इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं


तीसरा लप्रेक “इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” सामने है| यह पुस्तक रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” और गिरीन्द्रनाथ झा के “इश्क़ में माटी सोना” से कई मायनों में भिन्न है|

अगर मैं विक्रम नायक के शब्द उधार लूँ, तो यह परिपक्व नादानियों की कहानियां हैं| इन कहानियों में विनीत कुमार की स्त्री – पुरुष सम्बन्ध और प्रेम सम्बन्ध के परिपक्व समझ और उनके अन्तरंग विवरण से उनका साम्य उजागर होता है| अधिकतर कहानियों में महिला पात्र स्पष्टतः मुखर हैं| यह कहानियां प्रेम की उस बदलती इबारत की कहानियां है जिसमें स्त्री सजीव, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी और सुस्पष्ट है| यहाँ स्त्री समाज के सभी सरोकारों के साथ समान तल पर खड़ी है| पुरुष पात्रों में नए बदलते समीकरणों के प्रति एक लाचारगी, बेपरवाही और नादानी भी झलक जाती है| विनीत कुमार के लप्रेक हल्के – फुल्के होते – होते गंभीर हैं और अपने संवादों के कारण दूर तक मार करते हैं| विनीत कुमार का लप्रेक केवल डिजिटल रोमांस नहीं है बल्कि खुदरा प्यार की थोक खबर है, इसमें उस इक्क की बात है जो मरता हैं| विनीत कुमार इस न मरते इश्क़ को मारते – मारते जीने और जीते जाने की लघुकथा है|

विनीत कुमार उस युवा वर्ग से हैं जो जानता – समझता है, “काफ़ी हाउस में पैसे किसी के भी लगें, कलेजा अपना ही कटता है”| विनीत कुमार का इश्क़ के ब्रेकअप की मौजूदगी में अंकुरित होता और अपनी सभी शर्तों – समर्पणों – और समझदारी में फलता – फूलता है| कहानियाँ अपनी लघुता में सम्पूर्ण हैं और उनके संवाद ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं| दो एक संवाद यहाँ प्रस्तुत हैं:

“ब्रेकअप के बाद रिश्तों – यादों को दफ़नाने के लिए अलग से कब्र नहीं खोदने पड़ते”

“जिस शख्स को लोकतंत्र के बेसिक कायदे से प्यार नहीं वो प्यार के भीतर के लोकतंत्र को जिन्दा रख पायेगा?”

“लाइफ में स्ट्रगल के बदले स्टेटस आ जाए तो किसी एक के एक्साइटमेंट को मरना ही होता है”

“उम्र तो मेरी ढल गई न, शौक तो उसी उम्र में ठिठका रहा”

लप्रेक में इश्क़ के बाद सबसे महत्वपूर्ण है, चित्रांकन – विक्रम नायक द्वारा अंकित चित्र कहानियाँ| तीसरे लप्रेक में विक्रम नायक और विनीत कुमार के बीच भाव पूरी भावना के साथ व्यक्त हुए हैं| विक्रम कहानियों को पूरी निष्ठा के साथ पकड़ पाए हैं| लप्रेक में पहली बार मुखपृष्ठ पर इश्क़ अपनी शिद्दत के साथ इसी पुस्तक में आया है| पृष्ठ VIII पर विक्रम अपनी इस रचना की प्रेम – प्रस्तावना एक छोटे से चित्र से रचते हैं| अधिकतर पृष्ठों पर चित्र कहनियों के साथ साम्य रखते हुए अपनी कहानी स्पष्ट और एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं| पृष्ठ 7, 13, 15, 54, 57, 65, 74, आदि पर मेरी कुछ पसंदीदा चित्र कहानियाँ हैं, इसके अलावा भी अनेक बखूबी से चित्रित लप्रेक मौजूद हैं|

“इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” में इश्क़ के बहुत से नमूने हैं, वह वाला भी जिससे आप आजकल में मिले थे|

पुस्तक: इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं
श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: विनीत कुमार
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: जनवरी 2016
पृष्ठ: 85
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2899 – 2
यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

इश्क़ का माटी होना


“लप्रेक” युवा प्रवासियों और महानगरीय स्वप्नरत युवाओं में लोकप्रिय साधारण साहित्य है जिसमे उबाऊ साहित्यिक हिंदी पंडिताऊपन नहीं बल्कि प्रेम का नया नजरिया है| लप्रेक श्रृंखला की दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में है  – “इश्क़ में माटी सोना”| यह रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” से भिन्न है और अलग पाठ का आग्रह रखती है| दोनों लप्रेक में विक्रम नायक अपने रेखाचित्रों के सशक्त परन्तु नवीन कथापाठ के साथ उपस्तिथ हैं|

गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|

गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|

लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|

पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|

कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|

पुस्तक: इश्क़ में माटी सोना

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चित्र: राजकमल प्रकाशन के वेबसाइट स

श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: गिरीन्द्रनाथ झा
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: दिसंबर 2015
पृष्ठ: 88
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2837 – 4
यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

जातिवादी शिक्षा व्यवस्था


बचपन में हम सवर्णों का वास्ता जाति और इसके अभिशाप से नहीं पड़ता| जब हम घर से निकलकर विद्यालय जाते हैं तो पहली बार इसका पता लगता है|

क्या घरों – मुहल्लों में जाति नहीं होती? दिल्ली मुम्बई महानगरों में जाति का प्रकोप मुहल्लों और कॉलोनियों में शायद कम ही दीखता हैं मगर अधिकांश नगरों – महानगरों में मोहल्ले ही जाति के आधार पर बने होते हैं| सवर्ण इलाकों में दलित और अन्य धर्म का रहना मुश्किल है| इसलिए बच्चों को जाति का सीधा भान नहीं होता| भारतीय शहरों में इलाकों के जाति और धर्म के नाम पर होते रहें हैं| हमारे शहरों में ब्राह्मणपुरी, बनियापाड़ा, तमोलीपाड़ा आदि जाति आरक्षित इलाक़े हैं| आज भी नए इलाकों में जाति का प्रकोप बना हुआ है और सवर्ण – पिछड़ा – दलित – उच्चमुस्लिम – निम्नमुस्लिम का प्रकोप बना हुआ है और थोड़ा अंतर यह है कि उसमें सवर्णों में आपसी जाति भेदभाव का स्थान आर्थिक भेदभाव ने ले लिया है|

जिनका बचपन या जीवन बचपन जीवन सवर्ण इलाकों में ही बीता हैं, उन्हें दलित लोगों से कोई विशेष वास्ता नहीं पड़ता| पारस्परिक संवाद का कोई साधन या पारस्परिक व्यवसायिक सम्बन्ध विकास और सवर्णों के गौर सवर्ण व्यवसायों में आने के साथ लगभग समाप्त हो चुके हैं| बहुत से कामों में आज लोग, सभ्यता या मजबूरी के कारण जाति नहीं देखते जैसे ढ़ाबे पर खाना खाना|

विद्यालय और व्यवसाय, जीवन में परिवार और नाते रिश्तों के बाहर पारस्परिक सामाजिक संवाद का अवसर प्रदान करते हैं| सरकारी नौकरियों में सकारात्मक आरक्षण के कारण पारस्परिक संवाद बना है, परन्तु निजी क्षेत्र में नकारात्मक आरक्षण (भेदभाव भी पढ़ सकते हैं) के कारण सवर्ण संस्थाओं में सवर्ण और दलित संस्था में दलित बहुसंख्या[1] काम करती है| निजी क्षेत्र में मजदूरों की नियुक्ति में जरूर जाति भेद कम हैं, मगर मध्यवर्गीय दृष्टि क्षेत्र के बाहर मजदूरों में आपसी जातिवाद और जातिगत गुटबाजी होती है|

विद्यालयों में पारस्परिक सामाजिक संवाद उस कच्ची उम्र में होता है, जहाँ यह जाने अनजाने में हमारे अंतर्मन पर दुष्प्रभाव छोड़ता है| सवर्ण क्षेत्रों में रहने पलने के बाद मेरे लिए भी इस भेदभाव का पाठ कक्षा 6 में मिला था| जहाँ अधिकतर हिन्दू – मुस्लिम सवर्ण और पिछड़े पहले सेक्शन में थे और हिन्दू मुस्लिम दलित तीसरे में| दूसरा सेक्शन सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ों के लिए था| अधिकतर शिक्षक सवर्ण थे और पहले सेक्शन के अलावा कहीं और पढ़ाना उनके लिए महापाप था| अंतरजातीय वार्तालाप गुरुजन के क्रोध को भड़का सकता था| मुझे कई बार यह बताया गया कि जाटवों या कुरैशियों से बात करने से जुबां ख़राब हो जाती है, आप संस्कृतनिष्ठ हिंदी या गाढ़ी उर्दू की जगह अबे – तबे बोलना शुरू कर सकते हैं| मजे की बात है की अबे तबे की भाषा में हमारे गुरुजन जाटवों या कुरैशियों से कहीं अधिक माहिर थे| भेदभाव का पहला पाठ यही था| आज भी स्तिथि नहीं बदली है, केवल बहाने बदल गए हैं| आज अछूत के स्थान पर साफ़ – सफाई, भाषा, गाली – गलौज, या कोई और बहाना लगाया जाता है|

पापा के स्थानांतरण के बाद जब नए स्कूल पहुँचे तो वहाँ हर सेक्शन में लगभग बराबर अनुपात में सभी सामाजिक वर्ग थे मगर…| उसका एक राजनीतिक कारण था, स्थानीय पूर्व सांसद दलित वर्ग से थे और केंद्र में मंत्री रहे थे| मगर सवर्ण और दलित प्रायः आपस में बात नहीं करते थे| कक्षा में सबसे आगे शहरी सवर्ण, उसके बाद ग्रामीण सवर्ण, फिर पिछड़े, फिर शहरी और ग्रामीण दलित थे| इसमें कुछेक अपवाद थे जैसे पूर्व सांसद महोदय का भतीजा अपने एक दो मित्रों से साथ अपनी पसंद की जगह पर बैठता था, वह प्रायः शहरी सवर्णों से पंगा नहीं लेता था और बाकी लोग उससे| मेरे और उसके जैसे दो – तीन लोग ही कक्षा में उन छात्रों में से थे जो जाति सीमा के बाहर हर किसी से बात करते थे| अन्य लोगों से संवाद प्रायः फब्तियों, गालियों, नारेबाजी और “जातिसूचक शब्दों” में होते थे|

जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं; सवर्णों को दलित वर्ग तो निशाना बनाने का एक और हथियार मिल गया| जिसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया तीव्र थी मगर जल्दी ही आर्थिक सुधारों में उसे थाम लिया| अब आर्थिक विकास के कारण होशियार छात्र प्रायः जातिगत आरक्षण को लेकर चिंता नहीं करते| आजकल कम पढ़ने वाले सवर्ण छात्र ही प्रायः दलितों और अन्य आरक्षित वर्गों से कटुता रखते हैं| भले ही अभी यह अपेक्षा से कम है, परन्तु दलित छात्रों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और पढाई – लिखाई का स्टार भी| परन्तु, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक भेदभाव आज भी शिक्षक वर्ग की तरफ से आता है|

हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारण उठे सवालों के तात्कालिक कारणों से हटकर अगर हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था में झांके तो हमारे विश्वविद्यालय सामंती परंपरा के संवाहक हैं| हमारे गुरुजन (और दुर्भाग्य से नवगुरुजन भी) यथा – योग्य चरणवंदना के आधार पर अपने गुरूर की सत्ता को गर्वानुभूति से संचालित कर रहे हैं| शोधार्थी तो वैसे ही बंधुआ हो जाता है, जिसके आगे गुरु घंटाल अपनी गौण – गुरुता सिद्ध करने में लगे रहते हैं| अगर छात्र सामाजिक या आर्थिक तौर पर नीचे पायदान है तो यह बंधुआ – शोधार्थी उनके लिए जन्म- जन्मान्तर का दास हो जाता है| एक शोधार्थी का सामाजिक आन्दोलन में सक्रिय होना विरोधी संगठन के लिए मात्र विरोध होता है परन्तु गुरु – सत्ता के लिए अपने इन्द्रासन पर आघात के समान होता हैं| डोलता हुआ इन्द्रासन शील, शालीनता, साधना और समाधि के नष्ट होने से ही ठिकता है|

[1] भारत के सकल उत्पाद का अधिकांश छोटे और मझौले उद्यमियों से आता हैं जिनका सञ्चालन अधिकतर पिछड़े और दलितों के हाथ में है|