गायत्री मन्त्र (हिंदी)


ॐ भू भुव स्व|

वह ग्राह्य सवित्देव|

होवें शुद्ध प्रकाशित|

सुहेतु मम सद्बुद्धि ||

(गायत्री मन्त्र का यह मान्त्रिक अर्थ मैंने विक्रम संवत २०५० आषाढ़ शुक्ल पक्ष ७ दिन शनिवार को किया था| मूल संस्कृत मन्त्र की ही तरह इस पद्य की रचना में सावित्री छंद का प्रयोग करने का प्रयास किया है| मुझे संस्कृत नहीं आती अतः मैंने उस समय उपलब्ध हिंदी अनुवाद का सहारा लिया है|)

 

ॐ भूर्भुवः॒ स्वः ।

तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं ।

भ॒र्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। ।

धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

सुनसान सड़क पर


सुनसान सड़क पर

देर शाम

टहलते हुए

गुनगुना रहा था

कोई पुराना प्रेम गीत

.

लाठी लहराते

सामने से आते

सिपाही ने

दूर से

कान के

पास कुछ पीछे

ललचाती लम्पट तीखी

नजर से

किया कुछ

बलात्कार सा

.

अचानक

अचानक

सहमी मरियल सी

श्याम वर्ण किशोरी ने

पीछे से कसकर

कंधे पर

पकड़ा

कान में

शब्द से आये

बचा लीजिये

निगल जायेगा

हाथ थाम लिए

दिल थम गया

.

मोड़ से

गुजर कर

सांसे ली गयीं

लड़की झुकी

मेरी ओर

आँखे नम थीं

चेहरा रक्तहीन

.

अचानक

अचानक

हाथ उठा

उसके बांये

स्तन पर

यंत्रवत जड़ दिए

अपने हस्ताक्षर

.

राहत थी

आँखों में

हल्की पड़ती चमक

ने जैसे कहा हो

शुक्रिया श्रीमान

अस्मिता बख्श दी

.

अचानक

अचानक

पौरुष ने कहा

कलंक

निरे नपुंसक

.

अचानक

अचानक

रात को

आँख खुल गयी

चढ़ा हुआ था

तकिये पर

.

.

(कवि हूँ या नहीं हूँ| कविता करने का न वादा है, न दावा है| चित्र यद्यपि मेरा नहीं हैं मगर इस चित्र को भी कृपया “शब्द समूह” के साथ या बाद अवश्य पढ़े|)

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)


 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|