धर्म की दूकान


हम भारतीय, विशेषकर हमारा हिन्दू समुदाय अंध भक्ति को जिस तरह से नतमस्तक होकर पसंद करता है; मैं हमेशा से उसका कायल रहा हूँ|

हर मंदिर, मठ, आश्रम, गुरूद्वारे, मकबरे, दरगाह, साधू, सन्यासी, पीर फ़क़ीर हर जगह हमारी भीड़ पहुँच जाती है| घर में चाहे दो जून रोटी न जुटती हो, बेटी के लिये दो मुठ्ठी अनाज न हो; मगर दान दक्षिणा के लिए सवा मन चावल तुरंत जुटा लिया जाता है| बहुत से लोग साल भर इसलिए परिश्रम करते हैं कि साल में एक बार गुरूजी के भण्डार भरने जा सकें|

इस देश में हर चोर उचक्का आज धर्म के नाम पर दूकान खोल कर बैठ जाता है और अगर पकड़ा जाता है तो उसके पालतू एजेंट केसरिया झंडा लहरा लहरा कर धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टिकरण को कोसने देने लगते हैं| इन दुकानों के बड़े बड़े विज्ञापन अखबार, टेलीविजन और इन्टरनेट पर रोज दिखाई देते हैं| अगर आप इन विज्ञापनों को इन्टरनेट, आगे वितरित नहीं करते हैं तो निश्चित ही आपका बुरा होने की खुली धमकी होती है|

मुझे भी कई बार इस प्रकार की दूकान खोलने ला मौका मिला है, मगर मेरे ईमान ने मुझे ऐसा नहीं करने दिया| एक तो बड़ा ही मजेदार किस्सा है| सुनिए:

बात उन दिनों की है जब मैं सोनीपत रहता था| मैं ट्रेन से अलीगढ़ तक जा रहा था| द्वितीय श्रेणी का डिब्बा था| पास में एक लम्पट गेरुआ वस्त्रधारी माला जाप करते हुए धर्म को बदनाम कर रहा था| दरअसल वह साथ में सामने बैठी एक किशोरी और अन्य महिलाओं को अनावश्यक रूप से “देख” रहा था और सभी लोग उस की हरकत से असहज महसूस कर रहे थे| हद तब हुई जब उसने कोई गीत गाना शुरू किया मगर उसके गा गाकर झूमना गलत लग रहा था| जब उसे मना किया गया तो उसने बढ़ते अधर्म की दुहाई देकर और जोर से गाना शुरू कर दिया और इसबार उसने कुछ इशारे भी करना शुरू कर दिया|

मैं अपनी जगह से उठा और मैंने कहा, बाबा! अगले पंद्रह मिनिट और गा ले| बहुत जरूरत पड़ेगी तुझे| भगवान तेरा दिनरात का भजन सुन कर पाक गए हैं और अब अलीगढ़ पर तेरे पिटाई की व्यवस्था की गयी है| इस पर उन महिलाओं में से एक ने बोला, हम भी साथ में इसकी पिटाई करंगे| बाबा का तुरंत ही भगवान् से विश्वास उठ गया और वो दरवाजे पर अपनी गठरी जमा कर चुपचाप बैठ गया|

मगर अभी तो कुछ और मजेदार होना बाकि था| एक सहयात्री जो किसी प्रतियोगी परीक्षा को देकर लौट रहा था, उठकर मेरे पास चला आया बोला भाई साहब, क्या ज्यादा पूजा करने से भगवान वाकई नाराज हो जाते हैं| मैंने कहा, कौन अक्लमंद बेबात की चापलूसी पसंद करता है? फिर भगवान् क्यों करेंगे?

पता चला कि किसी बाबा ने दो साल पहले एक माला और मन्त्र दिया था उसका १००८ बार जाप करना होता है| उसके सभी साथी अपने काम धंधे पर लग चुके थे और ये भाई अभी बेरोजगार थे|

मैंने कहा कि भाई ऐसा करो कि वही मंत्र पढो दिन में केवल दो वक़्त ११ – ११ बार| उसने मुझसे मेरा नाम पता पूछा तो उसे अपना कार्ड दे दिया| यात्रा के बाद मैं यह बात भूल गया| लगभग तीन महीने बाद उस भाई का फ़ोन आया, मुझे गुरूजी कहकर संबोधित कर रहा था| उसकी किसी सरकारी महकमे में नौकरी लग गयी थी| अब तो हर १० दिन में उसके फ़ोन आने लगे| हद तब हुई जब उसकी माँ और पिताजी भी “गुरूजी” यानि मेरे “दर्शन” के लिए आना चाहते थे|

परन्तु मेरा तबादला सोनीपत से दिल्ली के लिए हो गया और मेरा कंपनी का फ़ोन नंबर भी बदल गया| मेरे पुराने नंबर पर कुछ दिन उसके फ़ोन आये| मैंने उस नंबर के नए मालिक को बोल दिया था कि उसे मेरा नया नंबर न दे|

बहरहाल इस घटना का मुझ पर भी काफी फर्क पड़ा| अब मुझे किसी भी गेरुवे कपड़े पहने धूर्त को देख कर उस से वितृष्णा नहीं होती; मैं सोचता हूँ कि कौन कौन इसकी दूकान पर आने को बेताब होगा|

स्तन कैंसर की मरीज: एक शब्द चित्र


 

कल जब बीबीसी हिंदी सेवा की रिपोर्ट पढ़ी कि हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली को स्तन कैंसर नहीं है फिर भी उन्होंने अपने स्तन हटवाए हैं; मैं अपने माँ के बारे में सोच रहा था| कल 15 मई 2013 को मेरी माँ अगर जिन्दा होतीं तो 61वां जन्मदिन मानतीं| मगर 49 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी| उसके बाद मेरी छोटी बहन को लगभग 7 -8 साल के संघर्ष के बाद कैंसर में मात्र 31 की आयु में हमसे छीन लिया| आगे बढ़ने से पहले मैं बता दूँ कि ज्यादातर मामलों में कैंसर लाइलाज नहीं है; मेरी बहन ने पहली बार उसे 6 महीने में पछाड़ दिया था और उसके बाद उसने 6 साल स्वस्थ जीवन जिया|

जब मैं बीबीसी की रिपोर्ट पढ़ रहा था तो मुझे उस पर की गयी टिप्पणियों से विशेष परेशानी हुई| कुछ टिप्पणियाँ इस प्रकार थीं:

“किस किस अंग को हटवाएगी? ये संरचना है भगवान की शरीर तो त्यागना ही होगा एक दिन”

“अब बताइए सब औरतें यही सोचने लगी तो क्या होगा इस दुनिया का नीरस नीरस नीरस”

मुझे बुरा लगा| मैंने लिखा:

“मुझे बेहद दुःख है कि बेहद घटिया बातें बकीगयी हैं यहाँ पर| मेरी माँ, जिनका आज जन्म दिन होता, और मेरी छोटी बहन की मृत्यु स्तन कैंसर से 49 और 31 के उम्र मैं हो गयी| बेहद दर्दनाक होता है| जिनपर बीतती है वो ही जानते है| गलत बात है कि लोग दुनिया के नीरस होने और मौत से भागने की बात कर रहे है| बच्चे को स्तन पान कराने के बाद स्तन का कोई प्रयोग नहीं है और इसका रहना न रहना बेमानी है| रही बात मौत से भागने की तो जिन्हें मौत से ज्यादा प्यार है वो आत्महत्या कर लें”

इसके बाद बीबीसी हिंदी से श्री सुशील कुमार झा ने मुझसे बात की और उसे छापा| बीबीसी हिंदी ने उसे अपने फेसबुक पेज पर और सुशील जी ने इस अपने फेसबुक प्रोफाइल पर सबके साथ साँझा किया है| जिन पर अलग अलग लोगों के विचार आ रहे हैं|

मगर एक टिपण्णी जो मूल रिपोर्ट पर थी और अब हटा दी गयी है कि “बिना **** के कैसे लगेगी?” यह टिपण्णी मुझे रात भर जगाये रही| तो मेरा उत्तर प्रस्तुत है:

मैं नहीं जानता कि एंजेलीना जोली कैसी दिखेंगी और उनके बारे में जानकर किसी को क्या करना है| अगर आपको अंदाजा लगाने का ज्यादा शौक है तो  मैं स्तन कैंसर से काफी ज्यादा पीड़ित एक महिला का शल्य चिकित्सा के बाद के तीसरे महीने का जिक्र कर रहा हूँ| (सलाह है: न पढ़ें)

जीवन का जीवन के लगभग सभी पिछले शारीरिक दर्द अब सिर्फ याद बन कर रह गए हैं| आज अब यदि कैंसर होने से पहले के सबसे तेज दर्द को याद करें तो वो इस दर्द को दस (10) मानने पर दो या तीन (2 या 3) के स्तर पर आयंगे| आज किसी भी पुराने दर्द और प्रताड़ना के लिए किसी से भी कोई शिकायत नहीं है| इंसान कितना भी ताकतवर हो वो दर्द नहीं दे सकता जो ईश्वर (अगर कहीं है) तो देता है| चिकित्सक दर्द की दवा बढ़ाते जा रहे हैं| नहीं!! चिकित्सक मरीज के लिए कोई दवा नहीं दे रहे; दवा इस बात की है कि मरीज शांत रहे, और तीमारदार शांति से सो सकें|

जब मरीज के सामने आप पहली बार जातें है तो ज्यादातर वो पहली नजर में ठीक ठाक लगती है| क्योंकि चिकित्सकों ने उसे काफी बेहतर खुराक लेने के लिए कहा है वरना वो कीमियो थैरपी को नहीं झेल सकती| कहते हैं कि कैंसर से जितनी मौत होतीं हैं उतनी ही इस कीमियो थैरपी से| इस समय मरीज को वो रासायन दिए जा रहे है जिनका प्रयोग विश्व युद्ध में रासायनिक हथियारों के रूप में किया गया था|

एक हल्की मुस्कान आपका स्वागत करेगी; मन में यह भाव है कि आ गया एक और…| चेहरे पर चमक होगी, बिना किसी श्रृंगार के यह महिला आपको अपने जीवन में सबसे ज्यादा सुन्दर लग रही हो सकती है| यदि आपकी निगाह में बारीकी है तो आप पाएंगे कि चेहरे पर कोई बाल नहीं है| ज्यादातर मामलों में सिर को ढक कर रखा गया है क्योंकि सिर पर भी बाल नहीं हैं| जहरीले रसायन सबसे पहले शरीर से बाल हटा देते हैं| सिर से पैर तक कहीं भी कोई बाल, रोंया, रोंगटा कुछ नहीं है| चिकनी चमक दार त्वचा है|

चेहरे के चारों ओर आपको एक प्रभा मंडल दिखाई देगा| जो किसी भी पहुंचे हुए सन्यासी महात्मा से अधिक होगा कम नहीं| आपको याद होगा कि महात्मा बुद्ध को बीमार, मृत और वृद्ध को देख कर संसार की क्षणभंगुरता का अहसास हो गया था| महात्मा बुद्ध ने जो तीनों चीजें देखीं थीं इस महिला ने एक साथ वह अवस्थाएं खुद से अपने इस जीवन में जी लीं हैं| जीवन का सारा सच आमने हैं: प्रथम और अंतिम|

अब शायद यह महिला अपने इलाज में प्रयुक्त रासायनिक विष के कारण कभी चाहकर भी माँ नहीं बन पाएगी| जीवन ने उसे सिखा दिया है कि उसका मातृत्व अब समाप्त हो गया है| अब उसके मन में जो विचार है वो मातृत्व और पितृत्व से ऊपर की बात है मैं उसे नहीं जानता| इसलिए नहीं लिख सकता| मगर यह महिला जानती है|

 

हर कुछ दिन बाद और ठीक होने की स्तिथि में जीवन भर हर साल बार बार इस मरीज को कुछ जांच करानी होंगी जिनमे उन्हें परमाणु – विकरण पैदा करने वाले तत्वों का घोल हर बार पीना होगा और कई बार जांच करने वाला चिकित्सक तीमारदार से कहेगा कि भाई ज़रा दूर बैठना, बच्चों को पास मत बिठाना| हाँ जी!! विकरण का खतरा है तीमारदार को, सोचें मरीज क्या झेल रहा हो सकता है|

साथ ही, मरीज की रेडिओ – थेरेपी भी चल रही है| इसमें शरीर के कैंसर प्रभावित अंदरूनी अंगों को जलाकर नष्ट कर दिया जाता है| जहाँ शल्य चिकित्सा संभव न हो या उन हिस्सों में कैंसर से लड़ना केवल कीमियो थैरपी के बस में न हो या किसी कोई अन्य कारण हो तो इसका प्रगोग करते हैं| आम भाषा में डॉक्टर इस सिकाई ही कहते है| मैंने एक चिकित्सा कर्मी से पूछा था कि कैसा महसूस होता होगा तो उसने जो कहा था मुझे वह पढ़ लें: “पहले आप किसी जलती मोमबत्ती के ऊपर हाथ रख कर खड़े हो जाएँ और फिर माइक्रो – वेब ओवन में पकते बैगन के बारे में सोचें|” जी नहीं! एक दिन में वो हाल नहीं करते मगर.. उस दयालू चिकित्सा कर्मी को मेरा प्रश्न बेहद नागवार गुजरा था|

बिना स्तन और बालों के यह महिला किसी पहुँचे हुए सन्यासी की तरह लगती है| जीवन की हर मलिनता, प्रेम, घृणा, पाप, पूण्य, मोह और लगाव अब इस महिला के लिए बेमानी है| न अब किसी के लिए मन में सहानुभूति है न खुद के लिए सहानुभूति की आवश्यकता है| धर्म और शिक्षा जिस मूलभूत सत्य को दशकों में नहीं सिखा पाते, जीवन के ये कुछ पल स्वयं सिखा देते हैं|

स्तन विहीन महिला, जिसके माँ बनने की सम्भावना नगण्य है, अब भी महिला और पुरुष के भेद से ऊपर है| नहीं! नहीं! वह नपुंसक बिलकुल नहीं है| अब वह मानव है, मात्र मानव|

 

 

क्षमा – शीलता की धुर विरोधी: क्षमा-इच्छा


मेरे पिछले ब्लॉग के बाद कुछ मित्रों में मुझसे बातचीत करते हुए असहमति जताते हुए कहा है कि जब भी भावनाओं को आहात करने वाली कोई भी टिपण्णी सामने आती है तो प्रबुद्ध वर्ग क्षमा याचना की मांग तो करता है है|

प्रथमतः, मुझे यह बात समझ नहीं आई| एक पुराना दोहा पढ़ा था:

छिमा बड़न को चाहिये,   छोटन को उतपात।

कह रहीम हरि का घट्यौ,         जो भृगु मारी लात॥

पूरी कथा से तो आप सभी प्रबुद्ध जन अवगत होंगें ही| भगवान् विष्णू ने इस मिथकीय घटना क्रम में एक श्रेष्ठ उदहारण प्रस्तुत किया है| उन्होंने भृगु द्वारा हमला किये जाने के बाद क्षमा की मांग नहीं की न ही किसी अन्य प्रकार का दबाब नहीं डाला|

मैं यह नहीं कहता कि क्षमा की आशा नहीं करनी चाहिए; परन्तु क्षमा मंगवाने के लिए किसी भी प्रकार का दबाब डालना, बल प्रयोग की धमकी देना, चरित्रहनन करना, बल प्रयोग करना आदि गलत है|

क्षमा किसी के भी ह्रदय परिवर्तन का प्रतिफल होना चाहिए; गले पड़ी मुसीबतों, मूर्खों और मवालियों से पीछा छुड़ाने की गरज का परिलक्षण नहीं| इन दिनों तो हमारे लोकतंत्र का काम ही माफ़ी मंगवाना या प्रतिबंध लगवाना रह गया है| हालत यह है कि साधारण तथ्यों से भी लोगों की भावनाएं आहात हो जाती हैं| अगर आप कह दें की “सूरज पूरब से निकलता है” तो देश में हंगामा हो जाएँ| कहना चाहिए “सूर्यदेव पूर्व दिशा से उदय होते हैं”|

हम रोज ही किसी न किसी को “सॉरी” बोलते हैं; मुझे नहीं लगता ही दस में से एक बार भी हम यह याद रख पाते हैं कि हमने क्यूँ क्षमा प्रार्थना की| यह सिर्फ अपनी शालीनता प्रदर्शन का माध्यम होता है| हमारा कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं होता| क्या इस तरह के आदतन क्षमा याचने से कोई लाभ होता है?

इसी प्रकार, जब कोई गुंडा मवाली सामने से लड़ने आ जाता है तो भी हम क्षमा याचना कर लेते हैं| क्या हम उस गुंडे को गुंडा मानना बंद करते हैं|

कई बार कानूनी कार्यवाही की धमकी दी जाती हैं| यह कई बार हास्यास्पद हो जाती है जब कि सामने वाले की टिप्पणी, अपने सभी सन्दर्भ और प्रसंगों के साथ काफी हद तक सही प्रतीत होती है| हम केवल इसलिए न्यायलय में वाद नहीं कर सकते कि हमारी “आत्म – मुग्धता” को ठेस लगी है| न्यायालय “आत्म – सम्मान” के लिए वाद सुनता है, “आत्म – मुग्धता” के लिए नहीं| बहुधा, इन दोनों स्तिथियों में कोई विशेष अंतर नहीं होता, इसलिए बचना चाहिए| क्योंकि हर कोई न्यायलय के चक्कर काटने से नहीं डरता| खासकर तब जब, उसे पता हो की मुक़दमे की धमकी गीदड़ – भभकी है|

बहुमत का जबरदस्त दबाब आज की भीड़तंत्र में क्षमा मंगवाने का बड़ा तरीका हो गया हैं| क्या एक आदमी का सत्य १०० करोड़ के दबाब से झूठ बन जाता है| कभी नहीं| यह दबाब उस एक आदमी को यह बताता है कि उसका सामना १०० करोड़ जाहिल – गंवारों से हो गया है और न्याय कि अब आशा नहीं बची है| अपने को बचाने के लिए या तो भाग जाओ या हथियार उठा लो|

कई बार क्षमा मंगवाने के लिए मारपीट भी की जाती है| आज देश के सड़कछाप (और सोशल मीडिया छाप) राजनीतिज्ञ और टका – छाप अपराधी तत्वों के लिए यह बड़ा आसन तरीका हो गया है| लोग फर्जी नाम रख कर आये दिन ऐसा कर रहे हैं| हाल में विश्व भर के मिडिया में इस प्रकार की धमकियों के भारतवर्ष में चलन को लेकर काफी चर्चा है| कहा जा रहा है कि भारत में एक ऐसा कट्टरपंथी तबका है जिसे अपनी बात मनवाने के पिटाई करने से लेकर बलात्कार और हत्या करने की धमकी देने में लाज शर्म नहीं आती है| ऐसी भी जानकारियां आ रही हैं कि इसमें प्रबुद्ध कहे जाने वाले डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट जैसे लोग भी अपने नकली नामों के साथ शामिल हैं| विभिन्न संस्थाओं ने नकली नामधारी इन लोगों का डेटाबेस भी तैयार करना शुरू कर दिया है|

मेरी समझ में जबरन क्षमा मंगवाना आतंक फ़ैलाने का प्रथम पायदान है|

जैसा मैंने पहले ही कहा है कि क्षमा मंगवाने का एक ही उचित तरीका हैं, सामने वाले के ह्रदय परिवर्तन का प्रयास करना| ह्रदय परिवर्तन के कई माध्यम हो सकते हैं:

१.       हम सामने वाले के सामने अपने कृत्य से ऐसे उदहारण रखें कि उसे खुद से आत्मग्लानि हो|

२.       हम वह तथ्य भली प्रकार से सामने लायें जिन्हें वह शायद नजर अंदाज कर गया हो|

३.       आपस में बैठ कर एक दुसरे की बात समझें और अपने अपने पक्ष की गलत बातों को सुधारें|

४.       सामने वाले पक्ष की गलत बातों को नजर अंदाज करते हुए समस्त समाज को भली प्रकार से सही बातों की जानकारी दें| जब सामने वाला पक्ष देखेगा कि उसके दुष्प्रचार का सद्प्रचार से मुकाबला किया जा रहा है तो वह स्वमेव शांत हो जायेगा|

कुल मिला कर मेरे विचार से क्षमेच्क्षा (क्षमा मंगवाने की जबरदस्त इच्छा रखना) क्षमा-शीलता का धुर विरोधी है|

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