बेटा मिग उड़ाता था!


 

बेटा मिग उड़ाता था![i]

 

हँसती थी माँ,
गाती थी माँ,
बचपन में जब,
बेटा जहाज उड़ाता था|

 

गाती थी माँ,
गोदी में लेकर,
सपनों की लोरी,
बेटा सोने जाता था|

 

रचती थी माँ,
चौके में जाकर,
भोजन थाली,
बेटा पढ़ने जाता था|

 

डरती थी माँ,
अनहोनी बातों से,
नन्हे हाथों में जब,
बेटा बन्दूक उठता था|

 

उठाती थी माँ,
मिठाई के दौनों से,
आसमां सर पर,
बेटा अव्वल आता था|

 

रोती थी माँ,
भूली बिसरी यादों से,
अनहोनी आहों से,
बेटा चुप करता था|[ii]

 

सुख सांझे थे,
दुःख सांझे थे,
माँ के सपनों के गुल्ले,
बेटा बुनकर लाता था|

 

शिखर कुलश्रेष्ठ  चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

शिखर कुलश्रेष्ठ
चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

मुस्काती थी माँ,
संतोष में पल में,
दिनभर मेहनत की,
बेटा खबर सुनाता था|

 

उड़ती थी माँ,
गाती थी माँ,
बच्ची थी माँ,
बेटा मिग उड़ाता था|

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!


[i] फ्लाइट लेफ्टिनेंट शिखर कुलश्रेष्ठ को समर्पित, जिन्हें सोमवार १५ जुलाई २०१३ को मिग दुर्घटना ने हमसे छीन लिया|

[ii] शिखर में काफी समय पहले अपने पिता को खो दिया था|

इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने – २


आश्रम, ब्रह्मचर्य, गुरुकुल, गन्धर्भ विवाह स्वयंवर, वानप्रस्थ,

भारत का गौरवशाली इतिहास जिन प्राचीन परम्पराओं के कारण विकसित हुआ आज उनका अस्तित्व नहीं बचा है बल्कि उनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है| हजार वर्ष की गुलाम मानसिकता में प्राचीन परंपरा का विरोध भर दिया है| कई बार हम देखते हैं कि लोग उनका कई प्रकार से विरोध करते हैं| मैं उनमे से कुछ प्राचीन बातों का उल्लेख में यहाँ करूँगा|

आश्रम व्यवस्था:

हमारी वैदिक परंपरा में चार आश्रम आते हैं: संन्यास, वानप्रस्थ, गृहस्थ, ब्रह्मचर्य| आज इन आश्रम के बारे में कोई बात नहीं करता| भले ही हम कितने भी धार्मिक होने का दावा करें, दुसरे धर्मों की आलोचना करें| मगर, हम अपने धर्म के मूल सिद्धांतों को कोई समर्थन नहीं देते| हम उन्हें इतना अधिक भुला चुके हैं कि दूसरों को हमारी आलोचना करने की आवश्कता भी नहीं रह गयी है| हास्यास्पद बात यह है कि हम सोच लेते हैं कि शायद उनके मुँह हमारी महानता से बंद है, पर वो जानते हैं प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? अगर हमारे सिद्धांतों और विचारों में कोई बल होता तो क्या हम उन्हें छोड़ते? मगर हमने उन्हें छोड़ा है|

ब्रह्मचर्य:

हमारे देश, समाज और जन जीवन में ब्रह्मचर्य एक अपशब्द बन कर रह गया है| हमारे देश में घर, परिवार, विद्यालय और संचार माध्यमों में इसकी कोई चर्चा नहीं होती| देश में सभी पुरुष पुरुषार्थ की जगह पुरुष-तत्व दिखाने के लिए छोड़ दिए गए हैं| देश में रोज बलात्कार हो रहे हैं और दोषारोपण स्त्रियों, स्त्री-शिक्षा और स्त्री – आजीविका पर हो रहा है| क्या ये स्त्रियाँ जबरन अपना बलात्कार करातीं है? अगर हम एक क्षण के लिए किसी स्त्री को कुचरित्र मान भी लें, तो क्या पुरुष का ब्रह्मचर्य क्षण – भंगुर होना चाहिए?

ब्रहचर्य का इस देश में इतना बुरा हाल है की इसके जबरन भंग करने को विश्व भर के विकसित राष्ट्रों में में बलात्कार माना जाता है, मगर हमारे यहाँ? अरे, जब हम अपना ब्रहचर्य का सिद्धांत ही पश्चिमी देशों को निर्यात करने के बाद ख़त्म कर दिया है तो क्यों ब्रह्मचर्य – भंग को बलात्कार माना जाए? वर्तमान भारत का मध्य – युगीन समाज केवल स्त्री के कौमार्य की मर्यादा पर आकर टिक गया है, जिसे ब्रह्मचर्य से कोई लेना देना नहीं रह गया है|

ब्रह्मचर्य को भूलने के कारण के रूप में कई बार यौन शिक्षा को दोष दिया जाता है जो अनुचित है| मेरे विचार से ठीक प्रकार की यौन शिक्षा का अभाव आज के कई दोषों का कारण है| जिस प्रकार रसायन विज्ञान के कक्षा में घातक अम्लों के बारे में बताया जाता है, उनके प्रयोग के सही तरीके, परिमाण और प्रमाण के साथ सिखाये जाते हैं और उसके दुष्प्रयोग का दुष्परिणाम समझाया जाता है, वही शिक्षा का सही तरीका है| उसी प्रकार समुचित यौन शिक्षा ब्रह्मचर्य का मूल आधार है| नवयुवाओं को अपने अनुभव से सीखने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वह अनुभव हीनता से गलत अनुभव पा सकते है और जीवन नष्ट कर सकते हैं|

गुरुकुल:

गुरुकुल, राज्य और समाज समर्थित शिक्षा संस्थान जहाँ शिक्षा का व्यापार नहीं था, जहाँ बिना जाति, धर्म, मत, सामाजिक स्तर, घर परिवार और माता पिता को देखे सभी के पास शिक्षा के समान अवसर थे| न शुल्क था, न व्यापार, न उत्तीर्ण कर दिए जाने के लज्जाहीन प्रपंच|

घर से ही शिक्षा पहला मूल था| अधिकतर लोग घर या समाज में प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद सीधे ही रोजगार परक ज्ञान को प्रायोगिक रूप से उचित अनुभवी लोगों के साथ सीखते थे| अन्य अकादमिक रूप से मजबूत विद्यार्थी ही गुरुकुल जाते थे| आज देश में स्नातक युवाओं की गिनती तो बढ़ रही है मगर उनका ज्ञान अथवा रोजगार स्तर नहीं| हमें ज्ञान परक और रोजगार परक शिक्षा को अलग अलग रख कर देखना होगा| इस विषय पर लम्बी बात की जा सकती है|

गन्धर्व विवाह और स्वयंवर:

गन्धर्भ विवाह और स्वयंवर का नाम लेने पर ही हमारी नसें फड़कने लगतीं हैं, कौन है जिसने माँ-बाप के बिना मर्जी के विवाह की हिमाकत की| कई – बार तो गन्धर्भ विवाह की प्राचीन परंपरा का पालन करने का प्रयास करने वाले युवा जोड़े की निर्मम हत्या सीना ठोंक कर की जाती है| हमने गन्धर्भ विवाह की गौरवशाली परंपरा को एक घटिया नाम दे दिया है: “घर से भाग कर शादी” और बहुत इज्जत दी तो “लव मैरिज”| हमारा समाज और परंपरा का इतना नाश हो चुका है कि जो लोग इस परंपरा से विरोध नहीं रखते वो भी इसे “लव कम अरेंज” का मुखौटा जरूर पहना देते हैं|

जिन्हें याद न आ रहा हो उन्हें याद दिला दूँ कि स्वयं कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा को अपने प्रेमी और फुफेरे भाई अर्जुन के साथ “भाग कर विवाह करने” की न सिर्फ सलाह दी बल्कि उनका पूरी तरह समर्थन किया था|[1] खुद कृष्ण जी ने अपनी प्रथम पत्नी रुक्मणि के साथ भाग कर ही विवाह किया था|

ब्रह्मचर्य, स्वयंवर और वानप्रस्थ को पश्चिमी सभ्यता का नाम न दें|

इस देश में हर परिवार चाहता है कि उस घर में बहू – बेटियाँ सीता जैसी हों, मगर कोई सीता – स्वयंवर नहीं चाहता| स्वयम्वर में लड़के रिश्ते की सम्भावना लेकर आते थे मगर आज लड़की बाले दर दर नाक रगड़ते और दहेज़ की बोलियाँ लगाते हैं| महाराज पांडू में माद्री के लिए दहेज़ दिया था, लिया नहीं था|[2]  आज  हर घर में बेटी की नुमाइश लगती है और हर परिवार लड़की से मिलने नहीं, उसे देखने जाता है| लड़की को कुछ भी बोलने की अनुमति नहीं रहती| क्योंकि अगर वो बोलेगी तो हो सकता है कि अपने प्रेमी के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए हाँ ही न करे|

 

वानप्रस्थ:

अभी कहीं सुन रहा था: “इस देश में माता पिता की सेवा पुरानी परंपरा है, बच्चे बड़ों की सेवा करते हैं, पश्चिमी देशों की तरह से वृद्दाश्रम में नहीं भेज देते हैं|” बच्चे बड़ों की सेवा करें, बड़ी अच्छी बात है, करनी ही चाहिए| मगर बड़े बच्चों और समाज पर बोझ बने, क्या यह उचित है| क्या है भारतीय परंपरा? क्या श्रवन कुमार का नाम ले लेकर एक देश में पुरानी परंपरा को नष्ट नहीं किया जा रहा|

जिस समय इस परम्परा का नाम वानप्रस्थ रखा गया समाज का एक बहुत बड़ा वंचित तबका वनों में रहता था| सभ्य समाज के लोग अपनी पारवारिक जिम्मेदारी पूरी करने के बाद समाज के विभिन्न वंचित तबकों की सहायता करने निकल पड़ते थे| यह परिवार में रहकर नहीं हो सकता| देश में जितने सामाजिक संस्थान है आज, उन्हें देख लीजिये, उन्हें चलने के लिए या तो वेतनभोगी युवाओं का सहारा लेना पड़ता है या घोटालेबाज उनपर कब्जा कर लेते हैं|

संन्यास के बारे में मैं बात नहीं करूँगा क्याकि देश की अधिसंख्य आबादी संन्यास की निर्धारित उम्र तक नहीं पहुँच पाती और जो पहुँचते हैं उनमें संन्यास की मनःस्थिति नहीं बन पाती है|

इस भाग के अंत में इतना ही कहूँगा कि ब्रह्मचर्य, स्वयंवर और वानप्रस्थ को पश्चिमी सभ्यता का नाम न दें| स्वयम्वर और वानप्रस्थ को लव – मैरिज और ओल्ड – ऐज – होम के नाम से बदनाम करना मुझे उचित नहीं लगता|

अभी इस श्रंखला के प्रमुख विषय इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने पर अभी आगे बहुत कुछ कहना बाकी है|


[1] http://en.wikipedia.org/wiki/Kunti कुंती और वसुदेव, शूरसेन की संतान थे|

इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने – १


 

हम भारतवासी हमेशा उन प्राचीन सपनों में खोये रहते हैं जिनमें हम “सोने की चिड़िया” और “विश्वगुरु” के रूप में बखानते रहे हैं| हमारी प्राचीन संस्कृति और समृद्धि कभी दूसरों के सपने में उन्हें लुभाती है मगर आज हमें भी लुभाती है| यह प्रवृत्ति शायद उत्तर भारत में अधिक है, जहां विदेशी आक्रमणों और लूटपाट का अधिक असर रहा| हम आदतन, प्राचीन संस्कृति और समृद्धि का नाम जरूर एक साथ लेते है, मगर हम मध्ययुगीन संस्कृति और प्राचीन युगीन समृद्धि को एक साथ जोड़ देते हैं|

पहले समृद्धि के बारे में मत स्पष्ट कर लेते हैं| हमें मौर्य, शक, कुषाण, गुप्त, और वर्धन वंश द्वारा भारत, विशेषकर उत्तर भारत के विकास और समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान का सदा ही विश्वास रहा है| हम जब भी किसी अखंड भारत की बात करते हैं तो हमारे पास मौर्य वंश और आज के भारत का मिला जुला मानचित्र होता है| हमारा सारा प्राचीन ज्ञान विज्ञान इसी समय में विकसित हुआ था| मगर दुर्भाग्य से इसके बाद देश ने विकास की राह नहीं पकड़ी और विनाश की ओर बढ़ता गया|

इस बात पर हम एक मत होंगे कि भारत पर हुए सभी विदेशी आक्रमणकर्ता देश से कुछ न कुछ लूट कर ले गए और देश को लगातार खोखला करते रहे हैं| हमारी प्राचीन समृद्धि का नाश कन्नौज के हर्षवर्धन के वंश के साथ 700 इस्वी संवत से होने लगा था| उसी समय 711 इस्वी में उम्मायत खिलाफत के सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने बोद्ध बहुल सिंध के ब्राह्मण राजा दाहिर को हरा कर देश में मध्य युग का प्रारम्भ कर दिया|[i] अगले छः सौ वर्षों तक कोई भी ऐसा उल्लेखनीय राजा हमें नहीं मिलता जिसने देश में विकास और समृद्धि का कोई महत्वपूर्ण कार्य किया हो| कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि परशुराम द्वारा सभी क्षत्रियों को समाप्त कर दिए जाने की कथा इसी अवस्था का द्योतक रही है| उसके बाद कुछ समय राजपूतों के राज्य का प्रारंभ होता है, जो अपनी तमाम महत्वपूर्ण कोशिशों के बाद भी राजपूत रह जाते हैं, राजा नहीं हो पाते| देश में आपसी लूटपाट और लड़ाई झगड़े बने रहते हैं और कोई भी अपने प्रभाव क्षेत्र से आगे बढ़कर भारतीय पहचान नहीं बना पाता| इसके बाद भले ही कोई भी राज रहा हो देश का इतिहास मुगलों के आने तक गहन अन्धकार में जीता रहा| यह अन्धकार इनता जबरदस्त है कि अनपढ़ और अधपढ़ भारतीय समुदाय बाबर को पहला विदेशी आक्रमणकारी मानता है|

सिंध पर सन 711 इस्वी में प्रारंभ हुए बाहरी शासन का विस्तार धीरे धीरे दिल्ली और फिर पूरे देश में फैलने लगा| दिल्ली के प्रारंभिक मुस्लिम शासक गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुग़लक वंश, सय्यद वंश और लोदी वंश के बारे में आम जनता में प्रायः जानकारी नहीं है| इन लोगों ने दिल्ली को सल्तनत बना दिया, जिसका अर्थ वास्तव में अपने को बड़ा, बाहरी, और अलग शासक समझना था| इस लोगों ने दिल्ली में सन 1206 से 1526 तक राज किया| इसके बाद मुग़ल शासकों में देश में राज्य किया मगर यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि उन्होंने अपने को, तमाम कट्टरपंथी विरोधों के बाद भी, स्वतंत्र सत्ता माना और देश में प्रवेश करते समय ही यहाँ रुकने, रहने और अपनाने की बात की| मगर उस समय एक नयी साम्राज्यवादी ताकत यूरोपियन विशषकर अंग्रेजों के रूप में सर उठा रही थी| जिन्हें मुगलों के इस देश में घुलने मिलने से ही सबसे बड़ी चुनोती थी| उनका इस देश के प्रति समझ का दायरा भी मुग़लों तक था| यही कारण है कि देश के इतिहास में हमें अरब, तुर्क, और अफ़गान शासकों की आलोचना से अधिक मुग़लों की आलोचना सुनने को मिलती है| इसी दुष्प्रचार के प्रारंभिक चरण के रूप में बाबर को देश के पहले बाहरी शासक के रूप में प्रचारित किया गया और आज भी किया जाता है| क्या केवल मुगलों को प्राचीन भारतीय संस्कृति का नाश करने का दोष देकर हम उनसे पहले के सभी विदेशी शासकों को बिना सोचे विचारे दोष मुक्त नहीं कर देते?

क्या केवल मुगलों को प्राचीन भारतीय संस्कृति का नाश करने का दोष देकर हम उनसे पहले के सभी विदेशी शासकों को बिना सोचे विचारे दोष मुक्त नहीं कर देते?

यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है कि कोई भी शासक समूह अपनी संस्कृति और भाषा को श्रेष्ठ मानता है और अपनी शाषित – शोषित जनता की सभी संस्कृति को निम्न और गलत सिद्ध करने के लिए साम दाम सब प्रयोग करता है| जब देश पर मात्र 200 वर्ष राज्य करने वाले अंग्रेज हमारी गंगा जमुनी संस्कृति को नष्ट करने में सारा जोर लगा देते हैं और काफी हद तक सफल होते हैं तो क्या कुल जमा हजार साल राज करने वाले अरब और तुर्क साम्राज्यवादियों ने क्या कोई प्रयास नहीं किये होंगें?

किस तरह के प्रयास रहे होंगे? क्या जजिया ही काफी रहा होगा? नहीं! अरब भारत के साथ बहुत पहले से, इस्लाम के पहले से ही भारत के साथ व्यापार कर रहे थे| उन्हें न केवल भारत की समृद्धि की जानकारी थी बल्कि उसकी वैज्ञानिक और गणितीय उन्नति से विश्व का परिचय करा रहे थे| अगर भारत को विश्व- गुरु कहना है तो अरब उस विश्व-गुरु के संदेशवाहक थे| उस स्तिथि में जब वह भारत पर राज करने आये तो स्वाभाविक रूप से या तो वो इस देश के ज्ञान – विज्ञान को बढ़ावा देते या अपना वर्चस्व बनाने के लिए उसे नष्ट करते| इस समय में बाहरी मुस्लिम शासक अपने को मुस्लिम खलीफा के प्रतिनिधि के रूप में बनाये रखने के कारण कभी पूरी तरह से स्वतंत्र शासन नहीं कर पाए तो राजपूत अपने खुद की फूट और अदूरदर्शिता में उलझे रहे| इस समय में जनता के पास करने के लिए, रोजी रोटी जुटाने के अलावा कुछ नहीं था| जिस समय यूरोप अपने अंध युग से बाहर निकल कर विकास कर रहा था, भारतीय अंधे कुएं में थे| सांस्कृतिक आदान – प्रदान के साथ विनाश और विकास की लम्बी प्रक्रिया चलती रही| वह समय आज का तेज कंप्यूटर युग नहीं था इसलिए यह एक धीमी और सतत प्रक्रिया रही होगी| यह प्रक्रिया जितनी लम्बी रही होगी उनता ही इसमें दो तरफ़ा संवाद की सम्भावना बनती है और नयी अवधारणा और विचार पैदा होते है| प्राचीन अवधारणा अपनी नयी व्याख्याओं के साथ प्रस्तुत हुई होंगी| शासित भारतीय समाज ने शासकों के कई मत अपनाये होंगे और अपने विचारों की नवीन व्याख्या कीं होंगीं|

जिस समय मुग़ल भारत आये, भारत में नए सांस्कृतिक विचार जन्म ले रहे थे और यह जन जागरण का समय था| भारतीय समाज में से बोद्ध वर्चस्व समाप्त हो चुका था| जैन किसी प्रकार की मजबूती नहीं पकड़ पाए थे| वैष्णव, शैव और शाक्त सम्प्रदाय एक नयी व्याख्या रचते हुए हिन्दू समाज को नए अर्थ दे रहे है| पश्चिम से आते नए विचार भी कहीं न कहीं जनता तक पहुँच रहे थे| उस समय के घटना क्रम को कई प्रकार से संजो कर रखा जा सका| परन्तु इस समय तक भारत की प्राचीन संस्कृति, सांस्कृतिक आदान – प्रदान और राज शक्ति के समक्ष लगभग रक्षात्मक रुख अपना चुका भारतीय जन मानस उस समय अपने लिए रक्षात्मक जीवन शैली और विचार अपना चुका था| एक गंगा – जमनी तहजीब पैदा हो रही थी जो आज भी तमाम कशमकस के बीच अपने पूरे रंगढंग में मौजूद है|

भारतीय मुस्लिम समाज, अपने को कितना ही अरब और तुर्क से जोड़े, आज पसमांदा मुस्लिम (जाति प्रथा), दहेज़, और अनेक प्रथा – कुप्रथा इसी लम्बी प्रक्रिया का हिस्सा है| इस समय भारतीय हिन्दू समाज के पास जो अवधारणा निकल कर आयीं उनमे से कई आज भी जिन्दा हैं| हमने अपनी कई प्राचीन परम्पराओं को न सिर्फ त्याग करना शुरू कर दिया वरन उनके ऐतिहासिक और मिथिकीय वर्णनों के लिए नयी रक्षात्मक व्याख्या देना भी शुरू कर दिया| आज इनमे से कई चीजें हमारे भारतीय समाज में घुल मिल गयीं है|

इस पर हम अगले आगामी चिठ्ठे में चर्चा करेंगे|