विश्व-बंदी १४ अप्रैल


उपशीर्षक – लम्बा लॉक डाउन 

यह कितना अजीब है कि पूरा देश कैद में हैं और आजाद नहीं होना चाहता| प्रकृति किसी छोटी बात का भी इतना बड़ा बदला इंसानियत से ले सकती है तो इंसान के बड़े बड़े गुनाह…| कहते हैं भगवान की लाठी में आवाज नहीं होती इसलिए शायद हमें नजला, जुकाम, दमा, दिल और दिमाग की हजारों बीमारियाँ चुपचाप मरतीं रहती हैं| हमारी सड़कों पर एक साल में इतने लोग मरते हैं कि दुनिया भर के सारे जंगली जानवरों ने भी कभी नहीं मारे होंगे| मगर हमें सामूहिक मौत से डर लगता है| अगर आशंकाओं की बात करें तो अभी बहुत कम लोग मरे हैं – आशाओं की बात करें तो शायद हम बीमारी के इस तूफ़ान की सिर झुका कर निकलने देने में कामयाब रहेंगे|

आज लॉक डाउन ३ मई तक के लिए बढ़ गया| प्रधानमंत्री के संबोधन मित्रों, भाइयों, साथियों से होकर देशवासियों तक उतर आए| मैं उनके संकल्प में आशा और मन में हताशा देखता हूँ| अगर देश के प्रधानमंत्री को दसियों बार हाथ जोड़ने पड़ते हैं तो यह उनके समर्थकों, अनुयायियों और समालोचकों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए| मैं प्रधानमंत्री को कभी देवदूत, अवतार पुरुष या महामानव नहीं मानता परन्तु भारत के प्रधानमंत्री को अपनी जनता के सामने इतना हाथ जोड़ना पड़े, यह निराश कर देने वाला है| मैं अक्षमताएं समझता हूँ परन्तु सदा की तरह उनके समर्थकों से बहुत निराश हूँ| लोग किसी एक समूह की तरफ इशारा करकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं परन्तु इस बीमारी से निपटने का पहला नियम अपना बचाव है, अगर आप किसी के संपर्क में नहीं आते तो पूरी आशा है कि आप बीमार नहीं पड़ेंगे| अगर आप बीमार पड़ रहे हैं तो पहली गलती आपकी या आपके किसी निकट व्यक्ति की है| और यह बात तब तक सही है जब तक बात कम्युनिटी ट्रांसमिशन से आगे नहीं बढ़ जाती|

मुंबई बांद्रा स्टेशन पर घर वापिस जाने के लिए हजारों लोगों की भीड़ लग गई है| यह आशंका पहले भी थी और कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के सामने यह बात पहले भी रखी थी| यद्यपि मैं मानता हूँ कि उन्हें इस समय घर वापिस भेजना कम खतरनाक नहीं है| परन्तु यदि वो लोग अगर इक्कीस दिन पहले वापिस भेज गए होते तो १४ दिन का आवश्यक क्वॉरंटीन पूरा करने बाद अपने घर में होते और कृषि कार्य में मदद कर रहे होते| साथ ही बड़े शहरों, उनके अस्पतालों और अन्य संसाधनों पर अनावश्यक दबाब भी कम हो जाता| मुंबई में मौजूद लोगों की निराशा इस बात से भी है कि जो लोग २१ दिन पहले पैदल निकले थे वो लोग एक हफ्ते की यात्रा और १४ दिन के क्वॉरंटीन के बाद एक दो दिन में परिवार के साथ होंगे| इस समय यह स्पष्ट है कि अगर ३ मई को भी लॉक डाउन खुल जाए तब भी इनमें से आधे मजदूरों को रोजगार मिलने की संभावना बेहद कम है| मैं मानता हूँ कि अगर लॉक डाउन को ३ मई से आगे बढ़ने की अगर हल्की भी आशंका है तो उन्हें स्वास्थ्य जांच के बाद वापिस जाने की अनुमति दे देनी चाहिए| दोहरी आश्वस्ति के लिए उनके गंतव्य पर पहुँचने पर उन्हें एक हफ्ते के लिए क्वॉरंटीन में रखा जा सकता है| जिन्हें इन मजदूरों से सहानुभूति नहीं है अपने उन मित्रों से पूछे जो भारत सरकार द्वारा विदेशों से निकाल कर लाये गए या अपने अपने देश लोटे हैं|

कल्पना करें आप लॉक डाउन से पहले वाली रात अनजान शहर के महंगे विलासिता पूर्ण होटल में फंस गए हैं, कमाई के साधन तुरंत बंद हो जाते हैं और आपके अपने शहर में आपके बूढ़े माता-पिता एक अदद पत्नी, दो छोटे बच्चे बिना आपके न सही मगर आपकी चिंता में आपकी कुशलता की कामना में रोज दरवाजे पर एक दिया जला रहे होते| हो सकता है कि आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट बहुत हो पर ४० दिन… के साथ इसकी कल्पना तो कीजिए|

सरकार को तुरंत वास्तविकता आधारित निर्णय लेना होगा|

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विश्व-बंदी १३ अप्रैल


उपशीर्षक – अनिश्चितता

सभी चर्चाओं में एक बात स्पष्ट है| मध्य वर्ग लॉक डाउन के लिए मन-बेमन तैयार है| उच्च वर्ग को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु उनके लिए लम्बा लॉक डाउन अधिक कठिनाई भरा होगा| भारत के बाहर भी हालात अच्छे नहीं इसलिए उनकी चिंता है है कि किसी प्रकार काम धंधे को चलाया जाए| लम्बा लॉक डाउन उनकी संपत्ति को बैठे बिठाए नष्ट कर सकता है| वैसे भी अर्थ-व्यवस्था राम-भरोसे है|

निम्नवर्ग को पूछता कौन है, उनके पास विकल्प नहीं है| साथ ही, लंगरों, सरकारी भोजनालयों, रैन बसेरों का उनको सहारा है| इन में से बहुत से लोगों के लिए मुफ्तखोरी बढ़िया चीज है तो बहुत से अन्य आत्मसम्मान बचा कर रखने की लड़ाई हारने के कगार पर है| एक बार आत्म सम्मान नष्ट हो जाता है तो उन्हें नकारा होने से कोई नहीं रोक सकता| शहरी निम्न वर्ग में यह खतरा अधिक है क्योंकि उनका स्वभाविक सामाजिक ताना-बाना परवाहहीन होता है| आत्म-सम्मान सामाजिक सम्मान की कुंजी है| अगर सामाजिक सम्मान की इच्छा न हो तो आत्म सम्मान का कोई मतलब नहीं होता|

मध्यवर्ग की चिंताओं का समुद्रमंथन हो रहा है| यही कारण है कि यह वर्ग रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, आध्यात्म, आदि की चर्चा में व्यस्त रहकर इस समय को काट लेना चाहता है परन्तु उनके पास कोई कारगर राह नहीं| यह वर्ग अपने आप को राष्ट्र का कर्णधार समझता है| इनके पास अपनी हर हार हानि का दोष देने के लिए कोई न कोई होता है – मुस्लिम, आरक्षण, अमीर, गरीब, पूंजीवाद, साम्यवाद, या फिर माता-पिता भी| यह वर्ग महानगरों में सबसे बुरे हालात का सामना करने जा रहा है| करोना की बीमारी भी मुख्यतः इसी वर्ग को प्रभावित कर रही है|

white ceramic sculpture with black face mask

Photo by cottonbro on Pexels.com

कल प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन है| अटकलों का बाजार गर्म है| लॉक डाउन बढ़ता है तो जान है, नहीं बढ़ता तो जहाँ है – वर्ना लटकती तलवार है| जनमानस लम्बे संघर्ष के लिए तैयार है| परन्तु हर किसी को विश्वास है कि किसी को हो मगर बीमारी उसे नहीं होगी| आज देर शाम बाजार की तरफ जाना पड़ा| आधे लोग नक़ाब नहीं पहने थे| मेरे सामने पुलिस वाले ने दो लोगों के डंडे लगाये और तीन लोग गलती से भूल आए की मिन्नत कर रहे थे| मिन्नत करने वालों में एक का कहना था कि उसके पास घर पर हजार रुपए वाला मास्क है| पुलिस वाले ने कहा तो उसे लॉकर में रखो और डंडा कहने के बाद पहनने के लिए सस्ता वाला मास्क खरीद लो|

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विश्व-बंदी १२ अप्रैल


उपशीर्षक – संशय और भूकम्प 

शुरूआती गर्मियों उदास छुट्टियाँ का रविवार बचपन में बड़ा भारी पड़ता था| रसोई पर कुछ खास करने का दबाव रहता तो अनुभव बदलते मौसम में गरिष्ट से बचने की सलाह देता| पंद्रह दिन में किस्से कहानी, किताबें, पतंगे, पतझड़ और खडूस हवाएं नीरस हो चुके होते – ककड़ी, खरबूजा, तरबूजा, खीरा, शर्बतों, और कचूमारों का सहारा भी कोई बहुत दिन तक आकर्षित नहीं कर पाता| दिल के राजा आम अभी बहुत दूर हैं| यहाँ तक आम पना भी अभी उपलब्ध नहीं दिखता|

लॉक डाउन में सबसे बड़ी बात यह कि घर में कोई सहायक नहीं, साफ़ सफाई, रसोई बाजार सब घर के लोगों को ही करने हैं साथ में अपने अपने दफ्तरों के काम भी करने हैं| टेलीविजन की आवाज कम करने के लिए कहने का खतरा भी गंभीर है – आखिर बच्चे क्या करें?

मित्रों के साथ दिन में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए गए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च न मानने की केंद्र सरकारी घोषणा पर चर्चा हुई| हम सब स्वयं-इच्छा योगदान को जबरन सरकारी कर बनाये जाने के सरकारी क़ानून से दुःख महसूस करते रहे हैं, इस बुरे दौर में सरकारी अहम् बेहद चिंता का विषय है| आम राय यह रही कि सरकार को इस बुरे दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च मान लेना चाहिए था – कम से कम कुछ समय के लिए|

सुबह पंजाब में निहंग सिखों के समूह द्वारा पुलिस अधिकारी के हाथ काटने की घटना से बेहद अधिक दुःख हुआ| मुझे यह भारत के विरुद्ध और उससे अधिक मानवता के विरुद्ध युद्ध की घोषणा जैसा लगा| कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सिख देश को डुबो देंगे|

दिन घटना विहीन जा रहा था तभी मोबाइल हाथ से गिरा और आधी स्क्रीन चकनाचूर – काँच की एक छोटी किरच अंगूठे में लग गई| निकालने के देशी नुस्खे अजमाकर चुके ही थे कि मुआ भूकम्प आ धमका| बैठे ठाले यह भूकम्प मुझे ६ से ज्यादा का लगा और यह मानकर कि पहाड़ों या विदेश में केंद्र होगा मुझे ८-९ की आशंका हुई| भला भगवान् का, ३.१ का भूकम्प बताया जा रहा है| उसके बाद भयभीत दिल्ली का दिल बैठा हुआ लग रहा है| वैसे भी दिल्ली के दिल वाले इश्क, कबाब, शराब, शबाब, चाट पकौड़ी बिरयानी के अलावा डरपोक ही होते हैं|

भूकम्प के चलते कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से बात हुई|

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