प्यारे तस्कर


तस्कर, यह शब्द भारतियों के रौंगटे खड़े करने के लिए काफी है| भारत हत्यारों के बाद तस्करों से ही सबसे ज्यादा घृणा करता है, बलात्कारियों के भी ज्यादा| हम उन्हें देश का दुश्मन मानते हैं| अपराध की दुनिया के बादशाह – एक खूंखार अपराधी|

आखिर तस्कर होते कौन है? व्यापारी, जो अपने व्यापार पर कर (टैक्स) भुगतान नहीं करते| क्या इसमें भेदभाव करेंगे कि व्यापारी कौन सा कर नहीं दे रहा? सीमाकर (कस्टम ड्यूटी) न देने वाला तस्कर,! उत्पादकर (एक्साइज ड्यूटी) न देने वाला – विकास का कर्णधार!! बिक्रीकर न देने वाला विकास का वाहक!!! कैसा करभेद है? वास्तव में हम कारचोरों से प्रेम करते हैं… बस कुछेक को छोड़कर|

यह सभी उदाहरण अप्रत्यक्ष कर के हैं, जहाँ किसी करचोर को खुद कर नहीं देना होता बल्कि गरीब जनता से वसूलना होता है| क्या इन करचोरों में आपस में कोई अंतर है? क्या सब करचोर देश को खोखला नहीं करते? आइये कुतर्क करें| अपने प्रिय करचोरों का समर्थन करें|

एक होते हैं प्रत्यक्षकरचोर| इन्हें पता होता है कि करचोरी कर रहे हैं| मगर टैक्सबेस, हमारी मेहनत की कमाई मेहनत न करने वालों में मत बांटों जैसे बकवास बातों में यह सबको उलझाये रखते है| भारत में तीस प्रतिशत दर से कर देने में इनको नानी याद आती है, मगर साठ प्रतिशत की दर से कर लेने वाले देशों का विकास मांगते हैं| यह वो लुटेरे हैं जो भूल जाते हैं कि इनकी कमाई में देश का भी योगदान हैं वर्ना सोमालिया में जाकर कमाई कर कर दिखा दें| दुनिया का कोई देश कर के बिना विकसित नहीं हुआ| टैक्सबेस बढ़ाने की बातें कर चोरों और उन के पालतू राजनीतिक दलों की जुमलेबाजी है| अगर सरकारें कराधार – टैक्सबेस बढ़ाने के कल्पित ख्याल की जगह वर्तमान कर चोरों से निपट ले तो पाने आप टैक्सबेस बढ़ जाएगा|

मगर हमें तो करचोर पसंद है – तस्करों को छोड़कर|

आइये इस वर्ष के बजट भाषण का पैरा 141 पढ़े और गर्व करें|

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे मरन्तु मोक्षं


चलिए सतयुग आ गया| सतयुग तो आ ही गया है| कालचक्र का यह आगमन तो सुनिश्चित ही था|

सतयुग वही समय तो है जब प्रत्येक मनुष्य सदेच्छा रखता है| आपको हल्की सी छींक आते है, प्रत्येक मानव मात्र आपके स्वास्थ्य के लिए अपनी चिंता, संवेदना और सदेच्छा वयक्त करता है – गॉड ब्लेस यू| प्रत्येक मनुष्य अपने धुर विरोधी का भी भविष्य उज्जवल देखना चाहता है| कुछ मित्र तो प्रतिदिन नियम पूर्वक प्रत्येक प्रातः के प्रत्येक के लिए शुभ होने की कामना करते करते ही महायोगी का जीवन जीते हैं| एक मित्र हर ज्ञात अज्ञात त्यौहार पर अपनी शुभकामनाओं का अकूत भण्डार भारत सरकार की किसी सरकारी अनुदान योजना की तरह रोज लुटा देते हैं| एक मित्र तो इतने शुभकामी हैं कि मुहर्रम पर भी नहीं चूकते – चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान  |

जब भी किसी मौसमी रोग – महारोग – महामारी का मौसम आता है तो दादी- नानी- परनानी की औषधियों से लेकर भविष्यतः दो सह्स्त्रब्धियों की औषधियों का महाज्ञान मित्र से प्राप्त होता है| किसी ज्ञात अज्ञात मृत अर्धमृत अमृत किसी भी मृत्यु पर मोक्ष की सदेच्छा का सन्देश देते रहना उनका प्रिय पुण्य है| जब एक परिचित सज्जन ने देवलोकगमन किया तो सन्देश मिलते ही उन्होंने जन्मजन्मान्तर से मुक्ति और मोक्ष की महाकामना के बाद ही जलपान चाय स्वीकार की| चाय सेवन के दौरान जब उनके पास शोक व्यक्त करने के अनंत सन्देश आने लगे तो पता चला कि देव्लोकगामी सज्जन कोई अन्य नहीं स्वयं उनके पिता है|

सतयुग में अप्सराएँ न हों तो क्या हो? रात्रिकाल एक दो कन्यायें तो निर्बाध रूप से शुभरात्रि और शुभस्वप्न के सन्देश दे ही देतीं है| सतयुग में स्वप्नदोष तो लगा ही रहता है|

जब से भारत में सूचनाक्रांति हुई है, सतयुग कर – कर मोबाइल – मोबाइल होता हुआ घर – घर आ पहुंचा है| किसी राजशिरोमणि का वचन नहीं, कि आप अच्छे दिन की प्रतीक्षा करते करते मोक्ष प्राप्त कर जाते| यह सतयुग ही तो अच्छे दिन है| आपका वचन पूरा होता है, पराक्रमी| तकनीकि सूचना की दूसरी पीढ़ी वाला महायज्ञ अश्वमेध यज्ञ की भांति समस्त भारतवर्ष में सूचना क्रांति के अश्व आज भी दौड़ा रहा है| आज उसकी पांचवी पीढ़ी अपनी महापताका लेकर क्रांति के युद्धस्थल की ओर अग्रसर है| हर कोई भारतवासी प्रत्येक जीवित के लिए शुभकामना और प्रत्येक मृत के लिए मोक्षकामना के साथ जीवित है| राग द्वेष कलियुग की पुरानी बातें है|

अथ श्री सत्यसूचना कथा:| अथ श्री अनुदानित स्पैक्ट्रम कथा:|

 

 

 

अपाहिज बूढ़ा देव


दिल्ली की कडकडाती ठण्ड का कोई धुपहला दिन रहा होगा| प्यारी सी बिटिया या बहू दिल्ली हाट घूमती रही| अचानक सुन्दर गणेश पर निगाह पड़ी| रसोईघर में रखूंगी या बैठकघर में, लौटते समय वो सोचती रही| देव भी सोचते रहे, दूकान के दरिद्र से निकल आये, जिस विधि विधाता चाहेगा, मजे से रहेंगे| कोई विशेष इच्छा न थी| अगर पक्ष – पखवाड़े एक मोदक का प्रसाद भी चढ़ जाता तो धन्य होते| खिलाती – पिलाती रसोई में रहने पर भक्ष्य – अभक्ष्य सबका भोग स्वतः हो जाता| यहाँ दिन निकलते ही, मोदक कलेवा होता| हर सांय सोमरस पर समाप्त होती| सेवाभाव में कमी न थी|

परिवार क्या होता है, यहीं जाना था| रसोईघर घर की सब गतिविधियों का केंद्र| षड्यंत्र तंत्र प्रपंच सब यहाँ अवश्य चर्चित होते| मनोरंजन के लिए कहीं न जाना पड़ा| दुःख भी होता| जब घर का बेटा अपनी पत्नी को अपने खुद के बूढ़े पिता के विरुद्ध भड़काता| दुःख नहीं देखा जाता| आँख बंद कर ली| बुड्ढा एक दिन चुपचाप तीर्थ करने चला गया| कभी नहीं लौटा| न जिन्दा न मुर्दा| सब जीवन की माया है| अपने अपने कर्म है, अपने अपने कर्मफल| वर्तमान में जीवन चलता है चलता रहा| पर विधाता से सुख कहाँ देखा जाता है|

हवा का झोका चला आया| तेज तो नहीं लगता था| मगर, अपाहिज कर गया| जमीन पर झाड़ू क्या फिरी, किस्मत फिर गई| अपाहिज बूढ़ा देव किसी का भला नहीं कर सकता| अपाहिज बूढ़ा देव किसी का बुरा नहीं कर सकता| कोई बीमा नहीं, कोई पेंशन नहीं, कोई भोग नहीं लगता| पेड़ से गिरने वाली पीपलियाँ भी यदाकदा मिल पातीं| सड़क किनारे भी अकेला हूँ| कभी कभी एक चीटीं आती है बात करने|

बस देव होने की थोड़ी इज्जत बची रही| कूड़े में नहीं डाला  गया| पीपल के पेड़ के नीचे पड़ा हूँ चुपचाप| दुःख नहीं देखा जाता| आँख बंद कर ली| माटी का रंग माटी हुआ जाता है| माटी का इन्तजार रहेगा|