कन्हैया कुमार के बहाने

सत्ता को दी जाने वाली सशक्त चुनौती सबसे पहले अशक्त प्रभावहीन विपक्ष को पदच्युत करती है|

विपक्ष का अप्रासंगिक होना ही सत्ता के लिए नवीन चुनौती को बीज देता है| जब निरंकुश सत्ता जन साधारण के आखेट पर निकलती है, चुनौती का जन्म होता है|

दिल्ली में अन्ना आन्दोलन ने विपक्ष के शून्य को भरते हुए ही सत्ता की और कदम बढ़ाये थे| मोदी लहर ने भी केन्द्रीय विपक्ष के शून्य को भरा था| सत्ता की नवीन चुनौती के प्रति उदासीनता, चुनौती को नष्ट कर देती है|

आज जिन्हें कन्हैया कुमार में नया नेतृत्व दिख रहा है; उन्हें कन्हैया को परिपक्व होने का मौका देना चाहिए|

कन्हैया का भाषण उन्हें भारत के श्रेष्ठ वक्ताओं में खड़ा करता है, मगर हमने श्रेष्ठ वक्ताओं को वक़्त के साथ बैठते देखा है| उम्मीद बाकी है| प्रकृति का नियम है; संतुलन| हर सत्ता, ताकतवर सत्ता का समानांतर विपक्ष खड़ा होगा, होता रहेगा|

आइये; आजादी…
क्षमा कीजिये.. मुक्ति के गीत गायें….
और उन गीतों को लोरी समझ कर सो जाएँ| जब तक सत्ता हमें झंझोड़ कर पुनः जगाये|

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