योग और योगा


जब मैंने योगाभ्यास और अध्ययन शुरू किया था तो उसका प्रारूप उस योगा से बहुत अलग था, जिसका आजकल बोलबाला है| योग में चित्त प्रधान है और उसकी वृत्तियों के निरोध में योग का समूचा अस्तित्व निहित है| योग का प्रारंभ यम – नियम से होकर ध्यान – धारणा – समाधि तक जाता है| योग क्योंकि दर्शन है, इसमें मत – मतान्तर, रूप, परंपरा और प्रारूप के अंतर के बाद “युक्त” हो जाना ही अंतिम सत्य है| योग में अंतिम तीन चरण, ध्यान – धारणा – समाधि का विशेष महत्त्व है|

दूसरी ओर योगा, शरीर प्रधान क्रिया है और जिसमें योग के ढ़ाई – अंग ही प्रधान हैं| योगा में दर्शन कम, दर्शाना अधिक है| योगा, प्रमुखतः हठ योग के विभिन्न आसन का अभ्यास हैं जिनके साथ कुछ एक शारीरिक महत्त्व के प्राणायाम पर जोर दिया गया है| योगा में ध्यान का स्थान किसी साधारण मानसिक व्यायाम से अधिक नहीं है| योग की प्रत्येक प्राचीन पुस्तक शांत और एकांत योगाभ्यास की बात करती है|

योगा शरीर को स्वस्थ रखने की वो जटिल क्रिया है जिसमें आप, यम – नियम – आहार – विहार – आचार – विचार – संक्रमण – अनुवांशिक सभी समस्याओं का समाधान हठ योग से करना चाहते हैं| यहाँ योग के पहले नियम “चित्तवृत्तिनिरोध” का कोई स्थान या आवश्यकता नहीं है| मैं नहीं समझ पाता जब जिव्हा [स्वाद और वाणी] पर नियंत्रण न रख पाने वाले लोग योगा से विश्वशांति की बात करते हैं| योगा उस परम्परा का हिस्सा है जिसमें योगासन क्रियाओं “आसन – प्राणायाम – ध्यान” के कुछ हिस्सों के धार्मिक कर्मकांडों या घरेलू कामकाज में इसलिए जोड़ लिया गया जिससे “व्यस्त” लोग कुछ तो सही काम कर लें|

आजकल योग में सूर्य नमस्कार और ॐ के प्रयोग पर भी बहुत चर्चा है| सूर्य नमस्कार, योगासनों का वो सुचारू क्रम है जिसे उगते सूर्य के सामने करने का शरीर अच्छा प्रभाव माना गया हैं| क्योंकि इसका प्रारंभ नमस्कार मुद्रा से होकर नमस्कार मुद्रा पर ही अंत होता है, इसका नाम सूर्य नमस्कार हैं| क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त का उगता हुआ सूर्य आजकल उपलब्ध नहीं है, सूर्य नमस्कार का सूर्य वाला भाग आजकल कोई लाभ नहीं देता| शेष क्रिया क्रिया अपना लाभ उतना ही रखती है| कुछ विद्वान मन्त्र जाप पर जोर देते हैं| मगर मन्त्रजाप का लाभ, सूर्य नमस्कार करते समय उठा पाना प्रायः संभव नहीं है| क्रिया करते समय मन्त्र सही प्रकार से जपना और उचित शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाना कठिन कार्य  है| अतः मन्त्र जाप न करने में ही भलाई है|

मुझे एक महिला ने वर्षो पहले कहा कि वो प्राणायाम तो करतीं हैं लाभ भी बहुत है मगर ॐ वाला प्राणायाम नहीं करतीं| मैंने उन्हें कहा ध्वनि का अधिक महत्व है अक्षर का नहीं| आप “आम” कर लीजिये| लगभग पचास फीसदी लाभ भी क्यों छोड़तीं हैं| वैसे मैंने अपने अध्ययन में पाया कि “याह”, “राह”, “राम” “अल्ल्लाह”, “वाह” आदि शब्द भी लाभकर हैं, बशर्ते आप य, र, ल और व पर ध्यान बनाये रखें| इसी प्रकार से आप, रूम आदि शब्द भी प्रयोग कर सकते हैं| ऐसा करते समय मन को साफ़ रखें कि योग किसी धर्म का अंग नहीं हैं और आप, योगिक क्रिया कर रहे हैं, धार्मिक नहीं; वर्ना आपका चित्त भटक जायेगा|

भारतीय दर्शनों में से पहले 6 किसी भी धर्म के बारे में बात नहीं करते| और अंतिम तीन तो नास्तिक दर्शन कहे ही जाते हैं| योग आत्मा और ईश्वर का मिलन नहीं है| योग मुख्यतः आपके अपने अस्तित्व का अपने आप से मिलन है| या कह सकते हैं चित्त का आत्मा से मिलन है| कुछ आस्तिक विद्वान, योग को आत्मा और ईश्वर के मिलन के साधन के रूप में देखते हैं, मैं उस से इंकार नहीं करता| मगर मुझे योग की सम्पूर्ण यात्रा साकार से निराकार, अनंत से शून्य और उस परंपरा में आस्तिक से नास्तिक की यात्रा अधिक लगती है| प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने अनुभव से योग में अलग अलग निष्कर्ष पर ले जा सकता है| यही कारण है कि “अहम् ब्रह्मास्मि” से लेकर “नेति नेति” तक सभी विचार भारतीय आस्तिक दर्शन में विद्यमान हैं|

क़ानून पर आम भारतीय नजरिया


क़ानून के हाथ लम्बे होते हों या न हों उसका डंडा बहुत लम्बा, मजबूत, कंटीला और कठोर होना चाहिए, जिस से कि पडौसी का सिर एक बार में फूट जाये| आज डंडे का जमाना नहीं है तो आप रिवाल्वर या रायफल कर लीजिये| मगर यह एक आम भारतीय नजरिया है|

दूसरा फ़लसफा खास भारतीय यह है कि क़ानून एक भैंस है जिसे कोई भी अपनी लाठी से हांक सकता है बशर्ते उसकी लाठी उस चौकी, थाने, जिले या सूबे में सब पर भारी होनी चाहिए| इस फ़लसफ़े का दूसरा तर्जुमा है, क़ानून एक ऐसी रांड है जिसे कोई भी अपनी रखैल बना कर उसका मजा मार सकता है|[i]

तीसरा और सबसे खास भारतीय क़ानूनी फ़लसफा ये है कि अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए| इसलिए हम भारतीय ऊपर लिखे सभी फ़लसफ़ों को दिल से लगाकर रखते है और तब तक ज़ुबान पर नहीं लाते| इसीलिए भारतीय पडौसी का सिर और अपना पिछवाड़ा फूटने तक चुप रहते है और हाकिमों के तलवों ने सिर छिपाए रखते हैं|

अब साहब अगर इन सादा सरल फ़लसफ़ों को समझने में कोई दिक्क़त तो तो कुछ वाकये सुनते हैं, जो कुछ दूर पास का ताल्लुक इन फ़लसफ़ों से रखते हैं| क़ानूनन आपको को बता दे कि सभी वाकयात एकदम बेहूदा और वाहियात हैं और उनका किसी सच से कोई ताल्लुक नहीं है| अगर आपको सच लगें तो ऊपर लिखा तीसरा फ़लसफ़ा दोबारा पढ़ें|

जब क़ानून किसी किसी कुर्ता- पायजामा को जूते पहना रहा हो या कुर्ता – पायजामा क़ानून के जूते बजा रहा हो तो आपके पास दूसरा फ़लसफ़ा पढने का वक़्त नहीं है| आप अगर शरीफ़ हैं तो चुपचाप घर जाकर बच्चों को कबीरदास का “सांच बराबर तप नहीं” वाला दोहा सुनाएँ| अगर आप झाड़ पौंछ शरीफ़ हैं तो कुर्ता – पायजामे का रंग देखें| अगर आपका और उसका रंग एक है तो भारत माता की जय बोलें और अगर रंग अलग है तो उसका फ़ोटो और फोटोशॉप सामाजिक क्रांति के लिए प्रयोग कर दें|

अगर क़ानून किसी अदालत में गोल गोल घूम रहा है तो दूसरा फ़लसफ़ा जेहन में आता है| अदालतें लाठी वालों का पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ क़ानून की भैंस हर कोई दुहता है|

सूट बूट हिंदुस्तान में सबसे ताकतवर होता है| सूट बूट का दिमाग उतना ही वातानुकूलित रहता है जितना उसके फार्महाउस का अय्याशखाना| यह हमेशा तफ़रीह के सीरियस मूड में रहता है और क़ानून खुद-ब-खुद इसकी बाँहों में| क़ानून इसके भाव – भंगिमा को खूब पहचानता हैं और हमेशा एक खास तरह में मूड में रहता है| अब, दूसरा फ़लसफ़ा का दोबारा न पढ़े|

अब बात आती है इस पूरी बकवास से मतलब क्या निकल रहा है| हमारे मुल्क में जो बात सबको पता हो, उसे बताना बकवास ही तो है| रे भाई, बताया था न, अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए|

बाकि जो मतलब जो बकबास है वो अगली बार बताई जाएगी| तब तक क़ानून से बचकर रहें| सलामत रहें और हमेशा की तरह ऑफिस में सूट – बूट और सोशल मीडिया पर कुर्ता – पायजामा के सामने नतमस्तक रहे| अपने ईश्वर और ईमान को औक़ात में बनाये रखें|

[i] सुसंस्कृत अनुवाद:- “भारत की सर्वमान्य नगरवधु विधि, समस्त योग्यजन के लिए प्रसन्नताकारक होती है|”

व्हाट्सऐप प्रेमकथा


1

नौ बज चुके थे| अभी तक ब्लॉक हूँ| शायद साथ में अभी भी कोई होगा| जिन्दगी की बैटरी डाउन है|

2

कई दिन से ब्लॉक कर रखा है| शादी के बाद कितना बदल जाते हैं? उनकी जिन्दगी रीस्टार्ट हो गयी| मैं आउट डेटेड वर्ज़न हूँ|

3

सुबह से कितनी बार ब्लॉक और अनब्लॉक किया| पता नहीं| जिन्दगी आत्मा से नहीं नेटवर्क से चलती है|

4

राधा कृष्ण वाला प्याला लगा लिया| लगता है उसे फिर से प्यार हो रहा है|

5

शराब का टूटा ग्लास, उसे दिल की गहराई में चुभ जाये शायद| नहीं लगा सकता| चलकर कॉफ़ी पीते है|

6

उसका ऑनलाइन होना ही तो बहार है| पता नहीं कब आएगी| उफ़, माँ का कॉल भी अभी आना था|

7

ब्लॉक होने से या कर देने से यादें ब्लॉक क्यूँ नहीं होतीं| शायद विज्ञान को याद नहीं आती|

8

बड़ा मोबाइल लेना है| तुम्हारा डिस्प्ले पिक्चर बड़ा दिखेगा| और रोने का मन करता है न|

9

और कितना पढ़ना है| सारी बात तुम्हारे लिए लिखीं है| कम लिखा है, तुम समझ लेना|