STOLEN HOPE


“Two women whose actions become turning points in this epic are Manthra and Surpanakha. Both emphasized their need over that of the others. When thousands of people have to suffer to satisfy one’s single person’s need (sic), one naturally warrants punishment.”

“Stolen Hope” is sequel to the national bestseller, “Rise of the Sun Prince” and “Shattered Dreams”, in the new spiritual and motivational series “Ramayana – The Game of Life” being written by Shubha Vilas.

The book, being a sequel, narrate story from 11th year of exile into forest of Rama.  This story is not just a story of Rama but this is philosophic tale of everyday life of all of us. We all have some stolen hope in our life and feel loss of our living life. The book reaches us to handle temptation and exploration beyond our comfort zone and give hope in our negativity.

Narrative is very simple compare to minute complex details of story and goes philosophical when philosophy slips into its way. I miss intensified drama and philosophy, which was part of last book but this book offer many less popular mythological stories. Writing style is lucid, crisp and quite engaging. To keep simple uses footnotes to describe backgrounds details, explanations and short takeaway points. The footnotes give deeper insights to each character and situation.  If you try to read it along; then the pace of story is hampered, but surely a reader may not want to ignore.

“Excellence is by-product of persistently choosing quality over quantity.”

I find these words very interesting in many perspectives – environment, female feticide, tribal rights, taxes, protection and  governance:

 “O lord, you are not only the master our heart but also the master of these woods. Just as it is the womb’s duty to protect the fetus, it is the king’s duty to protect its citizens wherever he is. A quarter of the merits of our sacrifice and penances go to the ruler. Our only wealth comes from austerities and penances. The investment needed to grow this wealth is that of total dependence on God. To grow our wealth of austerities, we will no effort to protect ourselves. So the service to protect us totally rest on your shoulders now.”

Book Details:

Title:  Stolen Hope, Book 3,
Series: Ramayana: The Game of Life
Author: Shubha Vilas
Publisher: Jaico Publishing House
Publication Year: 2016
Genre: Mythology/Religion & philosophy/ self-help
ISBN 13: 978-81-8495-824-9
Binding: Paperback
Number of pages: 387
Price: Rs 350

About the Author: Shubha Vilas is a spiritual seeker and a motivational speaker. He holds a degree in engineering and law with specialization in IP: Patent Law. His leadership seminars such as Secrets of Lasting Relationships’, ‘Soul Curry to Stop Worry’ and ‘Work–Life Balance’ are popular with top-level management in corporate houses. He also helps individuals deal with modern-life situations by applying the teachings of the Bhagavad Gita, Ramayana and other dharmic traditions.

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अल्प–सफल पठानकोट बचाव


किसी भी हमले या आतंकवादी हमले की स्तिथि में सुरक्षा बलों को, गुप्तचरों और उनके मार्फ़त सरकार बहादुरों को ही यह पता होता है कि इस हमले की आक्रमकता को देखते हुए सफलता का मापदंड क्या होना चाहिए|

पठानकोट बचाव में सबसे बड़ी असफलता यह है कि न सिर्फ “सफल लक्ष्य” को पहले से ही जान –पहचान लिया गया बल्कि उसके पूरा होते ही “पीठ ठोंको – शाबासी दो” अभियान भी शुरू हो गया| लेकिन यही पठानकोट बचाव की असफलता है क्योंकि सरकार बहादुरों के बधाई संदेशों के बाद हमला जारी था और दुनिया में सरकार बहादुरों और भारत का मखौल बन रहा था|

कारण बहुत सीधा सरल है; हमने सरकार बहादुर ने अपने सामने पूर्ण आत्म- विश्वास के साथ बेहद सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया और उसमें किसी प्रकार के परिस्तिथि जन्य बदलाव की कल्पना या आशंका भी नहीं की| सरकार बहादुर ने यह माना कि सबकुछ किसी लोकप्रिय विडियो गेम की तरह से चलेगा और काम ख़त्म| सरकार बहादुरों ने इस पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद यह समय लगाने की भी जरूरत नहीं समझी कि जमीनी हकीकत को एक बार जाँच लिया जाये| यदि यह किया गया होता तो कम से कम अति-उत्साह से बचा जाता और आलोचना से भी|

सबसे पहले यह बात सुस्पष्ट होनी चाहिए कि गुप्तचर सूचना का बहुत पुख्ता होना, जैसा कुछ नहीं होता और आप वास्तविक घटनाक्रम की कोई पटकथा पूर्णतः पूर्व निर्धारित नहीं कर सकते| दूसरा आपको पटकथा के अनुसार सब कुछ या बहुत कुछ चलने पर भी, दो – तीन बार जमीनी हकीकत मालूम करनी चाहिए|

जनसामान्य और सामान्य सैनिक को हमेशा सरल गणित आता है, हमलावरों के मुकाबले बचावदल में जान की हानि कम होनी चाहिए| यह सरल गणित सैन्य और जन मनोविज्ञान का मूल है| कम से कम नुकसान के साथ लक्ष्य प्राप्त करने का और उसके लिए योजना बनाने काम सैन्य – असैन्य नेतृत्व का है, सैनिक का नहीं| अगर इसमें सफलता नहीं मिलती तो यह एक असफलता है|

इस बात को सफलता के तौर पर प्रस्तुत करने क प्रयास हो रहा है कि वहां पठानकोट एयरबेस में मौजूद परिवारों या जहाजों को नुक्सान नहीं हुआ| इस पैमाने पर सफलता और असफलता नहीं आकीं जा सकती| यदि इस प्रकार का नुकसान किसी पूर्व चेतावनी या सूचना के बिना होता है तो उसे असफलता नहीं कहा जा सकता और साथ ही यदि यह नुकसान पूर्व सूचना के बाद भी होता है तो यह असफलता नहीं होती, शर्मनाक होता| क्योंकि पठानकोट हमले की पूर्व सूचना थी, तो इस बात को सफलता के और पर नहीं, संतोष के तौर पर देखा जा सकता है|

यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि किसी भी आत्मघाती आतंकवादी हमले में आतंकवादियों की असफलता नगण्य नहीं होती| उनका लक्ष्य मात्र अपने शिकार को अपने में उलझाना, उसका जितना हो सके नुक्सान करना और मर जाना होता है| अगर हम, आतकवादियों, उनके सहयोगियों और परिवारों के विचारों को समझे तो आत्मघाती आतंकवादी हमलावर की असफलता मात्र उसका जिन्दा पकड़ा जाना और अंतिम असफलता उसका हृदय परिवर्तन होना ही है|

आयें, भविष्य के लिए कुछ सीखें और कुछ पुख्ता योजनायें बनायें|

आम आदमी की अवधारणा


आज सुबह सुबह मुझे नया फितूर चढ़ा; भारत में आम आदमी कौन है? इतना तो तय है कि आम आदमी की इस खास जमात से संतरी से मंत्री तक सब जुड़े रहना चाहते है| सरकारों की तमाम नीतियां, कंपनियों के तमाम विज्ञापन, टेलीविज़न के तमाम कार्यक्रम और क्रिकेट के तमाम खेल सब आम आदमी के लिए बनाये जाते हैं| मगर, आम आदमी की परिभाषा तो दूर अवधारणा भी स्पष्ट नहीं हो रही है|

आम आदमी की अवधारणा प्रायः उस नकारात्मकता के निर्धारित होती है जिसमें कौन आम आदमी नहीं है, यह परिभाषित होता है| अपवाद के रूप में वरिष्ठ अधिकारी और बड़े व्यवसायी, ही अपने समूह को आम आदमी के दायरे से बाहर रखने का प्रयास करते हैं|

प्रायः लोग मध्यम वर्ग को आम आदमी के रूप में देखते है| जिसे सुविधा के लिए मैं स्वीकार कर लेता हूँ| मगर न तो मध्यम वर्ग परिभाषित है और न ही मध्यम वर्ग के सभी लोग आम आदमी माने जाते हैं| हर व्यक्ति के लिए आम आदमी शब्द का अर्थ अलग अलग होता है| मीडिया भी इसमें भूमिका निभाता है, पत्रकार भले ही आम आदमी को कुछ भी परिभाषित करें मगर व्यक्ति विशेष का पूर्वाग्रह अपनी भूमिका निभाता है| प्रायः लेखक और वक्ता उस समूह के लिए इस शब्द का प्रयोग करते हैं जिस में वो खुद आते हैं| सोशल मीडिया में आम आदमी को लेकर अवधारणा में स्पष्ट विभेद देखा जा सकता है|

आम आदमी की अवधारणा में व्यक्ति का अपना आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, जातिगत, और स्थानीय समुदाय प्रायः उसके लिए आम आदमी शब्द की रूपरेखा राय करता है|

दिल्ली और बिहार के चुनावों में, मनरेगा के अनुपालन में, और धर्मनिरपेक्षता, आरक्षण, शाकाहारी भोजन आदि के बारे में हुईं हालिया बहसों में आम आदमी की इसी संकुचित अवधारणा के कारण अधिकांश नीति निर्माताओं ने हाल में भिन्न प्रकार के निर्णय लिए हैं| देश में बहुसंख्य को आम आदमी की अवधारणा से बाहर कर देने से नीति निर्धारण संबंधी दिक्कते पेश आ रहीं हैं|

मीडिया और सामाजिक मीडिया में हो – हल्ला करने वाली भीड़ को आम आदमी नहीं माना जा सकता|

आम आदमी निश्चित रूप से वह व्यक्ति है जिसका शासन – प्रशासन में हित हो मगर मतदान से अधिक मत न हो, वह आम आदमी है|