विश्व-बंदी १७ मई


उपशीर्षक – आपूर्ति की जय,

माँग होए मोती बिके, बिन माँग न चून|

रहीम अगर आज दोहा लिखते तो वर्तमान सरकार को इसी प्रकार कुछ अर्थ नीति समझाते| यह अलग बात है कि ज्ञान देने के चक्कर में गाली गलौज का शिकार होते|

भारत पिछले तीन चार वर्षों से मंदी का शिकार है| नोटबंदी, तालाबंदी और श्रमिकबन्दी तक हर कदम ने माँग में कमी पैदा की है| करोना से पहले भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सरकार ने अपने प्रयास किये हैं|

इसके लिए सरकार ने बड़ी कंपनियों के करों में कमी की जो भले ही गलत कदम नहीं था मगर माँग बढ़ाने का काम नहीं कर सकता था| सरकार बजट के महीनों बाद बजट से भी अधिक बड़ा घोषणापत्र लेकर सामने आई| जैसा सबको पता था, कोई लाभ नहीं हुआ| बाजार में पैसा समाप्त होने लगा| सरकार ने व्यवस्था में धन बहाल करने के लिए कई प्रयास किए इनसे महंगाई तो बढ़ी, पर माँग नहीं| अगर आप आँकड़ों में देखें तो महंगाई यानि दाम जिस समय घटने चाहिए तब स्थिर रहे या बेहद कम बढ़े|

इस करोना काल में भी सरकार दो महीने के भीतर कई घोषणा लेकर आई| वर्तमान और दूसरी कड़ी को पांच दिन में शानदार रूप से आत्मनिर्भर भारत नाम से प्रचारित किया गया| जिसमें स्वतन्त्र निदेशकों के पंजीकरण जैसे सामान्य घोषणा की गई जो करोना के महीनों पहले से मौजूद थीं और न माँग बढ़ा सकती थीं न आपूर्ति| वैसे यह जरूर है कि मेरा स्वतंत्र निदेशक के लिए मैंने परीक्षा जरूर करोना तालाबंदी के दौरान उत्तीर्ण की| पिछले पांच छः दिन में सरकार के भी ऐसा कदम नहीं बता सकी जिससे आम भारतीय उपभोक्ता की और से माँग बढ़े| भारतीय उपभोक्ता को बेहद कठिन वेतन कटौती से लेकर रोजगार कटौती का सामना करना पड़ा है| छोटे दुकानदार, फेरीवाले, रेहड़ीवाले, छोटे चिकित्सक, छोटे वकील, छोटे लेखाकार सब आय की कमी का सामना कर रहे हैं| उनके खर्चे कम उस अनुपात में नहीं हुए हैं| किसानों के अपने उत्पाद का दाम नहीं मिल पाया है| भूखा प्यासा मजदूर पैदल अपने बचपन के घरों की और जा रहा है| जो मजदूर वापिस नहीं जा रहा वो या तो जड़ से कट चुका है या फिर शायद अवैध आप्रवासी है|

हर चीज सरकार के हाथ में नहीं है परन्तु सरकार इस बड़े मोटे से पैकेज में से कुछ धन सीधे इस आम जनता तक पहुंचाकर जनता के हाथ में कुछ क्रयशक्ति प्रदान कर सकती थी| सरकार बेरोजगारी भत्ता, मनरेगा, शहरी मनरेगा, मजदूरी सहायता जैसी महत्वपूर्ण बातों पर  चूक गई है| फ़िलहाल अर्थव्यवस्था ठीक होते नहीं नजर आ रही|

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Published by

Aishwarya Mohan Gahrana

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