हिन्दुस्तानी शादी में फूफा होना

हिन्दुस्तानी शादी में फूफ़ा हो जाना एक मुहावरा बन चुका है| फूफ़ा होना कई मायनों में महत्वपूर्ण होता है| फूफ़ा होने का मुहावरेदार अर्थ है कि यह व्यक्ति रायता फैलाएगा ही फैलाएगा|

फूफ़ा परिवार का भूतपूर्व दामाद होता है – जी हाँ, यह अर्ध सत्य है परन्तु सत्य के थोड़ा अधिक करीब है| शादी में किसी नए दामाद का पर्दापरण होना लगभग तय हो चुका होता है| पुराने दामाद की कुर्सी खिसकने लगती है| (अगर लड़के की शादी हो तब भी फूफ़ा के सिंहासन में कम्पन तो आते ही हैं|) यह पुराना दामाद अब न चाहते समझते हुए भी फूफ़ा की शक्ल में फूफा ससुर में बदलने लगता है| मगर पुरानी आदतें एक पल में तो नहीं बदलतीं| जिसे दामाद-देवता की तरह पूजा गया हो उसे अचानक अर्धदेवता बनना होता है| फूफा के मन में पददलित हो जाने का भाव उत्पन्न होता है|

साथ ही फूफा जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती है| अर्धदेवता को ससुराल रुपी मंदिर के एक सुनसान कोने में एक पवित्र स्थान के साथ जिम्मेदारियां भी पकड़ा दी जातीं है| खर्चबरदार के रूप में उसे खजांची बना दिया जाता है| धन-दौलत की पोटली बांधे फूफा ससुराल में पहली बार वो जिम्म्मेदारी निभाता है जिस में उसे सलाह देने का भी अधिकार न हो| फूफा की उम्मीद के के विपरीत उसके साले उसे बस हुक्म देते हैं – पंडितजी को इतना दीजिये, हलवाई को इतना देना है, माली को अभी तक क्यों नहीं दिया| हुक्म देने वाला हुक्म की तामील करने लगता है|

हिन्दुस्तानी दामाद कोई मजाक तो होता नहीं है| उसके गाल स्वभावतः फूले हैं – दामाद के रूप में गर्व ख़ुशी और अधिकार भाव से| उसके गाल फूफा बनने के बाद भी फूले रहते हैं – मगर ससुराल को लगता है – फूफा जी फूल गए हैं| फूफा के फूलने और फूलकर फटने का इन्तजार हिन्दुस्तानी शादी में सारी ससुराल क्या खुद फूफा की औलादें भी करतीं हैं| फूफा की औलादों को इंतजार रहता है कि कब फूफा फूलें और वो रायता फैलाएं, फूफी को फुला कर हवेली के उस पुराने कमरे में कमरें को कोप बनाने भेजें जहाँ फूफी बचपन में कभी रहा करतीं थीं|

फूफा ग्राम देवता की तरह निश्छल होते हैं- अधिकतर पत्रं-पुष्पम् में मान जाते हैं| कभी कभार उन्हें काल-भैरव का प्रसाद चढ़ाना होता है तो का बार उनका लक्ष्मीपूजन करना पड़ता है| असली फूफा मगर वह है जो पत्रं-पुष्पं, लक्ष्मीपूजन के बाद भी काल भैरव का अंश-अवतार बना रहे| ऐसा फूफा अक्सर फूफी का उचित सम्मान आदि प्राप्त कर अपने बुढ़ापे को सुखद बनाता है| यह फूफा अक्सर नये दामाद को अपना चेला बनाने में कामयाब रहते हैं| दरअसल फूफा बनना भारतीय रिश्ते-नाते से अधिक गुरु-शिष्य परंपरा का अंग है| आएं नष्ट होती इस परंपरा का सम्मान करें|

ख़ुद हराम दिल्ली

प्रदूषण की मारी दिल्ली से बाहर निकलते समय आपके फेफड़े ख़ुशी से चीख चीख कर आपको धन्यवाद करने लगते हैं| कान आसपास आँख फाड़कर देखने लगते हैं – क्या जगह है कि सन्नाटे में शांति है? आँख हवा को सूंघने लगती है – क्या हुआ हवा को कि जलन नहीं हो रही? आती हुई उबास बंद होते ही नाक खुलकर जीने लगती है| त्वचा फिर एक बार साँस लेने लगती है| शहर बदलते ही स्वाद तो खैर बदल ही जाता है|

उत्तर भारत में नीला असमान देखना जीते जी स्वर्ग देखने का साकार सपना लगता है| दिल्ली को फर्क नहीं पड़ता| किसने पीछे पांच साल में ध्रुवतारा देखा? किसने पिछले बीस साल में रात के सन्नाटे में झींगुर का गान सुना? कौन धरती की सौंध को दो रात सूंघ पाया? हर कोई धीमी मर रहा है – खुद अपनी चुनी हुई हत्या – आत्महत्या नहीं कहूँगा| आत्महत्या में कम से कम दुस्साहस तो लगता है| हमारी मौत एक नाकारा मौत है| दिल्ली वाली मौत उधार का (की नहीं) वैश्या है जिसे हम सब बाप का माल समझकर भोगना चाहते हैं|

धर्म के नाम पर पांच – ग्यारह – इक्कीस दीपक नहीं जलाते – हर दिवाली हम पटाखे फोड़कर अपने धर्म से ज्यादा अपना गुरूर बचाते हैं| बात किसी धर्म की नहीं है हमारे गुरूर की है- हठधर्मिता की है| हमारी दलील हैं, हम क्या सब कूंए में कूद रहे हैं? मुझे मत रोको|

किसान को दोष देना अच्छा लगता है न| मान लिया किसान दोषी है – मगर साल के दो महीन  के लिए न| बाकि दस महीने के लिए एक बार अपनी आत्मा को ज़बाव तो दे कर तो देखो| मन और आत्मा का सम-विषम तो करो| दस महीने का दोष किसे दें – पाकिस्तान को, चीन को या अमेरिका को|

हमें अपनी आँख में धूल झोंकना अच्छा लगता है| सम-विषम अनुलोम-वियोम करेंगे| घर के अन्दर जो कार्बन मोनो ऑक्साइड रोज पैदा होता है – सोचा कभी? सीशा (लेड) वाला पुताई करवाई है दीवार पर कभी देखा कि बच्चे के पेट में और फैफड़ों में कब चला गया? दिन भर कान घौंस कर रखी गई गानों की आवाज कब दिमाग में ध्वनि-प्रदूषण कर गई – पूछा? दूध, दूध-मिठाई पीते वक़्त कभी सोचा कि आपको और आपके बच्चे को नकली दूध का वीडियो क्यों देखना पड़ता है? आप ने रेस्टोरंट में कभी बोला भैया ये वाले चार प्रदूषक मेरे खाने में मत डालना – कम स्वाद के लिए नहीं लडूंगा?

आइए सरकार को दोष दें| आइए किसान को दोष दें| बावर्ची को दोष दें| पड़ौसी को दोष दें|

नोट: इस बार दिल्ली से त्रिवेंद्रम आते समय सोचा नहीं था कि मैं दोनों शहरों में कोई तुलना करूंगा मगर…

बीमाकृत बचत

पिछले दो दशक में पर्यावरण सुरक्षा दिवाली के अवसर पर एक बड़ा प्रश्न रहा है| एक बार फिर से आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न सामने खड़ा है|

नोटबंदी के बाद से कोई भी भारतीय अपनी मुद्रा में बचत्त और निवेश नहीं करना चाहता| मुद्रास्फीति का सामना करने वाले भारत जैसे देशों में मुद्रा में निवेश करना कोई भी समझदारी नहीं है| परन्तु यह भी सही बात हैं कि नोटबंदी होने तक मुद्रा बचत निवेश का सबसे सरल और तरल माध्यम था| भौगोलिक विशालता वाले देश में मुद्रास्फीति लागत के मुकाबले अन्य निवेश संसाधन तक पहुँचने की लागत अधिक रही है| अब यदपि स्तिथि में बड़ा बदलाव महसूस होता है| मुद्रा में निवेश मंहगा और अधिक जोखिम भरा है|

मुद्रा के बाद सरल तरल माने जाने वाले निवेश सोना, चाँदी, और संपत्ति कभी भी तरल नहीं रहे| यह निवेश भावनात्मक लगाव के कारण समय पर काम नहीं आते| अति गंभीर स्तिथि में इनकी कीमत और तरलता बुरी तरह गिर जाती है|

इसके बाद बैंक बचत खाता एक बड़ा सरल और तरल निवेश विकल्प है| परन्तु इसमें निवेशक को पूर्ण सुरक्षा वादा मात्र एक लाख रुपये तक के निवेश तक ही मिलता है| हाल के बैंक घोटालों और बैंक असफलता के बाद, बैंक अपने ग्राहकों को दिए जाने वाले दस्तावेज़ों पर मोहर लगाकर मात्र एक लाख तक के बीमा की जानकारी दे रहा है| यह बैंक की तरफ से उचित कदम है| परन्तु सुरक्षा की दृष्टि से हमारे पास क्या विकल्प है?

पहला विकल्प हो सकता है कि हम हर बैंक के बचत खाते में एक एक लाख रूपये का निवेश करें| परन्तु ऐसा करने से हमारे बचत खातों के निष्क्रिय घोषित होने का ख़तरा पैदा होता है| डाकघर बचत बैंक एक विकल्प हो सकता था परन्तु यह अब सरकारी विभाग नहीं रहा और इसमें निवेश करना बैंक निवेश से समान ही जोखिम भरा है|

हम भारत सरकार के सार्वभौमिक प्रतिभूति प्रपत्रों में निवेश कर सकते हैं| सरकारी प्रतिभूति निवेश बैंक निवेश से अधिक सुरक्षित है| इस की अपनी एक सीमा है| निवेशक अपनी मर्जी से निवेश नहीं कर सकता बल्कि सरकार तय करती है कि उसे किस सीमा तक उधार लेना है| पिछले दशक में कई देशों की सार्वभौमिक प्रतिभूतियों को भी असुरक्षित माना गया है|

मैं सामान्य निवेशक को बैंकों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के सावधि जमा की सुरक्षा सम्बन्धी जोखिम के बारे में बताना चाहूँगा| इन सब के पास किसी न किसी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी से ली गई क्रेडिट रेटिंग हो सकती है| परन्तु इनका कोई बीमा नहीं होता| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने २०१४ में एक क़ानून बनाकर निजी क्षेत्र के कंपनियों को जमा बीमा करने के निर्देश दिए थे| परन्तु कोई बीमा कंपनी जमा बीमा करने के लिए तैयार नहीं हुई| हारकर १५ अगस्त २०१८ को सरकार ने जमा बीमा का प्रावधान वापिस ले लिया|

समझने वाली बात यह है कि हमें जानना और मानना चाहिए कि लगभग सभी निवेशों में अपने जोखिम हैं| हम को निवेश पर निगाह रखनी चाहिए| हिन्दू धर्म की अपरिग्रह और इस्लाम की केवल व्यावसायिक निवेश करने की सलाह को मानना चाहिए| दिवाली पर लक्ष्मी पूजन से पहले सरस्वती और गणेश पूजन के पीछे की अवधारणा को समझा जाए|

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बाबरी दिवाली

राम और बाबर का पांच सौ साल पुराना रिश्ता लगभग अटूट है| किसी भी अदालत का कोई फैसला इस रिश्ते को नहीं तोड़ सकता| यह रिश्ता मंदिर मस्जिद का मोहताज नहीं है| यह रिश्ता दिवाली का है|

दिवाली उद्गम भले ही भगवान राम के अयोध्या वापिस आने से जुड़ा हो परन्तु किसी न किसी दिन भारतीय दिवाली को आधुनिक बनाने का श्रेय ज़हीर-उड़-दीन बाबर को जरूर दिया जायेगा| वैसे तो दिवाली को अति-आधुनिक प्रकाश-प्रदूषित बनाने का जिम्मा भी चंगेज़ी इलाकों के बाशिंदों को दिया जाना चाहिए|

जब राम अयोध्या वापिस लौटे – लगभग सभी ग्रन्थ – गाथाएं – गवैये सहमत हैं – नागरिकों ने दीवले जलाकर उन का स्वागत किया| दिवाली से जुड़े सारे शब्द दीवलों से जाकर जुड़ते हैं| चाहे किसी का दीवाला निकलना हो या किसी की दिवाली होनी हो; दीवले चुपचाप अपनी उपस्तिथि का अहसास करा देते हैं| यह अलग बात है कि बाबरी और चीनी दिवाली में दीवलों की सदेह उपस्तिथि कम होती जा रही है|

बाबर समरकंद से जब भारत आया तो अपने साथ हिंदुस्तान के लिए वो नायब तोहफ़ा लाया जिसके खिलाफ कोई शब्द सुनना किसी कट्टर हिंदूवादी या इस्लामवादी को शायद ही गवारा हो| यह बेशकीमती तोहफा है – बारूद और उसकी औलाद आतिशबाजी| बाबर या उसके दिखावापसंद वंशजों ने दिवाली के दीयों की रौशनी से मुकाबला करने के लिए आतिशबाजी के जौहर दिखाने शुरू किये| धीरे धीरे आज यह आतिशबाजी दिवाली का सबसे दुखद पर्याय बन गई है| अदालती फरमानों के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी होती है| राम से सहज सच्चे सुन्दर दीवलों का मजाक बाबर की आतिशबाजी आजतक उड़ाती है|

बाबर के खानदानी मंगोलों की कृपा से आजकल उनके मूल देश चीन से आने वाली प्रकाशलड़ियाँ भी तो कुछ कम नहीं| झूठीं चमक-दमक प्रकाश प्रदूषण – लाभ कोई नहीं|

पढेलिखे कहे जाने वाले लोग आतिशबाजी कर कर मलेरिया और डेंगू तो रोकने का दावा करने में नहीं चूकते| बेचारे भूल जाते हैं हमारे सीधे सादे राम जी की कृपा से मिट्टी का सस्ता सा दिया भी मच्छर मार लेता हैं और आबोहवा भी ख़राब नहीं करता|

मगर माटी के दिया कोई क्यों ले – उससे दिखावा कहाँ हो पाता है? उसकी धमक कहाँ पड़ोसी के कान में जाती है, उसकी रौशनी से कौन नातेदार चौंधियाता है? चुपचाप पड़ा रहता है – तेल की धार देखते देखते सो जाता है|

जाने कब राम जी की दिवाली वापिस आएगी|

दिवाली पर पहले लिखे गए आलेख:

रंगीन दीवले 

अहोई कथा – दीवाली व्यथा

दिवाली अब भी मानती है

तेजहीन तेजस

भारत स्वभावतः एक वर्णभेदी और वर्गभेदी राष्ट्र है| हमारे सामाजिक जीवन में वर्गभेद कदाचित वर्णभेद से कहीं अधिक है| जब से शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है, लोग वर्ग के आधार पर अपने बच्चों के लिए विद्यालय का चयन करते हैं| जाति या वर्ण की बात वर्ग के बिना शहरी जीवन में करना बेकार है| शहरी सामाजिकता में जाति या वर्ण की बात करना असामाजिक माना जाने लगा है परन्तु वर्ग का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है|

कुछ वर्ष पहले जब में गृहनगर से ईएमयू ट्रेन से लौट रहा था तब किसी ने टोका की आजकल शताब्दी क्यों छोड़ दी आपने| सीधा सवाल यह कि आप निम्नवर्गीय ट्रेन में क्यों सफ़र कर रहे हैं? यही बात टाटा की बेहतरीन नेनो कार के बारे में भी है| इस साल २०१९ में पूरे देश में मात्र एक नेनो बिकी है| अगर देखा जाए तो आर्थिक मंदी, बढ़ते हुए निम्नमध्यवर्ग के चलते नेनो की बिक्री नहीं बढ़ी| कारण वर्ग व्यस्था में नीचे गिर जाने का भय| शायद ही किसी भारतीय घर में नेनो पहली कार के रूप में दिल से स्वीकार हुई है|वर्यग भेद की यह बात रेल और हवाई यातायात में भी लागू होती है|

अगर आप दिल्ली-मुंबई, दिल्ली लखनऊ, दिल्ली जयपुर, जैसे कमाऊ मार्गों के यातायात की बात करें तो हवाई यात्रा बहुत लोकप्रिय हैं जबकि इन मार्गों पर राजधानी या बढ़िया शताब्दी गाड़ियाँ सुलभ हैं और अधिक सुविधाजनक भी हैं| दिल्ली आगरा और दिल्ली जयपुर जैसे मार्गों पर उच्चस्तरीय टैक्सी और वातानुकूलित बसों को बहुत पसंद किया जाता है| रेल यात्रा उच्चवर्ग के लिए अधम होने जैसा विकल्प है|

दिल्ली आगरा मार्ग पर गतिमान एक्सप्रेस के सफल होने का कारण देशी विदेशी पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का लोकप्रिय होना है| सरकार ने गतिमान एक्सप्रेस की सफलता के बाद अन्य उच्च स्तरीय गाड़ियों की सफलता की जो उम्मीद बाँधी है, वह भारतीय सन्दर्भ में उचित नहीं प्रतीत होती|

सरकार रेलवे को लाभ में लाना चाहती है| इसलिए सरकार का ध्यानबिन्दु उच्चवर्ग है जिसे बेहतर सुविधाओं के साथ रेलवे से जोड़ने की तैयारी चलती रही है| तेजस एक्सप्रेस इस प्रयास का एक हिस्सा है| लाभ को मूल आधार मानकर इसका निजीकरण भी किया गया है| परन्तु क्या यह महंगी ट्रेन मन चाहा लाभ दे पायेगी| मुझे इसमें संदेह है|

तेजस एक्सप्रेस को  हवाई मार्ग और स्वर्ण शताब्दी से कड़ी टक्कर मिलनी है| साथ ही इसका समय दिल्ली में कार्यालय बंद होने के समय से काफी पहले है| यदि आप किसी भी मंहगी गाड़ी को लाभ में रखना चाहते हैं तो उसका समय इस हिसाब से होना चाहिए कि उसके संभावित प्रयोगकर्ता समूह के समय से उसका मेल हो|हवाईयात्रियों को रेल की पटरी पर उतारने के लिए रेलवे को कड़ी मसक्कत करनी होगी| उनके हवाई यात्रा में लगने वाले समय और उसमें मिलने वाले आराम का बढ़िया विकल्प देना होगा| इसके साथ इसे हवाई यात्रा दर के मुकाबले लगभग पिचहत्तर प्रतिशत कम लागत पर उपलब्ध करना होगा|परन्तु मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ और समाजिक औचित्य नहीं लगता|

बेहतर है कि रेलवे गैरवातानुकूलित परन्तु तेज गति ट्रेन विकसित करने पर ध्यान दे| इन ट्रेन के लिए रेलवे उचित सुविधाएँ देते हुए इन्हें उचित किराये पर चलाये|अंधाधुंध अनारक्षित टिकट जारी करने की पुरानी प्रवृत्ति पर या तो रोक लगाये या अनारक्षित स्थानों की संख्या में वृद्धि करे|
वास्तव में एक करोड़ लोगों से एक रूपये प्रति व्यक्ति का लाभ लेना सरल है एक व्यक्ति से एक करोड़ रुपये का लाभ लेना कठिन|

अन्त में:

 

बचकाना बिचौलिया

पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|