सहमति और अपराध


पिछले एक वर्ष में हमारे देश में सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य में जिस शब्द की सबसे अधिक कमी खली वह है: “सहमति”|

वर्ष के प्रारंभ में बलात्कार के सन्दर्भ में सहमति शब्द की कमी दिखाई दी और अंत में “समलैंगिक संबंधों” के सन्दर्भ में|

कानूनी दावपेंच के बाहर, बलात्कार की परिभाषा बहुत ही सरल है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्ध बनाना बलात्कार है|

किसी एक व्यक्ति के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ उसकी सहमति के बिना यौन सम्बन्धी आचरण या व्यवहार करना यौन शोषण है|

हमारा भारतीय पुरुषसत्तात्मक समाज, स्त्री की सहमति को आवश्यक नहीं मानता| स्त्री की “न में भी हाँ”, “सदा समर्पण”, और “सतीत्व की शक्ति” जैसे अवास्तविक मुहावरे गढ़ लिए गए हैं| दुर्भाग्य से हम विवाह संबंधों में भी सहमति की जबरन कल्पना कर रहे हैं, भले ही पत्नी बीमार, परेशां अथवा थकी हुई हो|

एक और मुहावरे का गलत प्रयोग किया जाता है: “ताली एक हाथ से नहीं बजती”| मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ मगर मेरी समझ से पूरा मुहवरा यह है:

“ताली एक हाथ से नहीं बजती, एक हाथ से धक्का लगता है”

“सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” में बारे में एक बात और है| हम लोग बलात्कार को तो आज तक पूरी तरह से रोक नहीं पाए हैं और विश्वभर में होने वालें “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” के अनैतिक होने का ढोल पीटने से नहीं थकते हैं| स्वयम हमारे देश में “सहमतिपूर्ण यौन संबंधों” और “सहमति पूर्ण वैवाहिक संबंधो” को पूरी मान्यता नहीं है| ऐसा कहते हुए मैं बहुत सारे संबंधों की बात करता हूँ: अंतरजातीय प्रेम विवाह, सजातीय सगोत्र विवाह, अंतर्धार्मिक विवाह|

उसी प्रकार से ‘समलैंगिक यौन संबंधों” की भी बात है| सभी इस बात से सहमत हैं कि किसी भी प्रकार का यौन सम्बन्ध जबरन नहीं होना चाहिए| परन्तु सहमतिपूर्ण समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध ठहराने की विक्टोरियन सोच मेरी समझ से बाहर है|

आप की शीतलहर


 

“दिल्ली की सर्दी” अगर अपने आप में एक मुहावरा है तो “दिल्ली का मौसम” और “मौसम का मिज़ाज” भी कहीं से भी पीछे नहीं हैं| इस समय दिल्ली में शीतलहर का मौसम है और इस बार “आप की शीतलहर” की मार है|

 

दिल्ली के चुनाव परिणामों से पहले दिल्ली के पिछले दो दशकों को अगर देखें तो हमें मानना होगा कि दिल्ली में विकास हुआ है| बिजली, पानी, सड़क, आदि की भी कोई बड़ी समस्या नहीं दिखाई देती है| दिल्ली मेट्रो दिल्ली के विकास का अग्रदूत बनकर खड़ीं दिखाई देती है| फिर क्या हुआ कि दिल्ली में कांग्रेस की शीला सरकार को हार देखनी पड़ी?

 

English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Ho...

English: Jantar Mantar, New Delhi with Park Hotel हिन्दी: जंतर मंतर, दिल्ली (Photo credit: Wikipedia)

 

१.      जनता ने विकास में भ्रष्टाचार को गहराई से महसूस किया;

 

२.      विकास की मौद्रिक लागत की अधिकता जनता को समझ नहीं आई;

 

३.      जब दिल्ली मेट्रो लाभ में गयी तो डीटीसी के घाटे पर सवाल उठे;

 

४.      बिजली पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के निजीकरण में, जनता को जिम्मेदारी से भागती सरकार और विपक्ष दिखाई देता है;

 

५.      बिजली कंपनी के खातों में धांधली की खबर से जनता में आक्रोश है; और

 

६.      हाल की नकली महंगाई ने भी जनता के कान खड़े कर दिए हैं|

 

यदि हम साधारण कहे जाने वाले लोगों से बात करते हैं तो पाते हैं कि सभी तबकों में संसद में काम ठप्प रहना; कानूनों का लम्बे समय तक पारित न होना; ताकतवर लोगों के मुकदमों का टलते रहना सब आक्रोश पैदा करता है| लोग जन – लुभावने वादों पर अब अधिक मतदान नहीं करते| सभी को नागनाथ – साँपनाथ की राजनीति से मुक्ति चाहिए|

 

हाल के चुनावों से यह तो स्पष्ट है कि देश में अब कांग्रेस के विरुद्ध माहौल है| परन्तु भाजपा के लिए आसान राह नहीं है| उसके पास मोदी समर्थक वोट से अधिक कांग्रेस विरोधी वोट का बल है| सबसे बड़ी कठनाई यह है कि “भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई” का भाव जनता में मौजूद है जिसे नारा बनना ही बाकि रह गया है|

 

क्या आप ये नारा बुलंद कर पाएगी?

 

“भाई – भाई, मिलकर खाई, दूध मलाई”

 

सुलझी बात उलझी बात||


सीधी बात

सुलझी बात

रेशम सी फिसलती बात

तेरी ज़ुल्फ़ को सुलझाते

उलझ गयी

बन गयी

उलझी बात|

सुलझी बात

उलझी बात||