इक्कीसवीं सदी में मध्ययुगीन भारत के सतयुगी सपने – ३

पर्दा, जौहर, सती, जन्म आधारित जाति, दास प्रथा, मूर्ति पूजा,

हमारे मध्य – युगीन विद्वानों ने केवल अच्छी बातें छोड़ने में ही यकीं नहीं किया है वरन बहुत सी गलत बातें इस तरह अपना लीं हैं कि आज उन्हें प्राचीन भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बता कर पेश किया जा रहा है| मेरे पास लम्बी सूची है जिस पर मैं बात कर सकता हूँ, मगर मैं कुछ बातें उदहारण के रूप में उठाऊंगा|

पर्दा और स्त्री अशिक्षा:

पर्दा प्रथा का हमारे प्राचीन समाज में कहीं नहीं मिलता| हमारे प्राचीन समाज में उच्च – शिक्षित नारियों की लम्बी सूची है| अगर पर्दा प्रथा का उस समय कोई अस्तित्व रहा होता तो क्या समझदार, उच्च – शिक्षित नारियों की कोई सम्भावना रहती| जिस देश में ब्रह्मचर्य का उच्च आदर्श रहा हो , वहाँ पर्दा क्यों कर आवश्यक हो सकता है? प्राचीन काल में मत्रेयी और गार्गी जैसी विदुषियों की उपस्तिथि इस बात का प्रमाण है कि उच्च शिक्षा पर नारियों का सामान अधिकार था| स्वयंवर जैसी परंपरा इस बात का प्रमाण है कि माता – पिता साथी चुनने में मात्र मार्गदर्शक थे मगर साथी चुनने का अधिकार नारी का था| यदि स्त्री अशिक्षित होती तो वह उचित निर्णय शायद नहीं कर सकती थी|

आज देश में जब महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे है तो कई मध्य –युगीन मानसिकताएं प्रबल होकर उनकी शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में उनके बढ़ते योगदान को दोष दे रहे है| जो की गलत और प्राचीन परंपरा के विरुद्ध बात है|

 

जौहर और सती:

माना जाता है कि महाभारत में महाराज पांडू की मृत्यु के बाद माद्री सती हुई थीं| मगर शायद यह दुःख और आत्मग्लानि में लिया गया प्राण त्याग का निर्णय था| इसके अतिरिक्त किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में सती परंपरा का जिक्र नहीं आता है और इतिहास में गुप्त काल से पहले किसी भी स्त्री के सती होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है| कहा जाता है की दिल्ली सल्तनत और मुग़ल शासन में सती होने के लिए सरकारी अनुमति लेनी होती थी|[1] इसका अर्थ यह हुआ सती परम्परा का जन्म उस समय हुआ जब पश्चिमी सीमा पर अरब आक्रमण हो रहे थे और कायर भारतियों उन आक्रमणों का मुकाबला करने से ज्यादा पत्नियों के विजेताओं के हाथ में पड़ने की चिंता अधिक थी| अथवा शेष रह जाने वाले हमारे वीर परिवारों को शहीदों की विधवाएं बोझ लग रहीं थीं| इसी गन्दी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसे जौहर व्रत का और अधिक घिनौना रूप दे दिया गया| क्या आश्चर्य है कि जिन स्थानों पर सती और जौहर जैसी घिनोनी परम्पराओं ने जन्म लिया, उन्ही स्थानों पर करवाचौथ का व्रत भी अधिक प्रचलित है| कौन इंसान ज़िंदा जल कर मरना चाहता है और अगर केवल पति की मृत्यु के कारण जिन्दा जलने का डर  जीवन भर सताए तो पति की मृत्यु रोकने के लिए व्रत उपवास ही क्या, कुछ भी सही गलत किया जा सकता है| दुःख की बात है कि सती और जौहर की घिनौनी परम्परा के इस जिन्दा अवशेष का देश में हर संभव माध्यम से प्रचार हो रहा है| आज उस स्त्री के चरित्र पर शक किया जाता है जो करवा चौथ का व्रत नहीं रखती| दुःख होता है कि कुछ नारीवादी मात्र यह देख कर खुश हो लेते है कि उन दिन पुरुष पत्नी का दिल नहीं दुखाते|

 

जन्म आधारित जाति प्रथा और अन्य भेदभाव:

सभी भारतीय जानते हैं कि राम चन्द्र जी के गुरु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र पहले क्षत्रिय थे जिन्होंने बाद में ब्राह्मणत्व प्राप्त किया| अग्रवाल वैश्यों के पूर्वज महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे जिन्होंने वैश्य कर्म को अपना लिया था| इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिलते हैं और समय के साथ इन सभी के वंशज अपने मूल जाति को अब तक भूल चुके हैं| हम देख सकते हैं कि किसी भी समाज में कार्य और आर्थिक क्षमता के अनुसार अपने वर्ग होते हैं| आज निम्न, निम्न मध्यम, मध्यम, और उच्च वर्ग मौजूद हैं| समान रूप से देश में धर्मगुरु, राजनीतिज्ञ, सरकारी अधिकारी, पेशेवर, व्यवसायी, कार्मिक, कृषक आदि वृहत्तर वर्ग मौजूद है| उसी प्रकार से प्राचीन काल में जाति थी जिसको धीरे धीरे कबीलाई तर्ज पर जन्म आधारित कट्टर रूप में स्वीकार कर लिया गया| यह उसी तरह से है जिस तरह से आज भी सऊदी अरब में एक कबीला विशेष अपने को बाकि कबीलों से ऊँचा मानता आ रहा है| मुझे जन्म आधारित जाति प्रथा से कोई बैर नहीं हैं मगर इसके आधार पर होने वाले भेदभाव से है| देश में हर जाति ने अपने से नीचे की एक जाति ढूंड ली है और उसका अपना सर उठा रखा है| जब आप अपनी जाति को ऊँचा या नीचा देखते हो तो आप जातिवादी हैं| क्या हम कबीला संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं?

आज किसी भी विवाह विज्ञापन को देखिये; जाति, वर्ग और व्यवसाय का मिला जुला भेदभाव आपको बिना परिश्रम देखने को मिल जाएगा|

आज हमारा देश हर मामले में अधिक भेदभाव वाला है और सभ्यता से कोसों दूर जा रहा है| आज किसी भी विवाह विज्ञापन को देखिये; जाति, वर्ग और व्यवसाय का मिला जुला भेदभाव आपको बिना परिश्रम देखने को मिल जाएगा| अगर संतान किसी भी एक क्षेत्र में एक कदम आगे बढ़ा ले तो माँ – बाप का नखरा नाक पर आकर बैठ जाता है|

आज देश में रंग भेद भी परवान चढ़ रहा है| पहले तो बात गोरी लड़कियों की थी अब तो लड़कों के लिए भी कहा जाने लगा है कि रंग बदलो वर्ना जीवन समाप्त| मैं यह बात केवल विज्ञापन देख कर नहीं कह रहा आप गैर सरकारी क्षेत्र में किसी भी साक्षात्कार में देख लीजिये, विज्ञापनों से फैलाया जाने वाला भेदभाव असर दिखा रहा है; लम्बे, छकहरे गौरे अंग्रेजी वाले लोगों को आँख बंद कर बढ़ावा दिया जा रहा है| क्या यह रंगभेद हमने अंग्रेजों की गुलामी से नहीं सीखा?

 

मूर्ति पूजा:

भारतीय सभ्यता के मूल ग्रंथों में मूर्ति पूजा का कोई चिह्न नहीं मिलता| वेद, उपवेद, उपनिषद, आदि में ईश्वर को निराकार माना गया है| जहाँ कहीं भी ईश्वर के किसी भी अंश, देवताओं आदि का वर्णन आया है वहां भी उनकी मूर्ति पूजा का प्रावधान नहीं मिलता| हर प्राचीन ग्रन्थ में यज्ञ, तपस्या और साधना का ही वर्णन मिलता है| हिन्दू धर्म कभी भी मूर्ति पूजक नहीं था| अगर हम आज भी किसी सामान्य हिन्दू से भी बात करें तो पायेंगे ही वह भी निर्विवाद रूप से ईश्वर को निराकार मानता है| तो फिर ये मूर्ति पूजा कहाँ से आई? इस बात की चर्चा हमेशा होती रही है कि अनार्य भारतीय समाज में मूर्तियों का चलन रहा होगा| यदि हम ठीक से अवलोकन करें तो पायेंगे की आर्यों में राम चन्द्र जी द्वारा रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना और पूजा, मूर्ति पूजा का पहला वर्णन है|[2] राम चन्द्र जी ने दो मूल कारणों से उस समय मूर्ति पूजा की हो सकती है; पहला, उनके साथ आदिवासियों और अनार्य समुदाय की काफी बड़ी सेना थी और वह उस सेना के मूल धार्मिक विचार से अपने को जोड़ना चाहते थे अथवा दूसरा, वह शिव भक्त रावण की सेना का मनोबल तोड़ने के लिए शिव लिंग की पूजा कर रहे हों| देश में रामायण काल के बाद के बने बहुत से प्राचीन मंदिर हैं मगर उनका मूल रूप मात्र ईश्वरीय शक्ति के स्मारक के रूप में था या मूर्ति पूजा होती थी कहना मुश्किल है| मूर्ति पूजा का चलन गुप्त काल के बाद से मिलता है| शिवलिंग और शालिग्राम के रूप में ईश्वरीय चिह्नों की पूजा का वर्णन अधिक मिलता है और उसके बाद अन्य मानवाकार रूप में ईश्वर के तीन रूपों (ब्रह्मा विष्णू, महेश), देवी और अवतारों की मूर्तियों का का चलन प्रारंभ होता है| आज इस सूची में नए नए देवता और गुरु भी जुड़ते जा रहे हैं|

कहा जाता है की मूर्ति से प्रारंभिक अवस्था में ध्यान लगाने में मदद मिलती है| यह तर्क भी इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन उच्च स्तरीयता के पतन के बाद भारतीय समाज को मूर्ति पूजा की अवश्य ही आवश्यकता पड़ी होगी|

मेरा मूल प्रश्न वही है; क्या हम अपने आज के मध्ययुगीन विचारों के साथ सतयुगी ऊँचाइयों के सपने देख सच कर सकते हैं? क्या हमें अपनी मध्ययुगीन अव्यवस्था को छोड़ कर प्राचीन उच्च आदर्श नहीं अपनाने चाहिए?

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