खस्ता कचौड़ी की अर्थव्यवस्था


प्रधान जी ने पहले ही पहचान लिया था कि मजेदार खस्ता बनेगा| बोले, खूब तलो, सब मिलकर तलो| नादान समझ न पाए| जब अर्थव्यवस्था के हालत खस्ता हों (या होने वाली हो) तो खस्ता तलने में ही भलाई है| मैं मजाक नहीं कर रहा  हूँ| अभी हाल में अलीगढ़ में कचौड़ी तलने पर सरकारी छापा पड़ा और सालाना बिक्री का आंकड़ा गरमागरम खस्ता निकला – पूरे साठ लाख सालाना|

मुझे अलीगढ़ी कचौड़ियों से प्रेम है| एक समय था, जब मेरी, मेरी पढाई की और देश की हालत ख़राब थे और देश का मण्डल कमण्डल हो रहा था| तब मैंने बहुत सारी चीज़े बनाना सीखा था| उस समय मेरी समझ यह विकसित हुई थी कि कपड़ा और खाना दो धंधे धड़ाकू आदमी के लिए और वकालत और वैद्यकी पढ़ाकू आदमी के लिए बहुत बढ़िया है| यह बात अलग है कि मुझे अब लगता है पहले दो धंधों में पढ़ाकू और दूसरे दो धंधों में धड़ाकू अधिक सफल हैं|

चाट पकौड़ी वाले भोजन में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य अधिक होता है| देखा जाए तो जब तक आपको ग्राहक को बिठाने पर खर्च न करना हो तो लाभ पक्का और पका पकाया है| किसी भी ठीक ठाक चलती दूकान पर पहुँचें तो पाएंगे कि हर पांच मिनिट में उसके पास एक ग्राहक होता है और अगर हर ग्राहक औसतन पचास रुपये का माल उठाता है तो साल भर में इक्कीस लाख रुपये का धंधा हो जाता है| दाम अगर आधे हों तो ग्राहकी चार गुना बढ़ जाती है परन्तु बढ़ी हुई ग्राहकी को सँभालने में दिक्कत रहती है| अगर आपका माल सामान्य से अच्छा है तो आप की बिक्री को कुछ ही दिनों में दोगुना होने से कोई नहीं रोक सकता| इस प्रकार चाट पकौड़ी के बाजार में पचास साठ का धंधा होना एक सामान्य बात है|

आप दिल्ली या किसी भी शहर के किसी भी मोहल्ले के किसी भी चाट पकौड़ी वाले को लें तो पाएंगे कि जिस “भैया” से आप तू तड़ाक करते रहे हैं वह शायद आपके बॉस से अधिक कमाता है| यहाँ तक कि आपके ऑफिस के बाहर बैठा चाय वाला भी आपकी कंपनी खरीद सकता है| शायद आपको मेड इन हेवन –  सीजन वन का प्लम्बर याद हो जिसने वेडिंग प्लानिंग कंपनी में मोटा निवेश किया हुआ था| प्लम्बर का पता नहीं मगर दिल्ली शहर के कई बड़े चाट पकौड़ी वाले देश के महत्वपूर्ण निवेशक हैं| यह सब जीवन की मध्यवर्गीय खस्ता सच्चाई है|

कुछ नया खस्ता बनाइये, पकाइए, खिलाइए|

कलाचित्र की खरीद


कला प्रदर्शनियों में मेरा जाना ऐसा ही रहा है जैसे कोई भूखा बेरोजगार मर्द बनारसी रेशम साड़ी भण्डार पहुँच जाए| इन प्रदर्शनियों में जाकर मेरे पास अपने आप को भरमाये रखने का एक ही तरीका है: अपनी काँख दबाकर और आँख गढ़ाकर कलाचित्रों को चिंदी चिंदी देखने लगना| कभी किसी चित्रकार ने कुछ पूछ लिया तो ब्रश स्ट्रोक से लेकर रंग बिरंग तक कुछ भी भारीभरकम ऊलजुलूल कह दिया| कुछ बेचारे चित्रकार बाकायदा अपनी प्रदर्शनी का निमंत्रण भेजने लगे| हकीकत यह है कि मैं कला के बारे में आजतक कुछ भी नहीं जानता, मगर प्रदर्शनी में चला जाता हूँ| फिर भी चित्रकार से कुछ भी पूछने से बचता हूँ, क्योंकि उनका नजरिया अक्सर कलाचित्र के बनने के साथ ही पुराना हो चुका होता है| मगर इस सब में थोडा बहुत लगाव पैदा हुआ| विधिक और साहित्यिक सभाओं से इतर कला प्रदर्शनियों में आपको विषयवस्तु से सीधी बातचीत का अवसर मिलता है|

अभी हाल में साहित्य पत्रिका सदानीरा के ग्रीष्म २०१९ अंक के मुखपृष्ठ पर छपने जा रहा कलाचित्र मुझे पसंद आया| इसमें एक अभिव्यक्ति की सरलता और विचार की तरलता का अनुभव होता था| जब चित्रकार ने अपने इन्स्टाग्राम पर इसे डाला तो इसने मुझे आकर्षित किया| मैं सिर्फ पत्रिका से ही संतोष कर लेना चाहता था| फिर भी टिपण्णी छोड़ दी कि यह चित्र कुछ दिन में मेरे घर आने वाला है – इशारा पत्रिका की तरफ था| पूछा गया कलाचित्र भी ले आया जाए आपके लिए? मुझे लगा मैंने अपनी फटी जेब भरे चौराहे पर पतलून से बाहर निकाल दी है| फिर भी पूछा, कीमत| मुझे दाम लगाने के लिए कहा गया| कला का क्या दाम (price), उसकी अहमियत (value) होती है| दाम तो खरीददार की जरूरत में होता है| अहमियत और दाम का रिश्ता तो अर्थशास्त्र भी नहीं निकाल पाया| मैंने मात्र अपना बजट बताया| उफ़; बात पक्की, मैंने सोचा| अब कठिनाई यह है कि छोटे से घर में आप इसे सजायेंगे कहाँ? उधर चित्रकार की समस्या थी, अमेरिका से दिल्ली तक का सफ़र और दिल्ली लाकर उसे फ्रेम कराकर मुझ तक सकुशल पहुँचाना|

समय बीता और एक दिन अचानक कलाचित्र मेरे घर में था| तेज बारिश का दिन था| कामकाजी दिन की शाम, बारिश और अरविंदो मार्ग|

अब चित्रकार की बारी थी – अपने ही चित्र को चिंदी चिंदी देखने की| मैं शांत था, मैं एक माँ से उसका बच्चा गोद ले रहा था| मेरे अन्दर का कानूनची अचानक बहुत से क़ानूनी पहलूओं पर खुदबुदा रहा था| मुझे एक कलाचित्र को पालना है, शायद कुछ और कलाचित्रों को भी|

इस कलाचित्र की खरीद के सम्बन्ध में बहुत कुछ सोशल मीडिया पर है| बहुत से लोग जो मौलिक कला खरीदना चाहते हैं उनके लिए मैं पूरी परिघटना यहाँ नीचे लगा रहा हूँ|

 

 

 

३७१ और नगालैंड


पिछले सप्ताह अपने आलेख ३७० से आगे में मैंने लिखा था, जन भावना से इतर नगालैंड सबसे गंभीर मुद्दा है| मोदी जी ने सरकार बनाते ही इस मुद्दे पर ध्यान दिया था जिसपर जनता (खासकर भक्त प्रजाति) ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था|

पूर्वोत्तर भारत के बारे में शेष भारत की जानकारी अत्यल्प रही है| पूर्वोतर को समझने का सरल तरीका अनिल यादव की यात्रा पुस्तक वह भी कोई देस है महाराज हो सकता है| परन्तु यह पुस्तक आज का मेरा विषय नहीं है|

जिस समय भारत एक देश, एक संविधान, एक विधान, एक निशान, एक पतान जैसी बातों में उलझा रहता है, नगालैण्ड से अलगाववादियों द्वारा अपना अनधिकृत झंडा फहराए जाने की ख़बरें भारतीय मुख्यधारा मीडिया में हाशिए पर भी अपनी जगह नहीं बना पातीं| नगालैंड से आने वाली ख़बरों का हाशिए पर रहना शायद कई कारणों से है| शेष भारत को इस्लामिक कश्मीर में अधिक दिलचस्पी है, इसाई नगालैंड से उन्हें अधिक फर्क नहीं पड़ता| जिस समय हम कश्मीर पर उलझे रहते हैं, हम भूल जाते हैं नगालैंड का नाम Unrepresented Nations and Peoples Organization (UNPO) जैसे खतरनाक संगठन में सन १९९३ से मौजूद है| कश्मीर इस संस्था का सदस्य नहीं रहा| यह संस्था UNPO उन भौगोलिक इकाइयों का संगठन हैं जिनके भविष्य में स्वतंत्र राष्ट्र होने के बारे में अन्तराष्ट्रीय प्रयास जारी हैं| आर्मीनिया, पूर्वी तिमूर, एस्टोनिया, लात्विया, जॉर्जिया, पलाऊ, इस संस्था से निकलकर आज सयुंक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बन चुके हैं|

३ अगस्त २०१५ में भारत सरकार ने UNPO में नगालैंड का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नेशनलिस्ट सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड के साथ नई दिल्ली में शांति समझौता किया था| इस समझौते के विवरण किसी भी पक्ष ने जनता के समक्ष नहीं रखे हैं| २०१७ से माना जाता है कि दोनों पक्ष निर्णय के निकट हैं|

वर्तमान मुख्यमंत्री २००३ से २०१३ तक कांग्रेस और २०१८ से अब तक भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री हैं| मुख्यंत्री द्वारा  केंद्र (मोदी) सरकार के नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध किया जाना पिछले साल ख़बरों में रहा था| मुख्यमंत्री का विचार था यह कानून संविधान के अनुच्छेद ३७१ के अनुरूप नहीं हैं| कोई भी मुख्यंत्री अपने राज्य को मिले विशेषाधिकारों को बनाये रखने की बात करेगा| परन्तु भारत की जनता के लिए समझने की बात यह है कि अनुच्छेद ३७० के आगे भी राष्ट्रहित, एकता और अनेकता मौजूद है| अनुच्छेद ३७१ के अनुसार नगालैंड को निम्नलिखित विशेषधिकार प्राप्त हैं –

  • धार्मिक और सामाजिक गतिविधियां;
  • नगा संप्रदाय के कानून;
  • नगा कानूनों के आधार पर नागरिक और आपराधिक मामलों में न्याय; और
  • जमीन का स्वामित्व और खरीद-फरोख्त

मेरा आग्रह यही है कि जन-उन्माद के हटकर सोच समझ कर बातें की जाएँ| भारत्त की अनेकता इसकी शक्ति है| जनमत और जनप्रिय नेतृत्व को उन्माद के आधार पर निर्णय लेने के लिए न उकसाया जाए| राष्ट्र के हितों की समझपूर्वक रक्षा की जानी चाहिए|