ऊँचे कंक्रीट

कंक्रीट की ऊँचाई अनंत आकाश की ऊँचाई के समक्ष वामनकद होती है| अहसास कराती है – हे मानव! अभी तुम बौने हो| ऊँचे कंक्रीट, हरे भरे जीवंत जंगल की तरह स्व-स्फूर्त नहीं उग आते हैं| इनकी रचना नहीं की जाती, निर्माण होता हैं| रचनात्मकता की कमी पर्याय है इनका| कंक्रीट में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती, कंक्रीट मुर्दा बना रहता है| ऊँचे कंक्रीट में बने घर जीवंत जाते हैं मगर कंक्रीट निर्लिप्त बना रहता है, किसी उदासीन पठार की तरह|

ऊँचे कंक्रीट जीवन के फैलाव और जीवन्तता के विस्तार से दूर होते हैं| कच्ची झोंपड़ी की जीवटता कंक्रीट में नहीं होती| ऊँचे कंक्रीट गर्व और गौरव की ऊँचाई का प्रतीक होते हैं, यह गर्व और गौरव घमंड की बानगी रखता है फलदार पेड़ों की तरह विनम्रता की नहीं इनमें|

कई बार लगता है इन ऊँचे कंक्रीट के निर्माता जिस तरह इनके आस पास लैंडस्केपिंग करते हैं, उस तरह इन पर भी वालस्केपिंग करते तो शायद यह जीवंत हो उठते|

मगर ऊँचे कंक्रीट घमंडी होते है, कलाकृति नहीं| काश, इन्हें निर्माता नहीं कलाकार सृजते|

आहत भावनाओं का देश

भावना प्रधान देश है हमारा| जान जाए पर भावना न जाए| भावनायें बचाते बचाते हमारी जिन्दगी गुजर जाती है| सदियों से हम भावनाएं बचा रहे है| दुनिया के आधे देश ज्ञान विज्ञान में तरक्की कर कर आगे निकल गए| हम अपनी “विश्व-गुरु रहे थे पुरखे” – गान गाने और उसकी भावना बचाने में लगे हैं| हमारी भावनाएं – कोई भी आहत कर देता है| किस किस की बात से जल्दी आहत होना है, किस किस तरह की बात से जल्दी आहत होना है, यह भी हमारी भावना पर निर्भर करता है| हुसैन के चित्रों से जो भावना आहत हुईं[1]  वो सिन्धु घाटी की मूर्ति को देवी पार्वती बताने पर ही प्रसन्न हुई| [2]

बाबर-अकबर – ओरंगजेब का का नाम लेने से आजकल हिन्दुओं की भावनाएं आहत हो जातीं हैं, तो सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन के नाम से मुसलमानों की| देश में किसी भी किताब, फिल्म, कलाकृति, चुटकुले, यहाँ तक कि भजन से भी भावनाएं आहत हो जातीं हैं| किसी और से तो छोड़ दीजिये, एक बार इस देश की भावनाएं गोस्वामी तुलसीदास जी ने आहत कर दीं थीं|

हुआ यूँ कि बेचारे गोस्वामी अवधी और व्रज में रामकथा लिखने लगे| काशी पण्डित लगे घबराने| आहट भावना से कश्मीर से कन्याकुमारी- कच्छ से कामरूप लगे कांपने| एक तो विधर्मी का राज ऊपर से अधर्मी भाषा में रामकथा| संस्कृतनिष्ट भावनाएं बुरी तरह आहत| गंवार-देहाती सब राम-राम छोड़ राम कथा करने लगेंगे| लगा पुस्तक पर प्रतिबन्ध| लगा इहलोक से निकले गोस्वामी, परलोक से भी निकले| गोस्वामी त्राहिमाम त्राहिमाम भागे, हनुमान जी ने तीन लोक नापे| हुआ चमत्कार और ईश्वर ने तुलसीदास की रामचरितमानस के पक्ष में निर्णय दे दिया|

तुलसीदास से पहले मीराबाई में शूरवीर मेवाड़ की भावना आहत की थीं| खुद ईश्वर को आकर उनके प्राण-प्रण बचाने पड़े| मगर हम न सुधरे| हमारी भावना न सुधरीं| भावनाएं आहत होना न रुका|

ईश्वर भी आहत हो गया, गवाही देते देते|

 

[1] https://en.wikipedia.org/wiki/M._F._Husain

[2] http://www.financialexpress.com/india-news/hindu-roots-goddess-parvati-report-hints-indus-valley-civilisation-used-to-worship-lord-shiva-in-2500-bc/486475/

ग्रैंड चोला का महास्मरण

आईटीसी ग्रैंड चोला में रुके हुए समय हो गया, परन्तु उसकी याद आज भी ताजा है| भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (ICSI) के राष्ट्रीय महाधिवेशन का आयोजन उस वर्ष चेन्नई के आईटीसी ग्रैंड चोला में था| तय हुआ वहीँ रुका जाए| चेक इन के समय समझ गया, यह अब तक के सभी अनुभवों से बेहतर हो सकता है| हमारे हाथ में किसी ताले की चाबी नहीं थी, बल्कि स्मार्ट कार्ड था| लिफ्ट में प्रवेश से लेकर विभिन्न तलों और सुविधाओं तक पहुँचने तक सब नियंत्रित था| आप चाहकर भी गलत तल पर नहीं जा सकते थे| अपने कमरे में पहुँचते ही प्रसन्नता का अहसास हुआ| कमरे का अपना प्रभामंडल आपको आकर्षित, प्रभावित, प्रफुल्लित, विश्रांत करने के लिए पर्याप्त था| श्रमसाध्य यात्रा के बाद बेहतरीन गद्दे आपको पुकारते ही हैं|

कमरा पूरी तरह स्मार्ट डिवाइस  के साथ जुड़ा हुआ था| द्वार के नेत्र-छिद्र से लेकर कमरे के तापमान तक सब आपके अपने नियंत्रण में था| आप अपने आप में छोटी सी दुनिया के शहंशाह नहीं वरन छोटे मोटे ईश्वर थे| परिचारक सभ्रांत तौर तरीके से बड़ी से लेकर मामूली बातों को समझा गया था| अतिथि के लिये सम्मान किसी भी होटल के लिए आवश्यक होता है परन्तु परिचारक का खुद अपने लिए सम्मान सबसे बेहतर बात होती है|

हमारा नाश्ता बेहद हल्का, स्वादिष्ट और सबसे बड़ी बात, हमारे इच्छित समय पर कमरे में था| इसके बाद के सभी भोजन अधिवेशन के साथ ही थे| देशभर से आये हजारों अतिथियों के अनुरूप सभी स्वाद का ध्यान रखा गया था| भोजन के मामले में मुझे चयन की बेहद कठिनाई हुई| हर प्रकार का बेहतरीन भारतीय भोजन उपलब्ध था|

स्नानागार जीवन का दो प्रतिशत समय लेता है मगर शेष अट्ठानवे प्रतिशत समय की गुणवत्ता तय करता है| बाथटब से लेकर अन्य सभी सुविधाएँ आपको अपने विशिष्ठ होने की अनुभूति करातीं थीं| मेरे लिए यह ईश्वर और अपने आपसे बात करने का बेहतरीन समय था| मेरे कई मित्रों ने स्पा और तरणताल की सुविधाओं का भी बेहतरीन आनंद लिया|

हम प्रोफेशनल लोगों की यात्रायें होटलों की सुख सुविधाओं का आनंद लेने के लिए नहीं होतीं, मगर यदि चुपके से बेहतरीन सुख आपके आप आ जाए तो सोने पर सुहागा जरूर होता है| मुख्य अधिवेशन में भाग लेते हुए भी आप समय निकाल कर आप संबंधों का तानाबाना बुनने में लगे होते हैं| ग्रैंड चोला की ग्रैंड लॉबी इसके लिए बेहतरीन सुविधा प्रदान करती थी| अगर आप गंभीर मुद्दों से ऊबकर चुपचाप अपने आप से बात करने बाहर आते तो आपको अपने आप में खोने देने की पूरी सुविधा थी| स्टाफ किसी भी प्रकार की सहायता के लिए उपलब्ध था|

अधिवेशन के अंतिम दिन अतिथियों को पहले से सूचित करने पर बिना शुल्क चेक आउट समय के बाद भी कुछ समय रुकने की सुविधा दी गई| मैंने इस अतिरक्ति समय में आधा घंटे के नींद ली थी| यह मेरे लिए स्मृति संजोने का समय था, जो आज भी ताजा हैं|

तकनीकि के माध्यम से आप दुनिया को नियंत्रित कर सकते हैं परन्तु आपसी सम्मान और समझ से आप सब कुछ स्वचालित कर सकते हैं|

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प्यारे तस्कर

तस्कर, यह शब्द भारतियों के रौंगटे खड़े करने के लिए काफी है| भारत हत्यारों के बाद तस्करों से ही सबसे ज्यादा घृणा करता है, बलात्कारियों के भी ज्यादा| हम उन्हें देश का दुश्मन मानते हैं| अपराध की दुनिया के बादशाह – एक खूंखार अपराधी|

आखिर तस्कर होते कौन है? व्यापारी, जो अपने व्यापार पर कर (टैक्स) भुगतान नहीं करते| क्या इसमें भेदभाव करेंगे कि व्यापारी कौन सा कर नहीं दे रहा? सीमाकर (कस्टम ड्यूटी) न देने वाला तस्कर,! उत्पादकर (एक्साइज ड्यूटी) न देने वाला – विकास का कर्णधार!! बिक्रीकर न देने वाला विकास का वाहक!!! कैसा करभेद है? वास्तव में हम कारचोरों से प्रेम करते हैं… बस कुछेक को छोड़कर|

यह सभी उदाहरण अप्रत्यक्ष कर के हैं, जहाँ किसी करचोर को खुद कर नहीं देना होता बल्कि गरीब जनता से वसूलना होता है| क्या इन करचोरों में आपस में कोई अंतर है? क्या सब करचोर देश को खोखला नहीं करते? आइये कुतर्क करें| अपने प्रिय करचोरों का समर्थन करें|

एक होते हैं प्रत्यक्षकरचोर| इन्हें पता होता है कि करचोरी कर रहे हैं| मगर टैक्सबेस, हमारी मेहनत की कमाई मेहनत न करने वालों में मत बांटों जैसे बकवास बातों में यह सबको उलझाये रखते है| भारत में तीस प्रतिशत दर से कर देने में इनको नानी याद आती है, मगर साठ प्रतिशत की दर से कर लेने वाले देशों का विकास मांगते हैं| यह वो लुटेरे हैं जो भूल जाते हैं कि इनकी कमाई में देश का भी योगदान हैं वर्ना सोमालिया में जाकर कमाई कर कर दिखा दें| दुनिया का कोई देश कर के बिना विकसित नहीं हुआ| टैक्सबेस बढ़ाने की बातें कर चोरों और उन के पालतू राजनीतिक दलों की जुमलेबाजी है| अगर सरकारें कराधार – टैक्सबेस बढ़ाने के कल्पित ख्याल की जगह वर्तमान कर चोरों से निपट ले तो पाने आप टैक्सबेस बढ़ जाएगा|

मगर हमें तो करचोर पसंद है – तस्करों को छोड़कर|

आइये इस वर्ष के बजट भाषण का पैरा 141 पढ़े और गर्व करें|

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे मरन्तु मोक्षं

चलिए सतयुग आ गया| सतयुग तो आ ही गया है| कालचक्र का यह आगमन तो सुनिश्चित ही था|

सतयुग वही समय तो है जब प्रत्येक मनुष्य सदेच्छा रखता है| आपको हल्की सी छींक आते है, प्रत्येक मानव मात्र आपके स्वास्थ्य के लिए अपनी चिंता, संवेदना और सदेच्छा वयक्त करता है – गॉड ब्लेस यू| प्रत्येक मनुष्य अपने धुर विरोधी का भी भविष्य उज्जवल देखना चाहता है| कुछ मित्र तो प्रतिदिन नियम पूर्वक प्रत्येक प्रातः के प्रत्येक के लिए शुभ होने की कामना करते करते ही महायोगी का जीवन जीते हैं| एक मित्र हर ज्ञात अज्ञात त्यौहार पर अपनी शुभकामनाओं का अकूत भण्डार भारत सरकार की किसी सरकारी अनुदान योजना की तरह रोज लुटा देते हैं| एक मित्र तो इतने शुभकामी हैं कि मुहर्रम पर भी नहीं चूकते – चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान  |

जब भी किसी मौसमी रोग – महारोग – महामारी का मौसम आता है तो दादी- नानी- परनानी की औषधियों से लेकर भविष्यतः दो सह्स्त्रब्धियों की औषधियों का महाज्ञान मित्र से प्राप्त होता है| किसी ज्ञात अज्ञात मृत अर्धमृत अमृत किसी भी मृत्यु पर मोक्ष की सदेच्छा का सन्देश देते रहना उनका प्रिय पुण्य है| जब एक परिचित सज्जन ने देवलोकगमन किया तो सन्देश मिलते ही उन्होंने जन्मजन्मान्तर से मुक्ति और मोक्ष की महाकामना के बाद ही जलपान चाय स्वीकार की| चाय सेवन के दौरान जब उनके पास शोक व्यक्त करने के अनंत सन्देश आने लगे तो पता चला कि देव्लोकगामी सज्जन कोई अन्य नहीं स्वयं उनके पिता है|

सतयुग में अप्सराएँ न हों तो क्या हो? रात्रिकाल एक दो कन्यायें तो निर्बाध रूप से शुभरात्रि और शुभस्वप्न के सन्देश दे ही देतीं है| सतयुग में स्वप्नदोष तो लगा ही रहता है|

जब से भारत में सूचनाक्रांति हुई है, सतयुग कर – कर मोबाइल – मोबाइल होता हुआ घर – घर आ पहुंचा है| किसी राजशिरोमणि का वचन नहीं, कि आप अच्छे दिन की प्रतीक्षा करते करते मोक्ष प्राप्त कर जाते| यह सतयुग ही तो अच्छे दिन है| आपका वचन पूरा होता है, पराक्रमी| तकनीकि सूचना की दूसरी पीढ़ी वाला महायज्ञ अश्वमेध यज्ञ की भांति समस्त भारतवर्ष में सूचना क्रांति के अश्व आज भी दौड़ा रहा है| आज उसकी पांचवी पीढ़ी अपनी महापताका लेकर क्रांति के युद्धस्थल की ओर अग्रसर है| हर कोई भारतवासी प्रत्येक जीवित के लिए शुभकामना और प्रत्येक मृत के लिए मोक्षकामना के साथ जीवित है| राग द्वेष कलियुग की पुरानी बातें है|

अथ श्री सत्यसूचना कथा:| अथ श्री अनुदानित स्पैक्ट्रम कथा:|

 

 

 

अपाहिज बूढ़ा देव

दिल्ली की कडकडाती ठण्ड का कोई धुपहला दिन रहा होगा| प्यारी सी बिटिया या बहू दिल्ली हाट घूमती रही| अचानक सुन्दर गणेश पर निगाह पड़ी| रसोईघर में रखूंगी या बैठकघर में, लौटते समय वो सोचती रही| देव भी सोचते रहे, दूकान के दरिद्र से निकल आये, जिस विधि विधाता चाहेगा, मजे से रहेंगे| कोई विशेष इच्छा न थी| अगर पक्ष – पखवाड़े एक मोदक का प्रसाद भी चढ़ जाता तो धन्य होते| खिलाती – पिलाती रसोई में रहने पर भक्ष्य – अभक्ष्य सबका भोग स्वतः हो जाता| यहाँ दिन निकलते ही, मोदक कलेवा होता| हर सांय सोमरस पर समाप्त होती| सेवाभाव में कमी न थी|

परिवार क्या होता है, यहीं जाना था| रसोईघर घर की सब गतिविधियों का केंद्र| षड्यंत्र तंत्र प्रपंच सब यहाँ अवश्य चर्चित होते| मनोरंजन के लिए कहीं न जाना पड़ा| दुःख भी होता| जब घर का बेटा अपनी पत्नी को अपने खुद के बूढ़े पिता के विरुद्ध भड़काता| दुःख नहीं देखा जाता| आँख बंद कर ली| बुड्ढा एक दिन चुपचाप तीर्थ करने चला गया| कभी नहीं लौटा| न जिन्दा न मुर्दा| सब जीवन की माया है| अपने अपने कर्म है, अपने अपने कर्मफल| वर्तमान में जीवन चलता है चलता रहा| पर विधाता से सुख कहाँ देखा जाता है|

#Life of #god #PostRetirement… If you are going to be retire one day, plan carefully. #_soidelhi #oldage #OldAgeHome #LifeAlone

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हवा का झोका चला आया| तेज तो नहीं लगता था| मगर, अपाहिज कर गया| जमीन पर झाड़ू क्या फिरी, किस्मत फिर गई| अपाहिज बूढ़ा देव किसी का भला नहीं कर सकता| अपाहिज बूढ़ा देव किसी का बुरा नहीं कर सकता| कोई बीमा नहीं, कोई पेंशन नहीं, कोई भोग नहीं लगता| पेड़ से गिरने वाली पीपलियाँ भी यदाकदा मिल पातीं| सड़क किनारे भी अकेला हूँ| कभी कभी एक चीटीं आती है बात करने|

बस देव होने की थोड़ी इज्जत बची रही| कूड़े में नहीं डाला  गया| पीपल के पेड़ के नीचे पड़ा हूँ चुपचाप| दुःख नहीं देखा जाता| आँख बंद कर ली| माटी का रंग माटी हुआ जाता है| माटी का इन्तजार रहेगा|

अतिशय सकार की नकारात्मकता

सकारात्मकता हम सभी की प्रिय है| नकरात्मक व्यक्ति, विचार, विमर्श, वस्तु, किसी को पसंद नहीं आते| पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित आलेख वर्षों से बता रहे हैं कि किसी प्रकार की नकारात्मकता को निकट नहीं आने देना चाहिए| सकारात्मकता के प्रचार प्रसार में विश्वभर के प्रशिक्षकों, प्रेरक वक्ताओं, धर्मगुरुओं, राजनेताओं, की अपार सेना लगी हुई है| अगर इनके प्रचार पर ध्यान दिया जाये तो लगता है विश्व पल भर में बेहद सुखद बनने जा रहा है| कुछ धर्मगुरु अपने प्रवचनों में ईश्वर को नकारात्मकता की रचना करने के लिए दोषी ठहराने के मात्र चौथाई क्षणभर पहले ही अपनी वाक् – प्रवीणता को लगाम दे देते हैं| मानों सकारात्मक होना ही सृष्टि का उद्देश्य है|

विश्व भर में आग्नेयास्त्र वर्षाने वाले एक बेहद बड़े राजनेता पैसे लेकर आपको सकारात्मकता का पुण्य प्रसार करते मिल जायेंगे| विश्वभर के आतंकवादी, शोषक, राजनेता, पूंजीवादी, साम्यवादी, सम्प्रदायवादी, धर्मगुरु, मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरूद्वारे, मदिरालय, वैश्यालय सब अपने प्रति होने वाले नकारात्मक प्रचार से दुखी हैं| हाल में एक महान समाजशास्त्री समाचारपत्रों में छपने वाले, रेडियो पर बजने वाले, टेलीविजन पर दिखने वाले, उस सभी समाचारों से परेशान थे जिसमें अपराध, शोषण, दमन, हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, गरीबी, बेचारी, महंगाई, विपदा, आपदा, आदि मनुष्यमात्र को ज्ञात होते हैं| महान समाजशास्त्रियों का मत है – गैर कामुक प्रेम, आर्थिक विकास, हरियाली, मुस्कान, महाराज्यमार्गों, गगनचुम्बी इमारतों, हँसते बच्चों, खिलखिलाती युवतियों और मस्त युवकों के बारे में ही समाचार, विचारविमर्श होना चाहिए|

वर्तमान समय की विश्व सरकारें अपने कृत्य – कुकृत्यों के बारे में जनता की राय मांगते समय किसी नकरात्मक सम्भावना का विकल्प ही नहीं देतीं| प्रस्तावित कार्यों के लिए सुझाव जानते समय पहले की सकारात्मक सुझाव का एक मात्र विकल्प दिया जाता है| कभी कभी रचनात्मक सरकारें सकारात्मक और रचनात्मक दो विकल्प भी देतीं है| उदहारण के लिए अगर सरकार बहादुर एक दिन में दो सेर मीठा खाना चाहें तो उन्हें रसगुल्ला, बर्फी, गुड़, शहद के सकारात्मक सुझाव दें, यह न कह दें कि इतना मीठा खाने से मधुमेह हो न हो मगर कै, उल्टी – पल्टी, आदि का खतरा हो सकता है| अगर आप रचनात्मक सुझाव देना चाहें तो (जैसा बहुत से बाजारू पेय में होता है,) दो सेर मीठे में उल्टी की दवा मिलाकर पीने का  सकारात्मक सुझाव दे सकते हैं|

अभी हाल में एक सज्जन ने पैदल लम्बी तीर्थयात्रा पर जाने के विचार किया| बोले सलाह दीजिये, हमने थकान, बीमारियों और आयु से सावधान करते हुए उनके दैनिक पदयात्रा लक्ष्य को कम करने का निवेदन किया| बोले, तुम नकारात्मक प्राणी हो, ईश्वर का नाम लो और यहाँ से पधारो| बाद में सप्ताह भर की यात्रा के बाद ही वह चिकित्सालय की शरण जा पहुँचे|

किसी भी विषय आलोचना या समालोचना और आने वाली नकारात्मक परिस्तिथियों को नकार नहीं माना जाना चाहिए| अगर व्यकित अपनी या अपने विचार की आलोचना को नकारात्मक मान कर उसपर ध्यान नहीं देता तो उसकी यह अति सकारात्मकता नकारात्मक परिणाम देती है| इसका अर्थ यह भी नहीं कि नकारात्मक विचार को सिर पर चढ़ा लिया जाए| हल सकारात्मक उपाय ढूढने में है|