वो उधार वापिसी…

आज कल के हिसाब से तंगहाली का जमाना था, जिसे नए नए बुढ्डे सस्ते का जमाना भी कह सकते हैं| लोगों की इज्ज़त पैसे से नहीं उसके दुआ – सलाम करने के क़ायदे से होती थी| ये तो वही बातें हैं, जिन्हें हम हर गुजरे ज़माने के लिए लिखते कहते हैं|

हर बुधवार और शुक्रवार को मोहल्ले के बच्चे शाम को एक घर में इकठ्ठे होते थे और दूरदर्शन पर रामायण देख कर लोग रोया या हंसा करते थे| कच्ची धूप वाली लड़कियां हमें पसंद आया करतीं थीं| उस समय कंप्यूटर बड़ी बड़ी कंपनियों और विश्वविद्यालयों में पाया जाता था, सरकार देश भर में कंप्यूटर लगा कर हर गरीब को बेरोजगार कर देना चाहती थी| इसी सिलसिले में हमारे सरकारी स्कूल में भी “टाइपराइटर पर टीवी वीसीआर” लगाकर रखा गया था (हम सब कंप्यूटर को ऐसे ही समझ पाते थे)| हमारे सरकारी स्कूल में फर्नीचर टूट टूट कर गोदाम में जमा हो रहा था| मेरी कक्षा में हिन्दू और मुस्लिम, अगड़े तगड़े, पढ़ते थे| ग़रीब, गंवार, पिछड़े, और निठल्ले दूसरे सेक्शन में थे|  मैं अलीगढ़ का नौरंगीलाल राजकीय इन्टर कॉलेज में छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ता था|

मैं उन गिने चुने बच्चों में से था जिन्हें हर रोज घर से चार या आठ आने मिला करते थे| बाकी सब पांच या दस नये पैसे वाले थे| हम जिन्हें चार आने मिलते थे वो हमेशा घर का खाना लाते थे और दूसरों के साथ शेयर भी करते थे| उस समय घर से पानी लेन का चलन नहीं था| अजीब बात यह थी कि जिन्हें पंजी या दस्सी मिलती थी वो हफ्ते में एक दो बार ठेल पर से चार आने के छोले या आठ आने का चीला खाया करते थे| फरबरी का महीना और बदलता मौसम था| मास्टर लोग पढ़ाने छोड़कर अपनी बोर्ड एग्जाम की ड्यूटी लगवाने में लगे थे|

उस ज़माने में हमारी फीस छः नए पैसे से बढ़ा कर दस पैसे होकर शायद आठ पैसे महीने पर टिक गयी थी| फीस विरोधी छात्र आन्दोलन ख़त्म हो चुका था| अगर बहुत से बच्चे या तो जब पैसे होते थे तो क्लास टीचर खां साहब के पास एडवांस फीस जमा कराते थे या कई बार फीस न दे पाने के कारण हर तीसरे महीने नाम कटवाते थे| खां साहब किसी की फीस अपने खाते से जमा नहीं करते थे| उनके पास एडवांस जमा का खाता था, मुसलमान थे इसलिए न उधार जमा करते थे, न लेते थे, न देते थे|

उधार पैसे देना मेरा काम था, हर महीने पच्चीस तारीख को मैं अपने पास के सारे सिक्के लाता था और उधार बांटता था| इसका हिसाब खां साहब ख़ुशी और नेक नीयत से खुद रखते थे|

वो एक मुस्लिम लड़का था, पिछड़ा था और गरीब भी| अगड़ों की तरह उसके पिता नहीं थे बाप था, जिसे वो प्यार से अब्बा और इज्ज़त से अब्बाजान कहा करता था| तीन नहीं से फीस नहीं दे पाया था और पूरे पूरे चौबीस पैसे फीस बकाया हो चुकी थी| अपना नाम पुकारे जाने पर उसने मेरी तरफ़ देखा और पाने चार आने बढ़ा दिए| फ़ीस जमा हो गई| उसका सर चकरा रहा था| हाथ फैलाना और इज्ज़त उतार कर सड़क पर रख देना एक बात थी| क्लास के सभी बच्चों के सामने खां साहब ने ताकीद की, ये उधारी किसी को बताना मत| वो दिन भर नहीं बोला, अगले दिन से स्कूल नहीं आया| हफ्ता बीत गया|

सुबह का वक्त था| स्कूल से 200 मीटर दूर घंटाघर पर साईकिल पकड़े तहमद कमीज़ पहने दढ़ियल शख्स ने आवाज़ दी, जनाब गहराना साहिब| मैंने पीछे मुड़ कर देखा| गहराना साहिब, यानि मेरे पिता तो जा चुके थे और कोई दूसरे गहराना साहिब भी वहां नहीं थे| मैं आवाज़ की तरफ़ देखने लगा| आजकल का ज़माना होता तो शायद मैं भाग खड़ा होता और हनुमान चालीसा पढ़ रहा होता|

“जनाब गहराना साहिब, आप से ही काम है” उन्होंने कहा| साइकिल के लट्ठे पर बैठे बच्चे ने भी ओढ़ी हुई लोई से बाहर झाँका| “ये लीजिये आपके पैसे, इसकी तरफ़ मत देखिये, इसको पीलिया बिगड़ गया है| मेडिकल ले जा रहा हूँ|” मैंने वो चवन्नी नहीं पकड़ी|

“ले लीजिये, ये मुसलमान है, इसे इसी जिन्दगी में चुकाना है| आगे मुलाकात हुई या नहीं| खुदा जाने|” (उन दिनों खुदा ही होता था, अल्लाह को मैं नहीं जानता था शायद|) वो शख्स आंसू पौछ रहा था| बाप था न|

मैंने पैसे ले लिए| उसने सर पर हाथ रख कर मेरी सलामती की दुआ की और चला गया| मैंने घंटाघर से बाबा बरछी बहादुर की मज़ार तक चार सौ मीटर की दौड़ लगाई| अन्दर जाती हुई एक औरत के हाथ ओर वही चवन्नी रखी, “आंटी इसे चढ़ा देना”|

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प्रधानमंत्री!!

 

भारतीय हिंदी समाचार चेनल पर प्रसारित किया जा रहीं नायब वृत्तचित्र श्रंखला| विश्व के श्रेष्ठ निर्देशक श्री शेखर कपूर इसके प्रस्तुतकर्ता हैं|

२३ किस्तों में प्रसारित होने वाली इस श्रृंखला की छह क़िस्त हम देख चुके हैं|

किस तरह आजादी के समय देश में ५६५ स्वशासित रजवाड़ों को भारत या पकिस्तान में मिला कर ५६६ राजनैतिक इकाइयों को जोड़ कर दो इकाइयों में तब्दील किया गया| किस तरह धर्म नहीं वरन राजनीति देश का बंटवारा करा रही थी या कहें कि धर्म द्वारा बांटे जा रहे देश को राजनीति मिला रही थी| अलग ही कथा है| सयुंक्त भारत उस दिन से पहले एक विचार था जिसको अब तक का सबसे बड़ा अमली जमा पहनाया गया था| हमने इस कथानक में देखा| हिन्दू जोधपुर पाकिस्तान में जा सकता था, क्या विचित्र राजनीति थी| बहुत सी सच्चाइयाँ आज कोई दुहराना नहीं चाहता| जोधपुर, जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर केवल कथा नहीं है देश का वो बंटा हुआ चरित्र है, जो आज भी भारत को अपने मानसिक पटल पर, बिहारी, मराठी या फिर हिन्दू मुस्लिम या ब्राह्मण- वैश्य के बाद रखता है|

एक ओर देश को जोड़ा जा रहा था| दूसरी तरफ अलग अलग राज्यों की मांग उठ रही थी| निश्चित ही भारतीय संस्कृति, बहुत सारी संस्कृतियों का संगम है और हर संस्कृति को अपनी अलग पहचान मिलनी चाहिए| मगर यह भी सच है कि हर घर परिवार की अपनी अलग संस्कृति, सांस्कृतिक पहचान होती है| कितने राज्य, किस पैमाने पर|

प्रश्न अनेक थे और हैं| हिन्दू कोड बिल!! उस समय उसका हिन्दू समाज में बड़ा विरोध हुआ, आज देश में हिन्दू समाज उन बातों पर गर्व करता है जिनका उस समय विरोध हुआ था| उदहारण के लिए, एकल विवाह.. आज हिन्दू मुस्लिम कानून में चार विवाहों की मान्यता मात्र का विरोध करते है और मजाक उड़ाते हैं| मेरे मन में कई बार प्रश्न उठता है, क्या सब के लिए समान संहिता न लाकर देश में मुस्लिम और अन्य तबकों को विकास के क्रम में पीछे नहीं छोड़ दिया गया है?

भारत चीन युद्ध भी ऐसी ही एक कथा है| भारतीय राजनीति, कूटनीति और युद्ध नीति की पहली बड़ी परीक्षा| नवविकसित देश गलती से ही सीखता है; हमने सीखा जरूर मगर क्या आज हम अपने बड़े हो जाने के गरूर में कुछ भुला तो नहीं रहे है|

कस कर बुनी हुई कहानी, संजीदगी से किया गया प्रस्तुतीकरण, आवश्वकता के अनुरूप नाट्य रूपांतरण प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी सफलता है| शेखर कपूर अपने हर शब्द से न्याय करते दिखाई देते हैं|

 

यह केवल भारत के सामाजिक इतिहास की गाथा नहीं है, देश के आगे बढ़ने की उधेड़बुन है|

भारत की अबला नारी

 

भारत का समाज और क़ानून मात्र दो प्रकार की अबला नारियों की परिकल्पना करता है:

१.      नवविवाहिता स्त्री, विवाह के पहले ३-४ वर्ष से लेकर सात वर्ष तक (नवविवाहित अबला); और

२.      भारतीय परिधान पहनने और अपने पिता या भाई की ऊँगली पकड़ कर चलने वाली २४ वर्ष की आयु अविवाहिता स्त्री (अविवाहित अबला)|

जो भी स्त्री इस दोनों निमयों से बाहर है वह प्रायः समाज और कानून द्वारा कुलटा स्त्री मानीं जाती है| (ध्यान दें, भारत में सबला स्त्री का कोई प्रावधान नहीं है|)

और जब तक किसी भी स्त्री को कुलटा घोषित नहीं किया जाता उसे भाभीजी और माताजी जैसे शब्दों से पुकारा जा सकता है|
(पुनः ध्यान दें, बहनजी शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है, अविवाहित स्त्रियों के लिए भी भाभीजी शब्द का धड़ल्ले प्रयोग किया जा सकता है|)

आईये; विस्तृत अध्ययन करते हैं:

नवविवाहित अबला:

नवविवाहिता अबला, सामाजिक समर्थन प्राप्त कानूनी अबला है, जिसे होने वाले किसी भी कष्ट के भारतीय समाज में आराजकता की उत्पत्ति होती है| इस श्रेणी में आने के लिए किसी भी स्त्री को नवविवाहित होना ही एक मात्र शर्त नहीं है| प्रेम- विवाह के नवविवाहित हुईं स्त्रियाँ, सामान्य नियम के अनुसार इस श्रेणी से बाहर ही रखीं जातीं हैं| गरीब और निम्न जाति की स्त्रियाँ भी, राजनितिक दबाब  का अभाव होने पर इस श्रेणी से बाहर मानीं जा सकतीं हैं| जिन स्त्रियों का विवाह, ३५ वर्ष की आयु के बाद हुआ हो, उन्हें इस श्रेणी में काफी संशय के साथ रखा जाता हैं|

सामाजिक नियम के अनुसार इस श्रेणी में स्त्री विवाह के बाद के पहले दो – चार वर्ष ही रहती है, परन्तु कानून के आधार पर यह अवधि विवाह के बाद के पहले सात वर्ष रहती है| उस समय सीमा के बाद कोई भी स्त्री अबला नहीं रह जाती|

अपवाद स्वरुप, अश्रुवती स्त्रियाँ अपने अबला काल को अधिक समय तक बना कर रख सकतीं हैं| सुन्दर, आकर्षक, समझदार, मिलनसार (अति – मिलनसार नहीं), होना उन अश्रुवती स्त्रियों के लिए अतिरिक्त लाभदायक हो सकता हैं|

हमारे भारतीय समाज और कानून में नन्द, सास, जेठानी, पड़ोसन और किसी भी अन्य स्त्री जिसका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ससुराल या पति से हो, नवविवाहिता अबला के लिए प्राण-घातक मानी जाती है|

दहेज़, सती, आत्महत्या, गर्भपात और घरेलू हिंसा आदि के लिए पति को दोषी माना जाए या न माना जाए, इन में से किसी न किसी स्त्री को ढूंढ कर अवश्य ही दोषी मान लिया जाता है|

इस प्रकार की अबला को पति नाम की चिड़िया और ससुराल नाम के चिड़ियाघर से सुरक्षा की विशेष आवश्कयता हमारे कानून में हमेशा से महसूस की है और आज भी कर रहा है| नए तलाक कानून इस  श्रंखला में एक और कड़ी हैं और हम ऐसी ही अनेकाने क्रांतिकारी कड़ियों की सम्भावना से रोमांचित हो उठते हैं| नव विवाहिता अबला की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के कानून बनाये गए हैं, उनके उदहारण इस प्रकार से हैं[i]:

  1. The Dowry Prohibition Act, 1961 (28 of 1961) (Amended in 1986)
  2. The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 (3 of 1988)
  3. Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
    1. The Indian Christian Marriage Act, 1872 (15 of 1872)
    2. The Married Women’s Property Act, 1874 (3 of 1874)
    3. The Guardians and Wards Act,1890
    4. The Child Marriage Restraint Act, 1929 (19 of 1929)
    5. The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
    6. The Special Marriage Act, 1954
    7. The Protection of Civil Rights Act 1955 
    8. The Hindu Marriage Act, 1955 (28 of 1989)
    9. The Hindu Adoptions & Maintenance Act, 1956
    10. The Hindu Minority & Guardianship Act, 1956
    11. The Hindu Succession Act, 1956
    12. The Foreign Marriage Act, 1969 (33 of 1969)
    13. The Indian Divorce Act, 1969 (4 of 1969)
    14. The Muslim women Protection of Rights on Dowry Act 1986
    15. National Commission for Women Act, 1990 (20 of 1990)

यदि इन कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा बाद में कभी करेंगे|

अभी पहले अविवाहित अबला के बारे में बात करते हैं|

 

अविवाहित अबला:

यह प्रायः सामाजिक किस्म की अबला है, जिसके अबला होने के बारे में माना जाता है कि कानूनी विद्वानों में केवल किताबी सहमति है| अविवाहित अबला, वह अविवाहित स्त्री है जो गैर – भारतीय परिधान न पहनती हो, अपने पारिवारिक स्व – पुरुष जन ( और कभी कभी माता बहनों) के अतिरक्त किसी अन्य प्राणी के साथ न पाई जाती हो, शरीर से सर्वांग – स्वस्थ होने के बाद भी गूंगी, बहरी और अंधी हो और किसी भी पुरुष के द्वारा उसके अबला होने से अधिकारिक रूप से इनकार न किया गया हो|

सामान्यतः स्थानीय नियमों के अनुसार २० से २४ वर्ष की आयु पार करने के बाद किसी भी स्त्री को इस श्रेणी से निकला हुआ मान लिया जाता है|

इस श्रेणी में बने रहना हर स्त्री के लिए एक चुनौती है और विवाह की प्रथम शर्त है| अबलाओं के हितों की रक्षा के लिए एक रोजगार परक राष्ट्रीय आयोग भी है जिसका नाम आपको पता है|

 

अन्य विचार बिन्दु:

हर स्त्री को अबला श्रेणी के निकाले जाने का भय हमेशा बना रहता है| पहले किसी समय में हर स्त्री को अबला माना जाता था परन्तु अब ऐसा नहीं है| आज इस बाबत, कई वैधानिक सिद्धांत हैं|

पहला वैधानिक सिद्धांत है; “गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई|” इस सिद्धांत में गरीब का अर्थ किसी भी रूप में निम्न स्तरीय परिवार के होना है और लुगाई का अर्थ गरीब घर की किसी भी स्त्री से लिया जाता है| निम्नता को धर्म, जाति, क्षेत्र, आय, सम्पन्नता, राजनितिक अलोकप्रियता और भीड़ इक्कठा न कर पाने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है|

दूसरा वैधानिक सिद्धांत है, “भले घर की लड़कियां मूँह नहीं खोलतीं”| यदि कोई स्त्री अपने साथ हुई किसी भी छेड़छाड़, या यौन शोषण की शिकायत करती है तो उसे समाज अबला के दर्जे से बाहर कर देता है| यदि वह फिर भी कोई कोशिश करती है तो हमारा न्यायतंत्र ( न्यायलय और समाचार माध्यम दोनों ही) उसके साथ इतना विचार – विमर्श करता है कि उसे अपने सही श्रेणी का ज्ञान हो जाता है, भले ही यह ज्ञान मरणोपरांत ही क्यों न हो| इस सिद्धांत का एक विपरीत सिद्धांत भी है, “अति भले और बलशाली घरों की लडकियां जब भी मूँह खोलती है, सत्य और उचित ही बोलतीं हैं” परंतु इस सिद्धांत का प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हो सकता है|

अंतिम निष्कर्ष:

एक स्त्री के अबला श्रेणी से बाहर कर दिए जाने से उसके लिए हर प्रकार की सामाजिक, वैधानिक और न्यायायिक सुरक्षा का अंत हो जाता है| परन्तु, अबला के साथ हल्की की भी ऊँच – नीच करने वाले का सात पुश्त, माँ – बहन, हड्डी – पसली और कुत्ते की जिन्दगी और मौत वाला हाल किया जा सकता है|

कुल मिला कर मौत के कूएँ में सांप – छछूंदर का खेल है और मदारी गोल महल में बीन बजा रहे हैं|

धर्म की दूकान

हम भारतीय, विशेषकर हमारा हिन्दू समुदाय अंध भक्ति को जिस तरह से नतमस्तक होकर पसंद करता है; मैं हमेशा से उसका कायल रहा हूँ|

हर मंदिर, मठ, आश्रम, गुरूद्वारे, मकबरे, दरगाह, साधू, सन्यासी, पीर फ़क़ीर हर जगह हमारी भीड़ पहुँच जाती है| घर में चाहे दो जून रोटी न जुटती हो, बेटी के लिये दो मुठ्ठी अनाज न हो; मगर दान दक्षिणा के लिए सवा मन चावल तुरंत जुटा लिया जाता है| बहुत से लोग साल भर इसलिए परिश्रम करते हैं कि साल में एक बार गुरूजी के भण्डार भरने जा सकें|

इस देश में हर चोर उचक्का आज धर्म के नाम पर दूकान खोल कर बैठ जाता है और अगर पकड़ा जाता है तो उसके पालतू एजेंट केसरिया झंडा लहरा लहरा कर धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टिकरण को कोसने देने लगते हैं| इन दुकानों के बड़े बड़े विज्ञापन अखबार, टेलीविजन और इन्टरनेट पर रोज दिखाई देते हैं| अगर आप इन विज्ञापनों को इन्टरनेट, आगे वितरित नहीं करते हैं तो निश्चित ही आपका बुरा होने की खुली धमकी होती है|

मुझे भी कई बार इस प्रकार की दूकान खोलने ला मौका मिला है, मगर मेरे ईमान ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया| एक तो बड़ा ही मजेदार किस्सा है| सुनिए:

बात उन दिनों की है जब मैं सोनीपत रहता था| मैं ट्रेन से अलीगढ़ तक जा रहा था| द्वितीय श्रेणी का डिब्बा था| पास में एक लम्पट गेरुआ वस्त्रधारी माला जाप करते हुए धर्म को बदनाम कर रहा था| दरअसल वह साथ में सामने बैठी एक किशोरी और अन्य महिलाओं को अनावश्यक रूप से “देख” रहा था और सभी लोग उस की हरकत से असहज महसूस कर रहे थे| हद तब हुई जब उसने कोई गीत गाना शुरू किया मगर उसके गा गाकर झूमना गलत लग रहा था| जब उसे मना किया गया तो उसने बढ़ते अधर्म की दुहाई देकर और जोर से गाना शुरू कर दिया और इसबार उसने कुछ इशारे भी करना शुरू कर दिया|

मैं अपनी जगह से उठा और मैंने कहा, बाबा! अगले पंद्रह मिनिट और गा ले| बहुत जरूरत पड़ेगी तुझे| भगवान तेरा दिनरात का भजन सुन कर पाक गए हैं और अब अलीगढ़ पर तेरे पिटाई की व्यवस्था की गयी है| इस पर उन महिलाओं में से एक ने बोला, हम भी साथ में इसकी पिटाई करंगे| बाबा का तुरंत ही भगवान् से विश्वास उठ गया और वो दरवाजे पर अपनी गठरी जमा कर चुपचाप बैठ गया|

मगर अभी तो कुछ और मजेदार होना बाकि था| एक सहयात्री जो किसी प्रतियोगी परीक्षा को देकर लौट रहा था, उठकर मेरे पास चला आया बोला भाई साहब, क्या ज्यादा पूजा करने से भगवान वाकई नाराज हो जाते हैं| मैंने कहा, कौन अक्लमंद बेबात की चापलूसी पसंद करता है? फिर भगवान् क्यों करेंगे?

पता चला कि किसी बाबा ने दो साल पहले एक माला और मन्त्र दिया था उसका १००८ बार जाप करना होता है| उसके सभी साथी अपने काम धंधे पर लग चुके थे और ये भाई अभी बेरोजगार थे|

मैंने कहा कि भाई ऐसा करो कि वही मंत्र पढो दिन में केवल दो वक़्त ११ – ११ बार| उसने मुझसे मेरा नाम पता पूछा तो उसे अपना कार्ड दे दिया| यात्रा के बाद मैं यह बात भूल गया| लगभग तीन महीने बाद उस भाई का फ़ोन आया, मुझे गुरूजी कहकर संबोधित कर रहा था| उसकी किसी सरकारी महकमे में नौकरी लग गयी थी| अब तो हर १० दिन में उसके फ़ोन आने लगे| हद तब हुई जब उसकी माँ और पिताजी भी “गुरूजी” यानि मेरे “दर्शन” के लिए आना चाहते थे|

परन्तु मेरा तबादला सोनीपत से दिल्ली के लिए हो गया और मेरा कंपनी का फ़ोन नंबर भी बदल गया| मेरे पुराने नंबर पर कुछ दिन उसके फ़ोन आये| मैंने उस नंबर के नए मालिक को बोल दिया था कि उसे मेरा नया नंबर न दे|

बहरहाल इस घटना का मुझ पर भी काफी फर्क पड़ा| अब मुझे किसी भी गेरुवे कपड़े पहने धूर्त को देख कर उस से वितृष्णा नहीं होती; मैं सोचता हूँ कि कौन कौन इसकी दूकान पर आने को बेताब होगा|

ऐश्वर्य के घर शिशु जन्म

यह दुनिया बहुत बड़ी है| इसमें एक छोटी सी दुनिया है, जिसमें हम रहते हैं| यह दुनिया एक दम अनोखी है: यहाँ बड़े बड़े दर्द और छोटी छोटी खुशियां है, अपनी लहरें, अपना पानी है; वक्त की अपनी रवानी है| हमारी यह छोटी सी दुनिया बड़ी सी दुनिया में जगह जगह फैली हुई है: अलीगढ़, दिल्ली, देहरादून, इलाहाबाद और मुंबई| यह दुनिया रेडियों, टेलिविज़न, मोबाइल फोन, इन्टरनेट, ट्विट्टर, फेसबुक, तक फ़ैल जाती है| यह दुनियां हाथ फैला कर बहुत कुछ अपने में समां लेती है| इस दुनिया में हम रहते है, यह दुनिया हमने बनाई है, इस दुनिया ने हमें बनाया है| यह सूरज, चाँद, सितारों वाली दुनिया है|

इस दुनिया में एक अन्तरंग गहमागहमी है जिस पर किसी भी अखबार की दखल नहीं है; न ही इसकी दरकार है| इस दुनिया में पत्रकार भी हम है और चित्रकार भी| रिपोर्ट भी हमारी है और सटायर भी| हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी ही है|

इस छोटी सी दुनिया में एक नए प्राणी का आगमन है| काफी समय पहले जब मेरी पत्नी ने इस बारे में कुछ महसूस किया तब हम किसे अन्य कार्य में व्यस्त थे और महीने भर तक चिकित्सक से सलाह मशविरा लेने के लिए समय नहीं निकाल पाए| समय बीत रहा था पर जीवन सांस लेने की अनुमति नहीं दे रहा था| तभी अचानक हमें एक शनिवार की शाम बाहर जाना था और दिन में हमारे पास समय था और हमने इस समय का सदुपयोग करने का निर्णय किया| उस दिन दोपहर को चिकित्सक में हमें बधाई दी और कुछ जाँच आदि करने के लिए कहा| इस के बाद सभी व्यस्तता और समस्याओं के बाद भी हम अपने अंदर एक बदलाव महसूस करने लगे| यह एक सुखद अनुभव रहा|

कुछ समय बाद जब हमारी अन्य व्यस्तताएं कम हुई हमने नए प्राणी के बारे में और अधिक सोचने शुरू कर दिया| पत्नी ने गर्भावस्था के बारे में एक पुस्तक पढ़नी प्रारम्भ कर दी तो मैंने इंटेरनेट पर काफी जानकारी इक्कठा की| कई बार ऐसा लगता था कि हमारे अलावा तो कोई और कभी माँ-बाप नहीं बना है| समय के साथ हमारी उन्त्सुक्ता बढ़ रही थी तो पत्नी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था, जो कि मानसिक तनाव और शारीरिक समस्याओं को लेकर थी| चिकित्सक इस सब में पैसा बना रहे थे और हम खुश थे| मैंने अपने जीवन का काफी समय चिकित्सालयों के चक्कर काट कर बिताया है पर इस बार हमें इस बात पर कोई दुःख नहीं हो रहा था| हमारी दुनिया में तमाम के बाद भी कुछ था जो नया था और जोश भर रहा था| पत्नी अपने कार्यालय, घर और गर्भवती माँ के रूप में अपनी जिम्मेदारी के बीच संतुलन बैठने में लगभग नाकाम हो रही थी और यही परीक्षा थी| पत्नी को सास का अभाव खाल रहा था|

हमने तय किया कि हमारे शिशु का जन्म उसकी माँ के जन्म स्थान देहरादून में होगा| इसके कई कारण रहे| अब नई समस्याएं थी; कार्यालय से अवकाश, दिवाली और अन्य त्यौहारों का मौसम, देहरादून कि ठण्ड, दिल्ली से देहरादून कि यात्रा, सही चिकित्सक का चुनाव| धीरे धीरे इन सभी को सुलझाया गया| चिकित्सकों ने बताया कि शिशु ने गर्भ में तिर्यक स्थिति अपना ली है और यह स्थिति यदि बनी रहती है तो समस्या हो सकती है|

इस समय हमने एक और निर्णय लिया; बच्चे के स्टेम सेल को परिरक्षित करवाने का| यह निर्णय हमारे पुराने अनुभवों और चिकित्सकीय अनुसंधानों के नए कारनामों का नतीजा था| इस क्षेत्र में कार्यरत कई सेवा प्रदाताओ से बात की और एक का चुनाव कर लिया| इस निर्णय से हमें लगभग एक लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च करना था पर भविष्य का डर सदा ही वर्तमान के गणित पर भारी पड़ता है|

पत्नी जी ने 23 अक्टूबर 2011 के लिए देहरादून शताब्दी के एक्स्क्युतिव श्रेणी डिब्बे में अपना आरक्षण करवाने का निर्णय सुनाया| यह एक यादगार यात्रा थी| उस दिन कि विशेष बात थी कि चाय न पीने का दवा रखने वाली पत्नीजी ने कम से कम तीन बड़ा कप चाय पी| दूसरा पहली बार ऐसा हुआ कि गाड़ी किसी स्थान पर पांच मिनिट से अधिक रुकी और मैंने प्लेटफोर्म का दौरा नहीं किया| (देहरादून शताब्दी सहारनपुर पर आधा घंटा रूकती है) इस प्रकार पत्नी जी अपने मायके जा पहुंची|

नए स्थान पर नए चिकित्सकों ने पुनः जांचें की और नए निर्णय दिए| शिशु में अपनी तिर्यक स्थिति को सुधार लिया था पर नै समस्या थी कि अब नाल उसके गले पर लिपटी हुई थी| चिकित्सकों को अब अपने अनुभव और ज्ञान पर कम भरोसा था और वो किसी भी प्रकार का दांव नहीं खेलना चाहते थे| इसमें उनका पैसा भी बनता है और इज्जत जाने का डर भी नहीं होता| उनका कहना था कि शल्य क्रिया होनी चाहिए और हमें उसके लिए समय का निर्णय करना था| इस समय सभी प्रकार की शंका और समाधान सामने थे| पत्नीजी का रक्तचाप इस दौरान महंगाई से तेज बढ़ने लगा| मैंने कई बार अनुभव किया है कि पत्नीजी कठिन समस्याओं का समाधान जल्दी कर लेती है और सरल निर्णय लेने में रक्तचाप बढ़ा लेती है|

अनुभव ने मुझे सिखाया है कि भले आप कोई अंधविश्वास न माने मगर इस भारतीय समाज में उसको अवश्य पूरा करें, वरना समाज आपको जरूर परेशां कर लेगा| इस कारण, गुरुवार नकार दिया गया क्योकि मान्यता के मुताबिक, गुरुवार को किया गया काम दुहराया जाता है और कोई भी बार बार शल्यक्रिया नहीं चाहता है| उसके बाद मूल नक्षत्रों का समय है जो कि शनिवार संध्या काल में समाप्त होता है| इस समय में पैदा हुआ शिशु परिवार के लिए कठनाई का सन्देश लाता है| परन्तु वास्तव में यह हिंदू ब्राह्मणों की आय का एक और स्रोत है| यह मूल दोष, कुछ पूजा पाठ करने के बाद भगवान के इन दूतों (ब्राह्मणों) को खिलाने, पिलाने और दान दक्षिणा देने से दूर हो जाता है| परन्तु यह पूजा – पाठ शिशु की माँ के लिए कष्टकारी समय होता है| अतः अब रविवार का समय तय हुआ है|

रविवार को प्रातः 7 बजे हम चिकित्सालय पहुँच गए और शल्य क्रिया की तैयारी शुरू हो गई| ठीक 8 बजे पत्नी को शल्यकक्ष में ले जाया गया और फिर 9 बजे उपचारिका (नर्स) नन्हे शिशु को लेकर उपस्तिथ हुई; “बेटा आया है|” यह खुशी के क्षण थे| लिखित संदेशों और फोन के जरिये सभी को सूचित किया गया| मैंने लिखा; “हमारे घर बेटा आया है|” लोगों के बधाई सन्देश और फोन आने लगे| एक अजब माहौल था: नन्हा शिशु, बेहोश माँ, उनका बढ़ता रक्तचाप, खुश परिवार, भागते दौड़ते नाना, उछलती कूदती नानी, हँसते-फूलते बुआ, मौसी, मामा, और चिंतित बाबा के बजते फोन, शिशु रुदन, बधाई सन्देश, लंबी फोन वार्ताएँ, दवाएं, मिठाइयां, अजब – गजब होता मैं| नयी मांगें हो रही थी : मित्र-सम्बन्धी लोग फोटो की, शिशु भोजन की, माँ शांति की, परिवार उत्सव की| मेरी छोटी बहन ने शिशु के लिए पुकारू नाम तय कर लिया गया था; “आदि; जो मेरे और पत्नी ले नामों ले प्रथमाक्षर ऐ-दि का परवर्तित हिंदी रूप है|

शाम को पत्नी ने पूरी तरह होश आने पर अपने मित्रों को भी सन्देश दिए| मैंने मित्रों को भेजने के लिए सांयकाल एक फोटो लिया, जिसे अगली प्रातः 5.45 भारतीय मानक समय पर http://twitter.com/AishMGhrana और उसके तुरंत बाद http://www.facebook.com/#!/aishwaryamgahrana?sk=info पर यह चित्र सम्बन्धियों और मित्रों को भेज दिया| अब बधाइयों का नया सिलसिला था|

अगले पांच दिन शिशु चिकित्सालय में इस विश्व को समझने में लगा रहा और हम उसको| नए शिशु को स्वस्थ्य सम्बन्धी छोटी मोटी समस्यायें भी परेशां कर रही थी, इसलिए शिशु चिकित्सा विशेषज्ञ भी बुलाये गए| उसकी पहला रोना, पहली जम्हाई, पहली डकार, सब इंगित किये गए| क्योंकि उसकी माँ दूध नहीं पिला सकती थी तो उसको शिशु आहार दिया गया| उसकी माँ ने उसे मंगलवार को पहली बार दूध पिलाने का प्रयास किया|

शुक्रवार को सभी लोग उसकी नानी के घर पहुँच गए| हिंदू रीति के हिसाब से छठी का कार्यक्रम किया गया| बुआ के द्वारा खरीद्वाए गए कपडे पहनाए गए| शाम को महिला संगीत हुआ|

अब मुझे नन्हे शिशु आदि के साथ एक रात बिता कर दिल्ली वापस लौटना था|

लड़की का घर

अभी हाल में पत्नी जी के साथ उनकी माँ के घर जाने
का मौका मिला| उनका वहाँ पर बेसब्री से इन्तजार हो रहा था| वैसे भी भारतीय
मानसिकता में विवाहित पुत्री बेहद लाडली, प्यारी, स्वागतयोग्य और इष्ट देवी सदृश्य
होती है| जैसे ही हमने घर में प्रवेश किया, पड़ोस से कोई चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी आ
पहुँची; पूछने लगी “ससुराल से आ गईं बिटिया?” पत्नी जी ने हाँ में जबाब दिया पर
मैंने विरोध किया;”ससुराल तो अलीगढ में है ये तो दिल्ली से आयीं है”| इसपर वह
चाची-ताई-बुआ-मामी-मौसी कहने लगीं, “ चलो ठीक है, पति के घर से सही, बेटा अब आराम
कर लो, मायका मायका होता है, मायके जैसा सुख कहीं नहीं”| मैं सोचने लगा, मेरी
बेचारी पत्नी जी का घर कहाँ है? उनके पास, माँ, पति और सास का घर है, अपना नहीं|

क्या भारतीय स्त्री को घर का कोई सुख है या सब
जगह से वह बाहर है|

एक बात और; माँ और सास के पास घर है, नव-विवाहिता
बेचारी… बच्चों की शादी तक.. बेघर हैं|

क्यों?

क्यों??

क्यो???

तब क्या जब एक नौकरी पेशा नव-विवाहिता महानगर में
पति के साथ रहती है और किराए में उसकी आधी भागीदारी है?

क्या इसके लिए क़ानून लाना होगा? क्या इसके लिए
सरकार दोषी है? क्या इसके लिए लड़की दोषी है? क्या पडोसी दोषी है? क्या सास ससुर
दोषी है? क्या माँ-बाप दोषी है? क्या समाज दोषी है?

माँ बाप अपने घर को लड़की का मायका बता कर अपने घर
को बेटे के लिए बचा लेते है|

सास-ससुर अपने घर को इस बाहरी औरत से तब तक के
लिए बचा लेते है, जब तक वो इस घर में पुरानी, विश्वस्त, अपनी और अभिन्न न हो जाए|

मायके और ससुराल से दूर रोजी रोटी की जिद-ओ-जहद वाले
रैन-बसेरे को कोई भी स्वीकारने नहीं देता|

क्या करे?

कोई तो जबाब दे??

कोई तो जिम्मा ले???

दंगानामा

भैया रे, अब तो सुना है कि विलायत के लन्दन शहर में भी दंगा हो गया| चलो जी अब हमारा अलीगढ और लन्दन भाई भाई हो गए इस नाते| चलो पहले अपने दर्द दिखा कर मन हल्का कर ले फिर लन्दन देखेंगे|

बचपन में अगर कोई पूछता कि तुम्हारे अलीगढ में दंगा क्यों होता है, तो मन करता कि पूंछू कि तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों होता है| अगर हम किसी नाते रिश्तेदारी में जाते और बच्चों का हुडदंग होता तो नाक चढ़ा कर कोई न कोई जनानी बोलती, अलीगढ वाले आये है; सबको पता चल रहा है| एटा वाली मौसी के पडोसी बोलते भाई, हमारे यहाँ भी तो मुसलमां उतने ही है जितने अलीगढ़ में; मगर हमारे यहाँ तो दंगा नहीं होता| अब भाई दंगा करने के लिए भी ज़िगर चाहिए होता है, कारण ढूँढना पड़ता है, तमाम बातें होती है| फिर चुनाव वगैरह के समीकरण भी देखने होते है| ऐसा थोड़े है कि मन आया और; अइयो रे और दइयो रे; शुरू धूम-धडाका, फटे पटाखा|

बारह तेरह साल पहले के दंगे को लें, क्या बात थी क्या नजारा था| मैं धर्मसमाज कालिज में पढ़ता था, सकूं भर बसंत बहारी दिन थे| सुबह पढ़ने निकले और अचलताल होकर क्लास रूम पहुँच गए| अभी दस मिनट हुए थे कि बूढ़ा चपरासी भागता आया, प्रिंसिपल साब ने बोला है दंगा हो गया है, पढ़ाई बंद करो, बच्चन को घर भेज दो| अब हमारा सनकी प्रोफेसर, बोला कब हुआ दंगा, अभी दस मिनिट पहले तो घर से आ रहा हूँ, कहीं कोई चर्चा तक नहीं थी| ये साला बूढ़ा सनक गया है| चपरासी अपना सा मुहँ और फटा कलेजा लेकर चला गया| पीछे पीछे लिखित फरमान आ पहुँचा| पता लगा कि आधा घंटा पहले बाहर अचल पर दंगा हुआ है, सराय सुल्तानी पर आगजनी भी हो गयी है| अब मैं सोचूँ, भाई आधा घंटा पहले दंगा हुआ, पन्द्रह मिनिट पहले मैं ठीक अचल पर था, दस मिनिट पहले आगजनी भी हो गयी| चलो खैर, कुछ सोचते विचारते घर को निकल गया| रस्ते में हर किसी को घर लोटने की जल्दी थी, एक दुसरे कि चिंता थी| हिन्दू इलाके के लोग मुसलमान को देख कर जल्दी घर जाने कि सलाह दे रहे थे तो एक नातेरिश्ते ले दुश्मनों से बचकर चलने की सलाह भी मुफ्त दे रहे थे| इन मौको पर रंजिश निकालने का खूब मौक़ा रहता है| घर मेरा लाइन पार दस मिनिट दूर था| बे मौक़ा घर पर देखकर माँ को गुस्सा आया जब बताया कि दंगा है तो उनकी चिंता बढ़ गयी| बोली दौड़ कर बहन को देख ला वो तो कलिज से नहीं लोटी, तब तक मैं सामान कि लिस्ट बना देती हूँ, बाजार से ले आना| मैं उलटे पाँव लौट लिया वापस कॉलिज पहुँचा| वहाँ पर चपरासी ने बोला सब लड़कियों को पिछले दरवाजे से लाइन पार करा दिया है अब तक तो लली घर पहुँच गयी होगीं| लौटे तो रास्ते में फ्लैग मार्च शुरू हो चुका था| आगे आगे एक जीप में कर्फू का एलान हो रहा था और जनता से जल्द घर पहुँच जाने की अपील थी| जनता सुन नहीं रही थी, सबको गल्ला राशन जो खरीदना था| पीछे पुलिस की खाली गाड़ियां थीं और उनके पीछे डरे सिमटे पैदल सिपाही| अलीगढ  पुलिस के इस साहसिक शक्ति प्रदर्शन पर मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी| आखिर ये पुलिस वाले भी तो इंसान ही तो  है| जब घर पंहुचा तब तक बहन घर पर पहुँच गया| तभी माँ ने आकार सामान की लिस्ट पकड़ा दी| अनुभव बताता है कि अगर घर में सामान नहीं रहा तो दंगे बहुत भारी पड़ सकते है| अगर आपके घर में पूरी रसद है तो आप सुरक्षित है|

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि अलीगढ़ में दंगा हुआ है, मुझे लगता था कि कोई सरकारी मजाक है| मगर शाम को आकाशवाणी, दूरदर्शन और बीबीसी ने भी दंगो की पुष्टी कर दी थी| विदेश के किसी अखबार में लिखा गया कि भारत की राजधानी की नाक के ठीक नीचे गृहयुद्ध की स्थिति बन रही है| खैर, अब यह टीवी पर सिनेमा देखने, सड़क पर क्रिकेट खेलने और मन करने पर पढाई करने का दिन था| इस समय दुनिया की कोई भी ताकत अलीगढ़ में बिजली काटने का आदेश नहीं दे सकती थी| पानी नल से खत्म नहीं होता था| जिन इलाको में पूरा कर्फू था वहाँ पर जरूर बच्चे चोर सिपाही या आई स्पाई का खेल रहे थे जिसमे गलियों में उंघते पुलिसिये वास्तविक सिपाही थे|

 

एक और दंगे की याद है| मैं एक चार्टर्ड अकाउन्टेंट फर्म के साथ काम कर रहा था| हम अपने जिस क्लाइंट के दफ्तर में थे वो मुस्लिम थे और एक को छोड़ कर उनके सारे मुलाजिम भी| दंगे की खबर आते ही उनका हुक्म आया की पास की दूकान से समौसे मांगा कर हम लोग खा पी लें| जैसे पुलिस की गाड़ी आती है वह हमें खुद हमारे मुहल्लों तक छोड़ देंगे| हमारा एक ट्रेनी अलीगढ़ के बाहर का था, बोला कहीं मुसल्ला मार तो नहीं देगा| मैंने कहा, घर बुलाएं मेहमान को कौन मारता है| खैर, जब पुलिस की गाड़ी आयी हम क्लाइंट की गाडी में थे और पुलिस की गाड़ी हमारे आगे आगे| आखिर वो हमें पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ सकते थे, क्या पता नेताओं के क्या आदेश हों|

इस तरह अलीगढ़ के दंगे कुछेक मौतों के अलावा आराम से बीत जाते है| मगर देश भर नफरत का गंदा जलील खेल और बढ़ जाता है| लोग अपनी आपसी रंजिश निपटा लेते है, और मरने वाले के घरवाले मुआवजे के लालच में चुप भी रहते है और अगले दंगे का इन्तजार करते है|

अलीगढ़ का आखिरी बुरा दंगा १९९२ वाला था|

(सभी विचार मेरी निजी समझ पर आधारित है, राजनितिक, सरकारी और अन्य निजी विचारों से कतई मेल नहीं खाते|)