“न्याय” का ललित निबंध


अधिकतर अदालती आदेश उतने ही धीर गंभीर उदासीन अलिप्त होते हैं जितने “बेयरफुट इन एथेंस” नाटक में सुकरात की भूमिका करते हुए सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ के हावभाव| दिलचस्प बात यह है की अतिगंभीर मुद्दों पर हमारे न्यायधीश साहित्य, संस्कृति, श्रुति और शायरी की बातें करते हैं, कदाचित इससे पाठक को उबासी न आये | अधिकतर आदेश दोनों पक्षों द्वारा रखे न्यायालय के समक्ष रखे गए तथ्यों और दलीलों से शुरू होते हुए कानून की बारीकियों में उलझते – सुलझते न्यायिक आभा की संरचना करते हुए न्याय तक जाते हैं| ज़मानत संबंधी आदेश आरोपों की गंभीरता और आरोपी के जाँच में सहयोग आदि की बात करते हैं|

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष पर लगे देशद्रोह के आरोपों और गिरफ़्तारी के बाद दिल्ली उच्चन्यायालय ने ज़मानत की अर्जी पर अपना फैसला २ मार्च २०१६ को सुनाया|

मैंने अदालती आदेशों को अंत से प्रारंभ और प्रारंभ से अंत तक पढ़ना सीखा है| इस आदेश में कहा गया है आदेश में दिए गए दृष्टान्त (Obesrvations) केवल ज़मानत पर सुनवाईं के लिए हैं, उन्हें तथ्यता (Merit) के रूप में नहीं माना जा सकता| क्योकिं तथ्यों की तथ्यता की पुष्टि होनी है, उनपर विचार करना हमारे लिए भी उचित नहीं होगा|

इस आदेश के प्रारंभ में दिया गया राष्ट्रप्रेम का गीत कई प्रश्न करता है? क्या उसका जमानत की अर्जी के सम्बन्ध में कोई विचारात्मक महत्त्व है? परन्तु, यह किसी विमर्श के प्रसंग में नहीं आया है और पूर्णतः स्वतंत्र अस्तित्व रखता है| भावनात्मक रूप से कठिन निर्णय की पुष्टि करता है| यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह गैर जमानती और भावनात्मक रूप से सशक्त आरोप का मामला है| न्यायाधीश ने स्वीकार है कि वह खुद को चौराहे पर खड़ा महसूस कर रहीं हैं|

इस आदेश में की कई बातों की न्यायविदों द्वारा आलोचना हो रही है| कुछ लोगों को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि न्यायाधीश भावनात्मक और न्यायात्मक दबाब के बीच न्याय के साथ जाते जाते पूरी तरह संयत नहीं हो पायीं है| भावनात्मक प्रवाह निर्णय में झलकता है जब न्यायाधीश अपराध के होने या न होने से इतर भारतीय सेनिकों और उनके परिवार की भावना की बात करतीं है|

ज़मानत देते समय मौलिक अधिकारों पर बात करते हुए मौलिक नागरिक कर्तव्यों की बात, अतिरिक्त उपदेश की तरह आती है| जिसे किसी आरोपी को नहीं बल्कि अपराधी को दिया जाना चाहिए था| किसी आरोपी के साथ अपराध सिद्ध होने तक अपराधी जैसा बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए| विश्वविद्यालय से सही मार्ग दिखाने का आग्रह न्यायायिक मामले से बहुत दूर निकल जाता है|

निर्णय अचानक बहुत कटु हो जाता है जब माननीय न्यायाधीश गंगरीन के लिए अंगविच्छेद की बात करतीं हैं| निर्णय अचानक अपराध की पुष्ट परिकल्पना की ओर मुड़ जाता है| भावनात्मक और न्यायात्मक विरोधाभास के चलते सुधार के पुराने पश्चाताप वाले तरीके की बात होती है|

अपराध की मजबूत परिकल्पना के साथ ज़मानत की मंजूरी बहुत सारे प्रश्न और उत्तर खड़े करती है|

अंतरिम ज़मानत दी जाती है|

यह आदेश न्यायालय के मानवीय भावना से परे न होने की पुष्टि करता है| यह निर्णय न्यायधीश के भावनात्मक और न्यायात्मक आन्तरिक विमर्श, निर्णयात्मक विरोधाभास, अतिवादी न्याय और उग्रराष्ट्रवाद के सामायिक दबाब के रूप में देखा जा सकता है| इस आदेश की अंतरात्मा में न्याय के आन्तरिक विमर्श का ललित निबंध है|

कन्हैया कुमार के बहाने


सत्ता को दी जाने वाली सशक्त चुनौती सबसे पहले अशक्त प्रभावहीन विपक्ष को पदच्युत करती है|

विपक्ष का अप्रासंगिक होना ही सत्ता के लिए नवीन चुनौती को बीज देता है| जब निरंकुश सत्ता जन साधारण के आखेट पर निकलती है, चुनौती का जन्म होता है|

दिल्ली में अन्ना आन्दोलन ने विपक्ष के शून्य को भरते हुए ही सत्ता की और कदम बढ़ाये थे| मोदी लहर ने भी केन्द्रीय विपक्ष के शून्य को भरा था| सत्ता की नवीन चुनौती के प्रति उदासीनता, चुनौती को नष्ट कर देती है|

आज जिन्हें कन्हैया कुमार में नया नेतृत्व दिख रहा है; उन्हें कन्हैया को परिपक्व होने का मौका देना चाहिए|

कन्हैया का भाषण उन्हें भारत के श्रेष्ठ वक्ताओं में खड़ा करता है, मगर हमने श्रेष्ठ वक्ताओं को वक़्त के साथ बैठते देखा है| उम्मीद बाकी है| प्रकृति का नियम है; संतुलन| हर सत्ता, ताकतवर सत्ता का समानांतर विपक्ष खड़ा होगा, होता रहेगा|

आइये; आजादी…
क्षमा कीजिये.. मुक्ति के गीत गायें….
और उन गीतों को लोरी समझ कर सो जाएँ| जब तक सत्ता हमें झंझोड़ कर पुनः जगाये|

प्रभावहीन भारतीय विपक्ष


नाकारा – 21वीं शताब्दी के भारतीय विपक्ष के लिए यह शब्द सम्मानपूर्वक प्रयोग किया जा सकता है|

24 फरवरी 2016 का दिन संसद में भारतीय विपक्ष द्वारा दिशाहीन, प्रभावहीन, तर्कहीन, विचारहीन, विमर्शहीन, इच्छाशक्तिविहीन, सामंजस्यवादी बहस के लिए याद किया जायेगा| परिश्रम से बचने के लिए तथ्य इकट्ठे नहीं किये गए, तर्कों और तथ्यों में सामंजस्य नहीं बिठाया गया| विपक्ष प्रति – आक्रमण के डर से बहस की आड़ में बहस से ही बचता रहा| विपक्ष के नेता अपनी धारदार – ओजस्विता के अभिमानित मोह में इतना मुग्ध हुए कि उन्होंने अपने तथ्य कौशल, विचार कौशल, वाक् कौशल, नेतृत्व कौशल और राजनीतिक कौशल का परिचय देना भी उचित न समझा|

एक ऐसा समय जब सत्ता जन – विमर्श के भंवर में डोल उठी थी; अपनी जबावदेही के लिए तैयारी कर रही थी, भारतीय विपक्ष जनता को किसी भी प्रकार का नेतृत्व देने की कोशिश करने में भी नाकाम रहा|

भारत में अंतिम मजबूत, मेहनती, विचारवान विपक्ष शायद प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के समय था, जब देश में एक कमज़ोर सत्ता को मजबूत प्रधानमंत्री सम्हाल रहा था और एक प्रभावी विचारवान परिश्रमी विपक्ष भारतीय राजनीति में मजबूत पकड़ बनाये हुए था| स्वाभाविक लोकतान्त्रिक विचारात्मक मतभेद के बाद भी, विपक्ष सत्ता जबाबदेह बनाये रखने में सक्षम था|

प्रधानमंत्री बाजपेयी के समय भारत में कमजोर विपक्ष का दौर शुरू हुआ| मजबूत सत्ता और मजबूत प्रधानमंत्री के सामने विपक्ष फ़ीका लगे यह स्वाभाविक है मगर भारतीय विपक्ष ने कमज़ोर होना स्वयं चुना था| भारतीय विपक्ष उस समय पूरी तरह से व्यक्ति केन्द्रित होकर रह गया और विचार का उसमें कोई स्थान नहीं बचा| साम – दाम सत्ता सुख भारतीय विपक्ष की न सिर्फ लालसा रही विपक्ष में रहकर भी उसने अपने को सत्ता से दूर नहीं किया| निसंदेह, ऐसा करते हुए वह जनता से नहीं जुड़ पाया| सत्ता से दूरी का यह समय अध्ययन, विचार, विमर्श, जन – संपर्क, व्यापक राजनीतिक समझ आदि के लिए नहीं किया गया| विपक्ष संसद में बाजपेयी सरकार को जबाबदेही की चुनौती नहीं दे पाया| इंडिया – शाइनिंग का मतिभ्रम चुनौती – विहीन बाजपेयी सरकार को ले डूबा|

कमज़ोर बूढ़े उच्च नेतृत्व के साथ विपक्ष में आई युवा बहुल भाजपा ने वही गलतियाँ शुरू कीं जो बाजपेयी सरकार के समय में कांग्रेस कर रही थी| उन्हें न सरकार से प्रश्न करने की इच्छा थी न जबाब की उम्मीद| संसद में प्रश्नकाल मजाक के रूप में स्थापित होता गया| बहसें शोर बनकर रह गयीं| सदन से बहिर्गमन विरोध न होकर बहस न कर पाने की कमजोरी का पर्दा बन गया| कांग्रेस और भाजपा विचार, कार्य और शैली में एक दूसरे का प्रतिबिम्ब मात्र बन गए|

प्रथम यूपीए सरकार को विपक्ष ने गैर जबाबदेही प्रदान की वह दूसरे कार्यकाल में निरंकुशता में बदल गई| यह निश्चित था कि यह सरकार अपने गैर जिम्मेदार बोझ के साथ सत्ता ज्यादा दिन नहीं संभाल पायेगी| उस समय में विपक्ष के राजनीतिक शून्य को केंद्र में नरेन्द्र मोदी और राज्य में अरविन्द केजरीवाल ने भरा| विपक्ष में मजबूत केंद्रीय नेतृत्व न होना तत्कालीन भाजपा और वर्तमान में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है|

कम अध्ययन, कम विचार – विश्लेषण, अल्पविचारित त्वरित प्रतिक्रिया, क्षणिक लोकप्रियता लाभ, आदि उस समय से भारतीय विपक्ष के मूल आधार बन गए है| भारतीय विपक्ष का व्यक्तिवादी बिखराब वैचारिक गिरावट का कारण बन रहा है| भारतीय राजनीतिक दलों का यह भ्रम कि जनता भावनात्मक मुद्दों पर मूर्ख बनते रहना पसंद करती है भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक बन कर उभरी है|

यह भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का निराश समय है, जिसके गर्भ से युवा आशाजनक नेतृत्व का जन्म अवश्यंभावी है|