भोजन- आत्मा हेतु भोग


पुरानी कहावत है: भोजन भजन एकांत में करने चाहिए| मगर महाभोजों, दावतों और लंगरों का सिलसिला भी चलता है| घर का एकांत हो या महाभोज की धूमधाम, भोजन करने की अपनी परम्परा और पद्यति भारत में रही है| भोजन और भजन को एक ही सूक्त में यूँ ही पिरो देना सहज नहीं| इस तरह की बात गंभीर चिंतन माँगती है|

जिस प्रकार भजन से पूर्व और पश्चात एक पूरी निष्ठावान प्रक्रिया है – भोजन बनाने और करने की अपनी प्रक्रिया है|

बिस्मिल्ला के बिना भोजन करने से शैतान साथ में भोजन करता है| अगर आप भोजन के लिए ईश्वर को, देवी अन्नपूर्णा को धन्यवाद न दें तो भोजन आपके शरीर में तत्त्व उत्पन्न नहीं करता|

खाद्य को पीने और पेय को खाने के बारे में भी सलाह मिलती है| खाद्य तब तक चबाना है, जब तक पीने योग्य महीन न हो जाए, पेय इतनी देर मुंह में रखें जितनी देर खाद्य चबाने में लगते है| चबाये, लार आदि पाचक रस मिल सकें| आप भोजन का स्वाद देर ले सकें|

मैं ठीक से न चबाने की आदत का शिकार रहा हूँ| पर जब भी ध्यान देता हूँ तो पाता हूँ कि स्वाद पेट से नहीं जीभ से ही लिया जाता हैं| एक मिनिट में दो लड्डू खाने के मुकाबले दो मिनिट तक एक ही लड्डू चबाने खाने में अधिक स्वाद और तृप्ति है| ठीक से स्वाद लेकर चबाना एकांत में संभव है| पारंपरिक भोजों, दावतों, भण्डारों और लंगरों कि भी एक प्रक्रिया है| भोजन के दौरान कब और कितनी बात करनी हैं, सब परम्परा में है| भोजन की प्रशंसा और भोजन बनाने, परोसने वालों का धन्यवाद होना है| प्रेम से भोजन परोसना और पैसे के लिए परोसना भी अलग दिखाई देता है| आप पैसा कम या अधिक लें मगर कितना श्रेष्ट भोजन पकाएँ, प्रेम से खाने खिलाने वाला न हो तो किसी को तृप्ति नहीं आती|

भोजन पकाने के लिए भी यंत्र, मन्त्र तंत्र का विधान है| कब कच्ची रसोई चलानी है कब पक्की रसोई रखनी है| पक्का खाना रोज न बनाने खाने का नियम है तो कुछ रिश्तों नातों में पक्का भोजन खिलाना नियम है| पक्का रसोई यानि तला- भुना भोजन| उबला भोजन कच्ची रसोई है|

भोजन का सांस्कृतिक महत्त्व आकर्षित करता है| फसल बोते समय पक्षियों और मित्र कीट आदि का आवाहन होता रहा है| भोजन बनाने के दौरान गाय, कौवा, कुत्ता, आदि की रोटियां निकली जाती रहीं हैं| बचे हुए भोजन को लघु कीटों, कुत्तों, गायों, और यहाँ तक कि ख़राब होने पर सूअर के सामने परोसने के भी क़ायदे अमल में लाए जाते रहे हैं| भोजन को इन सब कीट और पशुओं के सामने फैंकना या पटकना नहीं होता, यह भोजन का अनादर है|

ऐसे में भोजन खाद्य को उदरस्थ करने का नाम नहीं है| यह भजन है| अपनी आत्मा को भोग लगाना भोजन का उदेश्य है| आत्मतृप्ति भोजन का उद्देश्य| श्रेष्ठ भोजन की प्रशंसा का उद्गार ही है: आज भोजन से आत्मा तृप्त हो गई|

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