चलें पर्यटन को

भारत घुमंतुओं का देश है| साल में एक दो शादी – ब्याह, एक – आध गंगा या गोदावरी स्नान, एक –  आध देवी – देवता, दो  – एक मेले, एक – आध किला – मक़बरा, और हुआ तो एक बार तफ़रीह के लिए जाना हम में से ज्यादातर का सालाना शगल है| कुछ नहीं तो इस जगह के कपड़े और उस जगह की मिठाई| गाँव का आदमी १००, शहर का ५०० और महानगर का १००० किलोमीटर तो साल में घूम ही लेता है| यह अलग बात है कि हम उसे पर्यटन कम ही मानते है| जब पर्यटन नहीं मानते तो जिम्मेदार पर्यटन की बात मुश्किल से हो पाती है|

पहले पर्यटन के प्रमुख स्थान, तीर्थस्थान, आदि नदी – नाले – पहाड़  – झरने पार करने के बाद किसी दूर जंगल में होते थे| प्रकृति की गोद, प्रकृति की शान्ति, जिन्दगी के कोलाहल से दूर| आप अपने खाने – पीने का साधारण सामान साथ ले जाते थे| पर्यटन की कठिनियों के कारण, जिनकी भावना पवित्र, जिम्मेदारी पूरी और धन लोभ कम होता था, उनका ही घूमना फिरना या कहें पर्यटन होता था|

आज सुविधाएँ ज्यादा हैं; चौड़ी सड़क, कार, बस, ट्रेन, हेलिकॉप्टर, कैमरे, मोबाइल, होटल, रेस्तराँ, ढाबे, भण्डारे, धर्मशाला| आज भीड़ की भीड़ तीर्थों, राष्ट्रीय उद्यानों, मेलों, आदि के लिए उमड़ पड़ती है| भीड़ गंदगी, प्रदुषण, पैसा और दुर्भावना छोड़ती हुई आगे गंतव्य तक जाती और लौट आती है|

धार्मिक और पर्यटक स्थान अपनी स्वाभाविक पवित्रता और सुन्दरता खोते जा रहे हैं| पर्यटन को सिर्फ एक लाभप्रद व्यवसाय समझकर व्यवसायी से लेकर सरकार तक पर्यटकों को लुभाने और मुनाफा कमाने के प्रयासों में लगी हैं| बनाबटी झरने और खुबसूरत इमारतें स्वाभाविक सब कुल मिला कर पर्यटन को कंक्रीट जंगल की यात्रा बना दे रहे हैं|

उत्तराखंड की त्रासदी को अभी दो चार साल ही बीते हैं, मगर उस वक़्त की गयीं बड़ी बड़ी बातें न सरकार को याद हैं न व्यवसाईयों को| सरकार को मुख्यतः अर्थ – व्यवस्था और कर संकलन से मतलब है और व्यवसाईयों को अपने तात्कालिक लाभ से| लेकिन क्या इस से पर्यटकों की एक पर्यटक के तौर पर जिम्मेदारी ख़त्म या कम हो जाती है?

एक पर्यटक के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है| पवित्रता और सुन्दरता को बचाए रखना उन लोगों की जरूरत और जिम्मेदारी है जो पवित्रता और सुन्दरता के पुजारी हैं; जो सच्चे पर्यटक हैं|

पद – पर्यटन

पद – पर्यटन का अर्थ यह नहीं है कि हम घर से लेकर अपने गंतव्य की यात्रा पैदल करें| इसके कई पहलू है| अधिक पैदल यात्रा, बेहद कम सामान, पर्यटन स्थान से अधिक जुड़ाव|

हम तकनीकि साधनों जैसे प्रदुषण फ़ैलाने वाले ईधन से चलने वाली कारों और अन्य यात्रा साधनों का प्रयोग कम से कम करें| पैदल चलना न सिर्फ आपको स्थानीय प्रकृति और संस्कृति से जोड़ता है वरन आपको स्वस्थ भी बनाता है|

उतना ही सामान ले जाएँ, खरीदें और प्रयोग करें, जितना हम अकेले अपने कन्धों पर उठा सकें| जितना कम सामान होगा, न सिर्फ यात्रा उतनी सफल होगी वरन हम गंदगी भी उतनी कम फैलाएंगे| हर स्थान के खाने का अपना एक स्वाद और संस्कृति होती है| खाने के डिब्बे और बोतलें खरीदने के स्थान पर स्थानीय संस्कृति और स्वाद का आनंद लें| प्रायः होटल और ढाबे पर्यटकों की बहुतायत के पसंद का और ज्यादा मसाले का खाना बनाते हैं| मगर आजकल घर के स्थानीय खाने का विकल्प आसानी से उपलब्ध है|

सबसे जरूरी बात, किसी भी पर्यटन स्थान पर इतनी ही गंदगी फैलाएं जितनी हम समेट कर वापिस ला सकें; इतनी कम कि पैदल लौटने पर भी समेट कर वापिस ला सकें| पानी की प्लास्टिक बोतलें, पेय पदार्थों के कैन, और नमकीन आदि के पैकेट गंदगी और अपवित्रता फ़ैलाने के सबसे बड़े कारक हैं| अगर आपको इनमें आनंद आता है तो घर पर इनका आनंद लें; कहीं जाकर इनका आनंद लेने का कोई मतलब नहीं है| साथ ही बोतलबंद पानी के भी प्रदूषित और नकली होने की सम्भावना भी बनी रहती है| ज्यादातर पर्यटक स्थलों पर साफ़ पानी उपलब्ध रहता है| अगर साफ़ खाना  – पानी नहीं है तो घर या होटल से खाना – पानी लेकर जा सकते हैं|

मैं प्रायः भीड़ वाले धार्मिक और पर्यटक स्थलों से बचना पसंद करता हूँ| कम भीड़ वाली जगह हमें अधिक शान्ति, आराम, प्रेम, सत्कार और सुरक्षा देतीं है|

Note: I am blogging for #ResponsibleTourism activity by Outlook Traveller in association with BlogAdda

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चलें पर्यटन को&rdquo पर एक विचार;

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