अलविदा सचिन!!!


 

 

 

English: Sachin Tendulkar's Signature.

सचिन तेंदुलकर के हस्ताक्षर (Photo credit: Wikipedia)

 

पिछले पंद्रह वर्ष से मैंने क्रिकेट का खेल लगभग नहीं देखा है| इसका मुख्य कारण सचिन रमेश तेंदुलकर हैं, ऐसा मुझे लगता है| सचिन के खेल शुरू करने के पहले कई वर्ष तक मैं उनके खेल का कायल था परन्तु धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि अब यह खेल बहुत पेशेवर बन रहा है और भद्रपुरुषों के स्थान पर या तो ईश्वर खेल रहा है या मशीन| मुझे जल्दी ही लगने लगा कि लगभग हर तीसरे मैच में सचिन बहुत बढ़िया खेलेंगे|

 

 

 

English: Sachin Ramesh Tendulkar Wax Statue in...

सचिन रमेश तेंतुलकर – मोम मूर्ति – मैडम तुसाद लन्दन (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

 

क्रिकेट से मेरा मन पहली बार तब टूटा जब १९९२ में मेरे बोर्ड परीक्षा थीं और घर – परिवार – पास  – पड़ोस के लोग मुझे इस महान खेल के विश्व कप मुकाबलों को देखना छोड़कर पढाई करने के लिए टोक – टाक रहे थे| हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला मैं मुश्किल से दुसरे दर्जे को बचा पाया| मेरा आत्मविश्वास पाताल से भी नीचे जा चुका था| मेरा जेबखर्च बंद कर दिया गया| मेरे माथे पर बेवकूफ, नाकारा और मूर्ख होने का कलंक इस तरह लगा की मुझे उसे धोने में कई वर्ष लग गए|

 

 

 

Sachin Tendulkar, Indian cricketer. 4 Test ser...

(Photo credit: Wikipedia)

 

परन्तु जब १९९६ जब इस खेल के विश्व कप मुकाबले चल रहे थे तब मेरा पहली बार अपने पिता से जबरदस्त झगड़ा हुआ| मेरे पिता और मुहल्ले के लोग दिन रात क्रिकेट की लत से त्रस्त थे और मेरी छोटी बहन अपनी बोर्ड परीक्षा की पढाई ठीक से नहीं कर पा रही थी| टेलिविज़न बंद करने या उसकी आवाज कम करने की हर गुजारिश बेकार चली गई| मुझे हार माननी पड़ी और मेरी बहन भी तमाम कोशिश के बाद दुसरे दर्जे में उत्तीर्ण कर पायी| यह अच्छा रहा कि साल भर के भीतर वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश पा गयी|

 

 

 

मुझे क्रिकेट में मैच फिक्सिंग की ख़बरें पढ़कर बहुत धक्का लगा था| मुझे नहीं लगता की इस तरह की बातें किसी भी खिलाड़ी से छिपी रह सकतीं हैं| खेल पर नजर रखने से कई बार यह समझ आ जाता है कि खिलाड़ी या पूरी टीम ही ठीक से नहीं खेल रही थी| कई बार आप देखते हैं, एक मैच में पूरी तरह थका हुआ खिलाडी अगले मैच में मैदान पर आराम करता है मगर टीम में चिपका रहता है|

 

 

 

उन्ही दिनों मुझे यह देख कर दुःख हुआ कि अस्पतालों में मैच वाले दिन न तो डॉक्टर ऑपरेशन करने को तैयार हैं और न ही मरीज के तीमारदार कराने को| सरकारी तो सरकारी, निजी क्षेत्र के कर्मचारी अपनी हाजिरी बनाने के लिए ही कार्यालय में आये हुए हैं मगर काम करने की जगह क्रिकेट पर दिल – दिमाग लगाये बैठे हैं| क्रिकेट ने देश में बहुत सारे कार्यदिवस नष्ट किये हैं, उत्पादन की जबरदस्त हानि की है|

 

English: Sachin Tendulkar at Adelaide Oval

(Photo credit: Wikipedia)

 

मुझे हँसी आती रहती है जब बहुत से लोग क्रिकेट के मैदान पर भारत – पाकिस्तान के सारे मसले सुलझा लेने की बात करते हैं|

 

 

 

जब मैं अपनी नौकरी में आया तो मुझे यह देख कर दुःख हुआ कि मेरे कर्मचारी क्रिकेट मैच को काम समय पर न कर पाने का उचित कारण समझते हैं| मेरे एक कर्मचारी में तो मेरी शिकायत करते हुए लिखा भी कि मैं क्रिकेट मैच वाले दिन भी सामान्य दिनों जितना ही काम करवाना चाहता हूँ| न चाहते हुए भी मुझे कुछ कर्मचारियों को उन क्रिकेट मैचों में जबरन अवकाश पर भेजना पड़ा, जिनमें भारतीय टीम खेल रही हो|

 

 

 

अपने जीवन में मैंने कभी यह उम्मीद नहीं की और शायद आगे भी नहीं कर पाउँगा कि भारत पाकिस्तान के क्रिकेट मैच के दौरान कोई माँ भी अपने बच्चे को मन लगा कर दूध भी पिला सकती है|

 

 

 

मुझे क्रिकेट के नए स्वरुप बीस – बीस ( जिसे बहुत से लोग बकवास – बीस मानते हैं) से कुछ उम्मीद है कि जल्दी ही यह दिन भर लम्बे एक दिवसीय क्रिकेट को समाप्त कर देगा| इस से करोड़ों कार्यदिवसों की बचत होगी और विश्व की पच्चीस फीसदी कार्मिक कार्यालयों में अपना काम करती रहेगी|

 

 

 

इसके बाद अब सचिन तेंदुलकर की सेवा निवृति से भी देश को राहत मिलेगी और बहुत से लोगों को क्रिकेट देखने का नशा शायद कुछ कम हो सकेगा| सबसे बड़ी बात शायद क्रिकेट एक बार फिर मशीन और भगवान के स्थान पर भद्रपुरुष इस खेल को खेलेंगे|

 

 

 

अलविदा सचिन!!!

 

 

 

 

 

विरोधी और आलोचक


 

स्कूल के दिनों में मेरे एक शिक्षक कहा करते थे कि अपने आलोचकों और विरोधियों के साथ आदर का व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह हमेशा मित्रों से बढ़कर आपके बारे में सोचते हैं| आपके मित्र यदा कदा आपकी कमियों को छिपाकर आपको तात्कालिक संकट से बचा तो लेते हैं परन्तु बड़ा संकट सदा तैयार रहता है| विरोधी आपकी कमियों का इतना प्रचार करते हैं कि आपको किसी भी संकट से पूर्व अपनी कमी दूर करने और अपने को हमेशा तैयार रहने में मदद मिल सकती है|

सामाजिक व्यवहार हमारे लिए कई मित्र और विरोधी उत्पन्न करता है| मित्र समय की कमी और भौगोलिक दूरी के कारण प्रायः दूर के ढोल हो जाते हैं| कभी कभार आप मित्रों के साप्ताहिक अवकाश और तीज – त्यौहार से भी जोड़ कर देख सकते हैं| मित्र कई वर्ग के होते हैं; मोहल्ले वाले, कार्यालय वाले, बस – ट्रेन – मेट्रो वाले, बचपन वाले, फेसबुक वाले और चलते – फिरते वाले| विरोधी ऐसा नहीं करते और वह न सिर्फ भौतिक – मानसिक वरन साइबर रूप में भी आपके आगे पीछे रहते हैं| कह सकते हैं कि परछाई साथ छोड़ सकती है मगर विरोधी और मृत्यु नहीं|

यह कई बार स्तिथि बहुत ही प्रसन्नता दायक हो जाती है| अभी हाल में मेरी भेंट अपने एक विरोधी समूह से बहुत दिनों बाद हुई| उन्हें देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई, इसलिए नहीं की मुझे विरोधीगण बहुत प्रसन्न हैं| एक कारण से मुझे यह भ्रम हो रहा था कि वह लोग मित्रता करना चाहते हैं| मगर मिलते ही शहद मिश्रित कटुवचन मुझे प्रदान किये गए| धीरे धीरे मुझे यह अहसास होने लगा कि मैं नितांत असफल, मित्र विहीन, इन्टरनेट का लती किताबी कीड़ा हूँ| मुझे वहाँ रुकना लगभग असंभव हो रहा था और वो लोग उस समय आलोचना से भाग खड़े होने वाले अशिष्ट असामाजिक लोगों के बारे में चर्चा करने लगे थे| मैं अब भाग जाने में भी संकोच अनुभव कर रहा था|

मगर अचानक मुझे समझ आया कि वह लोग मेरे सफल आलोचक इसलिए हैं कि वह पूरी तरह से हर स्थान पर मेरा अनुसरण करते हैं| उन लोगों में मेरे एक एक फालतू ट्वीट को अक्षर मात्र के साथ पढ़ा हुआ था| मेरे कई ब्लॉग उन्हें जबानी याद थे| मेरे असामाजिक व्यवहार और असामाजिक सोच पर उनके पास व्याख्यान तैयार थे|

मैंने अचानक ही उनमें से दो को मेरे ब्लॉग इतना ध्यान से पढने के लिए धन्यवाद दिया और वह सभी तुरंत ही हवा में विलीन हो गए| इस आलेख को लिखना प्रारंभ करते समय मैंने अपने ब्लॉग की अनुसरण सूची देखी तो पाया मेरे सभी विरोधी और आलोचक सादर यथा स्थान उपस्थित हैं|

मगर मित्र…. लगता है अभी और घनिष्ट मित्रता पर मुझे ध्यान देना होगा|

बाल गुरु


 

हर दिवाली घर द्वार की साफ़ सफाई, हम उत्तर भारतीयों का सालाना उत्सव है|

Diwali decoration

Diwali decoration (Photo credit: Piyush’s Space)

इस दिवाली जब मैं घर पर कुछ झाड़ – पौंछ में लगा था तो मुझे ध्यान दिलाया गया कि साहब सो रहे हैं| साहब यानि मेरे दो साल का बेटा| अब मुझे सारा काम इस तरह से निपटाना था कि काम भी हो जाये और साहब के जाग जाने और हमारी शामत आने की नौबत न आये|

मुझे अपने वो दिन याद आये अब मैं नौकरी कर रहा था| तब जब भी कोई खास काम होता तो वरिष्ठ कर्मी सलाह देते कि काम इस तरह से हो कि साहब को ये तो लगे कि कुछ लगातार हो रहा है मगर वो अपना नाग फन उठा कर बाहर न आ जाये|

English: Sleeping baby boy

English: Sleeping baby boy (Photo credit: Wikipedia)

कुल मिला कर किसी भी काम को सफलता पूर्वक संपन्न करने के लिए शांति पूर्ण माहौल की जरूरत होती है| अगर हम वरिष्ठ अधिकारिओं को बार बार हस्तक्षेप करने देते है तो वह काम कभी भी अपने सही अंजाम तक नहीं पहुँचता| साथ ही सभी सह कर्मियों का उत्साह भी जाता रहता है; कभी कभी तो यह नकारात्मक भावना में भी बदल जाता है| अधिकारी को कभी भी काम होते देखने में प्रसन्नता का अनुभव नहीं होता वरन उसे सारे काम या उसके किसी एक चरण के पूरा होने पर ही संतोष होता है|

संयोग से मेरा बेटा काम ख़त्म होने के बाद तक सोता रहा| जगने के बाद जब उसने निरिक्षण किया तो कमरे के बदले हुए रूप पर उसकी प्रसन्नता देखते ही बनती थी|