ग्रैंड चोला का महास्मरण

आईटीसी ग्रैंड चोला में रुके हुए समय हो गया, परन्तु उसकी याद आज भी ताजा है| भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (ICSI) के राष्ट्रीय महाधिवेशन का आयोजन उस वर्ष चेन्नई के आईटीसी ग्रैंड चोला में था| तय हुआ वहीँ रुका जाए| चेक इन के समय समझ गया, यह अब तक के सभी अनुभवों से बेहतर हो सकता है| हमारे हाथ में किसी ताले की चाबी नहीं थी, बल्कि स्मार्ट कार्ड था| लिफ्ट में प्रवेश से लेकर विभिन्न तलों और सुविधाओं तक पहुँचने तक सब नियंत्रित था| आप चाहकर भी गलत तल पर नहीं जा सकते थे| अपने कमरे में पहुँचते ही प्रसन्नता का अहसास हुआ| कमरे का अपना प्रभामंडल आपको आकर्षित, प्रभावित, प्रफुल्लित, विश्रांत करने के लिए पर्याप्त था| श्रमसाध्य यात्रा के बाद बेहतरीन गद्दे आपको पुकारते ही हैं|

कमरा पूरी तरह स्मार्ट डिवाइस  के साथ जुड़ा हुआ था| द्वार के नेत्र-छिद्र से लेकर कमरे के तापमान तक सब आपके अपने नियंत्रण में था| आप अपने आप में छोटी सी दुनिया के शहंशाह नहीं वरन छोटे मोटे ईश्वर थे| परिचारक सभ्रांत तौर तरीके से बड़ी से लेकर मामूली बातों को समझा गया था| अतिथि के लिये सम्मान किसी भी होटल के लिए आवश्यक होता है परन्तु परिचारक का खुद अपने लिए सम्मान सबसे बेहतर बात होती है|

हमारा नाश्ता बेहद हल्का, स्वादिष्ट और सबसे बड़ी बात, हमारे इच्छित समय पर कमरे में था| इसके बाद के सभी भोजन अधिवेशन के साथ ही थे| देशभर से आये हजारों अतिथियों के अनुरूप सभी स्वाद का ध्यान रखा गया था| भोजन के मामले में मुझे चयन की बेहद कठिनाई हुई| हर प्रकार का बेहतरीन भारतीय भोजन उपलब्ध था|

स्नानागार जीवन का दो प्रतिशत समय लेता है मगर शेष अट्ठानवे प्रतिशत समय की गुणवत्ता तय करता है| बाथटब से लेकर अन्य सभी सुविधाएँ आपको अपने विशिष्ठ होने की अनुभूति करातीं थीं| मेरे लिए यह ईश्वर और अपने आपसे बात करने का बेहतरीन समय था| मेरे कई मित्रों ने स्पा और तरणताल की सुविधाओं का भी बेहतरीन आनंद लिया|

हम प्रोफेशनल लोगों की यात्रायें होटलों की सुख सुविधाओं का आनंद लेने के लिए नहीं होतीं, मगर यदि चुपके से बेहतरीन सुख आपके आप आ जाए तो सोने पर सुहागा जरूर होता है| मुख्य अधिवेशन में भाग लेते हुए भी आप समय निकाल कर आप संबंधों का तानाबाना बुनने में लगे होते हैं| ग्रैंड चोला की ग्रैंड लॉबी इसके लिए बेहतरीन सुविधा प्रदान करती थी| अगर आप गंभीर मुद्दों से ऊबकर चुपचाप अपने आप से बात करने बाहर आते तो आपको अपने आप में खोने देने की पूरी सुविधा थी| स्टाफ किसी भी प्रकार की सहायता के लिए उपलब्ध था|

अधिवेशन के अंतिम दिन अतिथियों को पहले से सूचित करने पर बिना शुल्क चेक आउट समय के बाद भी कुछ समय रुकने की सुविधा दी गई| मैंने इस अतिरक्ति समय में आधा घंटे के नींद ली थी| यह मेरे लिए स्मृति संजोने का समय था, जो आज भी ताजा हैं|

तकनीकि के माध्यम से आप दुनिया को नियंत्रित कर सकते हैं परन्तु आपसी सम्मान और समझ से आप सब कुछ स्वचालित कर सकते हैं|

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ॐकारेश्वर – ममलेश्वर

मध्यप्रदेश का खंडवा जिला पवित्र नदी नर्मदा का विशिष्ट कृपापात्र है| नर्मदा किनारे ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी जिले में पड़ता है| हनुमंतिया से लौटते हुए अचानक ॐकारेश्वर में स्तिथ मध्यप्रदेश पर्यटन के नर्मदा रिसोर्ट में रुकने का कार्यक्रम बना| नर्मदा रिसोर्ट के प्रभारी श्री नितिन कटारे हमें तुरंत ही साग्रह ॐकारेश्वर मंदिर ले गए| शयन आरती शुरू हो चुकी थी| हमारे पूरे प्रयास के बाद भी हमें आरती देखने को नहीं मिली, आरती जरूर ले पाए| आरती करना, आरती देखना और आरती लेना तीनों एक ही मूल घटना के अलग अलग परिणाम है जो पल भर की देरी के कारण बदल जाते हैं| जब हम पहुंचे तब आरती का अंतिम पद गाया जा रहा था| जिस समय हम यहाँ पहुंचे तब शयन आरती हो चुकी थी|

भगवान् शिव उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से यहाँ रात्रि विश्राम के लिए पधार चुके थे| उनका शयनकक्ष तैयार था| उनके बैठने और सोने के स्थान पर चौपड़ बिछी हुई थी, जिससे भगवान् सोने से पहले परिवार के साथ क्रीड़ा का आनंद ले सकें| सुबह ब्रह्ममुहूर्त में भगवान् पुनः प्रस्थान कर जायेंगे| सृष्टि चलाना विकट कार्य है| मैं मन ही मन भगवान् की अनुपस्तिथि पुनः में आने का वचन देता हूँ| आरती लेने के बाद मस्तक पर चन्दन का त्रिपुण्ड धारण कर कर वापिस हो लेता हूँ|

पर्यटन निगम के प्रयास से मुख्य पुरोहित ने हमसे वार्तालाप किया| ॐकारेश्वर मंदिर वास्तव में नर्मदा नदी के बीच मान्धाता नाम के द्वीप पर स्तिथ है| इस द्वीप पर राजा मान्धाता और उनके पुत्रों द्वारा तपस्या की कथा मिलती है| उनकी तपस्या के कारण भगवान् शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए|

भोजन के बाद मध्यरात्रि तक हम उस शांत नगर में भ्रमण करते रहे| प्रातः मैं पुनः ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करता हूँ| भगवान् के प्रस्थान के बाद सूना सूना सा है| लगता नहीं कुछ विशेष है| लोग उसी प्रकार पूजा अर्पण कर रहे है जैसे किसी सामान्य मंदिर में होती प्रतीत होती है| अब ममलेश्वर जाना है| ममलेश्वर मुख्यभूमि पर है| बिना ममलेश्वर दर्शन ॐकारेश्वर दर्शन पूरे नहीं होते| यह प्राचीन मंदिर है| कुछ लोगों की मान्यता है कि यह मूल ज्योतिर्लिंग है तो अन्य के अनुसार दोनों ही मूल हैं| इसका प्राचीन स्थापत्य मुझे अन्य ज्योतिर्लिंग मंदिरों का स्मरण दिलाता है| पण्डे – पंडितों का दक्षिणा के लिए संपर्क करते हैं| तभी मुझे एक तख़्त पर हजार के लगभग मिट्टी के छोटे छोटे शिवलिंग दिखते हैं| मैं उनमें से एक पंडित को बुलाकर उनकी कथा पूछता हूँ| यह कथा सुनाने के बीस रूपये से उनकी बोनी तो हो गई मगर उसके मुख पर बेरोजगारी की चिंता बरकरार है|

हमें अब इंदौर के लिए निकलना है|

 

हनुवंतिया जल महोत्सव

फरवरी 2016 में हुए प्रथम  हनुवंतिया जल महोत्सव के बारे में सुनकर वहां जाने की तीव्र इच्छा थी | मेरी उत्सुकता का अनुमान पिछले ब्लॉग पोस्ट से लग ही जाता है| द्वितीय जल महोत्सव 15 दिसंबर से प्रारंभ हुआ| हम 16 दिसंबर को इन्दोर से टैक्सी द्वारा ढाई – तीन घंटे की यात्रा कर कर हनुवंतिया पहुंचे| निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम ने तम्बुओं (स्विस टेंट) का पूरा गाँव बसा रखा था| आधुनिक प्रकाश व्यवस्था वाले वातानुकूलित तम्बू में आधुनिक दैनिन्दिक सुविधाएँ थीं| सुख सुविधा अनुभव आराम को देखते हुए तबुओं के इन किरायों को अधिक नहीं कहा जा सकता|

क्योंकि हम सूर्यास्त से कुछ पहले ही पहुंचे थे, वहां पर चल रही अधिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सके| नियमानुसार यह गतिविधियाँ सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही हो सकतीं हैं| यहाँ गतिविधियों में जल – क्रीड़ा, साहसिक खेल, आइलैंड कैम्पिंग, हॉट एयर बलून, पेरा सेलिंग, पेरा स्पोर्ट्स, पेरा मोटर्स, स्टार गेजिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, वाटर जार्बिंग, बर्मा ब्रिज, बर्ड वाचिंग, ट्रैकिंग, ट्रीजर हंट, नाईट कैम्पिंग आदि  बहुत कुछ शामिल है|

इंदिरा सागर बांध 950 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है| यह क्षेत्रफल की दृष्टि से सिंगापूर जैसे देश से बड़ा है| समुद्र जैसे विशाल इंदिरा सागर बांध के किनारे टहलना, साइकिल चलाना और चाँदनी रात में लहरों को निहारना अपने आप में अच्छा अनुभव था| निगम की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन तो था ही| आगंतुकों के लिए काफी बड़े भोजनालय का भी प्रबंध किया गया है|

सुबह जल्दी उठकर मैंने योग – ध्यान का नियम पूरा किया| निगम की ओर से योगाचार्य के मार्गदर्शन का लाभ यहाँ लोगों के लिए उपलब्ध है| हवा सुबह से असमान्य रूप से तेज बताई जा रही थी| फिर भी पैरा – ग्लाइडिंग और पैरा – मोटरिंग का आनंद लिया गया| बाद में तेज हवा और तेज लहरों के चलते बहुत से गतिविधियाँ स्थगित कर दीं गईं| मौसम का आप कुछ निश्चित नहीं कह सकते परन्तु इसके बदलते रुख से आनन्द में वृद्धि ही होती है| अगले दिन सभी गतिविधियाँ सामान्य रूप से हो  रहीं थीं, परन्तु मेरे पास उनके लिए समय नहीं था|

दूसरा जल महोत्सव पूरे एक माह चलेगा| अगर आप जल महोत्सव की भीड़ से इतर जाना चाहें तो यहाँ पर्यटन निगम की ओर से स्थाई व्यवस्था है| हाउसबोट का काम अपने अंतिम चरण में था| उनका निरिक्षण करने के बाद उनमें रुकने की इच्छा जाग्रत हुई|

खंडवा रेलवे स्टेशन से हनुवंतिया 50 किलोमीटर है और इन्दोर हवाई अड्डे से यह 150 किलोमीटर है|

नीलाभ जल वाला हनुवंतिया आपको बुला रहा है|

हनुवंतिया पुकारे आजा…

मध्य प्रदेश में जल – पर्यटन? जी हाँ, इंदिरा सागर बांध सुना है न| उसी में सौ से अधिक द्वीप और टापू उभर आये हैं| हनुवंतिया से टापुओं का यह सिलसिला शुरू होता है| हनुवंतिया टापू नहीं है, यह तीन ओर से नर्मदा के बांधे गए जल से घिरा हुआ है| मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम इसको विकसित करने के क्रम में दूसरा जल-महोत्सव आयोजित कर रहा है –  15 दिसंबर 2016 से एक महीने के लिए|

बारिश के बाद जब बाँध में बहुत अच्छा पानी आ जाता है और गर्मियों तक बना रहता है, तब मध्यप्रदेश में जल – पर्यटन का सही समय है| मध्यप्रदेश में कड़ाके की हाड़ कंपाने वाली ठण्ड भी नहीं पड़ती| नर्मदा का पवित्र स्वच्छ जल और प्राकृतिक संसार, आपको लुभाते हैं| आस पास सघन वन, वन्य – जीव, रंग – बिरंगे पक्षी माहौल को रमणीय बना देते हैं| जीवन की आपाधापी से दूर आपको क्या चाहिए – तनाव मुक्त नीलाभ संसार|

हनुवंतिया में क्रुज, मोटर बोट के बाद अब हाउस बोट भी शुरू हो रहीं हैं| जल – क्रीड़ा, साहसिक खेल, आइलैंड कैम्पिंग, हॉट एयर बलून, पेरा सेलिंग, पेरा स्पोर्ट्स, पेरा मोटर्स, स्टार गेजिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, वाटर जार्बिंग, बर्मा ब्रिज, बर्ड वाचिंग, ट्रैकिंग, ट्रीजर हंट, नाईट कैम्पिंग आदि  बहुत कुछ शामिल है|

इंदिरा सागर बांध 950 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा बड़ा है| इस लिए यहाँ पर्यटन के क्षेत्र में विकास और निवेश की अपार संभावनाएं है| सरकार निजी क्षेत्र को यहाँ पर्यटन विकास के लिए प्रेरित कर रही है| जल्दी ही बहुत से रिसोर्ट, हाउसबोट आदि यहाँ आने की सम्भावना हैं|

खंडवा रेलवे स्टेशन से हनुवंतिया 50 किलोमीटर है और इन्दोर हवाई अड्डे से यह 150 किलोमीटर है| मध्य प्रदेश का हरा भरा निमाड़ क्षेत्र (इंदौर के आसपास का क्षेत्र) अपनी संस्कृति और विविधता के लिए जाना जाता है| विन्ध्य पर्वत माला की सतपुड़ा पहाड़ियां, नर्मदा और ताप्ति नदियाँ, ॐकारेश्वर का मंदिर और भीलों की मीठी निमाड़ी बोली निमाड़ की पहचान हैं| मध्य प्रदेश के इसी निमाड़ क्षेत्र में है खंडवा| खंडवा से याद आते हैं – फिल्म अभिनेता अशोक कुमार, किशोर कुमार, अनूप कुमार| हिंदी की प्रसिद्ध राष्ट्रवादी कविता “पुष्प की अभिलाषा” भी पंडित माखन लाल चतुर्वेदी द्वारा यहीं खंडवा में लिखी गई थी|

नीलाभ जल वाला हनुवंतिया आपको बुला रहा है|

 

छोटे पहाड़ी शहर

पालमपुर - बढ़ते वाहन

पालमपुर – बढ़ते वाहन

अक्सर पर्यटक स्थलों पर भीड़भाड़ मुझे उनसे दूर कर देती हैं| अगर भीड़ का अकेलापन ही महसूस करना है तो दिल्ली मुंबई का कोई भी चौराहा क्या बुरा है| कम भीड़भाड़ वाले पर्यटक स्थलों के प्रति मेरा स्वाभाविक आकर्षण मुझे इस बार पालमपुर ले गया|

पहाड़, खुबसूरत शहर, रंगबिरंगे घर, अलग अलग रंग की टिन की छतें, पहाड़ों से नीचे उतरते और पहाड़ों पर ऊपर चढ़ते बादल, बार बार बरसात, जुलाई का पहला सप्ताह, हाल में पहुंचा हुआ मानसून, सब इस जगह को जन्नत बना रहा था|

मगर पहाड़ों पर या किसी भी पर्यटन स्थल पर बढ़ते हुए वाहन बड़ी समस्या हैं| संकरी सड़कों पर वाहनों की भीड़ उन्हें असुरक्षित तो बनाती ही है, वहां के सौंदर्य को भी नष्ट करती है|

मुझे लगता है कि पर्यटक स्थलों के बाहर ही वाहनों को रोक लिया जाना चाहिए और शहर में पारंपरिक साधनों, साइकिल, रिक्शा, घोड़े, खच्चरों का ही प्रयोग होना चाहिए|

नीमराणा फोर्ट पैलेस

नीमराना जाने के मामले में हुआ यूँ कि सब कुछ इत्तिफाक से होता चला गया| एक प्रतियोगिता के चलते एक ब्लॉग पोस्ट यहाँ लिखी गई| जिसमें मैंने पद – पर्यटन यानि घुमक्कड़ी पर अपने विचार रखे थे:

पद – पर्यटन का अर्थ यह नहीं है कि हम घर से लेकर अपने गंतव्य की यात्रा पैदल करें| इसके कई पहलू है| अधिक पैदल यात्रा, बेहद कम सामान, पर्यटन स्थान से अधिक जुड़ाव|

उसके बाद एक प्रसिद्ध पर्यटन पत्रिका के रेस्पोंसिबल टूरिज्म सम्मलेन के लिए बुलावा आया और वहाँ जो कुछ पढ़ा सीखा उस पर भी ब्लॉग पोस्ट यहाँ लिखी गई| अब उन दोनों पोस्ट पर पुरुस्कार स्वरुप नीमराणा जाने का वाउचर मिल गया| मजे की बात यह कि हमारे लिए तारीख तय करना बहुत मुश्किल हुआ, आखिरकार एक पुराने वादे के चलते एक जरूरी मीटिंग में न जाने का फैसला किया गया| खान मार्किट पर नीमराना शॉप में गर्मजोश सवाल के बदले हमें जो महल (कमरा) लेने की उदास सलाह दी गई, वही हमने चुन लिया| वैसे यह चुनाव सही रहा|

मार्च के पहले सप्ताहांत हम बस पकड़ कर नीमराणा जा पहुंचे| राष्ट्रीय राजमार्ग से होटल तक एक पुराने मित्र ने टैक्सी का प्रबंध करवाया था| भारी भरकम विकास के बीच मौजूद छोटी से कस्बाई आबादी से होकर हम एक पुराने किले में प्राचीन शानदार किले में मौजूद अधुनातन शानदार रिजोर्ट पहुंचे|

पुखराज महल

जी हाँ, यही नाम था – पुखराज महल –  जहाँ हम रुके थे| पंद्रहवीं शताब्दी में बने भाग का सबसे ऊपरी और महत्वपूर्ण महल| तीन कमरों (जिनमें से एक को स्नानागार में बदला गया है), एक बालकोनी, एक टेरेस के साथ नीमराणा फोर्ट, शहर और आसपास का शानदार नजारा| प्राचीन आभा देता हुआ फर्नीचर, सजावट और आधुनिक स्नानागार|

पुखराज महल: आधिकारिक फ़ोटो

पुखराज महल: आधिकारिक फ़ोटो

नीमराणा फोर्ट पैलेस का हर कमरा अपने आप में अलग है| उस से दिखाई देने वाला नजारा भी कुछ हद तक बदल जाता है| पुखराज महल से आप स्विमिंग पूल ही नहीं, लगभग पूरा रिसोर्ट ही देख सकते हैं| यहाँ से स्विमिंग पूल, डाइनिंग हॉल, ओपन एयर थिएटर और अन्य सुविधाएँ आदि सब पास ही हैं| कमरों की साज सज्जा आपको एक दिन के महाराजा होने का पूरा अनुभव देने के लिए काफी है|

नीमराणा फोर्ट के नए हिस्से और आधुनिक निर्माण अपने पुरानेपन को आधुनिकता के साथ संजोने का प्रयास है|

हम भी दिनभर पूरे किले में घूमते रहे| सामान्य किलों के विपरीत यहाँ हमें अपनी मर्जी से कहीं भी घूमने, बैठने और खड़े होने की आजादी थी| बहुत से लोग तो लगा कि इसी रिसोर्ट में रुक कर भारतीय वास्तुशास्त्र, इतिहास, भूगोल, कला और संस्कृति की जानकारी ले लेना चाहते हैं| दो तीन लड़के लड़कियां तो शायद फोटोग्राफी में अपना कैरियर यहीं बना लेना चाहते हैं| यह आसन फोटोग्राफी के लिए बढ़िया स्थान है|

हर शनिवार को कुछ न कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है| उस दिन तेज आंधी और बारिश के कारण कार्यक्रम खुले में न होकर बंद कमरे में हुआ| उसके बाद भोजन, गाला डिनर, का साप्ताहिक आयोजन था| यह भी आज सामान्य भोजन कक्ष में हो रहा है|

अगले दिन विंटेज कार से नीमराणा कस्बे का चक्कर लगाया और दिल्ली आ गए| विंटेज कार के ड्राईवर के अलावा हर कोई यहाँ बहुत अधिक औपचारिक था| यह बड़े होटलों में होता है|

यह औसत भारतीय के लिए महंगा मगर एक सुखद अनुभव था|

मध्य प्रदेश में पर्यटन संभावनाएं

मध्य प्रदेश हाल के वर्षों में पर्यटन के क्षेत्र में सबसे अधिक विकास करने वाले राज्यों में बना हुआ है| हाल में संम्पन्न सिंहस्थ महाकुम्भ के अलावा भी मध्य प्रदेश में पर्यटन के लिए जाने वालों की संख्या बढ़ी है| मध्य प्रदेश में पर्यटन के विकास के लिए बहुत से प्रयास किये जा रहे हैं| जिनमें से एक २७ मई २०१६ को दिल्ली में आयोजित रोड शो भी है, जिसे मध्य प्रदेश पर्यटन निगम की असिस्टंट मैनेजिंग डायरेक्टर तन्वी सुन्द्रियाल की उपस्तिथि में आयोजित किया गया|

मध्य प्रदेश को हाल में ६ राष्ट्रीय पर्यटन पुरुस्कार मिले हैं और अभी भी पर्यटन विकास की अपर संभावनाएं हैं| मुझे उनमें से कुछ की चर्चा यहाँ करनी चाहिए:

  • ९ राष्ट्रीय उद्यान:
  • २५ वन्यजीव अभ्यारण्य:
  • ३ उनेस्को विश्व विरासत स्थल: खजुराहो, भीमबेटका, साँची;
  • जलक्षेत्र: इन्द्रासागर, बंसागर, तवा,
  • सांस्कृतिक कार्यक्रम: खजुराहो नृत्य महोत्सव, मालवा उत्सव, तानसेन उत्सव, अल्लाउद्दीन संगीत उत्सव;
  • २ ज्योतिलिंग: महाकालेश्वर, ओमकारेश्वर;
  • २ मुग़ल वास्तुशिल्प: भोपाल, बुरहानपुर;
  • वस्त्रशिल्प: बाघप्रिंट, चंदेरी और महेश्वर साड़ियाँ;
  • १ ब्रॉड गेज रेल रेस्टोरेंट (भोपाल –एक्सप्रेस) – विश्व में एकमात्र;
  • कारवां टूरिज्म – हॉलिडे ऑन व्हील;
  • जल महोत्सव – हनुवान्तिया (जल्दी ही – बरगी, चोरल, भेडाघाट संभावित)
  • फोटोग्राफी पर्यटन – बंसागर, गाँधी सागर आदि
  • बुद्धिस्ट सर्किट, हेरिटेज सर्किट, (स्वदेश दर्शन – भारत सरकार) नर्मदा – दर्शन;
  • प्रकाश – ध्वनि कार्यक्रम – ग्वालियर, ओरछा, खजुराहो, इंदौर, उज्जैन,

इस सब के साथ मध्य प्रदेश पर्यटन संबंधी निवेश को बढ़ावा देने के लिए स्टाम्प ड्यूटी, लक्ज़री टैक्स, आदि में छूट दे रहा है| मांडू, खजुराहो, ग्वालियर, भोपाल, जबलपुर, ओरछा, बुरहानपुर के किये अलग से मार्केटिंग योजना बनाई गई है| अब पर्यटन टोल फ्री १८०० – २३३ – ७७७७ से सरलता से सलाह ले सकते हैं| यात्रियों की सुविधा के लिए प्रमुख मार्गों पर हर ४० – ५० किलोमीटर पर सुविधाओं का विकास किया जा रहा है| प्रदेश में २२ होम स्टे शुरू हुए है और अन्य लोगों के जुड़ने की सम्भावना है|

मांडू के राजमहल

मांडू जाकर लगा कि कभी यहीं जन्नत बसती होगी| अगर पुरातत्व विभाग के सूचनापट्ट की मानें तो ४८ पुरातत्व महत्त्व के स्थान आज भी मांडू में हैं| बताया गया कि कभी मांडू में ७०० मंदिर थे जिनमें से ४०० जैन मंदिर थे| अपने स्वर्णकाल में विश्व के सबसे बड़े महानगर में से एक मांडू को देखने से उस समय की वास्तुकला के गौरव को समझा जा सकता है| बहुत से समकालीन भवनों में मुझे उस भव्यता और समझ – बूझ का अनुभव नहीं होता जितना पंद्रहवीं शताब्दी के जहाज महल में होता है| खासकर महल के जल प्रबंधन को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता| जिस वर्षा जल संचयन (rain water harvesting) की बात आज हम रोज कहते सुनते हैं, वो वहां बहुत सुन्दर रूप में मौजूद है| आज भी मांडू में पानी की किल्लत है मगर उस काल के संघर्षपूर्ण जीवन में पानी का न होना राज्य के लिए तुरंत जीवन – मरण का प्रश्न हो सकता था| शायद, मांडू का पतन पानी के रख रखाव के पुराने तरीकों को छोड़ दिए जाने के कारण ही हुआ होगा| इस माह जब फरक्का शहर के विद्युत् संयंत्र को पानी की कमी के कारण बंद करना पड़ा, मांडू का बूढ़ा जल – प्रबंधन हमारी आधुनिक मूर्खता का मजाक उड़ाते हुए खड़ा है| मुझे लगता है केवल जहाज महल का जल – प्रबंधन देखना ही मांडू जाने को सार्थकता देने के लिए काफी है| जहाज महल में आपको चौथे और छठे मंजिल पर तरणताल (swimming pool) देखने को मिलते है तो उन तक साफ पानी पहुँचाने का शानदार तरीका भी मिलता है| पानी के साफ़ करने के लिए पूरा संयंत्र भी उस समय बनाया गया था, जिसके अवशेष मन मोह लेते हैं|

छत पर तरणताल

छत पर तरणताल

मांडू पहुँचते ही सबसे पहले आपको आदिवासी घरों की बाहरी दीवारों पर बने चित्रण का देखकर आनंद होता है| आज मांडू की अधिकतर आबादी आदिवासी है जो छोटे छोटे घरों में रहती है|

मांडू में यूँ तो हर चप्पे पर इतिहास मौजूद है, मगर शाही महल परिसर का आनंद अलग ही है| हम मांडू पहुँचते ही जहाज महल और हिंडोला महल देखने चल देते हैं| मगर परिसर विशाल है और इसमें बहुत से भवन हैं| हिंडोला भवन की दीवारें आज भी दावत देतीं हैं किसी राजसभा के लिए|

मुझे शाही हमाम बहुत आकर्षित करता है| बहुत रूमानी हैं, उसकी छत में बनाये गए चाँद –सितारे| उस ज़माने में गर्म और ठण्डे पानी के दो नल एक साथ मौजूद हैं| जन्नत का शाही गुसल और कैसा होता होगा?

मांडू - शाही हमाम : स्नानागार

मांडू – शाही हमाम : स्नानागार

नाट्यशाला में आवाज को सबसे पीछे तक पहुंचाने के लिए दीवारों में खोखले रास्ते बनाये गए हैं| प्रकाश संयोजन बेहद उम्दा बन पड़ा है| रिहायश के लिए शानदार इंतजाम है| आप अन्दर रहकर भी दुश्मन से बच सकते हैं| पानी और ठंडी ताजी हवा की कोई कमी नहीं होती| आज यहाँ उस ज़माने में अफ्रीका से लाई गयीं चमगादड़ें अमन – शान्ति से रहतीं है|

मांडू लोहानी दरवाज़े से आप शानदार सूर्यास्त देख सकते हैं| यह दिन का आख़िरी पड़ाव है| हम बहुत बड़ी झील के किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन के मालवा रिसोर्ट में पहुँच रहे है| शांत सुन्दर सुरीली शाम हमारा स्वागत करती है| हम आराम करने के लिए खुली हवा में बैठे खिरनी के बड़े पेड़ के नीचे बैठे है| देशी विदेशी सेलानी रानी रूपमति और बाज बहादुर के बारे में चर्चा कर रहे हैं| संगीत के दो महान फ़नकारों का मांडू में प्रकृति का संगीत हमें रूमानी रूहानियत की ओर ले जा रहा है| सामने पहाड़ी के पीछे हो तो उन दोनों की आत्माएं बसती हैं|

मालवा की शाम ख़ूबसूरत और सुबह शानदार है| हम सुबह छः बजे रानी रूपमती के महल के लिए चल देते हैं| नर्मदा मैया का प्रतीक रेवाकुण्ड यहीं पास में है| रानी रूपमती बिना नर्मदा के दर्शन किये अन्नजल ग्रहण नहीं करेंगी| इसलिए नर्मदा की ओर अंतिम पहाड़ी पर है रानी रूपमती का महल| वैसे रहती हो रानी बाज बहादुर के साथ ही हैं, मगर रोज आती हैं, मीलों दूर स्तिथ नर्मदा के दर्शन करने के लिए| आज धुंध है, हमें नर्मदा मैया दर्शन नहीं देतीं| इतना दूर देखना यूँ भी मुश्किल है| यहाँ अस्तबल होता था और यह दूर पूर्व में होने वाली गतिविधि पर निगाह रखने के लिए निगरानी चौकी भी था| बाज बहादुर का महल यहाँ से दिखाई देता है|

बाज बहादुर का महल, जहाँ संगीत रचता – बसता था| यहाँ की दीवारें और कमरे संगीत के हिसाब से बनवाए गए हैं| अन्यथा यह महल साधारण दिखाई देता है| यहाँ पर होतीं थीं रानी रूपमती, बाज बहादुर और अन्य बड़े संगीतकारों की महफ़िलें|

थोड़ी दूर पर हैं दाई माँ के मकबरे| बताया गया, यह कभी जच्चा – बच्चा अस्पताल की तरह प्रयोग हुए और बाद में मकबरे बने| मगर आज यह इको – पॉइंट की तरह प्रयोग होते हैं|

अब जामी मस्जिद की ओर जा रहे हैं| यह देखने में काफी शानदार ईमारत है| इसके पीछे है होशंगशाह का मकबरा, जिसमें वास्तव में कोई दफ़न नहीं हैं मगर ताजमहल बनाने वालों ने इस से प्रेरणा ली| इसे भारत में संगमरमर की सबसे प्राचीन इमारतों में माना जाता है| इसके साथ बने दालान को हिन्दू शैली में बने होने के कारण धर्मशाला कहा जाता है| एक कथा यह भी है कि जामी मस्जिद, मस्जिद के रूप में प्रयोग होने से पहले यह शाही दरबार के रूप में प्रयोग होती थी और तब शायद यह धर्मशाला शाही मेहमानों के लिए अतिथि गृह रही हो|

मांडू अपने शानदार समय में मालवा की दीर्घकालीन राजधानी धार से टक्कर लेता रहा| मगर इसका इतिहास और भूगोल धार से हमेशा प्रभावित रहा| राजा भोज की नगरी धार के लिए भले ही यह सेन्य दुर्ग के रूप में बसाया गया हो, मगर यह पूरी शान से धार या किसी भी अन्य ऐतिहासिक महानगरी को टक्कर देता है|

पर्यटन जमीन पर

हमारे पर्यटक भगवान नहीं होते, उनसे बढ़कर होते हैं| पर्यटक अपने घर पर भले ही जमीन पर सोता हो, जब भी हम पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते हैं तो बेहद आलीशान कमरा, मखमली गद्देदार पलंग, वातानुकूलन, शानदार देशी – विदेशी खाना आदि हमारे जेहन में होते हैं| हम पर्यटन के नाम पर खान – पान, नाच – गाने के रंग में केवल मौज – मस्ती परोस रहे हैं| क्या मौज – मस्ती के बाहर पर्यटन की दुनिया नहीं है? भले ही इस बारे में कोई सीधी बात नहीं हुई, मगर हाल में आउटलुक ट्रैवलर रेस्पोंसिबल टूरिज्म समिट के दौरान यह बात मेरे दिमाग में घूमती रही| इस सम्मलेन में मेरे प्रश्न के सभी उत्तर थे|

पर्यटन जमीन से भी जुड़ सकता है| लोग वास्तव में संस्कृति और सभ्यता से जुड़ने आते हैं; प्रकृति से प्रेम करते हैं; बेहद सादा जीवन जीना चाहते हैं; बनावट से दूर भी उन्हें दुनिया दिखती है; और पर्यटन विलासिता के बिना भी समृद्ध हो सकता है| यह वो विचार हैं, जो मेरे मन में सम्मलेन के दौरान उमड़ने लगे थे|

किसी भी साधारण सा जीवन यापन भी बिना किसी हो – हल्ले के न केवल नेक पर्यटन हो सकता है वरन एक सुन्दर व्यवसाय भी हो सकता है|

अगर मैं अपनी बात करूं तो शादी के बाद घूमने के लिए हमने गोवा के समुद्रतट के स्थान पोंडिचेरी जाना पसंद किया था| भीड़, गंदगी, हो – हल्ला और शाही स्वागत, यह सब हर किसी के लिए नहीं है| इनसे हमेशा मन को संतुष्टि और शान्ति नहीं मिलती| हम एक भागदौड़ की जिन्दगी जी रहे हैं, हमें शान्ति और संतुष्टि की जरूरत है, जो हमें पर्यटन के माध्यम के मिलते है| एक उचित पर्यटन हमें पर्यावरण, प्रकृति, संस्कृति, समृद्धि, सम्वेदना, और समन्वय से जोड़ता हैं| यह सम्मलेन कहीं न कहीं इन बातों की पुष्टि कर रहा था|

इस सम्मलेन में आईटीसी होटल्स  – रेस्पोंसिबल लक्ज़री, सीजीएच अर्थ – एक्सपीरियंस होटल, नीमराना होटल्स – नॉन-होटल होटल्स, जैसे बड़े होटल थे तो  विलेज वे, चम्बल सफारी, कबानी बम्बू विलेज जैसे अनुभव भी थे| इन सब अनुभवों के अपने अनुभव थे जो हमें एक साथ पर्यटन की फंतासी, उसकी उपलब्धियों और उसकी जमीन और जमीनी हक़ीकत से एक साथ जोड़ते हैं| सरकारें अपनी तरफ से एक साथ पर्यटन को बढ़ावा देने से लेकर उसके समुचित और नियंत्रित विकास के सारे प्रयास कर रहीं हैं| पर्यटकों का अधिक आवागमन किसी भी पर्यटक स्थल के विशिष्ट सौन्दर्य को हानि पहुंचा सकता हैं, इस लिए व्यापक मगर नियंत्रित पर्यटन हमारे समय की आवश्यकता है|

इस सम्मलेन में सरकारों और अफसरानों के विचार और अपने अनुभव सुनने का अवसर भी रहा| इस सम्मलेन में भारत सरकार के पर्यटन विभाग के साथ केरल पर्यटन, मध्य प्रदेश पर्यटन, उत्तराखण्ड पर्यटन, छत्तीसगढ़ पर्यटन, गुजरात पर्यटन, और उत्तर प्रदेश पर्यटन मौजूद थे| इसके अलावा  पर्यटन से जुड़ी अन्य संस्थाओं, और विद्वानों के विचार भी सुनने का  अवसर मिला|

विलेज वे और चम्बल सफारी भले ही सुनने में नए प्रयास और अनुभव मालूम पड़ते हों मगर वो एक उचित रूप से अच्छा व्यवसाय कर रहे हैं|

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चलें पर्यटन को

भारत घुमंतुओं का देश है| साल में एक दो शादी – ब्याह, एक – आध गंगा या गोदावरी स्नान, एक –  आध देवी – देवता, दो  – एक मेले, एक – आध किला – मक़बरा, और हुआ तो एक बार तफ़रीह के लिए जाना हम में से ज्यादातर का सालाना शगल है| कुछ नहीं तो इस जगह के कपड़े और उस जगह की मिठाई| गाँव का आदमी १००, शहर का ५०० और महानगर का १००० किलोमीटर तो साल में घूम ही लेता है| यह अलग बात है कि हम उसे पर्यटन कम ही मानते है| जब पर्यटन नहीं मानते तो जिम्मेदार पर्यटन की बात मुश्किल से हो पाती है|

पहले पर्यटन के प्रमुख स्थान, तीर्थस्थान, आदि नदी – नाले – पहाड़  – झरने पार करने के बाद किसी दूर जंगल में होते थे| प्रकृति की गोद, प्रकृति की शान्ति, जिन्दगी के कोलाहल से दूर| आप अपने खाने – पीने का साधारण सामान साथ ले जाते थे| पर्यटन की कठिनियों के कारण, जिनकी भावना पवित्र, जिम्मेदारी पूरी और धन लोभ कम होता था, उनका ही घूमना फिरना या कहें पर्यटन होता था|

आज सुविधाएँ ज्यादा हैं; चौड़ी सड़क, कार, बस, ट्रेन, हेलिकॉप्टर, कैमरे, मोबाइल, होटल, रेस्तराँ, ढाबे, भण्डारे, धर्मशाला| आज भीड़ की भीड़ तीर्थों, राष्ट्रीय उद्यानों, मेलों, आदि के लिए उमड़ पड़ती है| भीड़ गंदगी, प्रदुषण, पैसा और दुर्भावना छोड़ती हुई आगे गंतव्य तक जाती और लौट आती है|

धार्मिक और पर्यटक स्थान अपनी स्वाभाविक पवित्रता और सुन्दरता खोते जा रहे हैं| पर्यटन को सिर्फ एक लाभप्रद व्यवसाय समझकर व्यवसायी से लेकर सरकार तक पर्यटकों को लुभाने और मुनाफा कमाने के प्रयासों में लगी हैं| बनाबटी झरने और खुबसूरत इमारतें स्वाभाविक सब कुल मिला कर पर्यटन को कंक्रीट जंगल की यात्रा बना दे रहे हैं|

उत्तराखंड की त्रासदी को अभी दो चार साल ही बीते हैं, मगर उस वक़्त की गयीं बड़ी बड़ी बातें न सरकार को याद हैं न व्यवसाईयों को| सरकार को मुख्यतः अर्थ – व्यवस्था और कर संकलन से मतलब है और व्यवसाईयों को अपने तात्कालिक लाभ से| लेकिन क्या इस से पर्यटकों की एक पर्यटक के तौर पर जिम्मेदारी ख़त्म या कम हो जाती है?

एक पर्यटक के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है| पवित्रता और सुन्दरता को बचाए रखना उन लोगों की जरूरत और जिम्मेदारी है जो पवित्रता और सुन्दरता के पुजारी हैं; जो सच्चे पर्यटक हैं|

पद – पर्यटन

पद – पर्यटन का अर्थ यह नहीं है कि हम घर से लेकर अपने गंतव्य की यात्रा पैदल करें| इसके कई पहलू है| अधिक पैदल यात्रा, बेहद कम सामान, पर्यटन स्थान से अधिक जुड़ाव|

हम तकनीकि साधनों जैसे प्रदुषण फ़ैलाने वाले ईधन से चलने वाली कारों और अन्य यात्रा साधनों का प्रयोग कम से कम करें| पैदल चलना न सिर्फ आपको स्थानीय प्रकृति और संस्कृति से जोड़ता है वरन आपको स्वस्थ भी बनाता है|

उतना ही सामान ले जाएँ, खरीदें और प्रयोग करें, जितना हम अकेले अपने कन्धों पर उठा सकें| जितना कम सामान होगा, न सिर्फ यात्रा उतनी सफल होगी वरन हम गंदगी भी उतनी कम फैलाएंगे| हर स्थान के खाने का अपना एक स्वाद और संस्कृति होती है| खाने के डिब्बे और बोतलें खरीदने के स्थान पर स्थानीय संस्कृति और स्वाद का आनंद लें| प्रायः होटल और ढाबे पर्यटकों की बहुतायत के पसंद का और ज्यादा मसाले का खाना बनाते हैं| मगर आजकल घर के स्थानीय खाने का विकल्प आसानी से उपलब्ध है|

सबसे जरूरी बात, किसी भी पर्यटन स्थान पर इतनी ही गंदगी फैलाएं जितनी हम समेट कर वापिस ला सकें; इतनी कम कि पैदल लौटने पर भी समेट कर वापिस ला सकें| पानी की प्लास्टिक बोतलें, पेय पदार्थों के कैन, और नमकीन आदि के पैकेट गंदगी और अपवित्रता फ़ैलाने के सबसे बड़े कारक हैं| अगर आपको इनमें आनंद आता है तो घर पर इनका आनंद लें; कहीं जाकर इनका आनंद लेने का कोई मतलब नहीं है| साथ ही बोतलबंद पानी के भी प्रदूषित और नकली होने की सम्भावना भी बनी रहती है| ज्यादातर पर्यटक स्थलों पर साफ़ पानी उपलब्ध रहता है| अगर साफ़ खाना  – पानी नहीं है तो घर या होटल से खाना – पानी लेकर जा सकते हैं|

मैं प्रायः भीड़ वाले धार्मिक और पर्यटक स्थलों से बचना पसंद करता हूँ| कम भीड़ वाली जगह हमें अधिक शान्ति, आराम, प्रेम, सत्कार और सुरक्षा देतीं है|

Note: I am blogging for #ResponsibleTourism activity by Outlook Traveller in association with BlogAdda