स्तन कैंसर की मरीज: एक शब्द चित्र


 

कल जब बीबीसी हिंदी सेवा की रिपोर्ट पढ़ी कि हॉलीवुड अभिनेत्री एंजेलीना जोली को स्तन कैंसर नहीं है फिर भी उन्होंने अपने स्तन हटवाए हैं; मैं अपने माँ के बारे में सोच रहा था| कल 15 मई 2013 को मेरी माँ अगर जिन्दा होतीं तो 61वां जन्मदिन मानतीं| मगर 49 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गयी| उसके बाद मेरी छोटी बहन को लगभग 7 -8 साल के संघर्ष के बाद कैंसर में मात्र 31 की आयु में हमसे छीन लिया| आगे बढ़ने से पहले मैं बता दूँ कि ज्यादातर मामलों में कैंसर लाइलाज नहीं है; मेरी बहन ने पहली बार उसे 6 महीने में पछाड़ दिया था और उसके बाद उसने 6 साल स्वस्थ जीवन जिया|

जब मैं बीबीसी की रिपोर्ट पढ़ रहा था तो मुझे उस पर की गयी टिप्पणियों से विशेष परेशानी हुई| कुछ टिप्पणियाँ इस प्रकार थीं:

“किस किस अंग को हटवाएगी? ये संरचना है भगवान की शरीर तो त्यागना ही होगा एक दिन”

“अब बताइए सब औरतें यही सोचने लगी तो क्या होगा इस दुनिया का नीरस नीरस नीरस”

मुझे बुरा लगा| मैंने लिखा:

“मुझे बेहद दुःख है कि बेहद घटिया बातें बकीगयी हैं यहाँ पर| मेरी माँ, जिनका आज जन्म दिन होता, और मेरी छोटी बहन की मृत्यु स्तन कैंसर से 49 और 31 के उम्र मैं हो गयी| बेहद दर्दनाक होता है| जिनपर बीतती है वो ही जानते है| गलत बात है कि लोग दुनिया के नीरस होने और मौत से भागने की बात कर रहे है| बच्चे को स्तन पान कराने के बाद स्तन का कोई प्रयोग नहीं है और इसका रहना न रहना बेमानी है| रही बात मौत से भागने की तो जिन्हें मौत से ज्यादा प्यार है वो आत्महत्या कर लें”

इसके बाद बीबीसी हिंदी से श्री सुशील कुमार झा ने मुझसे बात की और उसे छापा| बीबीसी हिंदी ने उसे अपने फेसबुक पेज पर और सुशील जी ने इस अपने फेसबुक प्रोफाइल पर सबके साथ साँझा किया है| जिन पर अलग अलग लोगों के विचार आ रहे हैं|

मगर एक टिपण्णी जो मूल रिपोर्ट पर थी और अब हटा दी गयी है कि “बिना **** के कैसे लगेगी?” यह टिपण्णी मुझे रात भर जगाये रही| तो मेरा उत्तर प्रस्तुत है:

मैं नहीं जानता कि एंजेलीना जोली कैसी दिखेंगी और उनके बारे में जानकर किसी को क्या करना है| अगर आपको अंदाजा लगाने का ज्यादा शौक है तो  मैं स्तन कैंसर से काफी ज्यादा पीड़ित एक महिला का शल्य चिकित्सा के बाद के तीसरे महीने का जिक्र कर रहा हूँ| (सलाह है: न पढ़ें)

जीवन का जीवन के लगभग सभी पिछले शारीरिक दर्द अब सिर्फ याद बन कर रह गए हैं| आज अब यदि कैंसर होने से पहले के सबसे तेज दर्द को याद करें तो वो इस दर्द को दस (10) मानने पर दो या तीन (2 या 3) के स्तर पर आयंगे| आज किसी भी पुराने दर्द और प्रताड़ना के लिए किसी से भी कोई शिकायत नहीं है| इंसान कितना भी ताकतवर हो वो दर्द नहीं दे सकता जो ईश्वर (अगर कहीं है) तो देता है| चिकित्सक दर्द की दवा बढ़ाते जा रहे हैं| नहीं!! चिकित्सक मरीज के लिए कोई दवा नहीं दे रहे; दवा इस बात की है कि मरीज शांत रहे, और तीमारदार शांति से सो सकें|

जब मरीज के सामने आप पहली बार जातें है तो ज्यादातर वो पहली नजर में ठीक ठाक लगती है| क्योंकि चिकित्सकों ने उसे काफी बेहतर खुराक लेने के लिए कहा है वरना वो कीमियो थैरपी को नहीं झेल सकती| कहते हैं कि कैंसर से जितनी मौत होतीं हैं उतनी ही इस कीमियो थैरपी से| इस समय मरीज को वो रासायन दिए जा रहे है जिनका प्रयोग विश्व युद्ध में रासायनिक हथियारों के रूप में किया गया था|

एक हल्की मुस्कान आपका स्वागत करेगी; मन में यह भाव है कि आ गया एक और…| चेहरे पर चमक होगी, बिना किसी श्रृंगार के यह महिला आपको अपने जीवन में सबसे ज्यादा सुन्दर लग रही हो सकती है| यदि आपकी निगाह में बारीकी है तो आप पाएंगे कि चेहरे पर कोई बाल नहीं है| ज्यादातर मामलों में सिर को ढक कर रखा गया है क्योंकि सिर पर भी बाल नहीं हैं| जहरीले रसायन सबसे पहले शरीर से बाल हटा देते हैं| सिर से पैर तक कहीं भी कोई बाल, रोंया, रोंगटा कुछ नहीं है| चिकनी चमक दार त्वचा है|

चेहरे के चारों ओर आपको एक प्रभा मंडल दिखाई देगा| जो किसी भी पहुंचे हुए सन्यासी महात्मा से अधिक होगा कम नहीं| आपको याद होगा कि महात्मा बुद्ध को बीमार, मृत और वृद्ध को देख कर संसार की क्षणभंगुरता का अहसास हो गया था| महात्मा बुद्ध ने जो तीनों चीजें देखीं थीं इस महिला ने एक साथ वह अवस्थाएं खुद से अपने इस जीवन में जी लीं हैं| जीवन का सारा सच आमने हैं: प्रथम और अंतिम|

अब शायद यह महिला अपने इलाज में प्रयुक्त रासायनिक विष के कारण कभी चाहकर भी माँ नहीं बन पाएगी| जीवन ने उसे सिखा दिया है कि उसका मातृत्व अब समाप्त हो गया है| अब उसके मन में जो विचार है वो मातृत्व और पितृत्व से ऊपर की बात है मैं उसे नहीं जानता| इसलिए नहीं लिख सकता| मगर यह महिला जानती है|

 

हर कुछ दिन बाद और ठीक होने की स्तिथि में जीवन भर हर साल बार बार इस मरीज को कुछ जांच करानी होंगी जिनमे उन्हें परमाणु – विकरण पैदा करने वाले तत्वों का घोल हर बार पीना होगा और कई बार जांच करने वाला चिकित्सक तीमारदार से कहेगा कि भाई ज़रा दूर बैठना, बच्चों को पास मत बिठाना| हाँ जी!! विकरण का खतरा है तीमारदार को, सोचें मरीज क्या झेल रहा हो सकता है|

साथ ही, मरीज की रेडिओ – थेरेपी भी चल रही है| इसमें शरीर के कैंसर प्रभावित अंदरूनी अंगों को जलाकर नष्ट कर दिया जाता है| जहाँ शल्य चिकित्सा संभव न हो या उन हिस्सों में कैंसर से लड़ना केवल कीमियो थैरपी के बस में न हो या किसी कोई अन्य कारण हो तो इसका प्रगोग करते हैं| आम भाषा में डॉक्टर इस सिकाई ही कहते है| मैंने एक चिकित्सा कर्मी से पूछा था कि कैसा महसूस होता होगा तो उसने जो कहा था मुझे वह पढ़ लें: “पहले आप किसी जलती मोमबत्ती के ऊपर हाथ रख कर खड़े हो जाएँ और फिर माइक्रो – वेब ओवन में पकते बैगन के बारे में सोचें|” जी नहीं! एक दिन में वो हाल नहीं करते मगर.. उस दयालू चिकित्सा कर्मी को मेरा प्रश्न बेहद नागवार गुजरा था|

बिना स्तन और बालों के यह महिला किसी पहुँचे हुए सन्यासी की तरह लगती है| जीवन की हर मलिनता, प्रेम, घृणा, पाप, पूण्य, मोह और लगाव अब इस महिला के लिए बेमानी है| न अब किसी के लिए मन में सहानुभूति है न खुद के लिए सहानुभूति की आवश्यकता है| धर्म और शिक्षा जिस मूलभूत सत्य को दशकों में नहीं सिखा पाते, जीवन के ये कुछ पल स्वयं सिखा देते हैं|

स्तन विहीन महिला, जिसके माँ बनने की सम्भावना नगण्य है, अब भी महिला और पुरुष के भेद से ऊपर है| नहीं! नहीं! वह नपुंसक बिलकुल नहीं है| अब वह मानव है, मात्र मानव|

 

 

क्षमा – शीलता की धुर विरोधी: क्षमा-इच्छा


मेरे पिछले ब्लॉग के बाद कुछ मित्रों में मुझसे बातचीत करते हुए असहमति जताते हुए कहा है कि जब भी भावनाओं को आहात करने वाली कोई भी टिपण्णी सामने आती है तो प्रबुद्ध वर्ग क्षमा याचना की मांग तो करता है है|

प्रथमतः, मुझे यह बात समझ नहीं आई| एक पुराना दोहा पढ़ा था:

छिमा बड़न को चाहिये,   छोटन को उतपात।

कह रहीम हरि का घट्यौ,         जो भृगु मारी लात॥

पूरी कथा से तो आप सभी प्रबुद्ध जन अवगत होंगें ही| भगवान् विष्णू ने इस मिथकीय घटना क्रम में एक श्रेष्ठ उदहारण प्रस्तुत किया है| उन्होंने भृगु द्वारा हमला किये जाने के बाद क्षमा की मांग नहीं की न ही किसी अन्य प्रकार का दबाब नहीं डाला|

मैं यह नहीं कहता कि क्षमा की आशा नहीं करनी चाहिए; परन्तु क्षमा मंगवाने के लिए किसी भी प्रकार का दबाब डालना, बल प्रयोग की धमकी देना, चरित्रहनन करना, बल प्रयोग करना आदि गलत है|

क्षमा किसी के भी ह्रदय परिवर्तन का प्रतिफल होना चाहिए; गले पड़ी मुसीबतों, मूर्खों और मवालियों से पीछा छुड़ाने की गरज का परिलक्षण नहीं| इन दिनों तो हमारे लोकतंत्र का काम ही माफ़ी मंगवाना या प्रतिबंध लगवाना रह गया है| हालत यह है कि साधारण तथ्यों से भी लोगों की भावनाएं आहात हो जाती हैं| अगर आप कह दें की “सूरज पूरब से निकलता है” तो देश में हंगामा हो जाएँ| कहना चाहिए “सूर्यदेव पूर्व दिशा से उदय होते हैं”|

हम रोज ही किसी न किसी को “सॉरी” बोलते हैं; मुझे नहीं लगता ही दस में से एक बार भी हम यह याद रख पाते हैं कि हमने क्यूँ क्षमा प्रार्थना की| यह सिर्फ अपनी शालीनता प्रदर्शन का माध्यम होता है| हमारा कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं होता| क्या इस तरह के आदतन क्षमा याचने से कोई लाभ होता है?

इसी प्रकार, जब कोई गुंडा मवाली सामने से लड़ने आ जाता है तो भी हम क्षमा याचना कर लेते हैं| क्या हम उस गुंडे को गुंडा मानना बंद करते हैं|

कई बार कानूनी कार्यवाही की धमकी दी जाती हैं| यह कई बार हास्यास्पद हो जाती है जब कि सामने वाले की टिप्पणी, अपने सभी सन्दर्भ और प्रसंगों के साथ काफी हद तक सही प्रतीत होती है| हम केवल इसलिए न्यायलय में वाद नहीं कर सकते कि हमारी “आत्म – मुग्धता” को ठेस लगी है| न्यायालय “आत्म – सम्मान” के लिए वाद सुनता है, “आत्म – मुग्धता” के लिए नहीं| बहुधा, इन दोनों स्तिथियों में कोई विशेष अंतर नहीं होता, इसलिए बचना चाहिए| क्योंकि हर कोई न्यायलय के चक्कर काटने से नहीं डरता| खासकर तब जब, उसे पता हो की मुक़दमे की धमकी गीदड़ – भभकी है|

बहुमत का जबरदस्त दबाब आज की भीड़तंत्र में क्षमा मंगवाने का बड़ा तरीका हो गया हैं| क्या एक आदमी का सत्य १०० करोड़ के दबाब से झूठ बन जाता है| कभी नहीं| यह दबाब उस एक आदमी को यह बताता है कि उसका सामना १०० करोड़ जाहिल – गंवारों से हो गया है और न्याय कि अब आशा नहीं बची है| अपने को बचाने के लिए या तो भाग जाओ या हथियार उठा लो|

कई बार क्षमा मंगवाने के लिए मारपीट भी की जाती है| आज देश के सड़कछाप (और सोशल मीडिया छाप) राजनीतिज्ञ और टका – छाप अपराधी तत्वों के लिए यह बड़ा आसन तरीका हो गया है| लोग फर्जी नाम रख कर आये दिन ऐसा कर रहे हैं| हाल में विश्व भर के मिडिया में इस प्रकार की धमकियों के भारतवर्ष में चलन को लेकर काफी चर्चा है| कहा जा रहा है कि भारत में एक ऐसा कट्टरपंथी तबका है जिसे अपनी बात मनवाने के पिटाई करने से लेकर बलात्कार और हत्या करने की धमकी देने में लाज शर्म नहीं आती है| ऐसी भी जानकारियां आ रही हैं कि इसमें प्रबुद्ध कहे जाने वाले डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट जैसे लोग भी अपने नकली नामों के साथ शामिल हैं| विभिन्न संस्थाओं ने नकली नामधारी इन लोगों का डेटाबेस भी तैयार करना शुरू कर दिया है|

मेरी समझ में जबरन क्षमा मंगवाना आतंक फ़ैलाने का प्रथम पायदान है|

जैसा मैंने पहले ही कहा है कि क्षमा मंगवाने का एक ही उचित तरीका हैं, सामने वाले के ह्रदय परिवर्तन का प्रयास करना| ह्रदय परिवर्तन के कई माध्यम हो सकते हैं:

१.       हम सामने वाले के सामने अपने कृत्य से ऐसे उदहारण रखें कि उसे खुद से आत्मग्लानि हो|

२.       हम वह तथ्य भली प्रकार से सामने लायें जिन्हें वह शायद नजर अंदाज कर गया हो|

३.       आपस में बैठ कर एक दुसरे की बात समझें और अपने अपने पक्ष की गलत बातों को सुधारें|

४.       सामने वाले पक्ष की गलत बातों को नजर अंदाज करते हुए समस्त समाज को भली प्रकार से सही बातों की जानकारी दें| जब सामने वाला पक्ष देखेगा कि उसके दुष्प्रचार का सद्प्रचार से मुकाबला किया जा रहा है तो वह स्वमेव शांत हो जायेगा|

कुल मिला कर मेरे विचार से क्षमेच्क्षा (क्षमा मंगवाने की जबरदस्त इच्छा रखना) क्षमा-शीलता का धुर विरोधी है|

.

यदि आपको यह आलेख पसंद आये या मित्रों से चर्चा करने योग्य लगे तो कृपया नीचे दिए बटनों का प्रयोग कर कर इसे सामाजिक माध्यमों में प्रचारित करें|

साहित्य : समाज का दर्पण — समतल, अवतल या उत्तल


अभी कुछ दिन पहले माननीय साहित्यकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी जी का गाँव भरथुआ देशभर में बदनाम कर दिया गया| वैरागी राजा और मुनि भतृहरि जी तपोभूमि एक नरपिसाच की दरिंदगी की भेंट चढ़ गयी| दिखिए क्या लिखा है इन्होने और इन्होने. कैसे एक ही गाँव में हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का महानायक और आज का एक महाखलनायक पैदा हो गया?

अब किसे नहीं पता कि कौरव और पांडव एक ही गाँव और घर परिवार के थे? क्या क़ानून का कोई महापंडित भी ठीक से ये बता सकता है कि हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर किसका उचित अधिकार था? हम जानते है कि सिंहासन का निर्णय सत्य से नन्हीं, चरित्र से नहीं और वरन इस बात से हुआ था कि सत्य और चरित्र का अधिक झुकाव किधर है| (टिपण्णी: युद्ध में हुई हार जीत मात्र प्रासंगिक है, सत्य का निर्णय नहीं|)

हाल में भरथुआ का नाम उछलने से साहित्य और समाज के रिश्ते चर्चा में उतर आये हैं| यह अच्छी बात है| इस तरह के प्रसंग बहुत सार्थक प्रभाव छोड़ते हैं| हमारे भावनात्मक देश में आज कल लोग शास्त्रार्थ की बातें नहीं करते वरन शस्त्रार्थ, कुत्रर्कों से काम चलाने लगते हैं| सार्थक चर्चा कम ही हो पातीं हैं| माफ़ी मंगवाना, प्रतिबंद लगवा देना, मुंह तोड़ने से बलात्कार तक करने की धमकी दे देना, भारत बंद करवा देना आदि अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के हमारे प्रिय माध्यम बन चुके हैं| आज रोजगारी अक्षरज्ञान के समय में शिक्षा और शास्त्रार्थ का आभाव होना शायद स्वाभाविक है| ऐसे समय में मुझे असंतुलित भाषा में भोजपुरी लोकगीतों पर निशाना साधती एक टिपण्णी फेसबुक पर दिखाई दी| उसके विरोध और समर्थन में कई तर्क कुतर्क भी दिखाई दिए जिनमे मुद्दे से हट कर टिपण्णी लेखक के निजी संबंधों तक पर किये गए प्रहार तक शामिल हैं|

मैं आज समूचे भारतीय साहित्य में अश्लीलता (कामुकता स्वीकार्य है अश्लीलता नहीं) प्रचुरता से पाता  हूँ| निश्चित रूप से कोई भी साहित्य (भले ही वो पीत साहित्य ही क्यों न हो) समाज का दर्पण होता है परन्तु “दर्पण” पूरा सच नहीं होता| प्रथम तो दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिम्ब हमेशा बिम्ब का आधा होता है| (खुद नाप कर देख लें, प्रयोगशाला में जाने की जरूरत नहीं है|) दूसरा उस दर्पण का खुद का क्या स्वरूप है: समतल, अवतल या उत्तल? यह सम्बंधित साहित्यकार पर निर्भर है कि वो क्या रूप चुनता है| यदि हम दर्पण को बिना समझे प्रतिबिम्ब को देखेंगे तो हमें कभी सही जानकारी नहीं मिलेगी| साहित्यकार क्या दर्पण चुनता है यह इस पर निर्भर है की उसकी प्रतिबद्धता क्या है? उसके साहित्य का पाठक, श्रोता और दर्शक कौन है?

आज हमारे लगभग सभी स्तरीय साहित्यकार कहते हैं कि उन्हें पाठक नहीं मिलते| आज गिने चुने हिंदी भाषी घरों में ही हिंदी साहित्य पुस्तकें और पत्रिकाएं आतीं हैं, मगर मनोहर कहानियां बिक जातीं हैं| आज कौन मधुर सार्थक संगीत सुनता है? कितने लोग सार्थक फिल्म, नाटक देखने जाते हैं? कई बार हम घटिया साहित्य के लिए प्रकाशकों, निर्देशकों और निर्माताओं को दोष देते हैं, मगर वो हमें हमारा गला पकड़ कर हमें कुछ भी पढने, सुनने और देखने को मजबूर नहीं करते हैं| हो सकता है कि वो बेहतर विज्ञापन करते हों, मगर क्या हमें अपनी समझ का प्रयोग नहीं करना चाहिए? क्या शराब की दुकानें लोग विज्ञापन के सहारे ढूंढते हैं? नहीं, इस देश में शराब खुद बिकती है और फलों के रस का विज्ञापन आता है| मेरा मंतव्य इतना है कि हम अपनी मानसिकता के अनुसार चीजे खोज लेते है| हमें अपनी मानसिकता पर लगाम रखने की जरूरत है|

सत्य यह है कि कुछ लोगों के लिए साहित्य एक आय का माध्यम भी है और उन्हें वही परोसना है जो बिक जाए| हर कोई महाकवि निराला नहीं है| हम – आप बढ़िया साहित्य खरीदें, सुनें और देखें तो क्या मजाल कि ख़राब साहित्य बिक जाए| घटिया पर प्रतिबन्ध का प्रश्न ही नहीं है, प्रश्न बढ़िया के प्रोत्साहन का है| मेरे लिए प्रोत्साहन का अर्थ कोई अकादमी की इमारत बनबा देना नहीं है वरन उसे घर घर लाने और पहुँचाने का है|

अगर हम किसी भी रचना को स्वीकारते हैं तो निश्चित ही हम उसमे वर्णित बातों का विरोध नहीं कर रहे होते, भले ही उसका समर्थन न करें| आज देश में हर भाषा में घटिया स्तरहीन साहित्य छाप रहा है| ये भोजपुरी, पंजाबी और मलयालम का प्रश्न नहीं है| यह हमारे द्वारा सही साहित्य को समर्थन न देने के कारण हैं|

आज हमारे साहित्य का मुख्यत लोक साहित्य का काफी पतन हुआ है| लोक भाषाएँ या क्षेत्रीय भाषाएँ अपने श्रेष्ठ रचनाकारों को अंग्रेजी के लिए खो रहीं हैं और कम श्रेष्ठ रचनाकार बढ़ी भाषाओँ में लिखना चाहते हैं| मगर दूर दराज के अंचलों में साहित्य, मुख्यतः मनोरंजक साहित्य की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कौन बचता है?  यहाँ पर एक बहुत बढ़ा शून्य है|

मेरे निजी विचार में देश का मजदूर तबका दूर दराज के इलाकों से आता है जो मुख्य रूप से आंचलिक और क्षेत्रीय भाषाओँ को प्राथमिक रूप से समझता है| इस वर्ग हो अपनी भाषा में ही मनोरंजन चाहिए होता है और उसकी मनोरंजक साहित्य शून्य को उन भाषाओँ का स्तरहीन साहित्य भर रहा है| प्रारंभ में उसे पढ़ते, देखते सुनते समय नहीं लगता कि कुछ गलत सुना जा रहा है मगर बाद में जब अर्थ समझ आने लगते है तो वही कुतर्क दिमाग में आते हैं: १. सब तो सुन रहे हैं,  २ सब जगह यही सब हो रहा है, ३. हम जो कर रहे है उस पर हमला मत कर, बहुत मारेंगे| इस सब से न सिर्फ स्तरहीन रचनाकारों का वरन स्तरहीन साहित्य पसंद करने वालों का होसला बढ़ रहा है|

कई वर्ष पहले से मुझे लोक साहित्य और संगीत को समझने का शौक चढ़ा था| हमारे व्रज में में रसिया होता है, रसिया – दंगल भी| एक मित्र मुझे अलीगढ़ नुमायश में रसिया दंगल में ले गए| अश्लीलता की वो हद थी कि हम दोनों न सिर्फ भाग खड़े हुए बल्कि डरते रहे की कोई देखा न ले| रसिया को इस सब स्तरहीनता से बचाने के उद्देश्य को सामने रख कर मैंने एक बड़ी कंपनी दारा प्रायोजित कार्यक्रम के लिए एक ब्लॉग आलेख भी लिखा था|

हमारे देश की एक और विचित्र मानसिकता है| हम भाषाओँ को विशेष अभिव्यक्तियों के लिए चुन लेते हैं| प्रेम मुहब्बत की बातें उर्दू में अधिक अच्छी लगतीं है और धर्म कर्म संस्कृत में; राम को अवधी ज्यादा भाती है और राधा कृष्ण प्रायः ब्रजभाषा में ही फंसे हैं| लड़के – लडकियों की शोखियाँ और मस्तियाँ पंजाबी की मोहताज हैं तो अश्लीलता प्रायः भोजपुरी के सर आ पड़ी है| ये सब क्या है? क्या भाषाएँ इन्हें चुनतीं हैं?

हमारे समाज की रचना कई तरह के राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और आंचलिक प्रभावों से मिलकर होती है| चाहे यह समाज दिल्ली में हो या भरथुआ में|

क्या पंजाबी गानों पर पूरा उत्तर भारत नहीं उछलता कूदता (कुछ लोग नृत्य भी कर लेते हैं)?

क्या भोजपुरी फिल्मों और तथा कथित लोकगीतों को सारे उत्तर भारत का मजदूर तबका नहीं सुनता?

क्या हनी सिंह के गाने सुनने वाले अधिकतर लोग सारे भारत से आये महानगरीय महामजदूर नहीं है?

जब हम भारतियों को अपनी बात पर जोर देना होता है तो हम प्रायः अंग्रेजी में बोलते है और जिन शब्दों को अपनी भाषा में बोलने पर लज्जा आती है, वो भी अंग्रेजी की गंगा में पवित्र हो जाते हैं| मैं यहाँ अंग्रेजी नहीं बोलूँगा| अंत में इतना ही कहूँगा, हमारे देश में देखे जाने वाली ज्यादातर पोर्न फ़िल्में शायद इंग्लिश में होतीं है तो क्या सारे अंग्रेजी भाषी अश्लील हो जाते हैं?