कलाचित्र की खरीद


कला प्रदर्शनियों में मेरा जाना ऐसा ही रहा है जैसे कोई भूखा बेरोजगार मर्द बनारसी रेशम साड़ी भण्डार पहुँच जाए| इन प्रदर्शनियों में जाकर मेरे पास अपने आप को भरमाये रखने का एक ही तरीका है: अपनी काँख दबाकर और आँख गढ़ाकर कलाचित्रों को चिंदी चिंदी देखने लगना| कभी किसी चित्रकार ने कुछ पूछ लिया तो ब्रश स्ट्रोक से लेकर रंग बिरंग तक कुछ भी भारीभरकम ऊलजुलूल कह दिया| कुछ बेचारे चित्रकार बाकायदा अपनी प्रदर्शनी का निमंत्रण भेजने लगे| हकीकत यह है कि मैं कला के बारे में आजतक कुछ भी नहीं जानता, मगर प्रदर्शनी में चला जाता हूँ| फिर भी चित्रकार से कुछ भी पूछने से बचता हूँ, क्योंकि उनका नजरिया अक्सर कलाचित्र के बनने के साथ ही पुराना हो चुका होता है| मगर इस सब में थोडा बहुत लगाव पैदा हुआ| विधिक और साहित्यिक सभाओं से इतर कला प्रदर्शनियों में आपको विषयवस्तु से सीधी बातचीत का अवसर मिलता है|

अभी हाल में साहित्य पत्रिका सदानीरा के ग्रीष्म २०१९ अंक के मुखपृष्ठ पर छपने जा रहा कलाचित्र मुझे पसंद आया| इसमें एक अभिव्यक्ति की सरलता और विचार की तरलता का अनुभव होता था| जब चित्रकार ने अपने इन्स्टाग्राम पर इसे डाला तो इसने मुझे आकर्षित किया| मैं सिर्फ पत्रिका से ही संतोष कर लेना चाहता था| फिर भी टिपण्णी छोड़ दी कि यह चित्र कुछ दिन में मेरे घर आने वाला है – इशारा पत्रिका की तरफ था| पूछा गया कलाचित्र भी ले आया जाए आपके लिए? मुझे लगा मैंने अपनी फटी जेब भरे चौराहे पर पतलून से बाहर निकाल दी है| फिर भी पूछा, कीमत| मुझे दाम लगाने के लिए कहा गया| कला का क्या दाम (price), उसकी अहमियत (value) होती है| दाम तो खरीददार की जरूरत में होता है| अहमियत और दाम का रिश्ता तो अर्थशास्त्र भी नहीं निकाल पाया| मैंने मात्र अपना बजट बताया| उफ़; बात पक्की, मैंने सोचा| अब कठिनाई यह है कि छोटे से घर में आप इसे सजायेंगे कहाँ? उधर चित्रकार की समस्या थी, अमेरिका से दिल्ली तक का सफ़र और दिल्ली लाकर उसे फ्रेम कराकर मुझ तक सकुशल पहुँचाना|

समय बीता और एक दिन अचानक कलाचित्र मेरे घर में था| तेज बारिश का दिन था| कामकाजी दिन की शाम, बारिश और अरविंदो मार्ग|

अब चित्रकार की बारी थी – अपने ही चित्र को चिंदी चिंदी देखने की| मैं शांत था, मैं एक माँ से उसका बच्चा गोद ले रहा था| मेरे अन्दर का कानूनची अचानक बहुत से क़ानूनी पहलूओं पर खुदबुदा रहा था| मुझे एक कलाचित्र को पालना है, शायद कुछ और कलाचित्रों को भी|

इस कलाचित्र की खरीद के सम्बन्ध में बहुत कुछ सोशल मीडिया पर है| बहुत से लोग जो मौलिक कला खरीदना चाहते हैं उनके लिए मैं पूरी परिघटना यहाँ नीचे लगा रहा हूँ|

 

 

 

प्लेटफ़ॉर्म का पेड़


कौन बड़ा कलाकार है, ईश्वर या मानव?

किसकी कलाकृति में अधिक नैसर्गिक सौंदर्य है? मानव सदा ईश्वरीय सुंदर में अपनी कांट छांट करता रहता है| मानवीय हस्तक्षेप बेहतर मालूम होता है तो गंभीर प्रश्न भी छोड़ जाता है| आखिर मानव को हर बात में अपना हस्तक्षेप करने की क्या आवश्यकता है? मानव नैसर्गिक सौन्दर्य में अपनी सुविधा के हिसाब से सुन्दरता और कुरूपता देखता है|

चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म एक का दिल्ली छोर| इंजन से लगभग तीन चार डिब्बे की दूरी पर एक सुंदर सा पेड़ है जो स्टेशन के बाहर दूर से देखने पर बड़ा सुन्दर, छायादार, प्रेममय हरा भरा दिखाई देता है| मगर जब हम प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचते हैं तो आधुनिक छत और उसकी अत्याधुनिक उपछत के चलते उसका तना ही दिखाई देता है|

अच्छी बात यह है कि मानवीय सौन्दर्यकारों ने इस पेड़ में महत्ता को स्वीकार और अंगीकार किया| उन्होंने हमारे कथित आधुनिक सुविधा भोगी समाज की प्रकृति से दूरी को भी अपने सौन्दर्य कार्य में समाहित किया| पेड़ की प्लेटफ़ॉर्म पर उपस्तिथि को सीमित किया गया है|

इस पेड़ का तना तीन रंगों से रंगा गया है, शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग अच्छा न लगा हो| शायद प्रकृति प्रदत्त भूरा रंग उन कीट पतंगों को आकर्षित करता हो जिन्हें मानव पसंद न करता हो| पेड़ के चारो उसकी सुरक्षा के लिए और उनकी जड़ों और तनों  के सहारे मौजूद मिट्टी से प्लेटफ़ॉर्म गन्दा होने से बचाने के लिए सुरक्षा बाड़ा भी बनाया गया है| पेड़ का मनोहर हरापन क्रूर आधुनिक की निगाह से बचा लिया गया है| मेरे मन के इस मरोड़ से बेख़बर पेड़ अपने में मगन है| पेड़ प्लेटफ़ॉर्म को आज भी छाया देता है| पेड़ पेड़ है – पिता की भूमिका में बना रहता है| मैं उसके पास बैठकर बोधिसत्व होने की प्रतीक्षा में हूँ|

 

होली में भरें रंग


जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

टहलने वाली शामें


शाम जब बसंती होने लगें और यह शाम दिल्ली को शाम नहीं हो तो टहलना बनता है|

गुजरा ज़माना था एक, जब हर शाम टहलने निकल जाते थे| उस शामों में धुंध नहीं थी, न धूआँ था| हलवाई की भट्टी के बराबर से गुजरने पर भी इतना धूआँ आँखों में नहीं चुभता था, जितना इन दिनों दिल्ली की किसी वीरान सड़क पर राह गुजरते आँखों में चुभ जाता है| न वाहनों की चिल्ल-पों थी न गाड़ियों से निकलने वाला कहने को प्रदुषण मुक्त धूआँ| गलियों में आती हवा सीधे खेतों जंगलों की ताजगी लाती थी|

उन दिनों घर घर टेलिविज़न नहीं होते थे और लोग मोहल्ले पड़ोस में और मोहल्ले पड़ोस के साथ घूमना पसंद करते थे| भले ही उन दिनों कान, सिर और गले में लटका लिए जाने वाले हैडफ़ोन आम नहीं थे मगर गली कूचों से कोई दीवाना ट्रांजिस्टर पर विविध भारती बजाते हुए गुज़र जाता| अगर वो नामुराद वाकई गली की किसी लड़की का पुराना आशिक होता तो लड़की को मुहब्बत और पास पड़ोस को जूतम-पैजार की टीस सी उठा करती|

घर से निकलते ही पान की तलब होती और दो नुक्कड़ बाद पनवाड़ी की दूकान से दो पत्ती तम्बाकू पान का छोटा बीड़ा मूँह में दबा लिया जाता| अगर घरवाली थोड़ा प्यार उमड़ता तो चुपचाप घर खानदान के लिए एक आध पान के हिसाब से पान बंधवा लिए जाते| शाम थोड़ा और सुरमई हो जाती| लाली होठों से होकर दिल और फिर जिन्दगी तक फल फूल फ़ैल जाती|

पान की दुकानें टहलने वालों का एकलौता ठिकाना नहीं थीं| मिठास भरे लोग अक्सर मिठाई की दुकान पर दौना दो दौना रबड़ी बंधवाने के शौक भी रखा करते| मगर रबड़ी का असली मजा मिट्टी के सकोरों में था|

चौक पर मिलने वाले कढ़ाई वाले मलाईदार दूध का लुफ्त उठाते लौटते| अब वो ढूध कहाँ? चौड़ी कढ़ाई में मेवा मखाने केसर बादाम के साथ घंटा दो घंटा उबलने के बाद ये दूध आजकल की मेवाखीर को टक्कर देता| ढूध पचाना कोई आसान काम तो नहीं था| सुबह उठकर पचास दण्ड पेलने और सौ बैठक लगाने के बाद मांसपेशियां क्या रोम भी राम राम करने लगते|

अक्सर लोग अपने साथ नक्काशीदार मूठ के बैंत ले जाते| गली के कुत्ते उन बैंतों को देखकर भौंकते थे या आवारा घूमते आदमी को, इसका पता शायद किसी को नहीं था| मगर बैंत शान दिखाने का तरीका था और रुतबे की पहचान थी|

मगर टहलने जाना भी कोई किसी ऐरे गैरे का काम नहीं था| अगर टहलने वाले के पीछे एक अर्दली भी टहल करता हो तो मजा कुछ था शान कुछ और|

दिवाली अब भी मनती है


वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

पानी की पहली लड़ाई


धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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साहित्य के उत्सव


साहित्यक समारोहों के प्रति जनता प्रायः निर्लिप्त भाव रखती रही है| साहित्य समारोह भी प्रायः आलोचकों, समालोचकों, पुरस्कार प्रदाताओं के वो परिपाटी बने रहे जिनमें आम जनता आम की गुठली की तरह निष्प्रयोज्य होती है| अपने इस संभ्रांत रवैये के कारण हाल के वर्षों में साहित्य समारोह हाशिये पर चले गए हैं और उत्सवों, जश्नों और फेस्टिवल ने ले ली है| उत्तर भारत में ठण्ड के आते ही शादियों के साथ साथ साहित्य और सांस्कृतिक उत्सवों का मौसम भी शुरू हो जाता है|

यह उत्सव, भारत के तीज त्योहारों की तरह समाज के हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ समेटे रखते हैं| यहाँ साहित्य और उपसाहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं| गंभीर साहित्य चर्चा को अक्सर मुख्य पंडाल अलग स्थान मिलता है| जिन समारोह में गंभीर साहित्य मुख्य पंडाल में होता हैं, वहां भीड़ प्रायः वहां नहीं होती| भले ही साहित्यकार इस प्रकार की स्तिथि को साहित्य विरोधी मानते हैं परन्तु भीड़ साहित्य से बहुत दूर नहीं होती| आप भीड़ से हमेशा गंभीर साहित्य से जोड़े हुए नहीं रख सकते| लोकप्रिय पंडाल प्रायः फिल्मकारों, पत्रकारों, से भरे महसूस होते हैं क्योंकि मीडिया में इनकी खबरें देने और पढ़ने वाले बहुत होते हैं| लोकप्रिय पंडाल में गायन, वादन और नृत्य का समां बंधा रहता हैं जिसमें फिल्म भी एक विधा है| नाटकीय प्रस्तुतियां – कथा पाठन, नृत्य नाटिकाएं, आदि होती हैं मगर प्रायः रंगमंच इन उत्सवों का भाग नहीं होता|

मेरी समझ में भोजन संस्कृति को जानने समझने का उचित माध्यम हैं और आजकल अधिकतर उत्सव इस पहलू पर ध्यान दे रहे हैं| सांस्कृतिक पहलू के अलावा भी भोजन दो प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, एक तो उत्सव में जुटी हुई भीड़ को उत्सव से दूर न जाने देने के लिए उनका पेट भरे रखना होता है दूसरा लाभ में मामूली सी हिस्सेदारी से उत्सव का खर्च भी कुछ हद तक पूरा जा सकता है| आम जनता के लिए तरह तरह के खाने और जायके तक एक ही स्थान पर पहुँच भी बड़ी बात है|

किताबें किसी भी साहित्य उत्सव का केंद्र होती हैं| जहाँ साहित्य किताबों के बिना बेमानी है| साहित्य उत्सव आम जनता साहित्यिक किताबों से जुड़ने का पुस्तक मेलों के मुकाबले अधिक उचित अवसर प्रदान करते हैं| यहाँ लोग सीधे सीधे किताबों से जुड़ते हैं, उनके बारे में हुई चर्चा से प्रभावित होते हैं और उन्हें साहित्य के परिदृश्य में देख समझ पाते हैं| हाल में साहित्येतर सांस्कृतिक गतिविधियों और भोजन के अलावा साहित्येतर सांस्कृतिक सामिग्री को भी इन उत्सवों में जगह मिलने लगी है| यह बाजार का साहित्य उत्सवों पर अतिक्रमण नहीं है वरन एक दुसरे से लाभ उठाने का प्रयास है|

इन उत्सवों में साहित्यिक संभ्रांतों का स्वांत सुखी वर्चस्व जरूर समाप्त हुआ है, मगर यह समाज के उच्च मध्यवर्ग का अपनी जड़ों से आज भी जुड़े होने का भ्रम कायम करने का माध्यम भी हैं| जश्न – ए अदब और जश्न – ए – रेख्ता जैसे उर्दू भाषी उत्सवों में भीड़ भडाका जनता की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अंग्रेजी है| लोग उर्दू के नजाकत और नफासत की बातें उर्दू में नहीं बल्कि बनावटी अमरीकी लहज़े की अंग्रेजी में करते हैं| ग़ालिब का ज़िक्र करते समय उनके शेरोशायरी का ग्लेमर जेहन में उछालें मारता है, की ग़ालिब को लेकर उनकी समझ|

जिस उत्सव में जितने कार्यक्रम समानांतर चलते हों, वह उतना बड़ा उत्सव है| मगर लोगों के जमावड़े को बुलाना, उसे जमाये रखना, जिमाये रखना, और ज़ज्बा बनाये रखना अपने आप में बड़ी बात है|

हिंदी में विनम्रता


Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

चाचे दी हट्टी, कमला नगर


राजमा चावल और छोले भठूरे दिल्ली वालों की जान हैं| छोले भठूरे का बाजार दिल्ली के सबसे चुनौतीपूर्ण बाजार में से एक हैं| आम तौर पर सारे छोले भठूरे एक जैसे हैं, छोले का तेज मसाला और तैलीय भठूरे| मगर ज्यादा मसाला स्वाद का दुश्मन है, यह बात जिन्हें पता हैं वही शीर्ष पर हैं| आपको शीर्ष पर आने के लिए दस नाम कोई भी गिना देगा, जहाँ मामूली मामूली अंतर से भी स्वाद में जबरदस्त अंतर है|

एक सामान्य व्यक्ति के लिए चाचे दी हट्टी छोले भठूरे की एक आम दुकान है| यहाँ न आपको बैठने या खड़े होने की कोई खास व्यवस्था नहीं| ग्राहक गली में रखी तो मेज के सहारे छोले भठूरे खाते हैं| बहुत से ग्राहक यहाँ वहां खड़े होकर जुगाली करते नजर आते हैं| अगर यह पतली से गली न होती तो शायद आपको आते जाते वाहन भी परेशान करते| यह दिक्कततलब बात है, जब आप देखते हैं कि दुकान के आधी गली भरकर भीड़ है| आपको कतार में खड़ा होना होता है| कोई भी दिल्ली वाला केवल छोले भठूरे के लिए इतनी दिक्कत झेल लेगा, मगर यह तो चाचे दी हट्टी के छोले भठूरे हैं|

कमला नगर, दिल्ली विश्वविद्यालय के पास होने के कारण छात्र-छात्रों के युवा जीवन्तता का केंद्र है| दिल्ली की लड़कियां कमला नगर और सरोजनी नगर में ख़रीददारी करना पसंद करतीं हैं| इसी कमला नगर में भीड़ से थोडा सा हटकर यह गली हैं, जिसमें चाचे दी हट्टी है| दुकान के ऊपर सूचना पट को शायद ही कोई पढ़ता होगा – रावलपिंडी के छोले भठूरे| एक दर्द है – विस्थापन का| एक निशानदेही है, हिंदुस्तान की भोजन संस्कृति की| हिंदुस्तान – जहाँ कोस कोस पर पानी, चार कोस पर बानी, और चालीस कोस पर खानी बदल जाती है|

चाचे दी हट्टी की शान हैं भठूरे भरवां – आलू वाले भठूरे| अगर आप बोलकर सादे भठूरे नहीं मांगते तो भरवां आलू भठूरे मिलेंगे| आलू अच्छे से उबला हुआ है और मसाला सिर्फ उतना ही है जितना ज़रा सा भी ज्यादा न कहला सके| आम भठूरे के मुकाबले यह कम तैलीय हैं| भठूरे का तैलीय होना काफी हद तक कड़ाई के तेल की गर्मी पर निर्भर करता है|

ज्यादातर छोले भठूरे में मोटे काबली चना (सफ़ेद चना) प्रयोग होता है| चाचे दी हट्टी के छोले छोटे काबली चने से बने हैं| मसाला बिलकुल भी ज्यादा नहीं हैं| नवरात्रि के दिनों में जाने के कारण मैं सोचा कि छोले में प्याज व्रत त्यौहार की वजह से नहीं डाली गई है| मगर बताया गया कि प्याज का मसाले में प्रयोग नहीं होता| इस लिए प्याज न खाने वाले भी इसे आराम से खा सकते हैं| साथ में हैं इमली की चटनी| प्याज सलाद के तौर अपर अलग से है|

स्थान: चाचे दी हट्टी, कमला नगर, दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: छोले भठूरे

पांच: साढ़े चार

दिल्ली, शाकाहारी, नई दिल्ली, छोले भठूरे, पंजाबी खाना, रावलपिंडी,

संस्कृत समस्या


मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

समाज में संस्कृत


प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को लेकर भारतीय विशेषकर उच्चवर्ग मानसिक रूप से लगाव रखता है| जिन लोगों को किसी भी भारतीय भाषा में बात करने में शर्म आती हैं वो भी संस्कृत का जिक्र आते ही अपने ह्रदय में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, और संस्कार के झंडे बुलंद करने लगते हैं| मगर अगर भारतीय जनसंख्या के अनुपात में देखें तो जनसँख्या का नगण्य हिस्सा के लिए ही संस्कृत  मातृभाषा है| मुट्ठी भर भारतीय इसे समझ बोल सकते हैं| बहुसंख्य के लिए संस्कृत गायत्री मंत्र या किसी और गुरुमंत्र की भाषा मात्र है| अधिकांश “काले अक्षर भैस बराबर – यजमान” पंडितजी के सही गलत उच्चारण में बोली गई संस्कृत में वेद – पुराण मन्त्रों से अपना इहलोक और परलोक “सुधार” लेते हैं और ॐ जय जगदीश हरे या कोई फ़िल्मी आरती गाकर या सुनकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं|

सरकारी हिंदी और धार्मिक संस्कृत की भारत में दशा इनके पोंगा प्रचारों, अनुष्ठानों और समारोहों के कारण जनता से कोसों दूर है| सरकारी हिंदी का बनावटीपन उसकी विनाशगाथा है| मगर संस्कृत का दुर्भाग्य है कि यह धर्म के ठेकेदारों के कब्जे में है और विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसके शिक्षक संस्कृत को धर्मग्रंथों से अलग कर कर नहीं देख पाते| उनके लिए संस्कृत वेद पुराण की भाषा से अधिक कुछ नहीं है| भर्तहरि बाणभट्ट, जयदेव, जैमनि, कालिदास, आदि उनके लिए संस्कृत का नहीं, सामान्य ज्ञान – अज्ञान का विषय है| आचार्यों के दीर्घबुद्धि में यह नहीं आता कि जब भाषा को साहित्य से अलग कर दिया जाय तो वह बूढी हो जाती है और जनता से कटकर मृत|

मगर संस्कृत की दुनिया में सब कुछ पंडिताऊ अंधकार ही नहीं है, जन साधारण का उजाला भी है:

देखिये सुनिए नीचे दिए गए चलचित्र –

 

 

 

 

छाया की अमूर्त अभिव्यक्ति


डॉ. छाया दुबे प्रकृति से अपना सम्बन्ध देखती है और प्रकृति उनकी अमूर्त रूप में उनके कैनवास पर उतरती है| उनसे बात करते हुए लगता है कि कैनवास उनके अकथ्य को रंग के रूप में उतारता है और उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है|

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प्रकाश उनकी अभिव्यक्ति को तेज प्रदान करता है और चटख रंगों के रूप में निखर कर आता है| सूर्य और जल उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण साधन और साध्य है जिन्हें वो भिन्न रंगों के माध्यम से व्यक्ति करती हैं| इस कारण उनकी रचना प्रक्रिया में चिंता के रंग और लकीरें दिखतीं हैं मगर अवसाद नहीं दिखाई देता|

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वो प्रकृति बचाने और पृथ्वी बचाने की बात आशावादिता के साथ करतीं है| उनसे बातचीत में लगता है कि भोपाल जैसे शहरों में जीवन और प्रकृति को लेकर अवसाद व्याप्त नहीं हुआ है सकारात्मक चिंताएं जरूर हैं| यह भाव उनकी कला को विशेषता देता है|

आश्चर्यजनक रूप से वो प्रकृति की चिंताओं के बीच उसके दोहन और शोषण की चमक – दमक को भी देख पातीं हैं| या कहिये, तमाम चिंताओं के बीच, प्रकृति के प्रति उनका सौन्दर्य बोध पूरे रोमानी अंदाज में मौजूद है|

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नारी शोषण शोषण और प्रताड़ना जैसे विषय ही उनके यहाँ अवसाद नहीं भरते वरन वो उसे पूरी आशा और प्रकाश के साथ देखती है|

ईश्वर और दर्शन भी, उनके अंतर्मुखी स्वभाव को बहिर्मुखी बनाते हैं|

छाया दुबे के शब्दों में:

“ मेरे चित्रों का मध्यम मिश्रित रहा है| एक्रेलिक ऑइल, ड्राई पेस्टल, सभी का प्रयोग करती हूँ| मेरे काम में नुकीले फोर्सफुल स्ट्रोक, परिश्रम एवं प्रयास को दर्शाते हैं| और सॉफ्ट स्पॉट स्ट्रोक स्थिरता और संतोष का सूचक हैं| मेरे चित्रों में पीले रंग का विशेष महत्त्व है, जैसे पृथ्वी और जीवन के लिए सूर्य की ऊर्जा का महत्त्व है| सभी रंगों के तालमेल में सृष्टि का सौन्दर्य निहित है, इन रंगों के साथ मेरी इस यात्रा में संगीत का साथ अनिवार्य सा है; मानो संगीत के लय एवं भाव मानो मेरे स्ट्रोक को और लयात्मक एवं भावयुक्त एवं अर्थपूर्ण बनाते हैं|”

डॉ. छाया दुबे के चित्रों की प्रदर्शनी, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम, २०५, तानसेन मार्ग, निकट मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन, पर दिनांक 28 अप्रैल से 8 मई 2016 तक चल रही है|

रमोना मेरा ब्राण्ड


अगर इस किताब का नाम “आजादी मेरा ब्राण्ड” नहीं होता तो निश्चित ही यही होता, “रमोना मेरा ब्राण्ड”| मगर किताब रमोना की नहीं हैं, न उसके बारे में है| यह किताब एक हिन्दुस्तानी हरियाणवी लड़की के यायावर हो जाने के बारे में है; आवारगी शायद अभी आनी बाकी है| आवारगी एक बेपरवाह विद्रोह है, यह किताब आजादगी के बारे में है, यायावरी के बारे में है|

इस किताब में आम लड़की के साधारण शब्द हैं, जो सीधे संवाद करते हैं; साहित्यिक पंडिताऊपन ऊब नहीं है| कई जगह शब्दों की कमी खल सकती है, मगर बेपरवाह रहा जा सकता है| यह सिर्फ घुमक्कड़ी का संस्मरण नहीं है, घुमक्कड़ हो जाने की यात्रा है| मैं यह किताब शुरू अप्रैल के जिन दिनों में पढ़ी, उन्हीं दिनों घुमक्कड़ी के महापंडित राहुल सांस्कृतयायन का जन्मदिन पड़ता है|

जिस तरह लोग इसे लड़कियों के लिए सुझा रहे हैं, मुझे लगा यह लड़कियों के लिए घुमक्कड़ी के गुर सिखाने वाली कोई प्रेरक किताब होगी| मगर १० अप्रैल को इसकी लेखिका को दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर में सुनते हुए लगा, नहीं बात कुछ ज्यादा है| बात आवारगी, बेपरवाही, पर्यटन, विद्रोह और नारीवाद से हटकर है| बात आजादगी और घुमक्कड़ी की है| बात आसमान में उड़ने की नहीं, धरती को छूने की है|

हिंदुस्तान में लड़की क्या कोई भी इन्सान धरती पर नहीं, समाज में रहता है| वो समाज जो उसका खुद का बनाया खोल है, जिसे वो पिंजड़ा बनाता है|

दुनिया अच्छे इंसानों की है, जिसपर बुरे लोग राज करते हैं क्योंकि अच्छे लोग दुबक कर अपनी जिन्दगी बचाने का भ्रम जी रहे है| यह बात अनुराधा बेनीवाल नाम की यह लड़की समझ लेती है| वो अच्छे लोगों की इस दुनिया को जानने के लिए निकल पड़ी है|

मैं स्वानन्द किरकिरे से सहमत नहीं हूँ कि यह यात्रा – वृत्तान्त है| यह यात्रा – स्वांत है, जिसमें दो परों वाली नहीं, दो पैरों वाली लड़की आजादी, आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और आत्मचेष्टा के साथ अपने स्वांत को अलग अलग स्थानों पर जी रही है| आम यात्रा वृत्तांतों से जुदा, यह प्रयोगों और अनुभवों की किताब है| इस घुमक्कड़ी में भटकन नहीं है, और नक्शा भी इंसान पर हावी नहीं है|

यह पुस्तक प्रेरणा हो सकती है, उन लोगों के लिए जो भ्रम पाले हुए हैं कि अपनी जिन्दगी, अपनी पसंद की जिन्दगी जीना कोई विलासिता है| बस एक कदम बढ़ाना है| यह पुस्तक प्रेरणा हो सकती है, उन लड़कियों के लिए हो भ्रम पाले हुए हैं कि अपनी जिन्दगी जीना विद्रोह है, या समझौता है, या विलासिता है|

मगर यह किताब अगर अनुराधा की है तो मैं रमोला को क्यों याद कर रहा हूँ? अपने छोटे छोटे कपड़ों को गाहे बगाहे खींचतीं रहने वाली आधुनिक दिल्ली वालियों पर मेरी हँसी का जबाब रमोला है| धोती कुर्ता में शर्माते आधुनिक संस्कृतिरक्षक राष्ट्रभक्तों पर मेरी हँसी का जबाब भी शायद रमोला है|

अगर आप यात्रा – वृत्तान्त के लिए यह किताब पढ़ना चाहते है तो न पढ़ें| अगर आप दुनिया को जीने के लिए पढ़ना चाहते हैं, तो शायद पढ़ सकते हैं| बाकी तो किताब है आजादगी और यायावरी के लिए|

पुस्तक: आज़ादी मेरा ब्रांड
श्रृंखला: यायावरी आवारगी – १
लेखिका: अनुराधा बेनीवाल
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
मूल्य: रुपये 199
संस्करण: पहला/ जनवरी 2016

यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

कैद में सृजन


अभी हाल में मध्य प्रदेश की जेलों के कैदियों द्वारा सृजित की गई कलाकृतियों को प्रदर्शनी देखने का अवसर प्राप्त हुआ| हम बीस मार्च को भोपाल के भारत भवन में घूम रहे थे| कोई इरादा नहीं था कि इस प्रदर्शनी में जाएँ| अचानक पुलिसिया सरगर्मी की तरफ ध्यान गया और उस हॉल के अन्दर की तरफ निगाह डालने पर कुछ आकर्षण पैदा हुआ| साथ में मौजूद पत्रकार मालिक साहब का ध्यान तो एक कलाकृति पर टिक गया, जो बाद में उनका बटुआ हल्का के होने में परिवर्तित हुआ| बताया गया कि इस प्रदर्शनी का समापन होने वाला है| परन्तु हमें समय दिया गया|

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यह कला एवं चित्र प्रदर्शनी मध्य प्रदेश के आठ केन्द्रीय कारावासों के रहवासियों की भिन्न भिन्न माध्यमों पर की गई रचनाओं का छोटा सा संसार था|

यहाँ विषय की विविधता और बहुलता है| कैदी श्रृंगार, भक्ति, देशप्रेम, प्रकृति, गाँधी, इन्तजार आदि महत्वपूर्ण विषयों पर अपना संसार रच रहे हैं| लकड़ी पर उकेरे गए गाँधी जी के तीन बन्दर एकदम अलग और भिन्न रचना है, एकदम अनूठी| पहले से ही बिक चुकी थी| इसकी रचना में कल्पना शीलता और सादगी का अनूठा संगम है|

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ब्रह्मा – विष्णू – महेश की त्रिमूर्ति और शिव परिवार का चित्रांकन निराला था|

IMG_20160320_173321IMG_20160320_173543 कैदियों में विषय की गहराई में उतरने और डूबने की अद्भुद क्षमता दिखाई देती है| समकालीन समाज पर उनके शांत मगर गंभीर व्यंग देखते ही बनते हैं| जब हम चलने लगे तब तक जेल अधीक्षक शैफाली राकेश पहुँच गईं| संक्षिप्त बातचीत हो पाई| उन्होंने बताया कि कैदियों में लिखने और रचने की शानदार क्षमता है| उनके लिए माध्यम की कमी और स्वतंत्रता कोई बाधा नहीं बनते|

अंत में, यह चित्र मेरे मन में बस गया जो किसी कैदी की जिन्दगी का महत्वपूर्ण आत्मकथ्य बन गया है|

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सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

अलीराजपुर का भगोरिया


होली के एक सप्ताह पूर्व भारत के प्राचीनतम निवासी भील और भिलाला आदिवासी जातियां अपने सदस्यों को अपना जीवनसाथी चुनने का अवसर प्रदान करतीं है| यह वह सुविधा है, जो आज सभ्य भारतीय समाज में सुलभ नहीं है, माँगनी पड़तीं है| भगोरिया एक अनुशासित प्रक्रिया है, जिसमें होली से ठीक पहले के सप्ताह में लगने वाले स्थानीय हाट (साप्ताहिक बाजार) भगोरिया मेले और उत्सव में बदल जाते हैं| खरीददारी, उत्सव, नाचगाना, और छोटे छोटे मनोरंजन के साथ प्राचीनता का नवीनता के साथ संगम देखते ही बनता है| इस वर्ष मुझे भगोरिया मेलों में शामिल होने का अवसर मिला|

चित्रों में भगोरिया – भ्रमण

भगोरिया के साथ प्रचलित रूप से मध्यप्रदेश के झाबूआ जिले का नाम जुड़ा हुआ है| झाबूआ दरअसल जिला बन जाने के कारण प्रसिद्ध हुआ और प्राचीन अलीराजपुर राज्य को अपना महत्व हासिल करने के लिए 2008 में स्वतंत्र जिला बनने तक इन्तजार करना पड़ा| प्राचीन भील राज्य आली और मध्यकालीन राजपुर मिलन से अलीराजपुर की नीव पड़ी|[i] वैसे भगोरिया का आयोजन मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के सभी आदिवासी बहुल जिलों झाबूआ, धार, खरगौन, अलीराजपुर आदि में होता है| जितना दूर दराज क्षेत्र में जाते हैं, भगोरिया अपने अधिक मूल रूप में दिखाई देता है|

चांदी के महत्वपूर्ण भारी भरकम गहनों के लदी असाधारण सौंदर्य की धनी भील और भिलाला कन्याएं एक सामूहिक गणवेश में झुण्ड के झुण्ड मेले का आनंद लेने आतीं हैं| हर झुण्ड की लडकियां आज भी एक जैसे रंग के भिलोंडी लहंगे और ओढ़नी पहनतीं हैं| परन्तु इस सामूहिकता में एकलता की थाप भी यदा कदा दिखाई देती है| जैसा कि हमेशा होता है, लड़कों में आधुनिक परिधानों का शौक मेले के पारंपरिक सौंदर्य को थोड़ा कम कर देता है| परन्तु कुछ लड़के फैंटे, कड़े और कंडोरे पहने दिखाई देते हैं|

उमरिया के भगोरिया में आती भिलाला कन्यायें
उमरिया के भगोरिया में आती भिलाला कन्यायें

मध्यमवर्गीय आधुनिकता के थपेड़े, सार्वजानिक प्रेम अभिवयक्ति को कम कर रहें हैं| पहली निगाह के प्रेम का स्थान अब पुराने प्रेम की कभी कभार वाली अभिव्यक्ति ने ले लिया है| ज्यादातर सम्बन्ध पारवारिक और सामाजिक पूर्व स्वीकृति से ही तय होने लगे हैं| दापा (वर पक्ष द्वारा दिया जाना वाला वधुमूल्य) कई बार भगोरिया से भागने के बाद भी देना पड़ता है|

यदि आप उस प्राचीन रूमानी इश्क़ और स्वयंवर के लिए भगोरिया आना चाहते हैं तो न आयें| न ही यह दिल्ली के प्रगति मैदान में होने वाले बड़े मेलों की तरह सजावटी है| मगर बहुत कुछ है भगोरिया में जो देखने और शामिल होने लायक है|

उमरिया:

सोंडवा विकासखंड का उमरिया गाँव बढ़िया सड़क और बाजार के कारण आकर्षित करता है| यह आम भारतीय कस्बों के बाजार जैसा ही है| सम्पन्नता के कारण यहाँ पर आने वाले लोगों में आत्मविश्वास दिखाई देता है| हम भारतवासी मेलों में सबसे अधिक भोजन की ओर आकर्षित होते हैं| यहाँ पर बढ़िया पकौड़े हर पांचवी दुकान पर मिल रहे थे| हाट में दुकान सँभालने और हाथ बंटाने वाली महिलाओं का काफी अच्छा अनुपात था| यहाँ पर भगोरिया के लिए निर्धारित मैदान भीड़ के कारण छोटा पड़ रहा था और आपात स्तिथि के लिए निकास नहीं था| पास के गांवों से भील और भिलाला समुदाय के लड़के लड़कियों के जत्थे लगातार आ रहे थे| जिन परिवार में बच्चे छोटे हैं वह ही पारवारिक इकाई के रूप में आते देते हैं| वृद्ध दंपत्ति में साथ आते में दिखाई दिए| लड़के लड़कियां अपने अपने अलग अलग समूह में आते हैं| आप सौन्दर्यबोध और सम्पन्नता के आधार पर आसानी से भील और भिलाला लड़कियों को पहचान सकते हैं|

यहाँ हम जैसे पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है| बड़े बड़े कैमरे सबसे अधिक फोकस उन भारी भरकम चांदी के गहनों की ओर कर रहे हैं, जिन्हें खरीदना आज आसान काम नहीं है| हाट में आये स्थानीय दुकानदार जागरूक हैं|  आदिवासी सामान की दुकान पर आदिवासियों और बाहरी लोगों का जमघट है| हमने यहाँ के स्थानीय गायकों के भगोरिया गीत भी पेन ड्राइव में खरीदकर लिए|[ii]

वालपुर:

इस से पहले वालपुर गाँव में मुझे अपेक्षागत रूप से अधिक ग्रामीण झलक दिखाई दी| इस छोटे से गाँव में इसके आकर से दो तीन गुना बड़ा हाट लगा था| बहुत से लोगें ने भगोरिया के उसी तरह से पंडाल लगाये थे जैसे दिल्ली में भंडारों के लगते हैं| यह शायद भील बहुल इलाका है, सम्पन्नता कम है और स्वभाव की सरलता अधिक| टूटी फूटी सड़क, बहुत सारी धूल के बाद भी वालपुर मुझे आकर्षित करता है| यहाँ स्थानीय जरूरत का साधारण सामान अधिक है| मैं मुख्य चौराहे पर रखे पत्थर पर खड़ा होकर चारों तरफ देख रहा हूँ| भीड़ अनुशासित है, मगर पुलिस भी अधिक है| ताड़ी पीकर आये लड़के लड़कियां भी अधिक है| एक पुलिसकर्मी मुझे कहता है, जब तक आप शांत है, बहुत सुरक्षित है; किसी की भावना को हल्की सी चोट आपके लिए बहुत हानिकारक हो सकती है| यहाँ लोग जब तक सरल हैं, सब ठीक है मगर क्रोध जगाने के स्तिथि में बहुत भड़क सकते हैं| लड़कियां बहुत शांत शर्मीली सहमी हुई और कम आत्मविश्वास में हैं| लड़के हर कदम पर पुलिस से बचकर चलते हैं| थोड़ी थोड़ी दूर छोटे छोटे समूह में लोग मस्ती में नाच रहे हैं| झाबूआ नर्मदा ग्रामीण बैंक के परिसर में भी दो बड़े ढ़ोल, लम्बी बांसुरी और अन्य वाद्य बज रहे हैं| लोग नाच रहे है| इसके बराबर में तरह तरह के आधुनिक और प्राचीन झूले लगे हैं| थोड़ी दूर मैदान में कई बड़े बड़े ढ़ोल हैं और उनके चारों ओर घूम घूम कर नाच चल रहा है| धुल कदम ताल के साथ बहुत ऊपर तक उठ रही है| धूल के अलावा प्रदूषण नहीं है|

वालपुर भगोरिया में बांसुरी
वालपुर भगोरिया में बांसुरी

रतालू बहुत बिक रहा है| रतालू दक्षिण अमेरिका से आलू के आने तक भारत का मुख्य खाद्य रहा है| सब्जियाँ, मछलियाँ, मांस, सूखी मछलियाँ सब अलग अलग गलियों या इलाकों में बिक रहीं है| पकोड़े और बड़ी बड़ी जलेबियाँ सबसे अधिक भीड़ बटोर रहे हैं| मैं खांड के कंगन और हार देख कर उधर जाता हूँ| यह होली की पूजा में देवता पर चढ़ेंगे, प्रसाद में खाए जायेंगे| मैं बताता हूँ दिल्ली में खण्ड के खिलौने  दिवाली पर बिकते है; दुकानदार कहता है… पढ़ लिख कर तो सब लोग उल्टा काम करते हैं, दिल्ली वाले पढ़े लिखे होते है| उसकी पत्नी “इनका” मुझे फ़ोटो लेने के लिए आग्रह करती है| बाद में हँसकर कहती है, भगोरिया नाचने गाने का त्यौहार है, लड़कियों के फ़ोटो लेने का नहीं|

हल्की सी बातचीत पर लोग अपनेपन से बात करते हैं| आपके गुलाल लगाते हैं और आपसे लगवाते हैं| पुलिस शाम की साढ़े पांच बजे मेले को बंद करा देगी| पूरे प्रशासनिक अमले को अगले दिन अगले गाँव के भगोरिया इंतजाम भी करना है| हम लोग चल देते हैं| अगले दिन पता चलता है, हम लोगों के निकलते ही पुलिस ने लाठियां चलाई, कुछ लड़की छेड़ने का मामला था| बताने वाला लड़का पूछता है अगर लड़की से बात भी नहीं कर पाएंगे तो भगोरिया कैसे होगा? साथ ही मानता है कि लड़की छेड़ने के मामले बढ़ते जा रहे हैं|

पर्यटकों से:

पर्यटक अपनी सुविधा से भगोरिया के लिए किसी भी स्थान होने वाले हाट में जा सकते हैं| आपको सुविधा और संस्कृति में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करनी होगी| मध्यप्रदेश पर्यटन विकास निगम भगोरिया के अवसर पर स्विस टेंट की व्यवस्था करता हैं| जहाँ सुविधाजनक रूप से रहा जा सकता है| अगर आप साथ में कट्ठीवाड़ा जाने का कार्यक्रम बनाते हैं तो यह सुखद अनुभव होगा|

सुझाव:

विकास और जनसँख्या विस्फ़ोट के साथ आज मेले आदि के लिए बड़े मैदान की कमी होती जा रही है| इसके लिए मेले स्थल के निकट बड़े मैदान की व्यवस्था की जरूरत है| हर हाट में आदिवासी हस्तशिल्प और खान-पान आदि को थोड़ा प्रोत्साहन मिलना चाहिए| आदिवासी गीत संगीत पर वालीवुड का असर देखा जा रहा है, मगर उसके प्रोत्साहन के लिए भगोरिया मेले माध्यम बन सकते हैं| क्या ताड़ी को गोवा की फैनी की तरह प्रोत्साहित किया जा सकता है?

सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

[यह यात्रा मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम द्वारा आयोजित की गई थी]

[i] आली और राजपुर से मिलकर बने अलीराजपुर शब्द में मुस्लिम हस्तक्षेप न खोंजें| यह भील राज्य आली का अवशेष है|

[ii] लगभग १०० भगोरिया गीत हमें मानसी ट्रेवल के दुर्गेश राजगुरु (सिसोदिया) – डिम्पी भाई ने खरीदकर उपहार में दिए| आपका हार्दिक धन्यवाद|

उत्तर भारत खोज-चित्रमाला


[पिछले महीने ११ अप्रैल के दिन ख्यातिप्राप्त चिट्ठाकार जिओ पार्किन ने अपने भारत भ्रमण के दौरान बनाये गए रेखाचित्र “North India explorer Sketchbook” प्रकाशित किए| रुचिपूर्ण लगने के कारण उनकी अनुमति के साथ मैं इस आलेख को यहाँ हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ, साथ में रेखाचित्र भी उपलब्ध हैं – आनन्द लीजिये, टिप्पणियों का स्वागत है|   

 

हम इस बार गर्मियों की छुट्टियों पर जल्दी ही निकल पड़े, यह गंतव्य ही कुछ ऐसा था कि अजीब सा समय चुनना पड़ा| हम बहुत समय से भारत जाना चाहते थे, परन्तु अगर आपको भीषण मानसूनी बारिश के प्रति विशेष रूचि नहीं है तो अगस्त में दो सप्ताह के लिए भारत जाने की सम्भावना नगण्य है|

 

हमारा यह भ्रमण जाँची – परखी साहसिक यात्रा कंपनी Exploreने आयोजित किया था, जिसने हमें अभी तक निराश नहीं किया है| हमारा १५ दिन का “उत्तर भारत खोज’ यात्रा कार्यक्रम राजधानी दिल्ली से प्रारंभ हुआ और हमने उदयपुर, पुष्कर, जयपुर, आगरा, वाराणसी, और अंत में कोलकाता को यात्रा की|

 

इस यात्रा में ग्रहण करने के लिए काफी चीजें थीं, हमें वापस आये एक सप्ताह हो गया है पर मेरे दिमाग में यह अनुभव अभी तक घूम रहा है| इस तरह की जगह मैंने पहले कभी नहीं देखी, सर्वथा वास्तविक से लेकर उत्कृष्ट अपरिचित और असाधारण छवियाँ लगातार बिना रुके इस सामने आ रहीं हैं कि आप पहले देखी हुई को इतनी जल्दी समझ ही नहीं पाते| यदि आप थोडा भी दृश्यपरक व्यक्ति है तो यह आपके लिए छवियों का विस्फ़ोट है|

 

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत छाविकारों के लिए सुनहरा सपना है और मैं अपने मेमोरी कार्ड को भर कर लाया हूँ| मैं अभी भी इनका संपादन कर रहा हूँ, अभी समय लेगा| हमेशा की तरह, मैंने रेखाचित्र पुस्तिका भी साथ रख ली थी –  जब भी मुझे अवसर मिला मैंने इसका प्रयोग किया|

 

हमारे यात्रा की गति काफी तेज थी और ज्यादातर जगह तो बैठ कर कुछ रेखाएं खींचने का भी समय नहीं मिल पाया| फिर भी, इस चक्कर में बहुत यात्रा की – ट्रेन से (तीन – तख्ती ट्रेन सहित, जो कि अपने में खास है), बस, नाव —  और इन सभी मौकों पर मैंने अपने सामने से कुछ न कुछ उकेर लेने का प्रयास किया| साधारणतः, इनमें मेरे साथी यात्री हैं जो किताबों और मोबाइल फ़ोन पर समय बर्बाद कर रहे हैं|

हाँ, भारतीय सड़कें भी ऐसी हैं, कि उन पर यात्रा करते हुए रेखाचित्र बनाना भी किसी रोलर कोस्टर राइड जैसा है न कि किसी आर्ट स्टूडियो जैसा शांत – सुशील माहौल| कोई फर्क नहीं पड़ता – सारे टेढ़े – मेढ़े अपूर्ण और विषय के दुहराव वाले रेखा चित्रों से उन स्तिथियों और माहौल का सही सही पता चल जाता है जिसमें यह बनाये गएँ हैं और एक ही विषय बने रेखाचित्र विभाजित प्रौस्तैन छायाचित्रकारी की तमाम विविधता के बाद भी नहीं लुभाते हैं|

जिन पृष्ठों में मैं आपको खालीपन दिखाई दे वहां मैंने अपने नोट्स मिटाए हैं – आपको उन्हें झेलने की कोई इच्छा नहीं होती – और मैंने स्कैनिंग के बाद फोटोशोप के द्वारा फ्लैट टोन जोड़ दी है|

नमस्ते!

हर समय संगीत संग


 

मैंने अपनी पिछले ब्लॉग पोस्ट में जब लिखा कि लोक संगीत को बचाने में नयी तकनीकि माध्यम हो सकती है तो किसी मित्र ने पूछा कि क्या आप पाश्चात्य संगीत नहीं सुनते? मैंने कहा, “नहीं, नहीं भाई, मेरा संगीत ज्ञान बहुत कमजोर है, जहाँ भी कोई लय, धुन, सुर ताल महसूस होती है, मैं संगीत सुन लेता हूँ|”

किन्ही साहब ने कहा, संगीत पसंद है तो गंग्नम स्टाइल में नाच कर दिखाओ| भाई!!, संगीत पसंद करना, सुनना अलग बात है| ये गाना बजाना, नाचना अपने बस में नहीं हैं| ये गाना बजाना नाचना, सब खुदाई नियामत हैं, मुझ जैसा आदमी इसे करकर कैसे पाप कर सकता है| खैर, उनका मन था तो कोशिश की और खुद पर हंस भी लिए|

अब  HP Connected Music India वालों एक नया प्रश्न सामने ला खड़ा किया गया है| क्या कहा या लिखा जाये जब कोई मुझसे पूछे कि मेरे जीवन में संगीत का क्या स्थान है?

जब मेरा जन्म हुआ था तब थाली बजा कर ही तो पहली बधाई दी गयी थी| थाली का वो संगीत भले ही आज महत्व न रखता हो मगर संगीत को जीवन से परिचित करने वाली वह ध्वनि आज भी मुझे संगीत से जोड़ कर रखे हुए है|

बाबा का वह लयबद्ध संध्या हवन और मन्त्र पाठ, माँ की गयी मानस की चौपाईयां, कवितायेँ गुगुनाते पिता, रेडियो पर बजता विविध भारती के फ़िल्मी गाने, रोज गाने गाकर भीख माँगने वाली भिखारिन – अम्माँ; सारा जीवन ही संगीत से शुरू होता है| हमारे यहाँ परम्परा है, आमतौर पर, मृत्यु पर संगीत नहीं बजाया जाता| यदि मरने वाला बहुत बड़ा आदमी हो तो शहनाई की शोकधुन बजती है और अगर वह अपनी सारी जिम्मेदारियां पूरी कर कर गया हो तो उसकी बाजे गाजे से अंतिम विदा|

मुझे संगीत के लय, सुर, ताल, सरगम की समझ नहीं आई मगर मन के हर हेर – फेर पर अलग प्रकार का संगीत सुनने की आदत रहीं है| बचपन में भजन, सुगम, गजल, फ़िल्म, कव्वाली, लोक संगीत, सुनने को मिला तो किशोरवय में रसिया, आल्हा, से लेकर ठुमरी, टप्पा, कजरी, होरी से होते हुए ध्रुपद, धमार, ख्याल भी सुनने में अच्छे लगने लगे|

जब कैरियर बनाने का भुत सर पर चढ़ गया तो सुगम संगीत सुनना बंद कर दिया क्योकि बोल जल्दी ही ध्यान अपनी तरफ खिंच लेते थे| उन दिनों वादन यानि इंस्ट्रुमेंटल सुनने लगे| हिन्दुस्तानी ही नहीं कर्नाटक और वेस्टर्न क्लासिकल पर भी कान अजमाए|

आप पढने बैठे हैं, बाएं हाथ की तरफ पानी से भरा पात्र रखा है, टेबल लेंप की हल्की रोशनी किताब पर हैं, पीछे म्यूजिक सिस्टम पर हल्की आवाज में कर्नाटक संगीत का कोई राग बजाया जा रहा है, रात का जो पहर है उसी पहर का संगीत है, आप बेहद ध्यान से पढ़ रहे है| आपकी कलम से कागज़ पर आपकी असली या ख्याली महबूबा के लिये “मुल्ला: द ट्रान्सफर ऑफ़ प्रॉपर्टी लॉ” जैसी भारी भरकम पुस्तक से “मॉर्गेज” पर नोट्स तैयार किये जा रहें हैं| मजाल क्या है, नींद आ जाये, ध्यान भंग हो जाए, कमर टिक जाए, प्यास लग जाए और बाहर गली में पहरा देता चौकीदार आपकी गली में “जागते रहो” की आवाज लगा जाये| पढाई सुबह संगीत की धुन बंद होने पर ही रुकनी है|

जब हम अपनी इंटर्नशिप के लिए एक साहब के दफ्तर पहुंचे तो सोने पर सुहागा हो गया| साहब लोग पेशे से तो चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी वगैराह थे मगर उनके यहाँ बिना बैकग्राउंड म्यूजिक के जोड़-गुना नहीं होते थे| अगर कंप्यूटर में कोई गाना नहीं बज रहा होता तो अन्दर से जबाब तलब कर लिया जाता, “इस कंप्यूटर का इलेक्ट्रॉनिक टाइप-राइटर किस से पूछ कर बना दिया?”

आज संगीत हर जेब में पड़े मोबाइल में हैं, हर गोद में रखे लैपटॉप में हैं; और सुना जा रहा है| जब सुनता हूँ तो लगता है कि चोरी तो नहीं है, जिसने गीत लिखा, बोल दिए, म्यूजिक दिया, साज बजाये; क्या उनके घर उनकी मेहनत का फल पहुंचा होगा की नहीं? कोई दोयम दर्जे की रिकॉर्डिंग तो नहीं? सुगम संगीत के बड़े बड़े नामों को तो शायद कोई फर्क नहीं पढता हो मगर लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत, उप – शास्त्रीय संगीत वाले कहाँ किस तरह से गुजरा कर पाते होंगे| सस्ते पायरेटेड म्यूजिक रिकॉर्डिंग ने मेरे हाथ में संगीत तो पहुंचा दिया है; मगर हम मुफ्त और सस्ते के फेर में केवल कुछ खास तरह के म्यूजिक ही सुन पाते हैं|

जरूरत ये है कि अच्छे लोग अच्छे संस्थान आगे आयें और हमें हर तरह का, हर रंग का हर मूड का संगीत एक जगह उपलब्ध कराएँ| हम अपना मूड बदलें, पलक झपके मन, समय, प्रहर, ऋतू, स्थान, के हिसाब से संगीत बज उठे… पंडवानी से लेकर पाश्चात्य तक सब| ज्यादा तरह का संगीत मिलेगा तभी तो ज्यादा तरह के संगीत का शौक पैदा होगा|

उम्मीद की किरण तो है, उम्मीद पूरी होना अभी बाकि है|

लोक संगीत – रसिया


संगीत किसी भी तरह का हो अगर आप उसका आनंद नहीं ले पा रहे हैं, तो आप सच में संगीत को प्यार नहीं करते| संगीत ही विविधता ही उसका सबसे बड़ा सौंदर्य है| हम आज भारतीय और पाश्चात्य संगीत और उसके फ्यूज़न की बात करते हैं| हमारे यहाँ खुद हिन्दुस्तानी और कर्णाटक दो अलग अलग शाश्त्रीय संगीत हैं और तमाम तरह के लोक संगीत मौजूद हैं| अलग अलग समय पर अलग अलग संगीत सुनना प्रिय लगता है और उनकी अपनी विशेषता हैं| आज वैश्वीकरण और तकनीकि के दौर में जहाँ विश्व, पास आते आते सिकुड़ कर हमारे लैपटॉप में आ गया है, वहीँ लोक संगीत का गला इस इस सिकुड़ गए विश्व में घुट रहा है| लोक संगीत दम घुटने से मरने से बचने की जुगत कर रहा है|

मुझे संगीत की सभी विधाएं सुनने समझने में अच्छी है और मैं उनका माहिर न होकर भी उनका आनंद ले सकता हूँ| लोक संगीत से मेरा एक विशेष लगाव है और उसके बचाव और बढ़ाव में मैं अपना योगदान अगर दे सकूँ तो मेरा सौभाग्य होगा|

यह हमारे भारत वर्ष में बसंत की ऋतू अभी अभी समाप्त हुई है| यह ऋतू बसंतोत्सव का समय है और विश्व भर में प्रेम का संचार करती है| मानवीय प्रेम के प्रतीक, बसंत – पंचमी, वैलेंटाइन दिवस, होली आदि सभी उत्सव इसी ऋतू में मनाये जाते हैं| स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न प्रेम लीलाओं का संगीतमय वर्णन इस समय किये जाने की परम्परा रही है|

इसी परंपरा का एक प्राचीन प्रतीक है हमारा लोक संगीत, रसिया गायन| रसिया मुख्य रूप से व्रजभाषा में गाया जाता है| व्रज भाषा हिंदी के जन्म से पहले, पांच सौ वर्षों तक उत्तर भारत की प्रमुख भाषा रही है| रसिया गायन में राधा और कृष्ण को नायक – नायिका के रूप में चित्रित करते हुए, मानवीय संबंधों, मानवीय प्रेम, और ईश्वरीय भक्ति – प्रेम का गायन है|

मेरे जैसे जिन लोगों ने आकाशवाणी (आल इंडिया रेडियो) पर रसिया सुने हैं उन्होंने अवश्य इसका रसास्वादन किया होगा| अच्छे रसिया गीत में श्रंगार और भक्ति रस का गजब का सम्मिश्रण होता है जो प्रेम को ईश्वर तक ले जाता है| रसिया गायन आपको सरल सहज शब्दों में प्रेम का सन्देश देता है| एक समय में व्रज क्षेत्र में रात रात भर रसिया दंगल हुआ करते थे| जिनमे एक से एक बढ़िया काव्य और संगीत की प्रस्तुतियां की जातीं थीं| आज तो होली के दिनों में रेडियो टेलिविज़न पर वही दो चार पुराने रसिया गीतों की रिकार्डिंग बजा कर केवल परम्परा का नाम भर ले लिया जाता है|

आज इस दम तोडती परम्परा को निर्वाह करने वाले बाजार में निम्न स्तरीय संगीत बेच रहे हैं| ऐसा शायद सुनने वालों का आसानी से उपलब्ध अन्य विधाओं के संगीत की तरफ जाने के कारण हो सकता है| कुछ लोक संगीत, विशेषकर रसिया, के कलाकारों के पास संसाधनों और विज्ञापन क्षमता की कमी हो सकती हैं| लोक संगीत से फिल्मो और अन्य संगीत की ओर प्रतिभा पलायन भी एक समस्या है| मुझे लगता है कि शायद नयी तकनीकि लोक संगीत को संरक्षित कर सकने और बढ़ावा देने में अपना योगदान दे सकती है| मुझे आशा है कि HP Connected Music India भी इस प्रकार का एक अच्छा प्रयास कर सकता हैं|