कोवलम तट

जब अनजान लोग किसी अनजान जगह तलाश में जाते हैं तो कुछ पक्का पता नहीं चलता कि उसी जगह पहुंचे जहाँ जाना था या कुछ नई ख़ोज हुई| कोवलम तट पर हमारी यात्रा भी कुछ इस तरह ही थी| अपने वयस्त कार्यक्रम के दौरान कुछ घंटे चुराए गए और दोस्तों का एक समूह बिना किसी शोध – ख़ोज के टैक्सी में सवार होकर चल पड़ा| कष़ाकूटम से हमें ले जाने वाला टैक्सी चालक हिंदी और अंग्रेजी लगभग न के बराबर समझता था| हम कोवलम में उसके अनुसार मुख्य स्थान जुमा मस्जिद के पास तट पर उतारे गए| कोवलम के प्रसिद्ध तटों से अलग हम आम देशी जनता से भरे तट पर थे| कुछ स्थानीय लोग तफरीह कर रहे थे और बाकि मछली पकड़ने में व्यस्त थे|

तट पर भीड़ बहुत थी| होटल लीला (halcyon castle)और जुमा मस्जिद के उत्तर में ऊँची चट्टानों और लहरों की आँख मिचौनी के बीच हम चट्टानों के निकट जा विराजे| इन चट्टानों के लिए लिखा हुआ था कि संभल कर चढ़ें| यह भारी भरकम पत्थर थे जिनपर तेज लहरें आकर अपना जोर अजमाती थीं| यहाँ शांति थी| चट्टानों के दूसरी ओर एक रिसोर्ट में का समुद्र तट था जिसमें विदेशी सैलानियों की बहुसंख्या थी|

चट्टानों की तरफ शुरुआत में वहां एक छोटी मोटी संरचना थी, जिसे झंडियाँ लगा कर किसी साधारण दरगाह का रूप दिया गया था| मैं और मेरे दो मित्र सुन्दर नजारों के लिए अपनी किस्मत अजमाने इन चट्टानों पर चढ़े और यह अच्छा काम हमने किया| एक तो छोटी मोटी मगर कठिन चढ़ाई का लुफ्त मिला, दूसरा वहां समुद्र की लहरें और आवाज तेज थी| पत्थरों से टकराती लहरें तेज उठतीं गिरतीं थीं| हम यहाँ बैठ गए और दूर तक समुन्दर उछालें लेता था| छिपता हुआ सूरज रंग और नज़ारे बदल रहा था| इसे लिखा नहीं जा सकता| मैंने अपने घर फ़ोन कर कर पिता, पत्नी और बेटे को सीधा प्रसारण कर डाला| मेरा बेटा चट्टानों पर मेरे चढ़ने उतरने का कौशल देख खुश था| शायद यह ग्रोव तट कहलाता है|

उसके दक्षिण में विश्व प्रसिद्ध लाइटहाउस तट और हवा तट हैं| केरल पर्यटन का समुद्र तट रिसोर्ट उत्तर में शोभायमान है|

 

Advertisements

आसमान की ओर

आसमान की ओर जाते हुए हम क्या करते हैं? आसमान की ओर जाना, उड़ जाना मानव का सदियों पुराना सपना है| आज भी पहली बार उड़ पाना करोड़ों लोगों के लिए एक उदास सपने की तरह है| भारत में हर उड़ान आज भी किसी न किसी ऐसे शख्स को लिए जाती है जो आसमान की उड़ान का आदी न हुआ हो| बहुत से लोगों के लिए यह सपना अभी हक़ीकत नहीं बनता| जिनके लिए यह हक़ीकत हो जाता है उनके मिज़ाज बदले नज़र आते हैं|

हम सब सड़क पर चलते हुए साधारण होते हैं और एक बात कार में बैठकर अपने आप को औकात का बाप समझने लगते हैं| मैं अपनी साईकिल पर चलते हुए महसूस करता हूँ कि बिना हेलमेट चलने पर पीछे से आने वाली कारें अधिक हो- हल्ला करतीं हैं और उनके सवार एक साईकिल सवार कीड़े को मसल देना चाहते हैं| जबकि यही लोग ख़ुद पैदल चलते हैं तो अक्सर रवैया बदल लेते हैं| यह सब आसमान में उड़ने वालों पर भी होता है, मगर ट्रेनों की तरह उड़ाने भी बहुत अधिक नखरा दिल में पैदा करतीं| मगर फिर भी व्यवहार में ख़म आ जाना मानव चरित्र का लक्षण है|

सुबह की उड़ाने अक्सर हमें अधिक चिंतित करतीं हैं| एक दिन पहले से हमारी सोच उड़ना शुरु कर देती है, जो किसी भी लम्बी यात्रा में होता है| मगर हवाई यात्रा में समय पर पहुंचना बहुत मायने रखता है| हवाई यात्रा की ख़ुशी को सुरक्षा जांच अक्सर थोड़ा धरातल की ओर ले जाती है| आप एक दिन पहले से उल्टा हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं| पौन घंटा पहले आपको दिए गए गेट पर पहुंचना होता है| उस से पहले सुरक्षा जांच की लम्बी होती जा रही कतारें| घरेलू उड़ानों में सुरक्षा जांच आज भी आपके पंद्रह मिनट आराम से ले लेती हैं| इस बीच लगभग हम सब सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करना चाहते हैं| चेक-इन काउंटर पर आपको लगभग पंद्रह मिनट लगते हैं| वयस्त हवाई अड्डों पर डिपार्चर टर्मिनल में टेक्सी से उतरने के बाद लगभग पांच से पंद्रह मिनट लगते हैं| कुल मिलाकर वयस्त हवाई अड्डों पर आपको कम से कम दो घंटा पहले हवाईअड्डे पर पहुंचना होता है| घर से हवाईअड्डे की दूरी हम भारतीय अन्य सभी दूरियों की तरह घंटों में नापते ही हैं|

मन में अक्सर सुबह की उड़ान पकड़ने की चिंता रहती है| इस कारण नींद न आना और नींद आ जाने पर समय पर खुल न पाना चिंता का कारण बन जाता है|

आजकल वेब- चेकइन भी एक अलग पीड़ा है – करें या न करें| वेब – चेकइन में अक्सर पैसे से मिलने वाली सीटें हमें विंडो पर मुफ्त मिल जाती हैं| अक्सर आसमान में खाना पीना भी आसमान छूता है| तो घर के कुछ खाकर जाने की चिंता भी रहती ही है|

अगर आपकी उड़ान १००० किलोमीटर से कम दूरी की है तो क्या कहने| यह शानदार है कि आपको बोर होने का मौका नहीं मिलेगा और अगर आप उड़ान में कुछ काम जैसे – नींद लेना करना चाहते हैं तो भूल जाइएगा|

 

दिल्ली का प्रदूषण पर्व

दिल्ली में साल भर प्रदूषण का स्तर ख़तरे की सभी सीमाओं से कई गुना ऊपर रहता है| लेकिन दिल्ली वाले ठहरे आँख के अंधे कान के कच्चे| न कोई सही चीज आसानी से दीखे, न कोई सही बात आसानी से सुनाई दे| जब तक प्रदूषण से सूरज दिखना बंद न हो जाए तब तक दिल्ली वालों को प्रदूषण समझ नहीं आता| यह उच्चतम प्रदूषण भी दिल्ली वालों के लिए एक पर्व हो गया गया है| बच्चों की स्कूल से छुट्टी, अमीरी में कहीं बाहर घुमने निकल जाना, या एयरप्योरिफायर लगाकर घर में मस्त फ़िल्में देखना| अब तो यह सालाना जलसा हो गया है कि होगा ही होगा| दिल्ली सरकार और भारत सरकार इस पर्व पर कुछ मनोरंजक समाधान पेश करेंगे| यही सब है, और क्या?

वैसे तो प्रदूषण दिल्ली वालों की दीखता नहीं और दिख भी जाए तो हमारे पास बहुत सारे हास्यास्पद समाधान है| जैसे – पंजाब हरियाणा वाले पिराली जला रहे हैं हैं; दिल्ली के गरीब लोग कचरा जला रहे हैं; भवन निर्माण मजदूर धूल उड़ा रहे हैं| हद होती हैं दिल्लीपन की|

प्रदूषण का यह प्रदूषण उच्चस्तर दिल्ली से सामान्य स्तर प्रदूषण से २० से ३०% अधिक ही होता है| सामान्यतः दिल्ली का प्रदूषण स्तर ३०० होता है और दिल्लीवालों का प्रदूषण सहनशीलता स्तर ४०० होता है, जो वैज्ञानिक रूप से पर्यावरण की मृत्यु का परिचायक है| यह प्रदूषणस्तर दिल्लीपन को हास्यास्पद बनाता है| इस स्तर पर दिल्ली की जनता, राज्य सरकार और कभी कभी दिल्ली की भारत सरकार भी जग जाती है| यह जगना इस तरह का है कि कोई नशेड़ी नींद से जागकर नशे में बक बक कर रहा हो|

दिल्ली प्रदूषण के सामान्य प्रमुख कारक भी कम हास्यास्पद नहीं है:

  1. दिल्ली का स्थलमध्य होना: भारत के अधिकतर बड़े शहर समुद्र के काफ़ी निकट हैं, इसलिए प्रदूषण दिल्ली में फंस जाता हैं|
  2. जनसंख्या: प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाला जनसंख्या घनत्व दिल्ली में इतना अधिक है कि दिल्ली शहर वर्ग प्रतिकिलोमीटर अधिक कार्बन डाई ओक्साइड छोड़ता है| दिल्ली में घरेलू प्रदूषण करक गैस स्टोव, फ्रिज, कूड़ा, हीटर, वातानुकूलन, आदि का घनत्व भी काफ़ी अधिक है|
  3. कूड़ादान: दिल्ली कूड़े का प्रबंधन आजतक ठीक से नहीं कर पाती| यहाँ स्वच्छता का मतलब है किसी मैदान में पेड़ के सूखे पत्तों पर झाड़ू लगाते हुए फ़ोटो खींचना|
  4. जनयातायात साधन: दिल्ली वाले सरकार से यह नहीं पूछते कि बसें इतनी कम क्यों हैं? कॉलोनियों के अन्दर रिक्शे क्यों बंद हैं? मेट्रो का अंतराल कम क्यों हैं? दिल्लीपन में शरीफ़ दिल्ली वालों को मजबूर करता है कि दस हज़ार माहना से भी अधिक खर्चा अपने सर पर डालो और कार ले आओ, भले ही द्वार पर खड़ी रहे| सुरक्षा की संवैधानिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारी भी सरकार का उत्तरदायित्व कम से कम दिल्ली में नहीं खड़ा करती|
  5. आस पड़ोस का प्रदूषण: दिल्ली को विकास चाहिए, दिल्ली को सुविधाएँ चाहिए मगर इस विकास की कीमत अदा करने की जिम्मेदारी झारखण्ड, छत्तीसगढ़, या कोई और पिछड़ा राज्य उठाये| मगर भाई प्रदूषण तो हवा के साथ आएगा ही| और विकास की मार झेलता हुया ग़रीब रोजगार की तलाश में दिल्ली ही तो भागेगा ही|

मगर कोई नहीं पूछता की वास्तविक क्या हैं, इनका क्या निदान है और उसमें खुद उसका क्या योगदान होगा और सरकार की अब तब और आगे की उत्तरदायिता क्या है?

खैर छोड़िये, प्रदूषण पर राजनीति करते हैं जब तक दिल्ली वाले खुद प्रदूषण से न मर जाएँ|

बापू की दिल्ली बिल्ली

गबरू नौजवान अपनी शाहना अकड़-धकड़ के साथ चला आ रहा है| उसकी चाल में गजब की मस्ती है मगर चहरे पर लगता है कि बदलते वक़्त ने थोड़ी पस्ती ला दी है| दूर सामने मैदान में दो तीन बूढ़े किसी बात पर संजीदगी से गुफ्तगू कर रहे है| बाद पेचीदा लगती है; नौजवान ने मन ही मन सोचा| वो दूर से ही मामला समझना चाहता है मगर काला कुहासा कुछ देखने नहीं देता| गौर से देखने पर महसूस होता है, बूढ़े मिलकर खों खों खांस रहे है| खांसना भी दिल्ली शहर में गुफ्तगू करने के सलीकों में शुमार होने लगा है|

“क्या इसी कालिख भरे मुल्क के लिए जिए मरे थे?” नौजवान बूढों की तरफ़ बढ़ते हुए सर झटकता है|

उसे अपनी तरफ आता देख बूढ़े शांत होने लगे| पीढ़ियों में सोच का फ़र्क यूँहीं तो नहीं जाता|

“क्या बापू! आज क्या कोई हड़ताल है?” नौजवान ने कुछ परेशानी और कुछ हमदर्दी से पूछा|

मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा खों खों कर हंसने लगा|

“अब न वोट क्लब है न जंतर मंतर। हड़ताल करने पर पड़ते हैं हंटर।“ जैकिट वाले बूढ़े ने उदास लहजे में कहा|

“मामला क्या है, कुछ नहीं तो बापू अपनी समाधि पर ही जाकर बैठ जाइएगा|” नौजवान ने मजाकिया मगर इज्जतदार लहजे में कहा|

“आप क्यों नहीं कोई धमाका कर लेते, बरखुरदार?” मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा बोला|

“ब्राउन ब्रिटिश से क्या लड़ें? साँस लेना दूभर हो चुका है| अब तो फ़िजाओं में स्वदेशी गर्द और गंदगी है|” नौजवान मायूस लहज़े से कहने लगा| दिल के दर्द से कहिये कि फैफड़े के दर्द से, नौजवान के गले से खों खों के दबी आवाज़ धमाके होने लगे| तीनों बूढों की खाँसी और बढ़ गई|

बापू धरने पर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे कि बिना साँस फुलाएं बैठ सके। जगह न मिली दिल्ली में| बिल्ली बने और मास्क पहन लिया ज़नाब।

Delhi pollution (c) vikram nayak

Unlikely Tails – Mani Padma

These short stories are really short if your counts words. Well crafted stories do not have a useless display of words. Mani Padma seems to have relatively good vocabulary among contemporary young fiction writers. In a solo collection of short stories, not more than half of these stories satisfy your literary bud. In this collection, I simply satisfied with all stories. Stories are not unusual but written very well.

When writers these focus no marketable stuff and drop literal value, Mani Padma is successful to save literal values. He crafted stories with a simple formula. These are our neighbourhood stories, routine life, but with a good reflection of events and human nature. Stories are being narrated across the table. Their tone and flows are smooth, slow and simple.

Against my earlier presumption, there is no short story in this collection with title “unlikely tails”. After careful reading these stories, I find a smooth twist in the chain of events which usually unpredictable before the last paragraph. These stories do not force you to sit and read in one sitting, do not increase your heart beats after each paragraph, do not increase your curiosity top of your mind, and do not force you to have hot coffee turned cold. No, nothing, stories simply take a smooth turn which you feel unlikely at first sight of reading. These unlikely turns are so smooth, you think twice each time if this is most logical tails of the story. I believe, yes these are.

These stories touch human relationship mostly from the angle of a common girl. Unlikely tails have women protagonist but without pushing fashionable feminism forward. You never feel any hardcore urge for and against any character. Naturally, messages if any there, delivered smoothly in our conscience.

These stories exhibit sharp focus of vision towards day to day events. Take the first story “Prince Charming”, until protagonist point of the observation, you do not note the point and once your note, you agree simply. As a rare instance, writing of the second story may be closed before last few words – explanatory statement by the protagonist. The story may have more impact, though most readers may not notice.

“Pummi’s Escort Service” reveals upon the biased and dirty mind of the middle-class male. “Date with future” is a cute comment upon relationships in the era of reality shows. “Breakfast” looks into the personal relationship of a ‘family’ woman. When one read “Dead – end”, you have silence suddenly after the inner violence of your own thought. “Dull-iance” is a story which comments upon female minds and deviates slightly from the pattern. I do not find in this collection a story which may be called average.

Manipadma is from Assam, now based in Delhi. No story is from Assam in this collection. It may be a conscious attempt to save her from regional writer tag. These stories are based in and around Northern India – the Hindi belt. Same time, no story is really from the medical background.

Mani Padma has good potential to be a good fiction writer. Her style of writing is suitable for short stories not for novels. “Unlikely Tails” is her solo debut.

Unlikely Tails (PostScript) – If you think, there are 17 stories as it seems, you are not the good reader. Though back cover, as well as index, read 17 stories, these are actually 18 stories. I presume it is the delebrate attempt. You need to find out how these are actually 18. [Hint is hidden in index itself]

Title: Unlikely Tails
Authors: Mani Padma
Publisher: Creative Crow Publishers LLP
Publishing year: 201
Genre: Fiction – Short Stories
ISBN:  938-84901-60-1
Binding: Hardbound
Number of Pages: 125
Price: Rs. 650/-

This review is a part of the biggest Book Review Program for Indian Bloggers. Participate now to get free books!

बिंदी तेरे बिन

हर साल हमारे समाचार पत्रों में एक खबर छपती है – इस साल ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने फलां फलां भारतीय शब्द को अंग्रेजी में शामिल किया| हम खुश हो जाते हैं| हम अपने शब्द की महानता समझते हैं मगर यह भूल जाते हैं कि उन्हें अपने में शामिल करने वाली जुबान दिल कितना बड़ा होगा| अंग्रेजी की इस तारीफ पर हम असहमत हो सकते हैं मगर अंग्रेजी एक बेहद छोटी छोटी जुबान से दुनिया में सबसे बड़ी जुबान में तब्दील हुई है| साम्राज्यवाद के पतन के बाद भी आज अंग्रेजी लगातार बढ़ रही है|

हर कुछ महीनों में हमारे समाचार – पत्रों में एक और खबर छपती है जिसमें उर्दू का नाम निशान मिटाने की बात होती है| यह जो उर्दू की बात होती है, ये दरअसल फ़ारसी की बात होती है| अगर सही कहे तो उस फ़ारसी की बात होती है, जिसपर अरबी प्रभाव पड़ा है| पुरानी फ़ारसी और संस्कृत एक परिवार की भाषाएँ है, अवेस्ता फ़ारसी और वैदिक संस्कृत के तमाम शब्द एक ही मूल से निकले हैं| यह निष्कासनवाद हिंदी को कमजोर करता है| आज निष्कासनवाद हिंदी की दुखद पहचान बन रहा है|एक वक्त हिंदी-उर्दू से बड़ी भाषाएँ रहीं ब्रज और अवधी को हिंदी वाले आज तिरस्कार और निष्कासन के भाव से देखते हैं वह हास्यास्पद है| हिंदी के इस तिरस्कार से पल-बढ़कर भोजपुरी एक बोली से बढ़कर विकसित भाषा का रूप लेने लगी है| जब भी हिंदी भाषा क्षेत्र की कोई पुरानी या नहीं भाषा या बोली आगे बढती हैं, हिंदी वालों की हिराकत बढ़ने लगती है| जहाँ अंग्रेजी दुनिया भर के शब्दों के साथ अपने को समृद्ध कर रहीं है, हिंदी अपने प्रभाव क्षेत्र में झुइमुई बन रही है|

आम बोलचाल हिंदी और उर्दू में फिलहाल कोई खास फर्क नहीं दिखता , मगर हिंदी से उर्दू या कहिये फ़ारसी शब्दों को निष्काषित करने के मुहिम चल रही है| हिंदी के ऊपर कठोर तत्सम भाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| आज की हिंदी को बिंदी से बड़ी नफ़रत होती है| हालत तो यह हैं कि  क़, ज़, फ़, ख़ की बिंदियाँ ही नहीं ढ़, ङ, ड़, बिंदियाँ भी गायब हो रहीं है| दुःख का विसर्ग कब और कहाँ जा उड़ा, यह तो हिन्दी वाले खुद भी नहीं बता सकते| यह निष्कासन भाषा के विकास के नाम पर हो रहा है| क्या भाषा को छोटा करते जाना उसका विकास है?

होना यह चाहिए था कि हिंदी वाले अपने बड़े बड़े शब्द कोष बनाते| हिंदी शब्द कोशों में ब्रज, अवधी भोजपुरी के सभी कामकाजी शब्द शामिल किये जाते| क्या हिंदी परिवार की सभी भाषाएँ मिलकर हिंदी को बड़ा नहीं कर देतीं|

जो लोग हिंदी में स्नेह शब्द का सही प्रयोग नहीं कर सकते, वो लोग मोहब्बत मिटाने में लगे हैं|

सुपर का उत्सव #CelebratingSuper

कुछ बदलाव सुखद होते हैं| सुखद बदलाव तात्कालिक लाभ के लिए नहीं किये जाते बल्कि उनके पीछे दीर्घकालिक भावना रहती है| यह जरूरी नहीं की हर बदलाव जो हमें सुखद लगता हो वो दीर्घकालिक तौर पर सुखद ही हो| पिछली दो तीन शताब्दियों में होने वाला औद्योगिक विकास सुखद तो रहा पर दीर्घकालिक रूप से सुखद नहीं है| यह बात समझने में मानवता को समय लगा है| दुर्भाग्य से आज भी हम में से अधिकांश लोग जब विकास की बात करते हैं, तब हम दीर्घकालिक विकास की बात नहीं करते| इस तरह का तात्कालिक विकास भले ही आज की पीढ़ी को सुख दे परन्तु आने वाली पीढ़ियों के लिए दुःख के पहाड़ खड़े कर रहा है|

तात्कालिक विकास से उत्त्पन्न समस्याएं मानवता को कष्ट देतीं हैं, परन्तु प्रायः वह मानव जो उस अंध-विकास का ध्वजवाहक होता है – वह अपने कार्यों के दुष्परिणाम न देख पाता है न भुगत पाता है| आज समय आ गया है कि जो लोग तात्कालिक विकास के पीछे है, उस से लाभान्वित होते हैं वह  अपनी जिम्मेदारी समझें और उठायें| कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) इस दिशा में एक कदम है| परन्तु यह अपर्याप्त होगा अगर यह भी दिशाहीन रहे|

विकास यात्रा में बहुत सी चीजें आज जरूरी हैं – जैसे यातायात साधन| परन्तु यह जरूरी नहीं कि हर घर पर कार हो, न यह जरूरी है कि कार से प्रदुषण पैदा हो, न यह जरूरी है कि कार हर समय प्रयोग की जाए| लेकिन यदि कोई कार्य होगा तो उसके अच्छे बुरे परिणाम होंगे ही| यदि कार से कोई प्रदूषण होता है तो उस का निवारण करने के लिए शायद हर कार के साथ एक बड़ा पेड़ शहर में हो| यह एक उदाहरण है, जरूरी नहीं कि पेड़ ही प्रदूषण से बचाएं कोई तकनीक हो जो प्रदूषण को दूर करने में मदद्गार हो| क्या यह हो सकता है कि प्रदुषण फ़ैलाने वाले वाहनों, यंत्रो, तंत्रों, कल और कारखानों के साथ प्रदूषण रोकने के तकनीकि उपाय लगा दिए जाएँ? हर नाक के ऊपर मास्क न होकर हर चिमनी के ऊपर मास्क हो|

आप सारे कारखाने मास्क से नहीं ढक सकते तो आपको इस उपाय की भी जरूरत है| खासकर जब आप किसी कारखाने के मालिक नहीं है तब तक तो आप उसमें प्रदूषण नियंत्रक यंत्र नहीं लगा सकते| यह काम या तो मालिक का है या सरकार का| कारखाने ही क्या आज हर घर से प्रदूषण पैदा होता है| हमारी एलपीजी गैस के चूल्हे घर के सुरक्षित माहौल में कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे जहर का उत्पादन होता है| हमारे कमरों में हरपल प्रतिपल छिड़का जाने वाला रूम फ्रेशनर भी प्रदूषण है –एक प्रदूषण के जबाब में दूसरा प्रदूषण|

अब प्रदूषण इतना है कि हम और आप उस से बचने के लिए तात्कालिक उपाय भी कर रहे हैं| आजकल दुनिया भर के कई शहरों में जगह जगह एयर प्योरिफायर लग रहे हैं| जन मन और धन के हिसाब से यह उचित कदम हो सकता है –समुचित कदम नहीं| परन्तु अच्छे प्रयास के रूप में इसकी सराहना होनी ही चाहिए|

ज्येष्ठ वैशाख (मई जून) के महीने में दिल्ली में बहुत गर्मी होती है| आजकल तात्कालिक उपाय है कि घर कार और कार्यालय में वातानुकूलन हो| वातानुकूलन अपने आप में गर्मी बढ़ाने का काम करता है| इस क्रिया में स्वयं ऊष्मा उत्पन्न होती है| हमारी पारंपरिक वास्तुकला इस प्रकार विकसित हुई कि घर हवादार हों और स्वाभाविक रूप से ठण्डे बने रहें| हमने उस तकनीक में विकास नहीं किया जो शायद अधिक सरल होता| यदि हर पक्के मकान दूकान कार्यालय की छत पर एक रूफ-टॉप गार्डन हो जाये और साथ में रेन-वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था हो तो गर्मी, पानी और पर्यावरण की समस्या को थोड़ा कम किया जा सके| जिन लोगों के पास अपनी छत नहीं है वो भी योगदान दे सकते हैं| बालकनी में गमले तो हो ही सकते हैं| अभी एक कंपनी ने दिवाली के मौके पर अपने स्टोरों से पौधों के बीज बाँटने का अच्छा कदम उठाया| बहुत लोगों ने पौधे लगाये होंगे| हम और आप भी अपनी बालकनी को प्राकृतिक सौंदर्य दे सकते हैं|

यह सब छोटी छोटी चीजें है, मगर अच्छे कदम है| मन में आशा भरते हैं| कुछ तो हो रहा है – #CelebratingSuper