कम हो अलीगढ़ के बाहर लोग इसे इसी तरह देखते हैं कि यहाँ मानो बहुत लम्बा गृहयुद्ध चल रहा हो|

इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण मांगने वालों का एक भ्रम (बल्कि गणित) यह भी है कि जातिगत आरक्षण की लाभार्थी जातियां हिन्दू हैं| ध्यान देने की बात यह है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम जातियाँ भी आरक्षण का पात्र हैं और उनकी जनसंख्या भी कम नहीं है| यदि इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण आता भी है तो आरक्षण का पात्र मुस्लिम तबका बड़ी संख्या में अपना हक ज़माने में कामयाब रहेगा| अगर आप विश्विद्यालय के मुस्लिम बहुमत को तोड़ना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होगा| वास्तव में अगड़े और पिछड़े मुस्लिमों में आपस में मेलजोल का नेक काम होगा| अगर इस गणित को ध्यान से समझें तो धरातल पर राजनैतिक झुकाव में कोई परिवर्तन यह मुद्दा नहीं ला सकता|

हाँ, नुक्सान में कौन रहेगा? कुछ सवर्ण हिन्दू परिवार|

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केरल साद्य

भारतीय संस्कृति भोजन को भजन से समकक्ष रखकर उसपर विचार, शोध विकास करती रही है| जब तक सभी आवश्यक तत्त्व शरीर में न जाएँ, भोजन पूर्ण नहीं| यही विचार थाली की अवधारणा को जन्म देता है| किसी भी खाते –पीते भारतीय परिवार में पांच भोज्य से कम मानकर थाली के बारे में नहीं सोचा जाता| छप्पनभोग की अवधारणा हमारी उत्तर भारतीय भोजन संस्कृति का एक चरम है| अगर थाली में तीन या तीन से कम भोज्य हैं तो इसे भोजन नहीं कहा जा सकता| भले ही मात्रा में कम कम लिए जाएँ पर कई प्रकार के भोज्य हों और उनको प्रेम से सस्वाद ग्रहण किया जाये|

केरल का साद्य भारतीय भोजन संस्कृति का प्रमुख प्रतीक है, जिसे प्रचार और प्रसार की आवश्यकता है| अपनी तिरुअनंतपुरम यात्रा के दौरान साद्य का आस्वादन मेरी प्राथमिकताओं में था|

साद्य मुख्यतः त्यौहार का भोजन है| इसका सम्बन्ध ओणम के त्यौहार से है| समय और धन समृद्धि के साथ अधिकतर पकवान त्यौहार और संस्कार समारोह से निकल कर दैनिक जीवन में आ चुके हैं| खासकर बड़े भोजनालय उन्हें साल भर परोसते हैं| साद्य को केले के पत्ते पर परोसने की परंपरा है परन्तु कोई भी भोजन केले के पत्ते पर परोसे जाने से साद्य नहीं बन जाता|

जिस सम्मलेन में भाग लेने के लिये केरल आया हूँ, वहां भी पहले दिन साद्य परोसा गया था| स्वाद लेकर खाने के बाद भी पूरा आनंद न आ पाया| बहुत से मित्र अपने उत्तर भारतीय, पूर्व भारतीय और पश्चिम भारतीय स्वाद से न उबर पाने के कारण इसका आनंद न ले पा रहे थे न अन्य मित्रों को लेने दे पा रहे थे| इसलिए ठीक से और शांति से साद्य का आनंद लेने की इच्छा बनी रही|

मेरे स्थानीय मित्र … … इस मामले में मेरा साथ देने के लिए तैयार थे| बातचीत से समझ आया की सम्पूर्ण साद्य घर में तैयार करने के लिए सोचना व्यवहारिक नहीं है| पांच लोगों के परिवार द्वारा सात आठ लोगों के लिए दो दर्जन भोज्य बनाना कि वो बेकार भी न जाएँ, चुनौती होती| अरुणमूल नौका दौड़ के दौरान वल्ला साद्य के दौरान ६४ से अधिक भोज्य परोसे जाते हैं|

विभिन्न विकल्पों के बाद मदर वेज प्लाज़ा का नाम तय पाया गया| यह भोजनालय उन गिने चुने स्थानों में था जहाँ साल भर साद्य उपलब्ध है| दोपहर के भोजन में ही साद्य उपलब्ध था| यहाँ आस्वादी जनों की अच्छी संख्या है| हम समय से पहले कूपन लेकर मेज पर जमा हैं| कूपन में परोसे जाने वाले सभी भोज्यों के नाम दिए हुए हैं| मैं उन्हें समझने और याद करने की कोशिश कर रहा हूँ| उप्पेरी, वट्टल, पापड़म, पषम, परिप्पूवड़ा, इंची, नारंग, मंगा, नेलिक्का, चार तरह की किचड़ी, तारण, अवियल, कूत्तूकरी, पर्रिपू, सांभर, पुल्शेरी, रसम, मोरू, बोली, सेमिया, अदा पायसम, और चंपा| इनमें से गिनी चुनी चीजों के बारे में ही मुझे पता है|

केले के पत्ते बिछाए जा रहे हैं| इनका भी एक सलीका है| उन्हें ध्यान रखना है कि बाद में भोजन करने और परोसने वालों को दिक्कत न हो| अब भोज्य पदार्थ आने लगे हैं| वेटर को पता है, हमें नाम नहीं पता इसलिए वह नाम बताता जाता है और हम भूलते जाते हैं| नए व्यक्ति के लिए सभी नाम और स्वाद याद रखना दुष्कर कार्य है| हर भोज्य को पत्ते पर नियत स्थान पर परोसना साद्य की निमावली में है|

मेरा मेजबान परोसे गए पदार्थों के बारे में और उन्हें खाने के सही तरीके के बारे में बताता जा रहा है| मैं उसके निर्देशों को मान रहा हूँ| भोजन का आस्वादन करना स्वादिष्ट भोजन बनाने से बड़ी नहीं तो कम बात भी शायद नहीं है|

मेजबान जानता है, मेरा पेट भर चुका है परन्तु मन नहीं| ‘दोबारा आयंगे तब भी लेकर आऊंगा’| मैं प्रसन्न हूँ|

मैं उसे नहीं बताता कि पिछली शाम मैं इस रेस्टोरंट में बिता चुका हूँ| मगर शाम को साद्य नहीं मिलता| कल शाम यहाँ शेजवान मसाला डोसा और काजू डोसा खा चूका हूँ| कई तरह का पारंपरिक और अनुसंधानित डोसा यहाँ मिल रहा है| शायद एक महीने का पूरा इंतजाम है| मुझे दोबारा आना होगा|

वह मर चुका है, पर बोलता है

पुरानी इमारतें अगर खंडहर न हो रहीं हों तो आबादी को पुकारतीं हैं| उनके आसपास आबादी जमा हो जाती है और साथ में अपनी गंदगी और प्रदूषण भी लाती है| जहाँ कहीं भी ईसाईयों की आबादी कम है, वहां चर्च आम तौर पर शांत हैं| इस चर्च का नाम तो है ही “जंगल में संत जॉन”| अपनी स्थापना के डेढ़ सौ साल पूरे होने के बाद यह चर्च आज भी जंगल में ही कहा जा सकता है| यह पुराना चर्च देश के सबसे बड़े भूकम्पों में से एक देख चुका है| पास पड़ोस में बीस हजार इंसानी मौत और भारी माली नुक्सान| चर्च नष्ट होने से बचा रहा मगर नुक्सान झेलना पड़ा|

नीचे एक तरफ देवदार का घना जंगल है तो दूसरी तरफ़ पहाड़ी और फोर्बिसगंज की हल्की फुल्की आबादी| पर्यटकों की गाड़ियाँ आ जा रहीं है| जिन्हें जल्दी है वो पैदल निकल जाते हैं| एकांतर एकल मार्ग का नियम लागू है|

भीड़ तो है सड़क पर मगर उसे चर्च से लेना देना नहीं| चर्च के दरवाजे की ओर शायद ही कोई देखता है| जो देखते हैं उन्हें चर्च से ज्यादा इसके अहाते में बनीं पुरानी कब्रें दिखाई देतीं हैं| मुझे चर्च की पुरानी इमारत पुकारती है| समय की मार दिखाई देती है| देखने से मालूम होता है, अभी देश का सबसे ताकतवर इंसान यहाँ आता रहा होगा| मैं चर्च की ओर उतर जाता हूँ| पुराने पेड़ बातें करते हैं, कब्रें मुस्कुरातीं हैं|

हमारें मुल्क में ज्यादातर बड़े बाग़ बगीचे कब्रों, मकबरों और छतरियों के साथ बने हैं| चर्च का यह अहाता कोई बगीचा या बाग़ जैसा नहीं कहा जा सकता| बेतरतीब का छोटा जंगल है| लगता नहीं कोई ज्यादा ख्याल रखा जाता है| मैं कब्रों के पत्थरों पर लिखी इबारतें पढ़ता जाता हूँ| कब्रों में लेटे लोग लगता है अक्सर आपस में बातचीत करते हैं| जैसा अक्सर होता है, माहौल उदास सा है| मैं चर्च के अन्दर जाता हूँ, अजब शांति का कुछ समय बिता कर बाहर आ जाता हूँ| चर्च के अहाते में बायीं ओर

एल्गिन के आठवें और किन्कार्दीन के बारहवें अर्ल जेम्स ब्रूस की कब्र है| जेम्स ब्रूस साहब सन १८६२ से १८६३ के बीच बीस महीने तक भारत के वाइसराय रहे|

अंगेजों से हम भारतियों का माई-बाप गुलामी का नाता है| अक्सर हम उन की इज्ज़त करते हैं| हम उन्हें आज भी अपने से ऊपर रखते हैं| शायद ही कभी उन्हें उस तरह गालियाँ देते हैं, जिस तरह किसी और शासक को दे लेते हैं| हर शासक में कुछ न कुछ अच्छाई बुराई होती है| पर अंग्रेज पहले शासक थे, जिनका मकसद देश को गुलाम बनाना था और लूटकर यहाँ का पैसा अपने मुल्क ले जाना था| वो न लूटकर लौटने का इरादा रखते थे न यहाँ रहकर यहीं का होकर शासन करने का|

एक शानदार शांत भव्यता के साथ खड़ा जेम्स ब्रूस का यह स्मारक मुझसे कहता है – हमने सब कुछ सही गलत किया तुम्हारे साथ| मंदिर और मस्जिद नहीं तोड़े| यही कूटनीति तुम्हे आज भी हमारा गुलाम रखती है|

उसने मुझसे कहा, आते रहना| कभी कभी मिलकर बातें करेंगे| मैंने कहा, आधी दुनिया पर राज करने वाले तुम, आज इस नीरवता में अकेले हो| वह मुस्कुराया, मैं अक्सर यहाँ हिमालय से गले मिलता हूँ| अगर कोई इसरायली सिपाही इधर से निकलता है, तो उसके साथ कॉफ़ी पीता हूँ|

स्मारक पर लिखा गया है – “वह मर चुका है, पर बोलता है”|

पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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मनभावन कर्जा

देश का हर बड़ा बिल्डर बर्बादी के कगार पर खड़ा है| दिवालिया कानून उसके सर पर मंडरा रहा है|

किसी भी शहर के बाहर निकल जाओ, निर्माणाधीन मकानों की भरमार है| अगर सारे मकान किसी न किसी को रहने के लिए दे दिए जाएँ तो कोई बेघर न रहे| मगर न बेघरों के पास घर हैं, इन मकानों के पास मालिक| जिनके पास मकान हैं तो कई हैं|

सरकार दायीं हो या बायीं – देश में बेघरों को सस्ते कर्जे की रोज घोषणा होती है| मगर जिन्हें घर की जरूरत है उन्हें शायद कर्ज नहीं मिलता| चलो सरकार कहती है, लो भाई जिनके पास पहले से घर हैं – वही लोग दोबारा कर्ज ले लो और एक और मकान ले लो| क्या इससे बेघरों की समस्या कम होती है| ये दो चार घर कर्जे पर खरीदने वाले लोग तो शायद किराये पर भी घर नहीं उठाते| शायद ही इनमें से किसी ने किराये की आय दिखाकर आयकर भरा हो| तो भी इतना कर्ज देते रहने से किसी लाभ?

सरकारी महाजन को – बैंक को| बैंक ने बिल्डर को मोटा कर्जे दे रखा है| बैंक को पता है, ये अपना कर्ज नहीं चुकाएगा| पुराना गुण्डा मवाली और नया नया नेता है| बड़े मेनेजर का हमप्याला यार भी है|

अब बैंक किसी ऐसे को पकड़ता हैं जो आँख का अँधा और गाँठ का पूरा हो – या कम से कम इतना भोला हो कि घर की आड़ में गधा बनकर बैंक के लिए सोलह घंटे काम कर सके| उसे उसकी जरूरत और औकात से ज्यादा का घर खरीदवा दो| बिल्डर को जो पैसा मकान के बदले देना हो बैंक उसकी एंट्री घुमाकर बिल्डर का कर्जा कम थोड़ा कम कर देता है| अब आपकी मासिक किस्त भी बनी तीस साल या और ज्यादा – मूल कम ब्याज ज्यादा| अगर आप आठ रुपया सैकड़ा भी ब्याज देंगे तो चालीस साल में बैंक को एक लाख में मूलधन पर पक्का वाला सुरक्षित ढाई लाख ब्याज आदि मिल जायेगा| अगर आप इस मकान में रहते हैं तो तो भावनात्मक लगाव आपको इस मकान को खतरे में नहीं डालने देगा या फिर आप इस से बड़ा और महंगा मकान खरीदेंगे|

इसमें सबसे बड़ा लाभ है – बिल्डर का| जो मकान मांग आपूर्ति के आधार पर वास्तव में दस लाख का नहीं बिकना चाहिए, वो पच्चीस लाख में बिकता है| उसे अपना मकान बेचने पर कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| यह काम अक्सर बैंक करता है| बिल्डर और सारे रियल एस्टेट उद्योग तो तो इस बात की चिंता नहीं करनी कि अगर उनके मकानों की कीमतें कम हो जाएँ तो क्या होगा? इस का नुक्सान तो बैंक को भुगतना है| मकानों की कीमतें गिरने पर लोग कर्जा उतारने में दिलचस्पी कम कर देंगे| उधर बिल्डर भी मकान न बिकने का हवाला देकर कर्जा नहीं चुकायेंगे|

कुल मिला कर अपनी जरूरत के आधार पर घर खरीदें आसन कर्जे के आधार पर नहीं|

असफलता

असफलता का अपना एक नशा और मजा होता है| आप या तो किसी गन्दी नाली में पड़े होते हैं या दार्शनिक बन जाते हैं| आपको असफल होने का शौक नहीं होता| आपको पता रहता है, आप की सफलता अभी कितनी फ़ीकी है| कभी रंग तो कभी रंगत में सुधार करने का चाव लगा होता है|

असफलता का सबसे बड़ा फायदा है लोग आप को पागल और झक्की समझते हैं| आप अकेले छोड़ दिए जाते हैं| असफल इंसान जानता है, किस तरह माँ की ममता और बाप का दुलार  अज्ञातवास पर चले जाते हैं| भाभियाँ और बहनें सामने परोसी गई थालियाँ उठा ले जातीं हैं| यह सब वक्त की मार नहीं, प्रेरणा है| भूखे पेट विचार बहुत आते हैं, और संकल्प भी| जितना भूखा पेट, उतनी लम्बी मजबूत जिद – उतना भरोसा| एक ही शर्त – टूटना नहीं है| झुकना और फिर फिर खड़े हो जाना आप सीख जाते हैं| आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बनाकर रखना और शांत रहना – यही परीक्षा है|

खूब सारी असफलता के बाद जब सफलता आती है तो उसकी मस्ती अलग है| वो सारे नाते रिश्तेदार जो आपको पहचानते नहीं थे – उन्हें अचानक सारे रिश्ते याद आ जाते| वो लाड़ दुलार जो कभी देने का सपना भी उन्हें आया होता है उनका भी हिसाब किताब होने लगता है| समझ नहीं आता कि कितना मुस्कराएँ| पर मुस्कराएँ जरूर|

असफलता का एक और फायदा है, हर परिस्तिथि में आप ढलना सीख जाते हैं| कोई भी नई असफलता आपको बेचैन नहीं करती| आप जानते हैं, यह कुछ दिन की बात है| आप संघर्ष कर सकते हैं| लोगों की कुटिल मुस्कान आपको नहीं डराती|
इस नशे से बाहर न आयें| क्योंकि असफलता में कमाया गया नशा आपको सकारात्मक बनाये रखने में मदद देता है| आपको संभाल कर रखता है|

असफलता का नशा आपको सफलता के जहरीले नशे से दूर रखता है|

पीना मना है!!

भोजन से ठीक पहले या बाद में पानी न पीने की सलाह हमें दांत निकलने के साथ मिलनी शुरू होती है और दांत टूटने तक मिलती रहती है| हम सब अंधविश्वास की तरह इसे मानते हैं| हर अंधविश्वास की तरह इस सलाह के भी वैज्ञानिक होने का विश्वास किया जाता है| पढ़े लिखे डॉक्टर, भोजन विशेषज्ञ, रसोइये, पाक कला विश्लेषक और पाचन तंत्र सम्बन्धी वैज्ञानिक भी इस सलाह के वैज्ञानिक होने पर सहमत नजर आते हैं| मगर मुझे यह किसी चिकित्सा-विज्ञानी द्वारा अपने किसी रोगी से किया गया मजाक लगता है| ठीक उसी तरह कि भोजन का ग्रास ३२ बार चबाना चाहिए – चाहे छोटा कौर लिया हो या बड़ा|

भोजन से पहले या बाद में पानी न पीने का मुख्य तर्क है कि जठराग्नि मंद पड़ जाती है| या कहें तो पाचकरस पतले हो जाते हैं जिस कारण से भोजन नहीं पच पाता|

अगर यह सत्य है तो हम सबको केवल रूखा-सूखा खाना खाना चाहिए| खाने का समय भी ऐसा हो की आमाशय में पानी न हो| रसीली दाल और सब्जी भी पाचक रसों को पतला कर देगी| जठराग्नि पर गुनगुना पानी डालें या ठंडा उसे बुझना ही चाहिए| या गरम पानी डालने से वो पेट में पेट्रोल का काम करेगा|

सोचिये जिस प्रकार खाना पकाते समय पानी की मात्रा कम ज्यादा की जाती है, और जिस प्रकार आँच को तेज और धीमा किया जाता है – आमाशय में भी उस प्रकार की कुछ व्यवस्था होनी चाहिए| फुल्का खाएं तो धीमी जठराग्नि और पूड़ी खाएं तो तेज|

जो विद्वान भोजन के पहले या बाद में पानी पीने की मना करते हैं वो अक्सर भोजन के बीच में ख़ूब पानी पीने की सलाह देते हैं| क्या वह पानी पानी नहीं रहता?

विद्वान बताते हैं कि पाचक रस में अम्ल होते हैं| ऐसा कहते समय यह विद्वान शराब का सेवन करते हुए भोजन की तैयारी कर रहे होते हैं| शायद ही कोई बताता है कि शराब जैसे क्षारीय पदार्थ के कारण पाचक रस कमजोर हो जायेंगे और खाना पचने में कठिनाई होगी| शराब पीने वाले मित्र अक्सर पाचन सम्बन्धी शिकायतें नहीं करते| इसके अलावा, शराब में उड़ेले गए पानी और बर्फ से उनका पाचन कभी कमजोर नहीं पड़ता|