दक्षिण भारतीय खाना – दिल्ली बनाम चेन्नई

दिल्ली में बहुत से लोगों को लगता है चेन्नई में या तो लोगों को दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता या उनको गलत भोजनालय ले जाया गया| कारण है गलत मसालों का प्रयोग|

दिल्ली में रहकर बिना छुरी कांटे दक्षिण भारतीय खाने की बात सोचना कठिन है| चेन्नई मैं छुरा कांटा तो क्या चम्मच भी कोई शायद ही प्रयोग करता हो| हर भोजनालय में चम्मच मांगते है वेटर समझ जाता है कि बाबू बिहारी (हिंदी भाषी) है| वैसे ज्यादातर वेटर बिहार, उड़ीसा, और बंगाल से मालूम होते हैं|

मुख्य बात तो यह कि दिल्ली में मिलने वाला दक्षिण भारतीय खाना कम से कम दक्षिण भारत का खाना तो नहीं कहा जाना चाहिए| एक महीना चेन्नई और हफ्ते भर त्रिवेंद्रम रहने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगता है| मुझे ऐसा लगता है कि किसी गुमनाम उत्तर भारतीय ने अपना धंधा चमकाने के लिए दिमागी घोड़े दौड़ा कर दक्षिण भारतीय खाने पर किताब लिख मारी हो और दिल्ली के बाकि लोग उसे पढ़कर खाना बनाने में लगे हैं| भला बताइए कोई रोज रोज अरहर में सरसों का तड़का डालकर सांभर बनाता अहि क्या? मगर ऐसा दिल्ली में संभव है| चेन्नई आने से पहले मुझे पता न था कि मूंग दाल से भी सांभर बन सकती है| दिल्ली और चेन्नई के सांभर मसलों के बीच तो विन्ध्याचल का पूरा पठार दीवार बनकर खड़ा है| मसाला डोसा ऐसा मामला भी चेन्नई में कम दिखाई देता है| दिल्ली में पायसम तो शायद खीर की सगी बहन लगती है, मगर यहाँ तो खीर और पायसम में मामा – फूफी का रिश्ता लगता है|

दोनों जगह नारियल चटनी का स्वाद बदल जाता है| इसमें नारियल के ताज़ा होने का भी योगदान होगा|

मुझे याद है कि दिल्ली में एक मित्र ने बोला था मुझे चेन्नई में लोगों को ठीक से दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता|

जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ, खाने पर स्थानीय रंग हमेशा चढ़ता ही है| दिल्ली शहर में आलू टिक्की बर्गर, पनीर – टिक्का पिज़्ज़ा और तड़का चौमिन यूँ ही तो नहीं बिकते|

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चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना

लगभग दस साल पहले की बात है| हम पांडिचेरी और चेन्नई से लौटे थे कि एक मित्र मिलने चले आये| पहले तो उनकी चिंता थी कि हमने हफ्ते भर रोज उत्तर भारतीय खाना कैसे ढूंढा| हमने कहा कि हम हमेशा स्थानीय खाना ही पसंद करते हैं| इसपर उन्होंने कहा कि केले के पत्ते पर खाने की बात ही निराली है और दूसरी बातों की तरफ रुख किया| काश में बता पाता कि चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना भी केले के पत्ते पर मिल जाता है|

इस बार, एक महीने के चेन्नई प्रवास में खाने को लेकर कई नए अनुभव हुए| उनमें से एक था चेन्नई के एल्दम्स रोड पर उत्तर भारतीय खाना| उस शाम में उत्तर भारतीय खाने की बहुत इच्छा थी| उसी एल्द्म्स रोड पर पंजाबी रसोई का खाना मुझे बहुत नहीं भाया था| मुझे सोचना पड़ रहा था कि क्या वो वाकई पंजाबी खाना है|

बहुत दिन दक्षिण भारतीय खाना खाने के बाद, अपने घर ब्रज का खाना दिख जाये तो क्या बात हो| मैंने जैसे ही भोजनालय में प्रवेश किया अलीगढ़ के आसपास बोली जाने वाली ब्रज मिश्रित हिंदी सुनाई दी| पकवान सूची देखे बिना ही खाना यहीं खाया जाए का अटल निर्णय लिया गया| घरेलू खाने की उम्मीद में भूख दोगुनी हो चुकी थी| भोजन में क्या क्या है दिखने से बढ़िया था, थाली मंगा ली जाए| तो पेश – ए – खिदमत है थाली| यह थाली उसके बाद कई शाम गाँव – घर और देश की याद का परदेश में सहारा बनी|

तीन रोटी, एक बड़ा कटोरा चावल, पापड़, दाल अरहर, आलू शोरबा, बूंदी रायता, और बेंगन आलू टमाटर| थाली में तीन रोटियां, किसी भी उत्तर भारतीय के लिए दुःख का सबब है| ब्रज क्षेत्र में तीन रोटियां एक साथ प्रायः मृत्यु उपरांत होने वाले संस्कार में परोसी जाती हैं| केले के गोल कटे पत्ते पर एक बड़ा कटोरा चावल और चावल एक ऊपर मैदा का जीरा वाला पापड़| परोसने का ख़ालिस दक्षिण भारतीय तरीका| एक बड़ा कटोरा उबला चावल रात एक खाने में खाना ब्रज में कभी न हो| दाल अरहर में हींग जीरा और सरसों के तेल का तड़का तो न था, नारियल तेल तला प्याज टमाटर भले ही रहा हो| आलू शोरबा का भी यही हाल था – न सरसों का तेल न देशी घी| बूंदी रायता ठीक था, मगर ब्रज के स्वाद के हिसाब से कम खट्टा, कम तीखा| सूखी सब्जी रोज बदल जाती थी इसलिए उस पर कोई टिपण्णी नहीं करूंगा| इस थाली को मैं पांच में से पूरे चार अंक दूंगा|

कुछ भी सही यह खाना उत्तर भारतीय खाना न सिर्फ आसपास रहने वाले उत्तर भारतियों बल्कि दक्षिण भारतीय लोगों में भी पसंद किया जा रहा था| उत्तर भारतीय खाने के शोकीन थाली तो खैर नहीं लेते थे मगर यहाँ के खाने और चाट-पकौड़ी की ठीक ठाक मांग थी| खाने डिलीवर करने वाली कम्पनियों के कारिंदे लगातार आवाजाही करते रहते हैं|

ऊर्जावान भोजन

भोजन भी विचित्र है| पृथ्वी पर प्रचुर भोजन होने के बाद भी एक तिहाई विश्व भोजन के अल्पता और एक तिहाई भोजन की अधिकता के बीमार और मृत होते हैं| न जाने क्यों? अति सर्वदा वर्जित ही है| भोजन के सन्दर्भ में किसी प्रकार भी अति इसे विष बनाती है|

भोजन वाली भूख तीन प्रकार की होती है –

  1. पेट द्वारा भोजन ग्रहण करने की भूख,
  2. ज्ञानेन्द्रियों द्वारा रसास्वादन की भूख, और
  3. अहम् द्वारा करते रहने की भूख|

मुझे लगता है, यह जितने अखाड़े, जिम, योग केंद्र मोटापा कम कराने के लिए खुलें हैं, यह मुख्यतः अहम् के भूखों और अल्पतः ज्ञानेन्द्रिय के भूखों के लिए खुले हैं| इनके चलते, विश्व भर के किसी भी भोजनालय और भोजन से मुझे कोई कष्ट नहीं|

पेट कितना कितना ग्रहण करता है? गणना के अनुसार औसतन 280 ग्राम – लगभग छप्पन ग्रास| शायद छप्पन भोग का अभिप्राय भी यही हो| संभव है, भक्त अपने आराध्य को हर ग्रास में अलग अलग प्रकार के स्वाद, अलग रस अलग पकवान का भोग लगाने की इच्छा रखते हों| यह थोडा कम ज्यादा हो सकता है| आजकल कैलोरी नापकर खाने का चलन है| ऊर्जा-हीन और ओजहीन खाने में संसाधन की बर्बादी होती है| क्यों न आवश्यकता की सीमा में रहकर ऊर्जावान ओजवान भोजन करें और संसाधन बचाएं| कुछ लोग चाट-पकौड़ी (street-food) तो कुछ देश विदेश या कुछ सात्विक – तामसिक, शाकाहार-मांसाहार और कैलोरी के चक्कर में पड़े रहते है| मेरा मानना है प्रथमतः भोजन हर रस, हर स्वाद से युक्त और ऊर्जावान होना चाहिए और दूसरा आवश्यकता से अधिक नहीं| यह स्वतः अनुभूत कह रहा हूँ| भारतीय धार्मिक परंपरा में छप्पन भोग का विचार यह दर्शाने के सफल है कि अल्प मात्रा में भोजन भी ज्ञानेन्द्रियों को, रसना को, जिव्हा को तृप्त कर सकता है|

अब रहा अहम्, अहम् की संतुष्टि नहीं हो सकती| मैं ऐसे दैत्यों को जानता हूँ पैसा वसूल करने के लिए खाते हैं, खाने को पचाने के लिए दवा खाते हैं और पचाए हुए को जलाने के लिए कसरत-मशक्कत करते हैं| यह लोग अगर आवश्यकता की सीमा में खाएं तो भोजन सामिग्री के साथ साथ समय का सदुपयोग कर पायें| भोजन की आवश्यकता न होने पर ऊर्जाहीन भोजन ग्रहण करना भी अनुचित है|

2017 05 26 दे० हिंदुस्तान

दे० हिंदुस्तान में यह पोस्ट – २६ मई २०१७

देनिक हिंदुस्तान में यह पोस्ट यहाँ छपा है|

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी

काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

ख्वाब स्वादिष्ट घुमक्कड़ी के…

हर किसी के सपने एक जैसे नहीं होते| हर किसी की अलग दुनिया, अलग जन्नत होती है| पहले को पुरानी पथरीली इमारतों में जन्नत दिखती है तो दूसरे को कश्मीर की वादियों में, तीसरे को पुड्डुचेरी के समुद्रतट पर, चौथे को जेसलमेर के रेट के टीलों में, पांचवे को अलीगढ़ के गिलहराज (हनुमानजी) मंदिर की आरती में, छठे को पंचसितारा होटल के आलिशान स्नानागार में, सातवें को कुचिपुड़ी नृत्य की भाव-भंगिमाओं में, आठवें को लावणी गायन में तो नवें को गोलगप्पे के पानी में…

जी हाँ, वो नवां मैं हूँ, जिसे गोलगप्पे के पानी में जन्नत दिखती है, जिसे छोटी छोटी बातों में जन्नत दिखती है.. छोटी छोटी खुशियों में जीवन दिखता है, छोटे छोटे दोहों में महाकाव्य  दिखते हैं| | मुझे जन्नत दिखती है.. छोटे पुराने शहरों में मौजूद खाने पीने की छोटी दुकान में, जंगलों में ताड़ी पीकर गाये जाते भील – भिलाला लोकगीत में, नहर किनारे की ठण्डी हवा में, पिलखुन की घनी छाँव में, साइकिल से पुराने शहर की सड़क छानने में|

भारतीय संस्कृति करोड़ों जीवंत संस्कृतियों का समुच्चय, समन्वय और संगति है| अगर आप बड़े की तलाश में दिल्ली का लालकिला, गोवा के समुद्रतट, संजीव कपूर का खाना, एवरेस्ट की चोटियों में ही जन्नत ढूंढते हैं तो आप गलत शायद न हो मगर आप आधारभूत संस्कृति को नजरअंदाज कर देते हैं जो आपके आसपास हर गली नुक्कड़ पर बिखरी पड़ी है|

बिना शक गोलगप्पे इस देश की साँझा संस्कृति हैं मगर गोलगप्पे का पानी या उसमें प्रयोग होने वाली “भरत” देश की साँझा संस्कृति नहीं है| देश के हर शहर के गोलगप्पे अलग स्वाद रखते हैं| गोलगप्पे में अलग अलग तरह की भरत प्रयोग होती है|

महानगरों के लोग सूजी के गोलगप्पे पसंद करते हैं तो सामान्य शहरों में आटे के गोलगप्पे पसंद किये जाते हैं| अलीराजपुर में एक भील ने मुझे मैदा के गोलगप्पे खिलाये| अलीगढ़ में आपको होली के आसपास हरे रंग में आटे और सूजी के गोलगप्पे मिलेंगे, जिनमें भांग का हल्का प्रयोग रहता है|

आगरा अलीगढ़ में गोलगप्पे के पानी में हींग की जबरदस्त प्रयोग होता है| दिल्ली में जलजीरा को खट्टे – मीठे दो चार स्वादों में कम मसालों के साथ प्रयोग किया जाता है| पुरानी दिल्ली में गोलगप्पे का पानी तेज मसालों का स्वाद रखता है| अलग अलग शहरों में धनिये पोदीने की चटनी का पानी अलग ठंडा स्वाद देता है तो इमली का पानी आपकी जीभ पर मीठी खटास छोड़ता है| हर शहर के पानी और खासकर गोलगप्पे के पानी में स्वाद अलग होता है| गोलगप्पे के पानी शहर शहर रंग और रंगत बदलता है| होस्टल के दिनों में बीयर, वाइन, वोडका, नारियल पानी, आदि के साथ गोलगप्पे खाना एक शगल है जिसे आप स्वीकृति अभी नहीं मिली है| ज्यादातर जगह गोलगप्पे का पानी ठंडा रखा जाता है मगर आपको कुछ जगह पर गुनगुना पानी भी मिल जाता है| हल्की गुनगुनी रसम के साथ गोलगप्पा निखर कर आता है|

कहीं गोलगप्पे में उबला आलू भरा जाता है तो कहीं मटर के छोले, कहीं चना मसाला, कहीं केले का गूदा, कहीं बूंदी| उत्तर भारत में प्रायः यह सब ठंडा रहता है और कई बार बर्फ में ठंडा किया जाता है| हैदराबाद में मुझे गोलगप्पे में गर्म गर्म छोले खाने को मिले| कई बार मसाला गोलगप्पे, भरवाँ गोलगप्पे और गोलगप्पा चाट में पानी का प्रयोग नहीं होता और उनमे अलग अलग प्रकार की भरत और चटनियों का प्रयोग होता है| कई बार यह छोटी छोटी राज कचौड़ी का रूप भी ले लेते हैं मगर ज्यादातर इसमें बहुत प्रकार के परिष्कृत तरीकों का प्रयोग और दुकान पर उपलब्ध सामिग्री का प्रयोग होता है| मुझे एक बार गोलगप्पे में मूली की खुर्तल (सलाद) और हरी चटनी का खाने का मौका मिला|

जैसा कि मैंने पहले कहा, देश के हर शहर के गोलगप्पे खाना मेरा एक महत्वपूर्ण सपना है| मेरा सपना है जमीन में जन्नत ढूंढने का, मेरा सपना है, हर छोटे छोटे दिन में छोटी छोटी ख़ुशी ढूंढते जाने का, हर गली नुक्कड़ पर जन्नत जी लेने का|

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शाकाहारी – हाहाकारी

हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|

भोली भाली माँ

हर माँ की तरह, मेरी माँ को खाना बनाने का बहुत शौक था| वो साधारण दाल रोटी सब्जी को भी ऐसे बनाती थीं, जैसे कोई अनुष्ठान कर रही हों| नहा धोकर ही रसोई में जाना, खाना बनाने में काम आने वाली हर चीज को किसी पवित्र पूजा सामिग्री की तरह आदर देना, किसी भी प्रकार का सकरा या झूठा रसोई में न आने देना, और कम से कम सब्जी छौंकते और दाल या रायते में तड़का लगाते समय वह कुछ नहीं बोलती थीं| शाकाहारी होकर भी, किसी भी खाद्य सामिग्री के लिए आदर का यह हाल था कि बाज़ार में बिकते मांस मछली को देखकर उन्हें अच्छा न लगने के बावजूद मजाल क्या कि उनके चेहरे पर कोई शिकन भी आ जाये| माँ हमेशा कहतीं किसी का खाना देखकर मन में मैल नहीं लाना चाहिए| एक बार हमारी छत पर बिल्ली कहीं से चूहा मार कर ले आई और खा रही थी| घिन के कारण मैंने बिल्ली को चप्पल फैंक कर मार दी| किसी के खाने के अपमान की सजा के तौर पर मुझे उस बिल्ली को दूध पिला कर माफ़ी मांगने की सजा मिली|

माँ खाना खाते समय भी नहीं बोलती थीं| उनके लिए शांत चित्त और पवित्र भाव से भोजन करना और करने देना सबसे बड़ी पूजा थी| जब भी कोई मेहमान आते तो माँ उन्हें पहले खिलाती और साथ बैठकर खाने के प्रस्ताव को प्रायः शालीनता से मना कर देतीं थीं|

हम तीनों बच्चों के संगी साथी हमारे घर खाना खाने की ईच्छा से आते रहते थे| मगर जब छोटी बहन का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला हुआ तब होस्टल में रहने वाले उसके सहपाठियों पर माँ को बहुत लाड़ – दुलार आता था| उन दिनों हमारे घर हर हफ़्ते “माँ के हाथ का घर का खाना” नामक दावतें हुआ करतीं थीं| मगर इसमें उन्हें कुछ दिक्कतें भी पेश आतीं थीं| माँ हमेशा शुद्ध शाकाहारी शास्त्रीय भोजन बनाया करतीं थीं, मगर मेहमान छात्रों में बिहार से लेकर मणिपुर तक से छात्र मौजूद थे| बहुतों को खाने से ज्यादा माँ के हाथ के खाने के भाव के कारण तृप्ति मिलती थी|

भारत की सांस्कृतिक विविधता के ऐसे विरले दुष्कर संगम के समय में माँ की बतकही बहुत काम आती थी| माँ अपने सामान्य ज्ञान, सामान्य विवेक और असामान्य परिकल्पना से बातों का एक स्वप्न बुनतीं थीं और प्रायः मेहमान उस स्वप्न में खुद को अपनी माँ की गोद में बैठा पाता था| इस क्रम में माँ हिंदी अंगेजी उर्दू संस्कृत और ब्रजभाषा में एक तिलिस्म रचतीं और मेहमान को अपनी माँ की कमी या तो बहुत महसूस होती या कुछ देर के लिए माँ को भूल जाता|

उस दिन एक मणिपुरी छात्रा घर पर आई| माँ को मणिपुरी संस्कृति का बहुत ज्ञान नहीं था और मेहमान का हिंदीपट्टी ज्ञान बॉलीवुड से अधिक नहीं था| माँ के लाड़ दुलार और मेहमानवाजी के चलते उसे खाना बहुत पसंद आया| मगर बार बार उत्पन्न होने वाली संवादहीनता के बीच माँ को ग़लतफ़हमी हो गयी की लड़की हिंदी नहीं समझती| ऐसे में उन दोनों ने सफ़लतापूर्वक संवादहीन संवाद कायम कर लिया| जैसे ही हम सब लोग खाने से निवृत्त हुए; माँ की प्रसन्नता चरम पर जा पहुँची| वो चहक कर मुझ से बोली, मेहमान के साथ अच्छा सम्बन्ध बन गया है और मैंने मुझे इतना अपना बना लिया है कि वो अब अलीगढ़ में अपने आप को अकेला नहीं समझेगी और जब भी उसे अपनी माँ की याद  आयेगी तो वो मेरे पास आ पायेगी|

अचानक माँ की वो मणिपुरी मेहमान आँखों में आँसू लेकर हंस पड़ी| उसने हिंदी में जबाब दिया, “हाँ माँ!! आप मेरी माँ की तरह अच्छी हो| मगर भोलेपन में तो आप बहुत ज्यादा एक्सपर्ट हो|”

टिप्पणी: यह पोस्ट इंडीब्लॉगर द्वारा गोदरेज एक्सपर्ट के लिए किये गए आयोजन के लिए लिखी गयी है|