नगद नारायण दर्शन दो

भारत के बाजारों में नगद की कमी कोई नई बात नहीं| सामान्य तौर पर आम चुनावों से पहले नगद की कमी हमेशा अनुभव की जाती है| मगर इस बार समस्या ज्यादा विकट मालूम होती है| ख़ासकर तकनीकि रूप से नगद को इस बार बाजार में नहीं ही होना चाहिए|

चुनावों से पहले जारी हुए आँकड़े बताते हैं कि चुनावी चंदे में भारी बढ़ोतरी हुई है| कॉर्पोरेट चंदा तो, आशा के अनुरूप, लगभग पूरा ही सत्ताधारियों को मिला है| कॉर्पोरेट चंदे को आम जनता में कानूनी तरीके से किया गया भ्रष्टाचार माना जाता है| पिछले बजट में कंपनी क़ानून में बदलाव करकर किसी भी कंपनी द्वारा दिए जा सकने वाले चंदे की उच्च सीमा को हटा दिया गया| इस समय चुनावी चंदे के रूप में दिया गया पैसा, नगद में हो या बैंक में, चुनाव से पहले अर्थव्यवस्था में वापिस नहीं आएगा|

विमुद्रीकरण के बाद कहा गया था कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जायेगा| साथ ही अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग नगद पर काम कर रहा है – चिकित्सा, वकालत और रोजमर्रा का खर्चा नगद में करना अभी भी मजबूरी है| इसलिए पूर्णतः डिजिटल नागरिक भी लगभग एक माह की राशि नगद में रख रहे हैं| क्योंकि किसी को भरोसा नहीं कि जरूरत के समय आस पास के सौ एटीएम में से एक भी काम कर रहा हो| पिछले कुछ समय में शहरों में एटीएम की संख्या में कमी की गई है या स्थानांतरित की गई हैं|

दूसरी तरफ सरकारी आँकड़े बताते हैं, विमुद्रीकरण की अपार सफलता के बाबजूद आज पहले से भी अधिक नगदी अर्थव्यवस्था में मौजूद है| कहाँ है यह धन? आज अर्थव्यवस्था में नये प्रचलित दोहजारी नोट की बहुतायत है| पुराना नगद जमा काला धन अब दोहजारी की शक्ल में अपने स्थान पर वापिस जमा है|

कालेधनसंग्रह के अलावा, एटीएम और पर्स दोनों को दोहजारी बहुत रास आता है| इस कारण

बाजार में लगभग हर कोई दोहजारी लेकर घूम रहा है| अधिकतर समय लेनदेन के लिए दोहजारी के मुकाबले छोटे नोटों की जरूरत होती है| जब इस बड़े नोट के कारण लेनदेन में छुट्टे की समस्या आती है तो यह नगदी की कमी का आभास कराता है|

वास्तव में विमुद्रीकरण का मानसिक हमला और दोहजारी नोट मिलकर आम बाजार विनिमय को कठिन बना रहे हैं| यही नगद की लक्ष्य से अधिक आपूर्ति के बाद भी बाजार में कमी का सत्य है| इस बात के भी समाचार हैं कि अर्थवयवस्था में नगद की मात्रा विमुद्रीकरण के स्तर को पार कर जाने की खबर के बाद सरकार ने नगद छापने में कटौती कर दी थी| इसमें सभी मूल्यवर्ग के नोट शामिल थे|

अच्छा यह है कि दोहजारी को छापना बंद कर दिया जाए| पांच सौ रूपये से अधिक मूल्य के नोट प्रचलन से बाहर रहें| इस से अधिक मूल्य के लेनदेन के लिए जनता को बैंकिंग माध्यमों , खासकर कार्ड और मोबाइल लेनदेन के तरीके उपलब्ध कराये जाएँ| मगर सरकारी जबरदस्ती न हो|

हालाँकि सबसे अच्छी खबर यह है कि चुनाव साल भर के भीतर हो जाने हैं| दलगत राजनीति में फंसा पैसा जल्दी अर्थव्यवस्था में वापिस आ जायेगा|

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