विश्व-बंदी २३ अप्रैल


उपशीर्षक – नीरसता की काट

करोना काल में आप भले ही कितना काम या आराम करें एक नीरसता आपको घेर ही जाती है| इस सदी में अधिकतर लोग नीरस समय सारिणियों के साथ जीवनचर्या व्यतीत करते हैं| छात्र जीवन में आशावान भविष्य की आशा इस प्रकार की नीरसता को तोड़ती है| परन्तु मध्यवय में यह नीरसता टूटना इतना सरल नहीं होता| गर्मियों की उदास कर देने वाली छुट्टियाँ याद आतीं हैं जब लू-लपट के कारण दोपहर में घर से निकलना मना नहीं तो कठिन जरूर होता था| लोग ऑनलाइन मीटिंग्स, फिल्मों, टेलिविज़न, ऑडियो बुक्स और वेब सीरीजों में समय खपा रहे हैं| अगर शाम को आप अपने आप को यह नहीं कह पाते कि आज का आपका जीवनसार क्या रहा तो आपके जागृत मष्तिष्क को नींद नहीं आती|

कान में हेड फ़ोन लगाकर कठिन शास्त्रीय संगीत को गुना जा सकता है| अगर आप ध्यान से सुनें तो आप वाकई इस समझ सकते हैं और इसके गुण को आत्मसात कर सकते हैं| मुझे शास्त्रीय संगीत सुनना पसंद हैं भले ही मैं इसकी गंभीर शास्त्रीय में गहरी गोताखोरी नहीं करता| जिन रागों या बंदिशों को पहले नहीं सुना या पुनः पुनः सुनने की इच्छा थी, उन्हें सुन रहा हूँ|

हाल में मैंने ऑडियो बुक का भी प्रयोग करना शुरू किया है| इस का लाभ मैं पहले भी देख चुका हूँ| हम सब जानते कि ज्ञान प्रारंभ में श्रुति परंपरा के चलते ही आगे पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ा है| बहुत की प्राचीन पुस्तकें जैसे वेद श्रुति के रूप में आगे बढ़े| बाद में भी गुरुओं, शिक्षक, मौलवी आदि मौखिक परंपरा से ही पढ़ाते आए हैं| धर्मग्रंथों के सामूहिक पाठ की लम्बी परंपरा रही है| हम सब अभी भी अपनी अपनी कक्षाओं में श्रुति का ही प्रयोग करते हैं| लिपि के घटते बढ़ते महत्त्व की चर्चाएँ होती रहेंगी, परन्तु ज्ञान का सुस्पष्ट मार्ग कर्णमार्ग ही है| लिपि उसके दीर्घकालिक संरक्षण के लिए शायद उचित हो| मैं तो पीडीऍफ़ पुस्तकों को पढ़ते समय भी उसके रीड आउट लाउड फ़ीचर का प्रयोग करता हूँ| इससे ध्यान भटकने की संभावना कम रहती है|

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विश्व-बंदी २२ अप्रैल


उपशीर्षक – न्यायलोप और भीड़हिंसा

अगर समाचार सही हैं तो एक ऐसे गाँव ने जिसमें गैर हिन्दू आबादी नहीं है क्रोधित हिन्दूयों की बड़ी भीड़ ने दो साधू वेशभूषाधारियों की बच्चाचोर मानकर हत्या कर दी| मृतकों की वास्तविक साधुओं के रूप में पुष्टि हुई| कई दिनों तक भारत के दुष्प्रचारतंत्र (आप समाचार तंत्र कहने के लिए स्वतंत्र हैं) ने इसे मुस्लिम आतताई भीड़ द्वारा साधुओं की हत्या के रूप में प्रचारित कर दंगे या गृहयुद्ध के हालात पैदा करने का प्रयास किया| दुर्भाग्य से भारत में भीड़हिंसा परंपरा की तरह स्थापित हो रही है| दुष्प्रचारतंत्र ने वर्तमान घटना का दुष्प्रयोग भीड़हिंसा की बनती जा रही विशिष्ट सामुदायिक पहचान को पलटने के लिए किया था| परन्तु, भीड़हिंसा आखिर क्यों?

इतिहास में राजा-महाराजाओं में भी हमने न्यायप्रियता को सामान्य गुण के रूप में न लेकर विशिष्ट गुण के रूप में दर्ज किया है| मानवता में शासक से लेकर शासित तक का हिंसा ही न्याय का प्रमुख साधन रहा है| न्याय प्रणाली का ह्रास, सत्ता की निस्कृष्टता का पहला प्रमाण पस्तुत करते रहे हैं| पिछले कई दशकों से दुनिया भर के सभी इंगितों (इंडेक्स) में भारत सबसे पीछे न्याय सम्बन्धी इंगितों में ही है और स्तर लगातार गिर रहा है|

अगर न्याय का महंगा या विलंबित हो या न्याय प्रणाली भ्रष्ट तो क्या होगा? समाज वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के बारे में विचार करेगा| सरकारी अवैचारिकता के चलते भारत में स्थानीय वैकल्पिक न्याय प्रणालियों का विकास नहीं हो सका है जैसे न्याय-पंचायत, मध्यस्थता और सुलह के औपचारिक ढ़ांचे खड़े नहीं हो सके| यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधिकरण निंदनीय रूप से न्यायाधीशों, न्यायविदों, अधिवक्ताओं और सरकारी अधिकारीयों के सेवानिवृत्ति केंद्र बनकर रह गए हैं|

विलंवित न्याय के चलते भारतीय राजनैतिक प्रणाली ने पहले तो पुलिस द्वारा की जाने वाली गिफ्तारियों को न्याय का समकक्ष बना दिया| झूठी या गलत गिरफ्तारियों के मामलों से भारत के तमाम न्यायिक निर्णय भरे पड़े हैं, सबूत के अभाव में आरोपी के छूटने की लम्बी चर्चा होती है परन्तु कोई सरकार या पुलिस से नहीं पूछता कि असली अपराधी कहाँ है या पूरे सबूत क्यों नहीं जुट सके| धीरे धीरे आरोपियों के अन्यायपूर्ण सरकारी हत्याओं को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी| तुरंत न्याय का दावा| जिसे मारा गया वो असली गुनाहगार था या नहीं किसे पता? जब भी आनन फ़ानन न्याय की ख़बरें आतीं है, असली अपराधी दावत उड़ाते हैं|

जब जनता ने पाया कि न्याय तंत्र या क़ानून व्यवस्था तंत्र नाकारा है, तो उन्हें अपने हाथ में न्याय को ले लेने का विकल्प दिखाई दिया| जनता का क्रोध उस समय बढ़ जाता है जब अपराधी दूसरे गाँव, समाज, शहर, धर्म, जाति, जिले, प्रदेश, रंग, लिंग, भाषा आदि किसी का हो – कुल मिलाकर बाहरी| फिर जनता सिर्फ बच्चाचोर होने के हल्के से से शक में दो साधुओं के मार देती है| साधुओं द्वारा लॉक डाउन का समुचित पालन न करना उनके प्रति शक को कई गुना बढ़ा देता है| यह बहुत बड़ी कीमत है|

मैं गिरफ्तार हुए सभी आरोपियों को दोयम दर्जे का आरोपी मानता हूँ, भीड़हिंसा के सभी मामले ऐसे ही हैं| मैं पुलिस विभाग को तीसरे दर्जे का दोषी समझता हूँ| दुष्प्रचार तंत्र के बारे में क्या कहा जाए? वो तो नबाब साहबों की पालतू मुर्गा-बटेर हैं| पहले दर्जे के मेरे आरोपी पिछले पचास वर्ष में रहे सभी सांसद, विधायक, न्यायाधिकारी, और न्यायविद हैं| यह न्याय प्रणाली और उसको सहजने वालों का अपराध है|

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विश्व-बंदी २१ अप्रैल


उपशीर्षक – प्रतिरोधक क्षमता का दुःख

यह लगभग सुखद परन्तु अत्यंत दुःखद समाचार था| भारत में ८० फ़ीसदी लोगों में करोना के लक्षण नहीं दिखाई दे रहे| यह शायद वैसा ही है कि जैसा एचाईवी पॉजिटिव होना एड्स होना नहीं होता, पर संवाहक होना हो सकता है| सुखद यह है कि आप शायद विषाणु का मुकाबला करने में अभी तक सफल हैं या आप जीत चुके हैं या विषाणु को शांत तो कर ही सके हैं| हो सकता है, विषाणु शांत रहकर पुनः हमला करे या आपके शरीर को छोड़ जाए| परन्तु एड्स के मुकाबले यह मामला इसलिए अधिक ख़तरनाक है कि उसमें विषाणु का प्रसार यूँ ही नहीं हो जाता, जैसा कि करोना विषाणु के मामले में हो सकता है| बिना किसी लक्षण के आपको नहीं पता लगता कि आप के शरीर में विषाणु का घर या युद्ध स्थल है| आप अनजाने ही बीमारी फैला सकते हैं या आपके अपने शरीर में ही बाद के लिए यह बाद के लिए रुक सकता है|

क्या अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना नुक्सान तो नहीं कर जाएगा? रोज सुबह साबित लहसुन के साथ समभाग अदरक चबाने के बाद चाय पीने से फ्लू का ख़तरा कम रहता है यह मेरे परिवार का पुराना अनुभव है| भारत में तो फ्लू से बचने के लिए तुलसी-अदरक-काढ़ा चाय है ही| फेंफड़ों की मजबूती के लिए मैं हर जाड़ों में ५०० ग्राम शहद २५ ग्राम छोटी पिप्पली मिलाकर उसकी माशा भर लेता ही हूँ| अन्य भारतवासियों के पास भी अलग अलग बहुत से उपाय हैं – हल्दी सौंठ का दूध से लेकर कबूतर का शोरबा तक| आजकल के साफ पर्यावरण में जब वायु प्रदूषणजन्य बीमारियाँ नहीं हैं, पता कैसे चले कि श्वास या फेफड़ों को पुराना कष्ट है या नया करोना? शायद सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता का विकास होने तक हमें लम्बी और धीमी लड़ाई लड़नी होगी| यह थकाऊ और उबाऊ नहीं होना चाहिए|

अब द्रुत जाँच किट को भी बेअसर पाया जा रहा है| राजस्थान सरकार के बाद अब भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद ने इनके प्रयोग को दो दिन के लिए रोक दिया है| कई बार लगता है काम पर वापिस जाएँ शेष सब भाग्य पर छोड़ दिया जाए|

खैर हम भारतीय हैं तो घर पर नए नए खाने पीने के प्रयोग चल रहे हैं| कुछ किताबें, कुछ फ़िल्में, कुछ गाने और बचे हुए बहुत से काम धाम|