काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी


काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

ख्वाब स्वादिष्ट घुमक्कड़ी के…


हर किसी के सपने एक जैसे नहीं होते| हर किसी की अलग दुनिया, अलग जन्नत होती है| पहले को पुरानी पथरीली इमारतों में जन्नत दिखती है तो दूसरे को कश्मीर की वादियों में, तीसरे को पुड्डुचेरी के समुद्रतट पर, चौथे को जेसलमेर के रेट के टीलों में, पांचवे को अलीगढ़ के गिलहराज (हनुमानजी) मंदिर की आरती में, छठे को पंचसितारा होटल के आलिशान स्नानागार में, सातवें को कुचिपुड़ी नृत्य की भाव-भंगिमाओं में, आठवें को लावणी गायन में तो नवें को गोलगप्पे के पानी में…

जी हाँ, वो नवां मैं हूँ, जिसे गोलगप्पे के पानी में जन्नत दिखती है, जिसे छोटी छोटी बातों में जन्नत दिखती है.. छोटी छोटी खुशियों में जीवन दिखता है, छोटे छोटे दोहों में महाकाव्य  दिखते हैं| | मुझे जन्नत दिखती है.. छोटे पुराने शहरों में मौजूद खाने पीने की छोटी दुकान में, जंगलों में ताड़ी पीकर गाये जाते भील – भिलाला लोकगीत में, नहर किनारे की ठण्डी हवा में, पिलखुन की घनी छाँव में, साइकिल से पुराने शहर की सड़क छानने में|

भारतीय संस्कृति करोड़ों जीवंत संस्कृतियों का समुच्चय, समन्वय और संगति है| अगर आप बड़े की तलाश में दिल्ली का लालकिला, गोवा के समुद्रतट, संजीव कपूर का खाना, एवरेस्ट की चोटियों में ही जन्नत ढूंढते हैं तो आप गलत शायद न हो मगर आप आधारभूत संस्कृति को नजरअंदाज कर देते हैं जो आपके आसपास हर गली नुक्कड़ पर बिखरी पड़ी है|

बिना शक गोलगप्पे इस देश की साँझा संस्कृति हैं मगर गोलगप्पे का पानी या उसमें प्रयोग होने वाली “भरत” देश की साँझा संस्कृति नहीं है| देश के हर शहर के गोलगप्पे अलग स्वाद रखते हैं| गोलगप्पे में अलग अलग तरह की भरत प्रयोग होती है|

महानगरों के लोग सूजी के गोलगप्पे पसंद करते हैं तो सामान्य शहरों में आटे के गोलगप्पे पसंद किये जाते हैं| अलीराजपुर में एक भील ने मुझे मैदा के गोलगप्पे खिलाये| अलीगढ़ में आपको होली के आसपास हरे रंग में आटे और सूजी के गोलगप्पे मिलेंगे, जिनमें भांग का हल्का प्रयोग रहता है|

आगरा अलीगढ़ में गोलगप्पे के पानी में हींग की जबरदस्त प्रयोग होता है| दिल्ली में जलजीरा को खट्टे – मीठे दो चार स्वादों में कम मसालों के साथ प्रयोग किया जाता है| पुरानी दिल्ली में गोलगप्पे का पानी तेज मसालों का स्वाद रखता है| अलग अलग शहरों में धनिये पोदीने की चटनी का पानी अलग ठंडा स्वाद देता है तो इमली का पानी आपकी जीभ पर मीठी खटास छोड़ता है| हर शहर के पानी और खासकर गोलगप्पे के पानी में स्वाद अलग होता है| गोलगप्पे के पानी शहर शहर रंग और रंगत बदलता है| होस्टल के दिनों में बीयर, वाइन, वोडका, नारियल पानी, आदि के साथ गोलगप्पे खाना एक शगल है जिसे आप स्वीकृति अभी नहीं मिली है| ज्यादातर जगह गोलगप्पे का पानी ठंडा रखा जाता है मगर आपको कुछ जगह पर गुनगुना पानी भी मिल जाता है| हल्की गुनगुनी रसम के साथ गोलगप्पा निखर कर आता है|

कहीं गोलगप्पे में उबला आलू भरा जाता है तो कहीं मटर के छोले, कहीं चना मसाला, कहीं केले का गूदा, कहीं बूंदी| उत्तर भारत में प्रायः यह सब ठंडा रहता है और कई बार बर्फ में ठंडा किया जाता है| हैदराबाद में मुझे गोलगप्पे में गर्म गर्म छोले खाने को मिले| कई बार मसाला गोलगप्पे, भरवाँ गोलगप्पे और गोलगप्पा चाट में पानी का प्रयोग नहीं होता और उनमे अलग अलग प्रकार की भरत और चटनियों का प्रयोग होता है| कई बार यह छोटी छोटी राज कचौड़ी का रूप भी ले लेते हैं मगर ज्यादातर इसमें बहुत प्रकार के परिष्कृत तरीकों का प्रयोग और दुकान पर उपलब्ध सामिग्री का प्रयोग होता है| मुझे एक बार गोलगप्पे में मूली की खुर्तल (सलाद) और हरी चटनी का खाने का मौका मिला|

जैसा कि मैंने पहले कहा, देश के हर शहर के गोलगप्पे खाना मेरा एक महत्वपूर्ण सपना है| मेरा सपना है जमीन में जन्नत ढूंढने का, मेरा सपना है, हर छोटे छोटे दिन में छोटी छोटी ख़ुशी ढूंढते जाने का, हर गली नुक्कड़ पर जन्नत जी लेने का|

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शाकाहारी – हाहाकारी


हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|