नपुंसकता प्रदूषित विकास और गाँव


सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

माल्या चले परदेश


माल्या चले गए परदेश| अच्छे समय के राजा; अच्छे समय के आते तक रुक नहीं सके| मैं दुःख नहीं करता| पुरुष – प्रकृति के अपने नियम हैं| पूर्व जन्म – जन्मान्तर के बहुत से पुण्य होंगे; काल के प्रताप से आनंद को प्राप्त किया और भूलोक में इन्द्रासन पर विराजमान हुए| जानते हैं यजमान, अंत में आत्मा ही जायेगी; न ऋण जायेगा, न सम्पत्ति| नश्वर संसार में सब मिथ्या है, मिथ है और मदिरा है|

बैंक माया का मतिभ्रम हैं, संसार चक्र का चक्रव्यूह है| सर्वधर्म विधान है; महाजनी, राहजनी, आगजनी सब धर्मसम्मत नहीं माने गए हैं| बैंक पश्चिमी संस्कृति का दुष्फल है| माल्या ने भारत में इस विधर्मी दुष्ट संस्कृति को क्षीण किया|

प्रेमचंद की कहानी “सवा सेर गेंहू” विप्र कुर्मी किसान को पीढ़ी – दर – पीढ़ी गुलाम बनाता है| आज बैंक किसान को गुलाम बनाता है| किसान जिसका न ब्याज माफ़ होता है न मूलधन; पुलिस के डंडे और अदालत का दंड खाता है| बैंक किसान की हत्या करता है; आत्महत्या करता है; चरित्रहत्या करता है, आत्मविश्वासहत्या करता है, सांस्कृतिक हत्या करता है| माफ़ का कागज आते आते कचहरी जाते जाते तक रोज किसान के जूते और आत्मा घिस जाते हैं, मगर कर्जा नहीं घिसता|

[जिन क्षेत्रों में बैंक नहीं है, वह अपनी गलती से नहीं हैं और किसान की अवैध सूदखोर का शिकार बनने के लिए छोड़ रहीं हैं|]

सबसे बड़ा पूंजीवादी पाप बैंक करते हैं, जब अपने कर्ज के पैसे देश के करोंड़ों किसानों को बांटकर व्यापक जोखिम वितरण नहीं करकर मुट्ठीभर पूंजीपति को सारा कर्ज देता है| किसान की गिरवी का मोल नहीं होता और पूंजीपति की गिरवी का मोल- भाव नहीं होता| जब बैंक गलत तरीके से पैसा देते हैं; तो उन्हें उस पैसे पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए|

माल्या जी कुबेर धर्मभाई हैं, यजमान| कुबेर को देवेन्द्र और माल्या को नरेंद्र का वरदहस्त प्राप्त हो| जितना धन पूंजीपति का माफ़ हो उतना किसान का भी हो जाये|

इति माल्या खण्ड, पूंजीपुराण||

“न्याय” का ललित निबंध


अधिकतर अदालती आदेश उतने ही धीर गंभीर उदासीन अलिप्त होते हैं जितने “बेयरफुट इन एथेंस” नाटक में सुकरात की भूमिका करते हुए सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ के हावभाव| दिलचस्प बात यह है की अतिगंभीर मुद्दों पर हमारे न्यायधीश साहित्य, संस्कृति, श्रुति और शायरी की बातें करते हैं, कदाचित इससे पाठक को उबासी न आये | अधिकतर आदेश दोनों पक्षों द्वारा रखे न्यायालय के समक्ष रखे गए तथ्यों और दलीलों से शुरू होते हुए कानून की बारीकियों में उलझते – सुलझते न्यायिक आभा की संरचना करते हुए न्याय तक जाते हैं| ज़मानत संबंधी आदेश आरोपों की गंभीरता और आरोपी के जाँच में सहयोग आदि की बात करते हैं|

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष पर लगे देशद्रोह के आरोपों और गिरफ़्तारी के बाद दिल्ली उच्चन्यायालय ने ज़मानत की अर्जी पर अपना फैसला २ मार्च २०१६ को सुनाया|

मैंने अदालती आदेशों को अंत से प्रारंभ और प्रारंभ से अंत तक पढ़ना सीखा है| इस आदेश में कहा गया है आदेश में दिए गए दृष्टान्त (Obesrvations) केवल ज़मानत पर सुनवाईं के लिए हैं, उन्हें तथ्यता (Merit) के रूप में नहीं माना जा सकता| क्योकिं तथ्यों की तथ्यता की पुष्टि होनी है, उनपर विचार करना हमारे लिए भी उचित नहीं होगा|

इस आदेश के प्रारंभ में दिया गया राष्ट्रप्रेम का गीत कई प्रश्न करता है? क्या उसका जमानत की अर्जी के सम्बन्ध में कोई विचारात्मक महत्त्व है? परन्तु, यह किसी विमर्श के प्रसंग में नहीं आया है और पूर्णतः स्वतंत्र अस्तित्व रखता है| भावनात्मक रूप से कठिन निर्णय की पुष्टि करता है| यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह गैर जमानती और भावनात्मक रूप से सशक्त आरोप का मामला है| न्यायाधीश ने स्वीकार है कि वह खुद को चौराहे पर खड़ा महसूस कर रहीं हैं|

इस आदेश में की कई बातों की न्यायविदों द्वारा आलोचना हो रही है| कुछ लोगों को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि न्यायाधीश भावनात्मक और न्यायात्मक दबाब के बीच न्याय के साथ जाते जाते पूरी तरह संयत नहीं हो पायीं है| भावनात्मक प्रवाह निर्णय में झलकता है जब न्यायाधीश अपराध के होने या न होने से इतर भारतीय सेनिकों और उनके परिवार की भावना की बात करतीं है|

ज़मानत देते समय मौलिक अधिकारों पर बात करते हुए मौलिक नागरिक कर्तव्यों की बात, अतिरिक्त उपदेश की तरह आती है| जिसे किसी आरोपी को नहीं बल्कि अपराधी को दिया जाना चाहिए था| किसी आरोपी के साथ अपराध सिद्ध होने तक अपराधी जैसा बर्ताव नहीं किया जाना चाहिए| विश्वविद्यालय से सही मार्ग दिखाने का आग्रह न्यायायिक मामले से बहुत दूर निकल जाता है|

निर्णय अचानक बहुत कटु हो जाता है जब माननीय न्यायाधीश गंगरीन के लिए अंगविच्छेद की बात करतीं हैं| निर्णय अचानक अपराध की पुष्ट परिकल्पना की ओर मुड़ जाता है| भावनात्मक और न्यायात्मक विरोधाभास के चलते सुधार के पुराने पश्चाताप वाले तरीके की बात होती है|

अपराध की मजबूत परिकल्पना के साथ ज़मानत की मंजूरी बहुत सारे प्रश्न और उत्तर खड़े करती है|

अंतरिम ज़मानत दी जाती है|

यह आदेश न्यायालय के मानवीय भावना से परे न होने की पुष्टि करता है| यह निर्णय न्यायधीश के भावनात्मक और न्यायात्मक आन्तरिक विमर्श, निर्णयात्मक विरोधाभास, अतिवादी न्याय और उग्रराष्ट्रवाद के सामायिक दबाब के रूप में देखा जा सकता है| इस आदेश की अंतरात्मा में न्याय के आन्तरिक विमर्श का ललित निबंध है|