इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने – २

आश्रम, ब्रह्मचर्य, गुरुकुल, गन्धर्भ विवाह स्वयंवर, वानप्रस्थ,

भारत का गौरवशाली इतिहास जिन प्राचीन परम्पराओं के कारण विकसित हुआ आज उनका अस्तित्व नहीं बचा है बल्कि उनका आज कोई नाम लेने वाला नहीं है| हजार वर्ष की गुलाम मानसिकता में प्राचीन परंपरा का विरोध भर दिया है| कई बार हम देखते हैं कि लोग उनका कई प्रकार से विरोध करते हैं| मैं उनमे से कुछ प्राचीन बातों का उल्लेख में यहाँ करूँगा|

आश्रम व्यवस्था:

हमारी वैदिक परंपरा में चार आश्रम आते हैं: संन्यास, वानप्रस्थ, गृहस्थ, ब्रह्मचर्य| आज इन आश्रम के बारे में कोई बात नहीं करता| भले ही हम कितने भी धार्मिक होने का दावा करें, दुसरे धर्मों की आलोचना करें| मगर, हम अपने धर्म के मूल सिद्धांतों को कोई समर्थन नहीं देते| हम उन्हें इतना अधिक भुला चुके हैं कि दूसरों को हमारी आलोचना करने की आवश्कता भी नहीं रह गयी है| हास्यास्पद बात यह है कि हम सोच लेते हैं कि शायद उनके मुँह हमारी महानता से बंद है, पर वो जानते हैं प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? अगर हमारे सिद्धांतों और विचारों में कोई बल होता तो क्या हम उन्हें छोड़ते? मगर हमने उन्हें छोड़ा है|

ब्रह्मचर्य:

हमारे देश, समाज और जन जीवन में ब्रह्मचर्य एक अपशब्द बन कर रह गया है| हमारे देश में घर, परिवार, विद्यालय और संचार माध्यमों में इसकी कोई चर्चा नहीं होती| देश में सभी पुरुष पुरुषार्थ की जगह पुरुष-तत्व दिखाने के लिए छोड़ दिए गए हैं| देश में रोज बलात्कार हो रहे हैं और दोषारोपण स्त्रियों, स्त्री-शिक्षा और स्त्री – आजीविका पर हो रहा है| क्या ये स्त्रियाँ जबरन अपना बलात्कार करातीं है? अगर हम एक क्षण के लिए किसी स्त्री को कुचरित्र मान भी लें, तो क्या पुरुष का ब्रह्मचर्य क्षण – भंगुर होना चाहिए?

ब्रहचर्य का इस देश में इतना बुरा हाल है की इसके जबरन भंग करने को विश्व भर के विकसित राष्ट्रों में में बलात्कार माना जाता है, मगर हमारे यहाँ? अरे, जब हम अपना ब्रहचर्य का सिद्धांत ही पश्चिमी देशों को निर्यात करने के बाद ख़त्म कर दिया है तो क्यों ब्रह्मचर्य – भंग को बलात्कार माना जाए? वर्तमान भारत का मध्य – युगीन समाज केवल स्त्री के कौमार्य की मर्यादा पर आकर टिक गया है, जिसे ब्रह्मचर्य से कोई लेना देना नहीं रह गया है|

ब्रह्मचर्य को भूलने के कारण के रूप में कई बार यौन शिक्षा को दोष दिया जाता है जो अनुचित है| मेरे विचार से ठीक प्रकार की यौन शिक्षा का अभाव आज के कई दोषों का कारण है| जिस प्रकार रसायन विज्ञान के कक्षा में घातक अम्लों के बारे में बताया जाता है, उनके प्रयोग के सही तरीके, परिमाण और प्रमाण के साथ सिखाये जाते हैं और उसके दुष्प्रयोग का दुष्परिणाम समझाया जाता है, वही शिक्षा का सही तरीका है| उसी प्रकार समुचित यौन शिक्षा ब्रह्मचर्य का मूल आधार है| नवयुवाओं को अपने अनुभव से सीखने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वह अनुभव हीनता से गलत अनुभव पा सकते है और जीवन नष्ट कर सकते हैं|

गुरुकुल:

गुरुकुल, राज्य और समाज समर्थित शिक्षा संस्थान जहाँ शिक्षा का व्यापार नहीं था, जहाँ बिना जाति, धर्म, मत, सामाजिक स्तर, घर परिवार और माता पिता को देखे सभी के पास शिक्षा के समान अवसर थे| न शुल्क था, न व्यापार, न उत्तीर्ण कर दिए जाने के लज्जाहीन प्रपंच|

घर से ही शिक्षा पहला मूल था| अधिकतर लोग घर या समाज में प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद सीधे ही रोजगार परक ज्ञान को प्रायोगिक रूप से उचित अनुभवी लोगों के साथ सीखते थे| अन्य अकादमिक रूप से मजबूत विद्यार्थी ही गुरुकुल जाते थे| आज देश में स्नातक युवाओं की गिनती तो बढ़ रही है मगर उनका ज्ञान अथवा रोजगार स्तर नहीं| हमें ज्ञान परक और रोजगार परक शिक्षा को अलग अलग रख कर देखना होगा| इस विषय पर लम्बी बात की जा सकती है|

गन्धर्व विवाह और स्वयंवर:

गन्धर्भ विवाह और स्वयंवर का नाम लेने पर ही हमारी नसें फड़कने लगतीं हैं, कौन है जिसने माँ-बाप के बिना मर्जी के विवाह की हिमाकत की| कई – बार तो गन्धर्भ विवाह की प्राचीन परंपरा का पालन करने का प्रयास करने वाले युवा जोड़े की निर्मम हत्या सीना ठोंक कर की जाती है| हमने गन्धर्भ विवाह की गौरवशाली परंपरा को एक घटिया नाम दे दिया है: “घर से भाग कर शादी” और बहुत इज्जत दी तो “लव मैरिज”| हमारा समाज और परंपरा का इतना नाश हो चुका है कि जो लोग इस परंपरा से विरोध नहीं रखते वो भी इसे “लव कम अरेंज” का मुखौटा जरूर पहना देते हैं|

जिन्हें याद न आ रहा हो उन्हें याद दिला दूँ कि स्वयं कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा को अपने प्रेमी और फुफेरे भाई अर्जुन के साथ “भाग कर विवाह करने” की न सिर्फ सलाह दी बल्कि उनका पूरी तरह समर्थन किया था|[1] खुद कृष्ण जी ने अपनी प्रथम पत्नी रुक्मणि के साथ भाग कर ही विवाह किया था|

ब्रह्मचर्य, स्वयंवर और वानप्रस्थ को पश्चिमी सभ्यता का नाम न दें|

इस देश में हर परिवार चाहता है कि उस घर में बहू – बेटियाँ सीता जैसी हों, मगर कोई सीता – स्वयंवर नहीं चाहता| स्वयम्वर में लड़के रिश्ते की सम्भावना लेकर आते थे मगर आज लड़की बाले दर दर नाक रगड़ते और दहेज़ की बोलियाँ लगाते हैं| महाराज पांडू में माद्री के लिए दहेज़ दिया था, लिया नहीं था|[2]  आज  हर घर में बेटी की नुमाइश लगती है और हर परिवार लड़की से मिलने नहीं, उसे देखने जाता है| लड़की को कुछ भी बोलने की अनुमति नहीं रहती| क्योंकि अगर वो बोलेगी तो हो सकता है कि अपने प्रेमी के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए हाँ ही न करे|

 

वानप्रस्थ:

अभी कहीं सुन रहा था: “इस देश में माता पिता की सेवा पुरानी परंपरा है, बच्चे बड़ों की सेवा करते हैं, पश्चिमी देशों की तरह से वृद्दाश्रम में नहीं भेज देते हैं|” बच्चे बड़ों की सेवा करें, बड़ी अच्छी बात है, करनी ही चाहिए| मगर बड़े बच्चों और समाज पर बोझ बने, क्या यह उचित है| क्या है भारतीय परंपरा? क्या श्रवन कुमार का नाम ले लेकर एक देश में पुरानी परंपरा को नष्ट नहीं किया जा रहा|

जिस समय इस परम्परा का नाम वानप्रस्थ रखा गया समाज का एक बहुत बड़ा वंचित तबका वनों में रहता था| सभ्य समाज के लोग अपनी पारवारिक जिम्मेदारी पूरी करने के बाद समाज के विभिन्न वंचित तबकों की सहायता करने निकल पड़ते थे| यह परिवार में रहकर नहीं हो सकता| देश में जितने सामाजिक संस्थान है आज, उन्हें देख लीजिये, उन्हें चलने के लिए या तो वेतनभोगी युवाओं का सहारा लेना पड़ता है या घोटालेबाज उनपर कब्जा कर लेते हैं|

संन्यास के बारे में मैं बात नहीं करूँगा क्याकि देश की अधिसंख्य आबादी संन्यास की निर्धारित उम्र तक नहीं पहुँच पाती और जो पहुँचते हैं उनमें संन्यास की मनःस्थिति नहीं बन पाती है|

इस भाग के अंत में इतना ही कहूँगा कि ब्रह्मचर्य, स्वयंवर और वानप्रस्थ को पश्चिमी सभ्यता का नाम न दें| स्वयम्वर और वानप्रस्थ को लव – मैरिज और ओल्ड – ऐज – होम के नाम से बदनाम करना मुझे उचित नहीं लगता|

अभी इस श्रंखला के प्रमुख विषय इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने पर अभी आगे बहुत कुछ कहना बाकी है|


[1] http://en.wikipedia.org/wiki/Kunti कुंती और वसुदेव, शूरसेन की संतान थे|

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