जोहरीपुर का छूट जाना

“इश्क में शहर होना” कम से कम दिल्ली में हर हिंदी प्रेमी, साहित्यप्रेमी और पुस्तकप्रेमी की जुबान पर है| पुस्तक बिक रही है, लप्रेक धूम मचा रहा है| मगर पुस्तक पढ़ने के क्रम में मुझे दिल्ली का एक गांव याद आ रहा है| जी, यह भजनपुरा के पास का इलाका है जहाँ ब्रा बन रही है| मेरे अनुमान के मुताबिक वह इलाका जोहरीपुर है| जोहरीपुर इतना प्रतिबंधित सा है कि उसका नाम लेने में संकोच होता है| मैं भी तो नाम नहीं लेता| मैं सहमत हूँ, “ऐसा घबराया की नज़र बचाकर भागने जैसा लौटने लगा| कई दिनों बाद उन गलियों में दोबारा लौटकर गया| ब्रा भी बनता है पहली बार देखा|” [सन्दर्भ: – शहर का किताब बनना – इश्क में शहर होना – रवीश कुमार – सार्थक (राजकमल प्रकाशन)]

नहीं, मैं “इश्क में शहर होना” के लप्रेक को नहीं लपेट रहा हूँ| ब्रा का इश्क़ से सम्बन्ध भी तो नहीं है| ब्रा शरीर छुपाने की चीज है, और ब्रा खुद भी छिपा दिए जाने की| यहाँ पंकज दुबे को बीच में मत लाइए जो कहते हैं, “वहाँ उन्हें दुसरे कपड़ों के नीचे छुपाकर रखने का रिवाज है| पैंटी और ब्रा वहाँ कपड़ा नहीं बल्कि घर की इज्ज़त – आबरू से कम नहीं है|” [सन्दर्भ: – लूज़र कहीं का – पंकज दुबे – पेंगुइन प्रकाशन]

मैंने पूछा था कारीगर से जब दोनों चीजें बनाते हो तो ब्रा ही क्यूँ बोलते हो? बोला साहब, आपको तो पता है कि दूध की दुकान पर दही भी मिलता है, मगर आपने दही की दुकान कभी देखी है? दही से दाम आते हैं, मुनाफा दूध से आता है| दूसरी बात ये है साहब, जिस देश में औरत किनारे (हाशिया पढ़ सकते हैं|) पर हैं, वहाँ औरत के जरूरी कपड़े तो गटर में ही होंगे| कौन गटर का नाम लेगा? मैं उसे देखता रहा| मगर कुछ नहीं बोला| शायद वो नक़ल कर कर के बारहवीं पास हुआ था, मगर… चलिए छोड़ते हैं, अगर उसे बुद्धिजीवी कहूँगा तो… नजला हो जायेगा| [1]

जोहरीपुर – पूर्वी दिल्ली के पूर्व में एक छूट सा गया एक गाँव| लोनी से शायद सटा हुआ| मूल निवासी कम, भीड़ ज्यादा| बुलंदशहर और अलीगढ़ जिलों के गांवों से आने वाले ज्यादातर पिछड़े तबके के लोग| बहुत से लोग ब्रा के काम में लगे हैं| यहाँ कोई छिपाव नहीं है, कुछेक कारीगर, वापिस अपने गाँव में जाकर अपना छोटा सा काम डालते हैं और ट्रेन से तैयार माल दिल्ली के बड़े ब्रांड के पास आ जाता है|

मगर ज्यादातर कारीगर गांव – घर में नहीं बताते कि क्या काम कर रहे हैं| यह एक अछूत काम है| जोहरीपुर… नव – अछूतों की बस्ती है, जिसे पूर्वी दिल्ली ने भी गंदे नाले के पीछे छिपा दिया है|

[1] [जिन्हें दिलचस्पी हो तो उस समय ब्रा के मुकाबले दूसरे कपड़े का आल इण्डिया मार्किट अधिक से अधिक 22 – 25% करीब था, वो चार दिन पहनने वाला कपड़ा जो है| बाकी बातें इस ब्लॉग पोस्ट का हिस्सा नहीं हैं]

Advertisements

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s