आरक्षण !!!


सवर्ण होने के बाद भी आरक्षण का समर्थन करने के कारण मुझे कई बार मित्रों और परिवारीजनों से बहुत कुछ सुनने के लिए मिलता रहा है| बहुतों को लगता है भारतीय प्रशानिक व्यवस्था में उनका न होना ही व्यवस्था के जर्जर होने की सबसे बड़ी वजह है| मण्डल रिपोर्ट लागू हुए अभी बाईस वर्ष हुए हैं और आज के समय में मलाईदार पदों पर आसीन लोग मण्डल से पहले अपनी निठल्ली नियुक्तियां पा चुके थे| आरक्षण विरोध का स्वर उठाने वाले अधिकतर सवर्ण मित्रों का योग्यता स्तर अधिकतर उस संभावित स्तर से काफी नीचे होता है जिसपर मण्डल न होने पर नियुक्तियां होने की संभावना बनती|

खैर, यह तो आज की बात है मगर मेरा आरक्षण समर्थन मण्डल लागू होते समय से बना हुआ है| कारण?

उस समय मुझे अपने भविष्य का चयन करना था और मैं आकलन में लगा था| मण्डल से पहले के उस समय में सरकारी नौकरी के दबाब में स्नातक के बाद सवर्ण युवा औसतन तीन साल तैयारी में लगा देते थे| उसके बाद तीन साल या तो उस भेंट का कर्जा उतारने में लग जाता था जो नौकरी के लिए उन्होंने दी थी या फिर छोटा मोटा व्यवसाय ज़माने में| कुल मिला कर सवर्ण युवा की आय स्नातक होने के छः वर्ष बाद ही वास्तविक आय लेगर आते थे| आज भी जो सवर्ण युवा सरकारी नौकरी के लिए तैयारी रहे हैं, उनको औसतन इतना ही समय लगता है| दूसरा मुझे यह समझ आ गया था कि सरकारी नौकरी पढाई से नहीं रिश्वत से प्राप्त होती है जो देना अधिकांश योग्य युवाओं के बस की बात न थी और न है| जब मण्डल आरक्षण आया तो मुझे दो संतोष हुए:

  • पहला, अब घर में सरकारी नौकरी का दबाब कम हो जायेगा (मेरे पिता का विशवास था कि अगर वो सरकारी नौकर न होते तो अधिक तरक्की करते क्योंकि सरकारी नौकरी में काम से कम; समय, भाई – भतीजावाद और धनबल की जय अधिक होती है|)
  • दूसरा, सरकार में रिश्वत देकर आने वाले अतिअल्पज्ञानी सवर्णों के साथ कुछ नहीं तो अल्पज्ञानी पिछड़े और अन्य तो आयेंगे तो सरकारी व्यवस्था का स्टार सुधरेगा|

वर्तमान में अतिचर्चित व्यापम घटनाक्रम सर्वज्ञात सत्य का उद्घाटन करता है कि सामान्य कोटे में नौकरियों बाजार में बिकतीं हैं, योग्यता पर नहीं मिलतीं| मेरे एक मित्र जो सोशल मीडिया पर पूछा करते थे कि क्या आप आरक्षण से शिक्षा नौकरी पाए हुए चिकित्सक को दिखायेंगे; मैं आजकल उनसे पूछता हूँ व्यापम वाले पर चलेंगे या आरक्षण वाले पर?

मैं कायस्थ होने के नाते सरकारी नौकरियों में कायस्थों के घटते प्रतिशत पर चिंता उठते देखता हूँ; ज्यादातर इसका दोष आरक्षण को दे दिया जाता है, जो अर्ध सत्य है| देश की आजादी के समय में जिन मुख्या सवर्ण जातियों का प्रशानिक पदों पर कब्ज़ा था उनका पारस्परिक अध्ययन किया जा सकता है| सामान्य पदों पर नियुक्तियां जातिवाद, भाई – भतीजावाद, धनबल और ज्ञानबल के आधार पर होती है, इस सत्य का ध्यान रखना होगा|

क्या आरक्षण जायज है:

अगर आप यह कहना चाहते हैं कि आरक्षण का अर्थ पुरखों के पाप की सजा आपको दिया जाना है तो आप गलत हैं| सवर्ण पुरखों ने शूद्रों के लिए आधा भी नहीं छोड़ा था, सवर्ण आरक्षण के बाद भी नौकरियां पाते हैं जो आज भी जनसँख्या अनुपात में कम तो कतई नहीं दी जा रही| महिला आरक्षण का तो लगभग पूरा कोटा सवर्ण के नाम खप जा रहा है| आज आरक्षण में एक कमी जरूर है कि आरक्षित वर्ग का क्रीमीलेयर आरक्षण का लाभ उठा रहा है तो मुझे लगता है कि आरक्षित वर्ग के वंचित तबके को जागरूक करना होगा कि भाई आगे बढ़ो, जो लाभ मिल रहा है उसे आगे बढ़कर लो|

निर्धन आरक्षण:

निर्धन आरक्षण की मांग करने वाला तबका यह भूल जाता है कि संख्या में निर्धन आरक्षित वर्ग में बहुत ज्यादा हैं और अगर यह मिल भी गया तो इसमें धन – बल और फ़र्जी बाड़ा व्यापम से भी अधिक होगा|

अंत में इतना ही कहूँगा, आरक्षण का लाभ उसी दिन है जब आरक्षित वर्ग में हम ही प्रतियोगिता पैदा कर पायें जितनी सवर्ण में महसूस करते हैं| यह काम सवर्ण को ही करना होगा, जैसे उन्होंने आरक्षण के समर्थन में किया था|

गदर्भ न्याय


भारतीय पुलिस को के बार आतंकवाद के आरोपी गीदड़  पकड़ने के आदेश मिले| पुलिस वाले बस इतना ही जानती थी कि गीदड़  कोई जानवर होता है| साल भर कुर्सी तोड़ने के बाद भी उन्हें गीदड़  नहीं मिला| एक दिन थाने के सामने घास चरता हुआ गधा मिल गया| तो उसे गीदड़  बना कर पकड़ लिया|

लात घूसे और लाठियां खाते खाते गधे को पता चला कि इन पुलिसियों को गीदड़  चाहिए| तो मार से बचने के लिए उसने खुद का गीदड़  होना कबूल कर लिया| अपराध में अपने शामिल होने के बारे में एक कहानी सुना दी|

सरकारी वकील ने अदालत को बताया हुजूर जानवरों के बारे में लिखी सबसे बड़ी किताब में लिखा है गीदड़  के सींग नहीं होते और पूँछ होती है| जो कि आरोपी के है| तो अदालत ने गधे को गीदड़  करार दे दिया|

इस बीच मंत्रीजी ने लालदीवार से गीदड़  पकड़ने वाले पुलिसियों को पुरुस्कार घोषित कर दिया| उधर अगले दिन वकील सफाई ने दलील दी कि आरोपी के खुर है, जो गीदड़  के नहीं होते| तो मंत्रीसेवकों ने उनको देशद्रोहियों का साथी बताना शुरू कर दिया| देश भर में अपराध पीड़ितों के लिए न्याय की मांग जोर पकड़ गई|

अदालत ने देश की भावना का सम्मान किया और गधे को गधा मानते हुए खुर न होने  की असमानता परन्तु अन्य समानता के आधार पर गीदड़  का भाई और उस के अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसको अपराधी घोषित कर दिया|

मोमबत्तीवालों ने बड़ेदरवाजे जाकर मोमबत्ती जलाईं| मंत्रीजी ने पुलिसियों का मोरल डाउन करने के आरोप में मोमबत्ती वालो ने पीछे कुत्ते छोड़ दिए| और पटाखे वालों ने पटाखे फोड़े|

कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| … कहानी यूँ ही चलती रही|

मंत्री जी की कुर्सी सालों साल बैठे रहने से चरमराने लगी| बढई ने बताया कुर्सी ठीक करने के लिए गीदड़  का खून लगेगा| पुलिस ने बताया, हमारे कब्जे में तो गीदड़  का भाई गधा है|

आनन फानन में मंत्री जी, अदालत, पुलिस, मोमबत्ती और पटाखे हरकत में आये|

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अख़बार ने लिखा “नरक में जा गधे|” गीदड़  ख़ुश हुआ| मोमबत्ती और पटाखे बिके| मंत्री जी ने बिरयानी खाई| पुलिस का मोरल आसमां से चिपक गया| कुछ गधों को कुछ यकीन आया|

बाद में एक किताब आई….

वेद में विज्ञान


“विज्ञान जो बता रहा है वो सब वेदों में है, मगर वेदों में कहाँ है, पंडितजी को नहीं मालूम… अथ सत्य कथा||”

अभी कुछ दिन पहले जब यह वाक्य मैंने फेसबुक पर डाला तो अति विचित्र प्रतिक्रिया हुई| मेरा आशय पण्डित जी पर टिपण्णी करना था और इसका छद्म उद्देश्य उन सभी तथाकथित धर्मगुरुओं और पदाधिकारियों पर टिपण्णी करना था जिन्हें हम पण्डित, स्वामी, संत, मोलाना, हाजी, काज़ी, पादरी, भंते आदि आदि कहते हैं| इस आलेख में आगे जब भी पण्डित जी शब्द प्रयोग हो तो उसमें यह सभी धार्मिक पदाधिकारीगण सम्मलित होंगे|

अधिकतर धार्मिक पदाधिकारियों की समस्या है कि उन्हें अपने धर्मग्रन्थ की मूल भाषा न के बराबर आती है| कुछ पण्डित लिपि तो पढ़ सकते है, मगर भाषा नहीं| अर्थात संस्कृत, अरबी, पाली, हिब्रू आदि का उच्चारण मात्र कर सकते हैं मगर अर्थ नहीं| प्रायः इन सभी का ज्ञान साधन इनके बड़े धार्मिक नेताओं की खोखली भाषणबाजी ही होती है या कभी कभी सस्ते किस्म के गुटखे या टीकाएँ|

हास्य इस बात से भी उत्पन्न होता है कि आज की पीढ़ी को दोष देकर हाथ झाड़ लिए जाते हैं कि “आज की पीढ़ी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अरबी या हिब्रू नहीं पढ़ती”| मगर पिछले दो हजार वर्षों में इतनी सारी पीढ़ियों ने यह सब भाषाएँ और धर्म ग्रन्थ पढ़ कर विज्ञान के क्षेत्र में कौन से तीर मार लिए|

आज के समय में कोई भी धर्मग्रन्थ हजार – दो हजार वर्ष में कम पुराना नहीं है मगर विज्ञान का विकास पिछले दो सौ वर्षों में ही हुआ है| यह वही समय है जबसे संस्कृत, पाली, प्राकृत, अरबी या हिब्रू आदि महान भाषाएँ पढ़ना कम हुआ  है| मेरे जैसे गिने चुने लोग अवश्य ही शौक में पुरानी भाषाओँ को पढ़ लेते हैं|

अब बात करते हैं धर्म ग्रंथों में विज्ञान होने की| जो भी विद्वान धर्म ग्रंथों को वैज्ञानिक ग्रन्थ मानते हैं वह धर्म ग्रंथों का अपमान कर रहे हैं| धर्म ग्रंथों का उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिकता की ओर ले जाना हैं और विज्ञान मात्र भौतिकता और सृष्टि पर मानव की विजय का अभियान मात्र है| यह सही है कि धर्मग्रंथों में कुछेक वैज्ञानिक बातें मिल सकती हैं मगर वह केवल प्रसंगवश आयीं हैं| धर्मिक कथाओं में विज्ञान ढूँढना धर्म के उद्देश्य से भटकना है| उपवेदों में गणित और आयुर्वेद भी इसलिए हैं कि उनकी आध्यात्मिक स्वस्थ जीवन में आवश्यकता है, उनका भौतिक लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं है|

आज जो लोग अपने अपने धर्मग्रन्थ में विज्ञान होने की बात कर रहे हैं वह मात्र भौकिकतावादी पीढ़ी को बरगला रहे है जिस से उनकी दुकान उन लोगों में भी चलती रहे जिनकी आध्यात्मिकता में कोई रूचि नहीं है|

यदि कोई आपसे अपने धर्मग्रन्थ में विज्ञान की बात करे तो संभल जाएँ, उसे अपनी दुकान में दिलचस्पी है धर्म और विज्ञान में नहीं|