३७० से आगे


राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णयों में सही गलत के फ़ैसले संविधान तय नहीं करता| सही गलत का निर्णय इतिहास तय करता हैं और इतिहास इतिहासकरों से अधिक समर्थकों और जनकवियों पर आश्रित होता है| आप जो निर्णय आज सही माना जाए वह पांच हजार वर्ष बाद गलत माना जा सकता है|

भावनात्मक समर्थन या विरोध से हटकर कोई तय नहीं कर सकता कि कौरव और पांडवों में नीतिगत रूप से सही उत्तराधिकारी कौन था| कुरुवंश अगली तीन पीढ़ियों में समाप्त हो गया| रावण द्वारा अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं हैं परन्तु प्रश्न यह है कि क्या उसने कठिन शत्रु से शत्रुता करनी चाहिए थी और क्या उसने सही तरीका अपनाया| आज इन प्रश्नों पर विचार का कोई लाभ नहीं|

कश्मीर पर अनुच्छेद ३७० का बना रहना या चले जाना इसी प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर इतिहास देगा| अनुच्छेद ३७० का पक्ष विपक्ष उसके होने न होने के लाभ हानि पर आज केवल भावनात्मक उत्तर देता हैं| संविधान में इस प्रकार के अन्य अनुच्छेद सरलता से मौजूद हैं| जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

कश्मीर मात्र छद्म मुद्दा रहा है| एक रजवाड़े की महत्वाकांक्षा और जनभावनाओं पर उसका अनिर्णय कश्मीर की कुल कहानी हैं जिसमें दो बड़े देश स्थानीय जनता की भावनाओं के बारे में आज तक असमंजस और भय में रहे हैं| वर्ना हैदराबाद, गोवा सेन्य कार्यवाही और जूनागढ़ जनमत के साथ भारत में विलयित हुए हैं और उनकी जनता आज मानती हैं कि उनका भारत विलय उचित रहा है|

इस समय पक्ष विपक्ष के प्रश्न इस बात पर आधारित हैं कि क्या भारत की केन्द्रीय सरकार और शेष भारत की जनता कश्मीर की जनता के साथ भावनात्मक एकता बना पायेगी? खासकर तब जब अनुच्छेद ३७० को निष्प्रभावी बनाते समय केंद्र सरकार ने अतिशय तिकड़म का प्रयोग करते हुए कश्मीर की सशंकित जनता के मन में अधिक अविश्वास पैदा कर दिया हैं| अब इस कदम को सफल बनाने का सारा दारोमदार अब भारत की जनता पर है|

दुर्भाग्य से भारत की जनता का राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर अच्छा प्रदर्शन नहीं रहा है| सामाजिक माध्यमों में जिस प्रकार के असभ्य और अनुपयुक्त सन्देश एक हफ्ते में डाले गए उनसे भारतीय एकता पर मोदी सरकार के प्रयासों को उनके भक्तों की ओर से ही धक्का लगा है| यदि मोदी सरकार और भाजपा कार्यकर्त्ता “भक्त प्रजाति” के समर्थकों पर जल्द काबू नहीं करते तो यह वर्ग सरकार के लिए दूरगामी कठिनाई पैदा कर सकता है|

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प्लेटफ़ॉर्म का पेड़


कौन बड़ा कलाकार है, ईश्वर या मानव?

किसकी कलाकृति में अधिक नैसर्गिक सौंदर्य है? मानव सदा ईश्वरीय सुंदर में अपनी कांट छांट करता रहता है| मानवीय हस्तक्षेप बेहतर मालूम होता है तो गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाता है| आखिर मानव को हर बात में अपना हस्तक्षेप करने की क्या आवश्यकता है? मानव नैसर्गिक सौन्दर्य में अपनी सुविधा के हिसाब से सुन्दरता और कुरूपता देखता है|

चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म एक का दिल्ली छोर| इंजन से लगभग तीन चार डिब्बे की दूरी पर एक सुंदर सा पेड़ है जो स्टेशन के बाहर दूर से देखने पर बड़ा सुन्दर, छायादार, प्रेममय हरा भरा दिखाई देता है| मगर जब हम प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते हैं तो आधुनिक छत और उसकी अत्याधुनिक उपछत के चलते उसका तना ही दिखाई देता है|

अच्छी बात यह है कि मानवीय सौन्दर्यकारों ने इस पेड़ में महत्ता को स्वीकार और अंगीकार किया| उन्होंने हमारे कथित आधुनिक सुविधा भोगी समाज की प्रकृति से दूरी को भी अपने सौन्दर्य कार्य में समाहित किया| पेड़ की प्लेटफ़ॉर्म पर उपस्तिथि को सीमित किया गया है|

इस पेड़ का तना तीन रंगों से रंगा गया है, शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग अच्छा न लगा हो| शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग उन कीट पतंगों को आकर्षित करता हो जिन्हें मानव पसंद न करता हो| पेड़ के चारो उसकी सुरक्षा के लिए और उनकी जड़ों और तनों  के सहारे मौजूद मिट्टी से प्लेटफ़ॉर्म गन्दा होने से बचाने के लिए सुरक्षा बाड़ा भी बनाया गया है| पेड़ का मनोहर हरापन क्रूर आधुनिक की निगाह से बचा लिया गया है| मेरे मन के इस मरोड़ से बेख़बर पेड़ अपने में मगन है| पेड़ प्लेटफ़ॉर्म को आज भी छाया देता है| पेड़ पेड़ है – पिता की भूमिका में बना रहता है| मैं उसके पास बैठकर बोधिसत्व होने की प्रतीक्षा में हूँ|

 

कुली कुचक्र


रेलवे स्टेशन पर समय बिताने के लिए मैंने बेकार खड़े कुली को पकड़ा| इधर उधर की बातें होने लगीं| वह तो सुख दुःख भी साँझा करने लगा| उसका सबसे बड़ा दुःख बहुत छोटा सा था| हमारे बैग और संदूकची में लगे पहिये| मैंने सोचा भी न था कि छोटे से दो पहिये जमीन पर नहीं उसकी छाती को रोंदते हैं और आँतों पर चलते हैं|

पहले आदमी अपने सामान को हाथ में उठाये या कंधे पर लादे हुए थक जाता था| अगर उसके पास पैसा नहीं होता तो थका हारा सामान घसीटता हुआ तेलगाड़ी बना हुआ रेलगाड़ी तक पहुँच जाता| मगर अगर उसके पास थोड़ा भी पैसा होता तो अपने बच्चों की मिठाई का ख्याल छोड़ कुली के बच्चों की पढाई का साधन बन जाता| ऐसा आदमी कटता भी बहुत था|

खाते पीते घर के बाबू लोग सबसे ज्यादा कटते| उन्हें हमेशा लगता रहता कि कुली सब लूटता है और फिर थोड़ी देर मेहनत मशक्कत के बाद कुली उसे हनुमान बाबा का अवतार लगता| भले ही पैसा देते वक़्त वो शनिचर हो जाता मगर कुली का पेट पाल देता| भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर कुली की बहुत मांग रहती| कुली भी नखरे करते| कई बार बिना मांगे लिखित मजदूरी से दोगुना मिलता तो कई बार झगड़ा होता| पैसे वाले तो खैर अपना चाकर साथ लाते और साहब लोग की तरह दुनिया भर से बचते बचाते रेलगाड़ी तक पहुँचते| कई साहब तो इस बात का पैसा देते कि तीसरे दर्जे के लोगों से बचाकर दूसरे रास्ते से उन्हें गाड़ी तक पहुँचाया जाए या उतरा जाए| कई बार लोग लौटने वक्त का कुली जाते वक़्त पक्का कर जाते| क्या साहब, कुली पर तो फ़िल्म भी बन गई| कुली लोग तो पूरा दुबई बसा गए|

मगर जब से संदूकचियाँ गाड़ी हो गईं तो कुली कटने लगे| जिन्हें काम मांगने की जरूरत नहीं होती थी, आज काम की भीख माँगने लगे| लोग स्टेशन पर कुत्ते और भिखारी के बाद कुली को ही सबसे ज्यादा दुत्कारते हैं| दो पहिये नहीं साहब यह हमारे घर का बुझा हुआ चूल्हा है|

ऐसा नहीं कि कुली लूटते है मगर कुली की मजदूरी से काम नहीं बनता| जिन्दा रहने के लिए आपको महीने का पंद्रह हजार तो चाहिए ही| रोज का पांच सौ| दिन में कितनी गाड़ी लगती हैं एक प्लेटफार्म पर जब दस गाड़ी लगें तब कुली को पांच काम पकड़ में आते हैं| उन पांच काम में अब पांच सौ भी न बनें तो घर क्या लेकर जाएँ| लोग अपना सामान दौड़ते हुए चले जाते हैं| उनकी क्या गलती| हमारा भाग्य गलत है| पहियों ने हमारे काम की इज्जत कम कर दी|