माल्या चले परदेश

माल्या चले गए परदेश| अच्छे समय के राजा; अच्छे समय के आते तक रुक नहीं सके| मैं दुःख नहीं करता| पुरुष – प्रकृति के अपने नियम हैं| पूर्व जन्म – जन्मान्तर के बहुत से पुण्य होंगे; काल के प्रताप से आनंद को प्राप्त किया और भूलोक में इन्द्रासन पर विराजमान हुए| जानते हैं यजमान, अंत में आत्मा ही जायेगी; न ऋण जायेगा, न सम्पत्ति| नश्वर संसार में सब मिथ्या है, मिथ है और मदिरा है|

बैंक माया का मतिभ्रम हैं, संसार चक्र का चक्रव्यूह है| सर्वधर्म विधान है; महाजनी, राहजनी, आगजनी सब धर्मसम्मत नहीं माने गए हैं| बैंक पश्चिमी संस्कृति का दुष्फल है| माल्या ने भारत में इस विधर्मी दुष्ट संस्कृति को क्षीण किया|

प्रेमचंद की कहानी “सवा सेर गेंहू” विप्र कुर्मी किसान को पीढ़ी – दर – पीढ़ी गुलाम बनाता है| आज बैंक किसान को गुलाम बनाता है| किसान जिसका न ब्याज माफ़ होता है न मूलधन; पुलिस के डंडे और अदालत का दंड खाता है| बैंक किसान की हत्या करता है; आत्महत्या करता है; चरित्रहत्या करता है, आत्मविश्वासहत्या करता है, सांस्कृतिक हत्या करता है| माफ़ का कागज आते आते कचहरी जाते जाते तक रोज किसान के जूते और आत्मा घिस जाते हैं, मगर कर्जा नहीं घिसता|

[जिन क्षेत्रों में बैंक नहीं है, वह अपनी गलती से नहीं हैं और किसान की अवैध सूदखोर का शिकार बनने के लिए छोड़ रहीं हैं|]

सबसे बड़ा पूंजीवादी पाप बैंक करते हैं, जब अपने कर्ज के पैसे देश के करोंड़ों किसानों को बांटकर व्यापक जोखिम वितरण नहीं करकर मुट्ठीभर पूंजीपति को सारा कर्ज देता है| किसान की गिरवी का मोल नहीं होता और पूंजीपति की गिरवी का मोल- भाव नहीं होता| जब बैंक गलत तरीके से पैसा देते हैं; तो उन्हें उस पैसे पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए|

माल्या जी कुबेर धर्मभाई हैं, यजमान| कुबेर को देवेन्द्र और माल्या को नरेंद्र का वरदहस्त प्राप्त हो| जितना धन पूंजीपति का माफ़ हो उतना किसान का भी हो जाये|

इति माल्या खण्ड, पूंजीपुराण||

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