विश्व-बंदी १२ अप्रैल


उपशीर्षक – संशय और भूकम्प 

शुरूआती गर्मियों उदास छुट्टियाँ का रविवार बचपन में बड़ा भारी पड़ता था| रसोई पर कुछ खास करने का दबाव रहता तो अनुभव बदलते मौसम में गरिष्ट से बचने की सलाह देता| पंद्रह दिन में किस्से कहानी, किताबें, पतंगे, पतझड़ और खडूस हवाएं नीरस हो चुके होते – ककड़ी, खरबूजा, तरबूजा, खीरा, शर्बतों, और कचूमारों का सहारा भी कोई बहुत दिन तक आकर्षित नहीं कर पाता| दिल के राजा आम अभी बहुत दूर हैं| यहाँ तक आम पना भी अभी उपलब्ध नहीं दिखता|

लॉक डाउन में सबसे बड़ी बात यह कि घर में कोई सहायक नहीं, साफ़ सफाई, रसोई बाजार सब घर के लोगों को ही करने हैं साथ में अपने अपने दफ्तरों के काम भी करने हैं| टेलीविजन की आवाज कम करने के लिए कहने का खतरा भी गंभीर है – आखिर बच्चे क्या करें?

मित्रों के साथ दिन में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए गए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च न मानने की केंद्र सरकारी घोषणा पर चर्चा हुई| हम सब स्वयं-इच्छा योगदान को जबरन सरकारी कर बनाये जाने के सरकारी क़ानून से दुःख महसूस करते रहे हैं, इस बुरे दौर में सरकारी अहम् बेहद चिंता का विषय है| आम राय यह रही कि सरकार को इस बुरे दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च मान लेना चाहिए था – कम से कम कुछ समय के लिए|

सुबह पंजाब में निहंग सिखों के समूह द्वारा पुलिस अधिकारी के हाथ काटने की घटना से बेहद अधिक दुःख हुआ| मुझे यह भारत के विरुद्ध और उससे अधिक मानवता के विरुद्ध युद्ध की घोषणा जैसा लगा| कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सिख देश को डुबो देंगे|

दिन घटना विहीन जा रहा था तभी मोबाइल हाथ से गिरा और आधी स्क्रीन चकनाचूर – काँच की एक छोटी किरच अंगूठे में लग गई| निकालने के देशी नुस्खे अजमाकर चुके ही थे कि मुआ भूकम्प आ धमका| बैठे ठाले यह भूकम्प मुझे ६ से ज्यादा का लगा और यह मानकर कि पहाड़ों या विदेश में केंद्र होगा मुझे ८-९ की आशंका हुई| भला भगवान् का, ३.१ का भूकम्प बताया जा रहा है| उसके बाद भयभीत दिल्ली का दिल बैठा हुआ लग रहा है| वैसे भी दिल्ली के दिल वाले इश्क, कबाब, शराब, शबाब, चाट पकौड़ी बिरयानी के अलावा डरपोक ही होते हैं|

भूकम्प के चलते कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से बात हुई|

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विश्व-बंदी ११ अप्रैल


उपशीर्षक –  कॉर्पोरेट असामाजिक गैरजिम्मेदारी 

मुझ से पिछले एक महीने में पूछे गए करोना सम्बन्धी जिस प्रश्न ने सबसे अधिक कष्ट दिया वह कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी पर पूछा गया बेहद गैर-जिम्मेदार प्रश्न था:

“क्या कंपनी द्वारा अपने कार्यालय में रखे गए और अपने कर्मचारियों को घर में प्रयोग कराए गए साबुन, हैण्डवाश आदि के खर्च को कंपनी कानून के तहत माना जाएगा?”

मेरा उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक रहा है|

यहाँ तक कि इस प्रकार के प्रश्न सरकार तक पहुँचे| आज सरकार ने कल जनरल सर्कुलर जारी कर देने योग्य उत्तर दिए हैं| सरकार ने सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों के उत्तरों में उत्तर संख्या ५ में लिखा:

Payment of salary/ wages to employees and workers during the lockdown period (including imposition of other social distancing requirements) shall not qualify as admissible CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि में दिए गए कर्मचारियों और मजदूरों के वेतन या मजदूरी, (और सामाजिक दूरी नियमों के पालन में लिए गए खर्च) कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

उत्तर संख्या ६ में लिखा:

Payment of wages to temporary or casual or daily wage workers during the lockdown period shall not count towards CSR expenditure.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों की मजदूरी के खर्च कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नहीं माने जायेंगे| (भावानुवाद)

सरकार ने बहुत ही उचित रूप से उत्तर संख्या ७ में लिखा:

If any ex-gratia payment is made to temporary / casual workers/ daily wage workers over and above the disbursement of wages, specifically for the purpose of fighting COVID 19, the same shall be admissible towards CSR expenditure as a onetime exception provided there is an explicit declaration to that effect by the Board of the company, which is duly certified by the statutory auditor.

लॉक डाउन समयावधि अस्थाई, अल्पावधि और दैनिक मजदूरों को मजदूरी के अतिरिक्त दी गई कोई भी सहायता के खर्च केवल इस बार एक बार के लिए कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी माने जायेंगे| (भावानुवाद)

मैं सरकार से इस से अधिक स्पष्टीकरण की आशा नहीं करता| कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मदारी का स्थापित नियम है कि ऐसा कोई भी खर्च जो एक व्यवसाय के सामान्य आवश्यकता का भाग हो या जो अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों को लाभ पहुँचाने के लिए हो, वह सामाजिक जिम्मदारी की सीमा को छूता भी नहीं है|

दुर्भाग्यपूर्ण प्रश्न का मामला यहीं रुक जाता तो ठीक होता, मगर कल तुरंत ही एक सवाल प्राप्त हुआ कि क्या कंपनी उत्तर संख्या ४ का लाभ लेकर उपरोक्त खर्च को सामाजिक जिम्मदारी का खर्च बता सकती है? जब तक आप कंपनी के और अंशधारकों, अधिकारीयों, कर्मचारियों और मजदूरों के इतर समाज के लिए कुछ नहीं करते अपनी सामाजिक जिम्मदारी को पूरा नहीं करते|

मुझे याद आता है जब कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के प्रावधानों पर शुरूआती चर्चा हो रही थी तो एक बड़ी कंपनी की और से कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदरी की दर के दो प्रतिशत होने को बहुत ही अधिक बताया गया था| उस समय उका ध्यान इस बात पर दिलाया गया कि इस्लाम हर व्यक्ति से शुद्ध आय के ढाई प्रतिशत सामाजिक जिम्मेदारी पर खर्च करते की प्रेरणा देता है| कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारी निर्वाहन के लिए इस दर को ध्यान में रखकर प्रेरणा ले सकतीं है| हिन्दू धर्म भी दान की बात करता है|

जिस समय मैं उपरोक्त प्रश्न से दुःख का अनुभव कर रहा था, मुझे बीबीसी की एक रिपोर्ट पाकिस्तान के बारे में देखने को मिली| पाकिस्तानी लॉक डाउन के समय में जगह जगह खाना, पैसा और अन्य सामिग्री बाँट रहे हैं| कुछ भारतीय खासकर सिख भी ऐसा कर रहे हैं, परन्तु इस तरह के मामलों में पाकिस्तानी भारतीयों से आगे बताये गए हैं| बीबीसी रिपोर्ट स्टेनफ़ोर्ड सोशल इनोवेशन रिव्यु के हवाले से कहती है कि ९८% पाकिस्तानी सामाजिक कार्यों के लिए ज़कात करते हैं, और इस तरह वह पाकिस्तान के जीडीपी के १% से अधिक के बराबर की रकम सामाजिक ज़िम्मेदारी ओअर खर्च करते हैं| यह पढ़ते हुए मुझे शर्मिंदा महसूस करना पड़ा कि भारतियों द्वारा सामाजिक ज़िम्मेदारी पर अपने जीडीपी का आधा प्रतिशत भी खर्च नहीं किया जाता|

मुझे यह महसूस करते हुए दुःख होता है कि भारतीय कंपनियां अपने अंशधारकों, कर्मचारियों और अधिकारियों आदि पर खर्च को सामाजिक जिम्मेदारी दिखाना चाहतीं हैं और भारतीय अपने मित्रों और रिश्तेदारों पर हुए खर्च को|

यह एक ऐसा विषय है जहाँ मेरे भारतीय अहम् को ठेस लगी है और सामाजिक जिम्मदारी के विषय पर मैं अपने देश और देशवासियों को उनसे आगे देखना चाहता हूँ|

कृपया, किसी गैर सरकारी संगठन को रकम देकर उससे अस्सी प्रतिशत वापिस लेने वाले नीचता पूर्ण विचार को न दोहराएँ| मुझे छोड़िये भारत सरकार भी इस से बहुत दुःख महसूस कर रही है| जल्दी ही कानून आपके नकेल डालेगा|

पुनश्च: – यहाँ यह स्पष्ट करता चलूँ चलूँ कि मैं सरकार द्वारा मुख्यमंत्री सहायता कोष में दी गई राशि को सामाजिक जिम्मेदारी निर्वहन न मानने को उचित नहीं मानता रहा हूँ परन्तु यह पुरानी नीति है और इसके सन्दर्भ में निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार स्वतंत्र भी है|

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विश्व-बंदी १० अप्रैल


उपशीर्षक – स्व-मुंडन 

अगर लॉक डाउन नहीं होता तो अपने शहर अलीगढ़ पहुँचे होते| शिब्बो की कचौड़ी, जलेबी हो चुकी होती और चीले का भी आनंद लेने का प्रयास चल रहा होता| शायद अपने किस्म की कुछ खरीददारी जो दिल्ली में अक्सर संभव नहीं होती, उसे अंजाम दिया गया होता| इस से अधिक यह भी कि मिलने जुलने के भूले बिसरे कुछ पुराने वादे निभाने की जुगत की जाती या फिर उन्हें अंजाम न दे पाने के कारण नई शिकायतें पैदा होतीं| पुराना घर दो चार दिन के लिए गुलजार होता, खुश होता और कहता – आते रहा करो बेटा| मैं पुराने घर की ऊँगली पकड़ कर दो रात सोता| पति पत्नी दिल्ली छोड़ कर अलीगढ़ या किसी और छोटे मझौले शहर लौट जाने के अपने पुराने संकल्प पर कुछ चर्चा करते| पुराने दिन एक बार फिर से बिसरा दिए जाते|

जनता कर्फ्यू वाले रोज बाल कटवाने जाने का इरादा था| कुछ इच्छा नहीं हुई फिर हिम्मत| बाल बहुत बढ़ गए थे| कुछ दिन पहले संदीप पारीख ने ट्विटर पर लिखा था कि उन्होंने इलेक्ट्रिक रेज़र के ट्रिमर का प्रयोग कर कर बाल काटें हैं| आज उनका अनुभव प्रयोग में  लाया गया| स्वयं बाल काटे गए| थोड़ी सहायता बेटे से लेनी पड़ी| बदले में उसका कटोरा कट करना पड़ा| कौन बाप बेटे का कटोरा कट करता कराता है? बात यह भी है कि उसके विद्यालय में कटोरा कट की अनुमति नहीं है तो जल्दी ही उसको सादा कटिंग करवानी पड़ेगी| कुछ दिन खुश रहेगा| पिताजी ने भी अपनी कटिंग का आग्रह किया है|

देवदत्त पटनायक की मेरी गीता आज समाप्त हो गई| यह मेरे लिए पहली ऑडियो बुक थी| यह अनुभव अच्छा रहा| झाडू पौछा और टहलते समय इसे सुना गया| ज्ञान और समझ में वृद्धि महसूस हुई| दूसरी ऑडियोबुक खरीद ली गई| इन दिनों में सुनने सुनाने का काम बढ़िया चल रहा है| परन्तु जो काम होने से रह गए हैं उनकी बड़ी चिंता हो रही है| दिल भी तो ठीक से काम करने में नहीं लगता|

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