विश्व-बंदी १३ अप्रैल


उपशीर्षक – अनिश्चितता

सभी चर्चाओं में एक बात स्पष्ट है| मध्य वर्ग लॉक डाउन के लिए मन-बेमन तैयार है| उच्च वर्ग को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु उनके लिए लम्बा लॉक डाउन अधिक कठिनाई भरा होगा| भारत के बाहर भी हालात अच्छे नहीं इसलिए उनकी चिंता है है कि किसी प्रकार काम धंधे को चलाया जाए| लम्बा लॉक डाउन उनकी संपत्ति को बैठे बिठाए नष्ट कर सकता है| वैसे भी अर्थ-व्यवस्था राम-भरोसे है|

निम्नवर्ग को पूछता कौन है, उनके पास विकल्प नहीं है| साथ ही, लंगरों, सरकारी भोजनालयों, रैन बसेरों का उनको सहारा है| इन में से बहुत से लोगों के लिए मुफ्तखोरी बढ़िया चीज है तो बहुत से अन्य आत्मसम्मान बचा कर रखने की लड़ाई हारने के कगार पर है| एक बार आत्म सम्मान नष्ट हो जाता है तो उन्हें नकारा होने से कोई नहीं रोक सकता| शहरी निम्न वर्ग में यह खतरा अधिक है क्योंकि उनका स्वभाविक सामाजिक ताना-बाना परवाहहीन होता है| आत्म-सम्मान सामाजिक सम्मान की कुंजी है| अगर सामाजिक सम्मान की इच्छा न हो तो आत्म सम्मान का कोई मतलब नहीं होता|

मध्यवर्ग की चिंताओं का समुद्रमंथन हो रहा है| यही कारण है कि यह वर्ग रामायण, महाभारत, गीता, कुरान, आध्यात्म, आदि की चर्चा में व्यस्त रहकर इस समय को काट लेना चाहता है परन्तु उनके पास कोई कारगर राह नहीं| यह वर्ग अपने आप को राष्ट्र का कर्णधार समझता है| इनके पास अपनी हर हार हानि का दोष देने के लिए कोई न कोई होता है – मुस्लिम, आरक्षण, अमीर, गरीब, पूंजीवाद, साम्यवाद, या फिर माता-पिता भी| यह वर्ग महानगरों में सबसे बुरे हालात का सामना करने जा रहा है| करोना की बीमारी भी मुख्यतः इसी वर्ग को प्रभावित कर रही है|

white ceramic sculpture with black face mask

Photo by cottonbro on Pexels.com

कल प्रधानमंत्री मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन है| अटकलों का बाजार गर्म है| लॉक डाउन बढ़ता है तो जान है, नहीं बढ़ता तो जहाँ है – वर्ना लटकती तलवार है| जनमानस लम्बे संघर्ष के लिए तैयार है| परन्तु हर किसी को विश्वास है कि किसी को हो मगर बीमारी उसे नहीं होगी| आज देर शाम बाजार की तरफ जाना पड़ा| आधे लोग नक़ाब नहीं पहने थे| मेरे सामने पुलिस वाले ने दो लोगों के डंडे लगाये और तीन लोग गलती से भूल आए की मिन्नत कर रहे थे| मिन्नत करने वालों में एक का कहना था कि उसके पास घर पर हजार रुपए वाला मास्क है| पुलिस वाले ने कहा तो उसे लॉकर में रखो और डंडा कहने के बाद पहनने के लिए सस्ता वाला मास्क खरीद लो|

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विश्व-बंदी १२ अप्रैल


उपशीर्षक – संशय और भूकम्प 

शुरूआती गर्मियों उदास छुट्टियाँ का रविवार बचपन में बड़ा भारी पड़ता था| रसोई पर कुछ खास करने का दबाव रहता तो अनुभव बदलते मौसम में गरिष्ट से बचने की सलाह देता| पंद्रह दिन में किस्से कहानी, किताबें, पतंगे, पतझड़ और खडूस हवाएं नीरस हो चुके होते – ककड़ी, खरबूजा, तरबूजा, खीरा, शर्बतों, और कचूमारों का सहारा भी कोई बहुत दिन तक आकर्षित नहीं कर पाता| दिल के राजा आम अभी बहुत दूर हैं| यहाँ तक आम पना भी अभी उपलब्ध नहीं दिखता|

लॉक डाउन में सबसे बड़ी बात यह कि घर में कोई सहायक नहीं, साफ़ सफाई, रसोई बाजार सब घर के लोगों को ही करने हैं साथ में अपने अपने दफ्तरों के काम भी करने हैं| टेलीविजन की आवाज कम करने के लिए कहने का खतरा भी गंभीर है – आखिर बच्चे क्या करें?

मित्रों के साथ दिन में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए गए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च न मानने की केंद्र सरकारी घोषणा पर चर्चा हुई| हम सब स्वयं-इच्छा योगदान को जबरन सरकारी कर बनाये जाने के सरकारी क़ानून से दुःख महसूस करते रहे हैं, इस बुरे दौर में सरकारी अहम् बेहद चिंता का विषय है| आम राय यह रही कि सरकार को इस बुरे दौर में राज्यों के मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए योगदान को सामाजिक जिम्मेदारी खर्च मान लेना चाहिए था – कम से कम कुछ समय के लिए|

सुबह पंजाब में निहंग सिखों के समूह द्वारा पुलिस अधिकारी के हाथ काटने की घटना से बेहद अधिक दुःख हुआ| मुझे यह भारत के विरुद्ध और उससे अधिक मानवता के विरुद्ध युद्ध की घोषणा जैसा लगा| कट्टरपंथी हिन्दू मुस्लिम सिख देश को डुबो देंगे|

दिन घटना विहीन जा रहा था तभी मोबाइल हाथ से गिरा और आधी स्क्रीन चकनाचूर – काँच की एक छोटी किरच अंगूठे में लग गई| निकालने के देशी नुस्खे अजमाकर चुके ही थे कि मुआ भूकम्प आ धमका| बैठे ठाले यह भूकम्प मुझे ६ से ज्यादा का लगा और यह मानकर कि पहाड़ों या विदेश में केंद्र होगा मुझे ८-९ की आशंका हुई| भला भगवान् का, ३.१ का भूकम्प बताया जा रहा है| उसके बाद भयभीत दिल्ली का दिल बैठा हुआ लग रहा है| वैसे भी दिल्ली के दिल वाले इश्क, कबाब, शराब, शबाब, चाट पकौड़ी बिरयानी के अलावा डरपोक ही होते हैं|

भूकम्प के चलते कुछ दोस्तों रिश्तेदारों से बात हुई|

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विश्व-बंदी ७ अप्रैल


उपशीर्षक – आराम की थकान 

लॉक डाउन को बढ़ाये जाने की इच्छा, आशा, आशंका और समर्थन की मिली जुली भावना के साथ मुझे यह भी कहना चाहिए कि मैं इस से थकान भी महसूस कर रहा हूँ| साधारण परिस्तिथि में कई बार ऐसा हुआ है कि मैं महीनों घर से नहीं निकल सका हूँ| परन्तु जब आप मर्जी के मालिक हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं| मुझे मालूम है कि लॉक डाउन के हटने के महीने दो महीने बाद भी शायद मैं आसानी से घर से न निकलूँ| परन्तु छोटी छोटी इच्छाएं होती रहती है| ऐसा नहीं कि मैं इन कामों के लिए जा नहीं सकता परन्तु लॉक डाउन के साथ आत्म नियंत्रण भी है| कई दिन से ब्रेड कटलेट खाने की इच्छा बलबती हो रही है| इन्द्रिय निग्रह के समस्त प्रयास भोजन पर ही सबसे पहले अटकते हैं| जिव्हा की वासना प्रबल होती है| अस्वादी और स्वाद रसिक होने का मेरा प्रयास तो सदा सफल है| अल्पआहारी होने के प्रयास में भी लगातार सफलता रही है| आज कांदे की सब्ज़ी बनाई खाई| अरहर की दाल तो पत्नी को मेरे हाथ की ही पसंद है| मजे की बात यह है कि साधारण चावल बनाना आज भी मुझे कठिन लगता है|

दो दिन से फल सब्ज़ी वालों की अचानक कमी हो गई है| अगर कल कोई ठेलेवाला नहीं आया तो फिर खुद जाकर सामान देखना पड़ेगा| दिन भर बार बार घर के आगे की सड़क और पीछे की गली में झाँकते बीत जाता है| कुछ तो दिखाई दे कोई तो कहानी हो कोई तो कहासुनी करे कुछ तो दिल लगे|

सड़क पर सूखे पत्ते बिखरे पड़े हैं| आज दो दिन बाद झाड़ू लगी मगर कुछ पल में ही सड़क पुनः पत्तों से भर गई| कड़ कड़ खड़ खड़ की आवाज करते हुए ये सूखे पत्ते जब हवा में नाचते गाते नीचे उतरते हैं तो दिल में संगीत उतरता है| जमीन पर बिछे हुए सूखे पत्तों पर चलना और उनकी आवाज सुनने में अपना अलग आनंद है| यह आनंद हमने अपने आप से छीन रखा है|

कल की गर्मी के बाद आज ठंडी हवा है| आसमान में बादल हैं| मौसम को भी अपनी जिन्दगी का कुछ पता नहीं| कब क्या क्या बदल जाए, क्या पता| दो महीने में दुनिया बदल गई| इंसान बदल गए|

मगर क्या वाकई हम बदल जायेंगे? लगता तो नहीं|

 

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