आरक्षण का उत्तर


अभी हाल में जब मैंने आरक्षण के पक्ष में अपने विचार रखे तो उसके विरोध में मिलने वाले विचारों में पिछले साठ साल से चल रहे आरक्षण पर इस प्रकार टिप्पणियाँ की गईं मानों यह आरक्षण मनु महाराज के ब्राहमण आरक्षण से अधिक लम्बा चल रहा हो|

जिस प्रकार भारत में आरक्षण पर हाँ और न चल रही है मुझे लगता है कि अगली एक सहस्त्राब्दि आरक्षण को चलना चाहिए| क्या आरक्षण का असली कारण सामाजिक पिछड़ापन मात्र है?

नहीं, देश में शिक्षा और नौकरियों के अवसर बहुत कम हैं| इन सीमित अवसरों में यदि आरक्षण न मिले तो पिछड़े वर्ग को अवसर कदापि न मिल पायें|

हमें आरक्षण को ख़त्म करते से पहले राष्ट्र के विकास पर ध्यान देना होगा, जिससे हर किसी के लिए शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर हों| आरक्षण समग्र विकास में अपनी भूमिका निभा रहा है| दो उदहारण हैं:

पहला: मौर्य काल से मुग़ल काल तक, अर्थात अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था| परन्तु, समृद्धि का सारा लाभ सवर्णों (मुस्लिम सवर्ण भी) के पास था| जबकि देश के सारे उद्योग आदि बुनकर, बढई, लोहार, चर्मकार, जैसे तमाम पिछड़े और शुद्र वर्ग के हाथ में था| अंग्रेजों में भारतीय विकास और समृद्धि की इस कमज़ोरी को समझा और मर्म पर प्रहार किया| वर्तमान आरक्षण इस गलती को ठीक करने का प्रयास कर रहा है| दुर्भाग्य से भारत का सवर्ण और आरक्षित वर्ग का क्रीमीलेयर आरक्षण के लाभ को सबसे निचले तबके तक नहीं पहुँचने देना चाहता|

दूसरा: जब हम ट्रेन में जाते है तो अपना अपना आरक्षण कराते हैं| अगर आपको लगता है इस ट्रेन आरक्षण की आवश्यकता इसलिए है कि आप आराम से यात्रा कर सकें तो आप गलत हैं| ट्रेन में आरक्षण करने के क्रम में बहुत से लोग यात्रा से वंचित रह जाते हैं| उनके लिए यात्रा की कोई सुनिश्चितता नहीं होती| कारण: कम ट्रेनें, कम सीटें, अर्थात संसाधन की कमी| जबकि यदि संसाधन पर्याप्त हों तो सभी लोग यात्रा कर सकते हैं और आरक्षण की आवश्यकता केवल सीट की सुनिश्चितता के लिए होगी न कि यात्रा की|

आरक्षण के सही उत्तर संसाधन का विकास है|

मोबाइल में जान


छोटा था मैं| नानाजी कहानी सुना रहे थे| “राक्षस की जान तोते में है…, राक्षस पर तलवार चलने से कुछ नहीं होगा… उसका तोता ढूँढना होगा|”

आज मेरा बेटा छोटा है| मैं कहानी सुना रहा हूँ: “राक्षस की जान तोते में है…, राक्षस पर तलवार चलने से कुछ नहीं होगा… उसका तोता ढूँढना होगा|” “और पापा आपकी जान तो मोबाइल में है|” तीन साल की उम्र में एक बड़ा सच|

मोबाइल, शरीर का वो हिस्सा जिस में दिमाग का बड़ा हिस्सा रहता है| आपके सम्बन्ध, यादें, कमजोरियां, ताकत, शौक, धन – दौलत, योजनायें, गपशप, आपके सारे काले सफ़ेद|

मेरा निजी पुस्तकालय मेरी जेब में चलता है| मेरा बैंक और ट्रेवल एजेंट मुट्ठी में रहते हैं| मेरे पसंदीदा पुराने गायकों की रूह हमेशा मेरे साथ है|

बाग़ के लगे इस पिलखुन के पेड़ के नीचे चुपचाप लेटा हूँ| बस सोच रहा हूँ| मेरी जान मोबाइल में बसती हैं| अजीब सा लग रहा है|

तभी उपर से एक तोता उड़ गया|

धर्मपत्नी


सोशल मीडिया की सबसे बड़ी खूबी है कि युवा पीढ़ी अपनी अज्ञानता और अयोग्यता को भी हँसी – ख़ुशी के साथ परोस देती है और शेयर/फॉरवर्ड भी करती है|

अभी हाल में एक प्रश्न मुझतक एक बार फिर पहुंचा:

अगर धर्मपिता, धर्ममाता और धर्मभाई का अर्थ असली पिता, माता या भाई से नहीं तो फिर धर्मपत्नी का अर्थ असली पत्नी से क्यों है?

पिता, माता, पुत्री, पुत्र, भाई और बहन यह सब वह सम्बन्ध हैं जिन्हें हम जन्म से लेकर आते हैं और भले ही हमें उन रिश्तों के बारे में किसी भी कारण जानकारी न हो मगर यह सभी सम्बन्ध मौजूद रहते है और इनका वैज्ञानिक प्रमाण भी दिया जा सकता है| जैसे बिछुड़ा भाई, हमेशा हमेशा भाई ही रहेगा; चाहे यह बिछुड़ना मानसिक (मन – मुटाव), भौतिक (कुम्भ मेले में बिछुड़ना) या आत्मिक (मृत्यु) कुछ भी हो| इन सम्बन्धों में असली या नकली नहीं होता, भाषा की दृष्टि से इन्हें “सगा” सम्बन्ध कहा जा सकता है| यह सम्बन्ध भौतिक और वैज्ञानिक सत्य हैं| भारतीय भाषाओँ के सम्बन्ध में सगे के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध चचेरे ममेरे फुफेरे मौसेरे भी हैं, जिन्हें अंग्रेजी में कजिन कहते हैं|

धर्मपिता, धर्ममाता, धर्मपुत्र, धर्मपुत्री, धर्मभाई, धर्मबहन आदि रिश्ते इस जन्म में बनते है| ऐसा नहीं है कि हमने किसी को पकड़ा और उसे भाई बोल दिया तो वह धर्म भाई हो गया| इस प्रकार तो शहर के सभी रिक्शेवाले और गोलगप्पे वाले सबके धर्मभाई हो जायेंगे|

धर्म सम्बन्ध में धर्म का अर्थ कि किसी धार्मिक या विधिक समारोह से नहीं है| गोद लेना एक धार्मिक और साथ ही विधिक समरोह है मगर इस से बनने वाला रिश्ता “सगा” होगा; इस से परिवार में पुत्र या पुत्री का प्रवेश होता है न कि धर्मपुत्र या धर्मपुत्री का| इसी प्रकार, विवाह के धार्मिक या विधिक समारोह से परिवार में पत्नी और पुत्रवधु का प्रवेश होता है न कि धर्मपत्नी या धर्मपुत्रवधु का|

धर्मसम्बन्ध में धर्म का अर्थ कर्तव्य से है, जो धर्म शब्द के मूल अर्थों में से एक है| वह व्यक्ति जो पिता का धर्म निभाए वह धर्मपिता; वह व्यक्ति जो माता का धर्म निभाए वह धर्ममाता; वह व्यक्ति जो पुत्र का धर्म निभाए वह धर्मपुत्र; वह व्यक्ति जो पुत्री का धर्म निभाए वह धर्मपुत्र; वह व्यक्ति जो भाई का धर्म निभाए वह धर्मभाई; वह व्यक्ति जो बहन का धर्म निभाए वह धर्मबहन; वह व्यक्ति जो पत्नी का धर्म निभाए वह धर्मपत्नी; और वह व्यक्ति जो पति का धर्म निभाए वह धर्मपत्नी| “धर्मपति” नहीं सुना शायद आपने; और इसके न सुनने में ही “धर्मपत्नी” का भाव, अर्थ और दुर्भावना छिपी हुई है| पहले इस बात से सहमत हो लें कि धर्मपत्नी है तो धर्मपति भी होगा ही| मगर “धर्मपति” शब्द प्रचलन में नहीं है|

प्रायः धर्मपत्नी शब्द का प्रयोग पत्नी के समक्ष यह कहने का प्रचलित तरीका है कि उसे पत्नी से बढ़कर होना चाहिए और पत्नी के साथ साथ धर्मपत्नी भी बनना चाहिए| अर्थात सभी पत्नी के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए| दुखद यह है कि धर्मपत्नी, पत्नी, उपपत्नी, रक्षिता और प्रेमिका के रूप में पति के साथ रहने वाली स्त्रिओं को धर्मपत्नी बनने का दबाब रहा है| जब पति अपनी पत्नी को धर्मपत्नी कहता है तो वो अपने निजी संबंधों के अच्छे होने के “निर्लज्ज” सार्वजानिक घोषणा करता है, जो मेरे विचार से पति – पत्नी आवश्यक कतई नहीं है| ऐसा इसलिए कि पति कभी भी अपने धर्मपति होने का दावा करते नहीं देखे जाते|

पत्नी के लिए धर्मपत्नी और अर्धांगिनी शब्द का प्रयोग मैं अनुचित हैं क्योंकि धर्मपति और अर्धंगना शब्द भाषा में मान्य नहीं हैं| अंग्रेजी का spouse और हिंदी का जीवनसाथी, पति पत्नी दोनों के लिए अधिक उचित शब्द हैं|