दिवाली अब भी मनती है

वर्षा उपरांत स्वच्छ गगन में झिलमिलाते असंख्य तारक तारिकाएँ रात्रि को गगन विहार को निकलतीं| लगता सप्तपाताल से लेकर सप्तस्वर्ग तक असंख्य आकाश-गंगाएं कलकल बह रहीं हों| दूर अन्तरिक्ष तक बहती इन आकाशगंगाओं में हजारों देव, देवेश्वर, देवादिराज, सहायक देव, उपदेव, वनदेव, ग्रामदेव आदि विचरण करते| देवियों देवेश्वरियों, सहायक देवियों, वनदेवियों, उपदेवियों, ग्रामदेवियों की मनोहर छटा होती| आकाश मानों ईश्वर का जगमगाता प्रतिबिम्ब हो| प्रतिबिम्बों अधिष्ठाता देव रात्रिपति चन्द्र को ईर्ष्या होती| कांतिहीन चंन्द्र अमावस की उस रात अपनी माँ की शरण चला जाता है| धरती पर कहीं छिप जाता है| उस रचे अनन्त षड्यंत्र इन आकाशगंगाओं की निर्झर बहने से रोकना चाहते हैं|

अहो! वर्षा उपरांत की यह अमावस रात!! देखी है क्या किसी दूर जंगल पहाड़ी के माथे बैठ कर| लहराता हुआ महासागर उससे ईर्ष्या करता है| उस के झिलमिल निर्झर प्रकाश में वनकुल की बूढ़ी स्त्रियाँ सुई में धागा पिरोती हैं| प्रकाश की किरणें नहीं प्रकाश का झरना है| प्रकृति की लहलहाता हुआ आँचल है| वर्षा उपरांत अमावस की रात यह रात अपने नेत्रों से देखी है!!

अकेला चन्द्र ही तो नहीं जो अनंत आकाशगंगाओं से ईर्ष्या करता है| सृष्टि विजय का स्वप्न है, मानव|

प्रकृति का दासत्व उसका उत्सव है| कोई आम उत्सव नहीं यह| स्वर्ग के देवों को भी प्रतीक्षा रहती है| मानव अनन्त आकाश गंगाओं से टकरा जाता है| धरती पर असंख्य दीप झिलमिला उठते हैं| आकाशगंगाओं में विचरण करते असंख्य देव, देवियाँ, देवेश्वर, देवेश्वारियां, देवादिराज, देवाधिदेवी, सहायक देव-देवियाँ, उपदेव-देवियाँ, वनदेव – देवियाँ, ग्रामदेव-देवियाँ घुटनों के बल बैठ जाते हैं| आकाशगंगा के किनारों से यह असंख्य देव देवियाँ पृथ्वी पर ताका करते हैं| अहा! यह दीपोत्सव है, यह दिवाली है| हर वर्ष हर वर्षा दीप बढ़ते जाते हैं| घी – तेल के दिया-बाती अपना संसार सृजते हैं| असंख्य देव भौचक रहते हैं| असंख्य देवियाँ किलकारियां भरती हैं| कौन किसको सराहे| कौन किसकी प्रशश्ति गाये| कौन किस का गुणगान करे| कौन किस की संगीत साधे|

अब देवता विचरण नहीं करते| अब देवियों की छटा नहीं दिखती| अब देव खांसते हैं| अब देवियाँ चकित नहीं होतीं| अब आकाश ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं होता| चन्द्र अमावस में मलिन नहीं होता| चन्द्र पूर्णिमा को मैला रहता है| चन्द्र चांदनी नहीं बिखेरता| इस चांदनी का चकोर मोल नहीं लगता| इस चांदनी में मिलावट है| इस चांदनी में शीतलता नहीं है|

मिठाइयाँ अब भी बनती है| पूड़ियाँ अब भी छनती हैं| बच्चे अब भी चहकते हैं| कपड़े अब भी महकते हैं| दीवारें अब भी चमकतीं हैं| प्रेमी अब भी बहकते हैं| दीपोत्सव अब भी होता है| दिवाली अब भी मनती है| आकाश में कालिख छाई है| हवाओं में जहर पलता है| दिग्दिगंत कोलाहल है| काल का शंख अब बजता है| ये मानव का अट्टाहास है| यह बारूद धमाका है| यह बारूद पटाखा है| यह बारूद का गुलशन है| यह बारूद की खेती है| यह बारूद का मन दीवाना है|

यह बारूद का उत्सव है| यहाँ दीपक किसने जाना है? यहाँ गंगा किसने देखी हैं? चाँद किसे अब पाना है? यहाँ खुद को किसने जाना?

यहाँ दमा का दम भी घुटता है| हर नाक पर यहाँ अब कपड़ा है|

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पानी की पहली लड़ाई

धौलाधार के ऊँचे पहाड़ों पर दूर एक प्राचीन मंदिर मिलता है| कहानियाँ बताती हैं कि कोई प्राचीन जनजातियों के राजाओं की लड़ाई हुई थी यहाँ| दोनों राजा मरने लगे| दोनों के एक दूसरे का दर्द समझ आया| एक दूसरे की प्रजा का दर्द समझ आया| मरते मरते समझौता हुआ| एक युद्ध स्मारक बना| यह युद्ध स्मारक अगर आज उसी रूप में होता तो शायद दुनिया का सबसे प्राचीन जल-युद्ध का स्मारक होता| जैसा होता है – स्मारक समय के साथ पूजास्थल बन गया और धीरे धीरे चार हजार साल बाद और अब से पांच हजार साल पहले मंदिर| यहाँ आज पंचमुखी शिवलिंग मंदिर है| अब यह गोरखा रेजिमेंट का अधिष्ठाता मंदिर है|

आज यह शिव मंदिर – एक कहानी और भी कहता है – भूकम्प की| धरती काँप उठी थी| मंदिर नष्ट हो गया| दूर एक चर्च बचा रहा| हिमालय के धौलाधार पहाड़ों के वीराने में लगभग बीस हजार लोग मारे गए| मंदिर दोबारा बनाया गया| उस भूकंप की चर्चा फिर कभी|

तब थार रेगिस्तान रेगिस्तान न था, नखलिस्तान भी न था, हरा भरा था| रेगिस्तान में अजयमेरु का पर्वत था| वही अजयमेरू जहाँ पुष्कर की झील है| अरावली की इन पहाड़ियों पर मौर्य काल से पहले एक बड़े राज्य के संकेत मिलते हैं जिसका स्थापत्य सिन्धु सभ्यता से मेल खाता है| यही एक भाग्सू राक्षस का राज्य था| सुनी सुनाई कहानियों के विपरीत यह राक्षस जनता का बहुत ध्यान रखता था| पर ग्लोबल वार्मिंग तब भी थी| हरा भरा अजयमेरू राज्य सूखे का सामना कर रहा था| राजा भाग्सू राक्षस ने पानी की ख़ोज की और हिमालय पर धौलाधार के पहाड़ों पर के झरने से पानी लाने का इंतजाम किया|

कथा के हिसाब से राजा भाग्सू राक्षस कमंडल में सारा पानी भरा और अपने राज्य चल दिया| स्थानीय राजा नाग डल को चिंता हुई| अगर पानी इस तरह चोरी होने लगा तो उसके राज्य में पानी का अकाल पड़ जायेगा| उसके राज्य में बर्फ़ तो बहुत थी मगर पानी?? ठण्डे हिमालय पर आप बर्फ नहीं पी सकते|

युद्ध शुरू हुआ| स्थानीय भूगोल ने स्थानीय राजा नाग डल की मदद की| राक्षस हारने लगा| उसने समझौते की गुहार लगाई| दोनों राजाओं ने पानी का मर्म, पानी की जरूरत और आपसी चिंताएं समझीं और संधिपत्र हस्ताक्षरित हुआ| यह सब आज से ९१३० साल पहले द्वापरयुग के मध्यकाल में हुआ|

इस युद्ध का स्थल आज दोनों महान राजाओं भाग्सू राक्षस और नाग दल के नाम पर भागसूनाग कहलाता है| हिमाचल में धर्मशाला के पास जो नाग डल झील है, वह इसी युद्ध या समझौते से अस्तित्व में आई| अजयमेरू तक भी पानी पहुंचा| कोई पुष्टि नहीं, मगर पुष्कर झील की याद हो आई| हो सकता है, नाग डल और पुष्कर प्राचीन बांध रहे हों, जिनके स्रोत नष्ट होते रहे और ताल रह गए|

अपनी प्रजा को प्रेम करने वाले दोनों महान राजाओं के राज्य, उनके वंश, उनकी जाति, उनके धर्म आज नहीं हैं| उस महान जल संधि का नाम भी विस्मृत ही है| इस वर्ष उस युद्ध का कारक भाग्सू नाग झरना मुझे सूखता मिला|

उनका युद्ध स्मारक आज गोरखा रायफल के अधिष्ठाता देवता के रूप में विद्यमान है| ५१२६ साल पहले राजा धर्मचंद के राज्य में यहाँ शिव मंदिर की स्थापना हुई| भागसूनाग मंदिर का नाम बिगाड़कर भागसुनाथ लिखा बोला जा रहा है| कल संभव है भाग्यसुधारनाथ भी हो जाए|

जब भी जाएँ कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भाग्सूनाग जाएँ, मंदिर के बाहर लगे पत्थर पर लिखे इतिहास को बार बार पढ़े| उसके बाद भाग्सुनाग झरने में घटते हुए पानी को देखें| बचे खुचे ठन्डे पानी में हाथपैर डालते समय सोचें; आज इस स्थान से थोड़ा दूर शिमला में सरकार पानी नाप तौल कर दे रही है|

मेरी जानकारी में भाग्सूनाग का युद्ध जल के लिए पहला युद्ध है| आज यह मिथक है, कल इतिहास था|

कहते हैं अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा| भारत पाकिस्तान और भारत चीन पहले ही पानी की बात पर अधिक कहासुनी कर ने लगे हैं|

यदि आपको लगता है, बच्चों का भविष्य बचाना है, इस मिथिकीय कहानी को इष्ट मित्रों से साँझा करें शेयर करें|

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साहित्य के उत्सव

साहित्यक समारोहों के प्रति जनता प्रायः निर्लिप्त भाव रखती रही है| साहित्य समारोह भी प्रायः आलोचकों, समालोचकों, पुरस्कार प्रदाताओं के वो परिपाटी बने रहे जिनमें आम जनता आम की गुठली की तरह निष्प्रयोज्य होती है| अपने इस संभ्रांत रवैये के कारण हाल के वर्षों में साहित्य समारोह हाशिये पर चले गए हैं और उत्सवों, जश्नों और फेस्टिवल ने ले ली है| उत्तर भारत में ठण्ड के आते ही शादियों के साथ साथ साहित्य और सांस्कृतिक उत्सवों का मौसम भी शुरू हो जाता है|

यह उत्सव, भारत के तीज त्योहारों की तरह समाज के हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ समेटे रखते हैं| यहाँ साहित्य और उपसाहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं| गंभीर साहित्य चर्चा को अक्सर मुख्य पंडाल अलग स्थान मिलता है| जिन समारोह में गंभीर साहित्य मुख्य पंडाल में होता हैं, वहां भीड़ प्रायः वहां नहीं होती| भले ही साहित्यकार इस प्रकार की स्तिथि को साहित्य विरोधी मानते हैं परन्तु भीड़ साहित्य से बहुत दूर नहीं होती| आप भीड़ से हमेशा गंभीर साहित्य से जोड़े हुए नहीं रख सकते| लोकप्रिय पंडाल प्रायः फिल्मकारों, पत्रकारों, से भरे महसूस होते हैं क्योंकि मीडिया में इनकी खबरें देने और पढ़ने वाले बहुत होते हैं| लोकप्रिय पंडाल में गायन, वादन और नृत्य का समां बंधा रहता हैं जिसमें फिल्म भी एक विधा है| नाटकीय प्रस्तुतियां – कथा पाठन, नृत्य नाटिकाएं, आदि होती हैं मगर प्रायः रंगमंच इन उत्सवों का भाग नहीं होता|

मेरी समझ में भोजन संस्कृति को जानने समझने का उचित माध्यम हैं और आजकल अधिकतर उत्सव इस पहलू पर ध्यान दे रहे हैं| सांस्कृतिक पहलू के अलावा भी भोजन दो प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, एक तो उत्सव में जुटी हुई भीड़ को उत्सव से दूर न जाने देने के लिए उनका पेट भरे रखना होता है दूसरा लाभ में मामूली सी हिस्सेदारी से उत्सव का खर्च भी कुछ हद तक पूरा जा सकता है| आम जनता के लिए तरह तरह के खाने और जायके तक एक ही स्थान पर पहुँच भी बड़ी बात है|

किताबें किसी भी साहित्य उत्सव का केंद्र होती हैं| जहाँ साहित्य किताबों के बिना बेमानी है| साहित्य उत्सव आम जनता साहित्यिक किताबों से जुड़ने का पुस्तक मेलों के मुकाबले अधिक उचित अवसर प्रदान करते हैं| यहाँ लोग सीधे सीधे किताबों से जुड़ते हैं, उनके बारे में हुई चर्चा से प्रभावित होते हैं और उन्हें साहित्य के परिदृश्य में देख समझ पाते हैं| हाल में साहित्येतर सांस्कृतिक गतिविधियों और भोजन के अलावा साहित्येतर सांस्कृतिक सामिग्री को भी इन उत्सवों में जगह मिलने लगी है| यह बाजार का साहित्य उत्सवों पर अतिक्रमण नहीं है वरन एक दुसरे से लाभ उठाने का प्रयास है|

इन उत्सवों में साहित्यिक संभ्रांतों का स्वांत सुखी वर्चस्व जरूर समाप्त हुआ है, मगर यह समाज के उच्च मध्यवर्ग का अपनी जड़ों से आज भी जुड़े होने का भ्रम कायम करने का माध्यम भी हैं| जश्न – ए अदब और जश्न – ए – रेख्ता जैसे उर्दू भाषी उत्सवों में भीड़ भडाका जनता की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अंग्रेजी है| लोग उर्दू के नजाकत और नफासत की बातें उर्दू में नहीं बल्कि बनावटी अमरीकी लहज़े की अंग्रेजी में करते हैं| ग़ालिब का ज़िक्र करते समय उनके शेरोशायरी का ग्लेमर जेहन में उछालें मारता है, की ग़ालिब को लेकर उनकी समझ|

जिस उत्सव में जितने कार्यक्रम समानांतर चलते हों, वह उतना बड़ा उत्सव है| मगर लोगों के जमावड़े को बुलाना, उसे जमाये रखना, जिमाये रखना, और ज़ज्बा बनाये रखना अपने आप में बड़ी बात है|

हिंदी में विनम्रता

Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

चाचे दी हट्टी, कमला नगर

राजमा चावल और छोले भठूरे दिल्ली वालों की जान हैं| छोले भठूरे का बाजार दिल्ली के सबसे चुनौतीपूर्ण बाजार में से एक हैं| आम तौर पर सारे छोले भठूरे एक जैसे हैं, छोले का तेज मसाला और तैलीय भठूरे| मगर ज्यादा मसाला स्वाद का दुश्मन है, यह बात जिन्हें पता हैं वही शीर्ष पर हैं| आपको शीर्ष पर आने के लिए दस नाम कोई भी गिना देगा, जहाँ मामूली मामूली अंतर से भी स्वाद में जबरदस्त अंतर है|

एक सामान्य व्यक्ति के लिए चाचे दी हट्टी छोले भठूरे की एक आम दुकान है| यहाँ न आपको बैठने या खड़े होने की कोई खास व्यवस्था नहीं| ग्राहक गली में रखी तो मेज के सहारे छोले भठूरे खाते हैं| बहुत से ग्राहक यहाँ वहां खड़े होकर जुगाली करते नजर आते हैं| अगर यह पतली से गली न होती तो शायद आपको आते जाते वाहन भी परेशान करते| यह दिक्कततलब बात है, जब आप देखते हैं कि दुकान के आधी गली भरकर भीड़ है| आपको कतार में खड़ा होना होता है| कोई भी दिल्ली वाला केवल छोले भठूरे के लिए इतनी दिक्कत झेल लेगा, मगर यह तो चाचे दी हट्टी के छोले भठूरे हैं|

कमला नगर, दिल्ली विश्वविद्यालय के पास होने के कारण छात्र-छात्रों के युवा जीवन्तता का केंद्र है| दिल्ली की लड़कियां कमला नगर और सरोजनी नगर में ख़रीददारी करना पसंद करतीं हैं| इसी कमला नगर में भीड़ से थोडा सा हटकर यह गली हैं, जिसमें चाचे दी हट्टी है| दुकान के ऊपर सूचना पट को शायद ही कोई पढ़ता होगा – रावलपिंडी के छोले भठूरे| एक दर्द है – विस्थापन का| एक निशानदेही है, हिंदुस्तान की भोजन संस्कृति की| हिंदुस्तान – जहाँ कोस कोस पर पानी, चार कोस पर बानी, और चालीस कोस पर खानी बदल जाती है|

चाचे दी हट्टी की शान हैं भठूरे भरवां – आलू वाले भठूरे| अगर आप बोलकर सादे भठूरे नहीं मांगते तो भरवां आलू भठूरे मिलेंगे| आलू अच्छे से उबला हुआ है और मसाला सिर्फ उतना ही है जितना ज़रा सा भी ज्यादा न कहला सके| आम भठूरे के मुकाबले यह कम तैलीय हैं| भठूरे का तैलीय होना काफी हद तक कड़ाई के तेल की गर्मी पर निर्भर करता है|

ज्यादातर छोले भठूरे में मोटे काबली चना (सफ़ेद चना) प्रयोग होता है| चाचे दी हट्टी के छोले छोटे काबली चने से बने हैं| मसाला बिलकुल भी ज्यादा नहीं हैं| नवरात्रि के दिनों में जाने के कारण मैं सोचा कि छोले में प्याज व्रत त्यौहार की वजह से नहीं डाली गई है| मगर बताया गया कि प्याज का मसाले में प्रयोग नहीं होता| इस लिए प्याज न खाने वाले भी इसे आराम से खा सकते हैं| साथ में हैं इमली की चटनी| प्याज सलाद के तौर अपर अलग से है|

स्थान: चाचे दी हट्टी, कमला नगर, दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: छोले भठूरे

पांच: साढ़े चार

दिल्ली, शाकाहारी, नई दिल्ली, छोले भठूरे, पंजाबी खाना, रावलपिंडी,

संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

समाज में संस्कृत

प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को लेकर भारतीय विशेषकर उच्चवर्ग मानसिक रूप से लगाव रखता है| जिन लोगों को किसी भी भारतीय भाषा में बात करने में शर्म आती हैं वो भी संस्कृत का जिक्र आते ही अपने ह्रदय में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, और संस्कार के झंडे बुलंद करने लगते हैं| मगर अगर भारतीय जनसंख्या के अनुपात में देखें तो जनसँख्या का नगण्य हिस्सा के लिए ही संस्कृत  मातृभाषा है| मुट्ठी भर भारतीय इसे समझ बोल सकते हैं| बहुसंख्य के लिए संस्कृत गायत्री मंत्र या किसी और गुरुमंत्र की भाषा मात्र है| अधिकांश “काले अक्षर भैस बराबर – यजमान” पंडितजी के सही गलत उच्चारण में बोली गई संस्कृत में वेद – पुराण मन्त्रों से अपना इहलोक और परलोक “सुधार” लेते हैं और ॐ जय जगदीश हरे या कोई फ़िल्मी आरती गाकर या सुनकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं|

सरकारी हिंदी और धार्मिक संस्कृत की भारत में दशा इनके पोंगा प्रचारों, अनुष्ठानों और समारोहों के कारण जनता से कोसों दूर है| सरकारी हिंदी का बनावटीपन उसकी विनाशगाथा है| मगर संस्कृत का दुर्भाग्य है कि यह धर्म के ठेकेदारों के कब्जे में है और विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसके शिक्षक संस्कृत को धर्मग्रंथों से अलग कर कर नहीं देख पाते| उनके लिए संस्कृत वेद पुराण की भाषा से अधिक कुछ नहीं है| भर्तहरि बाणभट्ट, जयदेव, जैमनि, कालिदास, आदि उनके लिए संस्कृत का नहीं, सामान्य ज्ञान – अज्ञान का विषय है| आचार्यों के दीर्घबुद्धि में यह नहीं आता कि जब भाषा को साहित्य से अलग कर दिया जाय तो वह बूढी हो जाती है और जनता से कटकर मृत|

मगर संस्कृत की दुनिया में सब कुछ पंडिताऊ अंधकार ही नहीं है, जन साधारण का उजाला भी है:

देखिये सुनिए नीचे दिए गए चलचित्र –