जयहिंद बनाम…


उन दिनों राम जन्मभूमि आन्दोलन जोरों पर था| जगह जगह कार्यक्रम जयश्रीराम से शुरू होते और जय भारत पर समाप्त होते थे| जयहिन्द सरकारी विद्यालयों का नारा था और नये निजी विद्यालय जयभारत की ओर सरक रहे थे| जयहिंद राष्ट्रभक्त और जयभारत हिन्दूराष्ट्रभक्त होने से जुड़ रहा था; मगर खुल कर कोई सामने नहीं आता था|

प्रायः, जयहिन्द के साथ उद्घोषित किया जाने वाला जयभारत; जयहिंद घोष के प्रति ब्राहमणवादी संस्कृतनिष्ठ पूर्वाग्रह का प्राकट्य है| इसके अतिरिक्त उसकी कोई आवश्यकता नहीं है| कई बार जयहिंद को चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस जैसे समाजवादी विचारधारा वाले क्रांतिकारियों से जुड़ा होने के कारण भी पूंजीपति हिन्दुत्वादी पसंद नहीं करते| वैसे आजकल इतिहास का पुनर्लेखन करते हुए इस क्रांतिकारियों को हिन्दुत्वादियों ने अपना लिया है, परन्तु उनके शिविर में जयभारत जयहिंद के समकक्ष रखने की विवशता हास्यास्पद है|

उन दिनों राष्ट्रवादी लोग क्रिकेट के मैच, राष्ट्रीय उत्सवों और सभाओं में भारत माता की जय का नारा बुलंद करते थे| भारतमाता जनमानस में निराकार, निर्गुण, मातृभूमि का नाममात्र और भावनामात्र थीं और आज भी हैं| जिसका सावरकर के निराकार निर्गुण पितृभूमि से सिद्धांत रूप से विभेद तो है, परन्तु अधिक अंतर नहीं है|

दूसरा तबका हिन्दूराष्ट्रवादी था जो तब तक भारतमाता की जय नहीं बोलता था जब तक अनंतउत्तर के समक्ष सिंहसवारपताकाधारी माता का चित्र सामने न हो| कई बार भ्रम होता कि आजाद हिन्द फ़ौज की भारत माता और हिन्दुराष्ट्रवादी की भारत माता में उतना ही भीषण अंतर है जितना वेदांत की निर्गुण और सगुन शाखा का|

सगुण के श्रृद्धालू प्रतीकों में इतने बंध जाते हैं कि उन्हें निराकार निर्गुण विश्वास प्रायः नास्तिकता या अधर्म के तुल्य लगते हैं; जबकि वह खुद अपने विश्वास की सीमायें जानते हैं|

 आज भारत में “वन्देमातरम कहना होगा” और “भारत माता की जय” करना होगा का वाद विवाद उसी राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रद्रोह के सगुण अंधविश्वास में फंस गया है|

माल्या चले परदेश


माल्या चले गए परदेश| अच्छे समय के राजा; अच्छे समय के आते तक रुक नहीं सके| मैं दुःख नहीं करता| पुरुष – प्रकृति के अपने नियम हैं| पूर्व जन्म – जन्मान्तर के बहुत से पुण्य होंगे; काल के प्रताप से आनंद को प्राप्त किया और भूलोक में इन्द्रासन पर विराजमान हुए| जानते हैं यजमान, अंत में आत्मा ही जायेगी; न ऋण जायेगा, न सम्पत्ति| नश्वर संसार में सब मिथ्या है, मिथ है और मदिरा है|

बैंक माया का मतिभ्रम हैं, संसार चक्र का चक्रव्यूह है| सर्वधर्म विधान है; महाजनी, राहजनी, आगजनी सब धर्मसम्मत नहीं माने गए हैं| बैंक पश्चिमी संस्कृति का दुष्फल है| माल्या ने भारत में इस विधर्मी दुष्ट संस्कृति को क्षीण किया|

प्रेमचंद की कहानी “सवा सेर गेंहू” विप्र कुर्मी किसान को पीढ़ी – दर – पीढ़ी गुलाम बनाता है| आज बैंक किसान को गुलाम बनाता है| किसान जिसका न ब्याज माफ़ होता है न मूलधन; पुलिस के डंडे और अदालत का दंड खाता है| बैंक किसान की हत्या करता है; आत्महत्या करता है; चरित्रहत्या करता है, आत्मविश्वासहत्या करता है, सांस्कृतिक हत्या करता है| माफ़ का कागज आते आते कचहरी जाते जाते तक रोज किसान के जूते और आत्मा घिस जाते हैं, मगर कर्जा नहीं घिसता|

[जिन क्षेत्रों में बैंक नहीं है, वह अपनी गलती से नहीं हैं और किसान की अवैध सूदखोर का शिकार बनने के लिए छोड़ रहीं हैं|]

सबसे बड़ा पूंजीवादी पाप बैंक करते हैं, जब अपने कर्ज के पैसे देश के करोंड़ों किसानों को बांटकर व्यापक जोखिम वितरण नहीं करकर मुट्ठीभर पूंजीपति को सारा कर्ज देता है| किसान की गिरवी का मोल नहीं होता और पूंजीपति की गिरवी का मोल- भाव नहीं होता| जब बैंक गलत तरीके से पैसा देते हैं; तो उन्हें उस पैसे पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए|

माल्या जी कुबेर धर्मभाई हैं, यजमान| कुबेर को देवेन्द्र और माल्या को नरेंद्र का वरदहस्त प्राप्त हो| जितना धन पूंजीपति का माफ़ हो उतना किसान का भी हो जाये|

इति माल्या खण्ड, पूंजीपुराण||

कन्हैया कुमार के बहाने


सत्ता को दी जाने वाली सशक्त चुनौती सबसे पहले अशक्त प्रभावहीन विपक्ष को पदच्युत करती है|

विपक्ष का अप्रासंगिक होना ही सत्ता के लिए नवीन चुनौती को बीज देता है| जब निरंकुश सत्ता जन साधारण के आखेट पर निकलती है, चुनौती का जन्म होता है|

दिल्ली में अन्ना आन्दोलन ने विपक्ष के शून्य को भरते हुए ही सत्ता की और कदम बढ़ाये थे| मोदी लहर ने भी केन्द्रीय विपक्ष के शून्य को भरा था| सत्ता की नवीन चुनौती के प्रति उदासीनता, चुनौती को नष्ट कर देती है|

आज जिन्हें कन्हैया कुमार में नया नेतृत्व दिख रहा है; उन्हें कन्हैया को परिपक्व होने का मौका देना चाहिए|

कन्हैया का भाषण उन्हें भारत के श्रेष्ठ वक्ताओं में खड़ा करता है, मगर हमने श्रेष्ठ वक्ताओं को वक़्त के साथ बैठते देखा है| उम्मीद बाकी है| प्रकृति का नियम है; संतुलन| हर सत्ता, ताकतवर सत्ता का समानांतर विपक्ष खड़ा होगा, होता रहेगा|

आइये; आजादी…
क्षमा कीजिये.. मुक्ति के गीत गायें….
और उन गीतों को लोरी समझ कर सो जाएँ| जब तक सत्ता हमें झंझोड़ कर पुनः जगाये|