विश्व-बंदी ९ अप्रैल


उपशीर्षक – कार्य असंतुलन 

आजकल पता नहीं लग रहा कि कौन सा दिन कार्यदिवस है और कौन सा छूट्टी| दीर्घ सप्ताहान्त जैसे शब्द बेमानी हो चले हैं| घर से कार्य की अवधारणा में भी गजब की गड़बड़ हो रही है| घर से काम करने की छुट्टी या घर से काम की छुट्टी या घर का काम करने की छुट्टी जैसे शब्द चर्चा का विषय हैं| वैसे हर कोई अपनी सुविधा के साथ काम कर रहा है इसलिए इन छुट्टी का खास महत्त्व महसूस नहीं किया जा रहा| कोई सार्वजानिक त्यौहार नहीं मनाया जा रहा| कठिनाइयाँ तो काम करने में आ रहीं हैं|

इधर जिन घरों में ले दे कर एक ही कंप्यूटर या लैपटॉप है वहाँ पारिवारिक सामंजस्य कठिनतर हो गया होगा है| मेरे घर में दो लैपटॉप के बाद भी सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा| मेरे लैपटॉप पर मेरा एकछत्र राज्य है| दूसरे लैपटॉप को पत्नी को अपने दफ़्तर के कामकाज और बेटे को अपनी पढाई के लिए लैपटॉप चाहिए| एक पारिवारिक मित्र के घर में सुबह आठ से दोपहर बारह बजे तक बच्चों को और उसके बाद बारी बारी से पति पत्नी को घर का एकमात्र लैपटॉप प्रयोग करना पड़ रहा है| आप बच्चे को पढ़ने से रोक नहीं सकते और पति-पत्नी दोनों काम ही नहीं कर पा रहे| फर्ज़ कीजिए घर में दो या तीन बच्चे हैं तो घर का माहौल इतना ख़राब है कि नरक को अच्छा बताया जा रहा है| जिन घरों में कार्यालय जाने वाले तीन चार लोग हैं वहाँ के हालात देखकर इतने ख़राब हैं कि सुबह दूरदर्शन पर रामायण देखते समय घर में महाभारत हो जाती है और शाम को महाभारत के समय तक पति देव राम बनकर पत्नी त्याग तक की बात करने लगते हैं|

शाम तक सरकार ने घुमावदार शब्दों में मान लिया कि चिकित्सकीय खासकर सुरक्षा उपकरणों की कमी है| सरकार को लगता है कि जल्दी ही दवाएं और उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होंगे| हकीकत यह है कि भारत में पर्याप्त संख्या में रोग की जाँच भी नहीं हो पा रही है| अस्पताल बीमारों को दाखिल करने से मना कर रहे हैं| कई मामलों में बीमार सामाजिक बहिष्कार के भय से अस्पताल नहीं जा रहे, जो जा रहे हैं वो भाग रहे हैं यहाँ तक कि बीमारी के भय से आत्महत्या भी कर रहे हैं| कई शहरों में अल्पसंख्यक, अनुसूचित जातियों और महिलाओं की मृत्यु दर में अकारण वृद्धि दर्ज करने की खबरें है| इंदौर में मुस्लिम समुदाय में मृत्यु दर बढ़ने की खबर अखबारों में छपी है|

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विश्व-बंदी ८ अप्रैल


उपशीर्षक – अर्धस्नान की पुनः स्मरण 

अपनी किशोर अवस्था में मुझे बार बार हाथ धोने की आदत थी| पूजा करने, योग ध्यान करने, खाने पीने, पढ़ने बैठने, घुमने जाने आने से लेकर सोने से पहले भी हाथ मुँह धोता था| मेरे एक मित्र थे जिनको कार्यालय में हर आधा घंटे बाद उठकर हाथ धोने की सनक थी| उनके हाथ धोकर आने के बाद झागों से भरा वाश-बेसिन एक सामान्य बात थी| बाद में मैंने अपनी आदत को थोड़ा सुधार लिया यानि कमी की| पिछले कई दिनों में बचपन की अपनी आदत को मैंने वापिस पाने का उपक्रम किया है| फिलहाल दिन में तीन बार मुँह और चार बार पैर भी धोये जा रहे हैं|

स्वास्थ्य के सन्दर्भ में चल रही सब चर्चाओं में पैर धोने के ऊपर कोई खास बात नहीं हो रही| परन्तु भारत में दिशा-मैदान, घुमने फिरने, दफ्तर बाजार, शमशान, कब्रिस्तान, मित्र सम्बन्धी कहीं से भी आने के तुरंत बाद पैर धोने की परंपरा रही है| रीति रिवाज़ों में आने पर सम्मान देने के लिए पैर धोने का जिक्र आता है| केवट द्वारा सीता राम के और कृष्ण द्वारा सुदामा के पैर धोने के प्रसंग भारत में कौन नहीं सुनता| मगर सुनने के बाद भी हम पैर धोने को नहीं जानते इसलिए शायद अपनाने पर कोई बात नहीं हो रही| अस्पतालों में जूते के गिलाफ़ (shoe cover) पैर धोने से बचने का ही आधा अधुरा विकल्प है|

सामान्य रूप से भी पैर धोने के लिए पानी उड़ेल लेना पर्याप्त नहीं है| मैं अक्सर शेम्पू (जैसा के पार्लर में सुझाया गया था) या कपड़े धोने के साबुन (जैसा की कस्बाई तरीका है) का प्रयोग करता हूँ| अगर लम्बी यात्रा, कटी-फटी बिबाई यानि एड़ियाँ है तो उबले पानी में हल्दी या नीम का प्रयोग हो सकता है| हल्दी के पानी से पैर धोना सांस्कृतिक परंपरा है जिसे विवाह आदि के समय आज भी अपनाया जाता है| अगर आप अंतिम क्रिया, चिकित्सालय असुरक्षित स्थान से आ रहे हैं तो गृह द्वार पर ही हाथ मुँह पैर धोने का पुराना विधान रहा है जिसे मुझे स्वयं भी पुनः अपनाना है| अगर द्वार पर ही गुसल लगाना संभव रहे तो मन बुद्धि की प्रेरणा से नहा लेना उचित है|

आज सब्ज़ी और गल्ला सब आ गया| दिन लॉक डाउन बढ़ने की अटकल लगाने में बीत गया|

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विश्व-बंदी ७ अप्रैल


उपशीर्षक – आराम की थकान 

लॉक डाउन को बढ़ाये जाने की इच्छा, आशा, आशंका और समर्थन की मिली जुली भावना के साथ मुझे यह भी कहना चाहिए कि मैं इस से थकान भी महसूस कर रहा हूँ| साधारण परिस्तिथि में कई बार ऐसा हुआ है कि मैं महीनों घर से नहीं निकल सका हूँ| परन्तु जब आप मर्जी के मालिक हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं| मुझे मालूम है कि लॉक डाउन के हटने के महीने दो महीने बाद भी शायद मैं आसानी से घर से न निकलूँ| परन्तु छोटी छोटी इच्छाएं होती रहती है| ऐसा नहीं कि मैं इन कामों के लिए जा नहीं सकता परन्तु लॉक डाउन के साथ आत्म नियंत्रण भी है| कई दिन से ब्रेड कटलेट खाने की इच्छा बलबती हो रही है| इन्द्रिय निग्रह के समस्त प्रयास भोजन पर ही सबसे पहले अटकते हैं| जिव्हा की वासना प्रबल होती है| अस्वादी और स्वाद रसिक होने का मेरा प्रयास तो सदा सफल है| अल्पआहारी होने के प्रयास में भी लगातार सफलता रही है| आज कांदे की सब्ज़ी बनाई खाई| अरहर की दाल तो पत्नी को मेरे हाथ की ही पसंद है| मजे की बात यह है कि साधारण चावल बनाना आज भी मुझे कठिन लगता है|

दो दिन से फल सब्ज़ी वालों की अचानक कमी हो गई है| अगर कल कोई ठेलेवाला नहीं आया तो फिर खुद जाकर सामान देखना पड़ेगा| दिन भर बार बार घर के आगे की सड़क और पीछे की गली में झाँकते बीत जाता है| कुछ तो दिखाई दे कोई तो कहानी हो कोई तो कहासुनी करे कुछ तो दिल लगे|

सड़क पर सूखे पत्ते बिखरे पड़े हैं| आज दो दिन बाद झाड़ू लगी मगर कुछ पल में ही सड़क पुनः पत्तों से भर गई| कड़ कड़ खड़ खड़ की आवाज करते हुए ये सूखे पत्ते जब हवा में नाचते गाते नीचे उतरते हैं तो दिल में संगीत उतरता है| जमीन पर बिछे हुए सूखे पत्तों पर चलना और उनकी आवाज सुनने में अपना अलग आनंद है| यह आनंद हमने अपने आप से छीन रखा है|

कल की गर्मी के बाद आज ठंडी हवा है| आसमान में बादल हैं| मौसम को भी अपनी जिन्दगी का कुछ पता नहीं| कब क्या क्या बदल जाए, क्या पता| दो महीने में दुनिया बदल गई| इंसान बदल गए|

मगर क्या वाकई हम बदल जायेंगे? लगता तो नहीं|

 

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