तीसरी जात

भारत में आप जातिवादी (या कहें, भेद्भावी) न होकर भी जाति के होने से इंकार नहीं कर सकते| जाति व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था से जन्म आधारित में परिवर्तित हुआ माना जाता है, और आज यह भेदभाव के आधार के अलावा आदतों, परम्पराओं, भोजन, रिहायश और वंशानुगत बीमारियों का प्रतीक है| इनमें जाति विशेषों से सम्बंधित कई बातें दुर्भावना से भी प्रेरित मानी जाती हैं|

परन्तु, किसी भी व्यवस्था के प्रारंभ होने के समय उसके कुछ न कुछ कारण रहे होते हैं, भले ही बाद में वह सही साबित हो या गलत| मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा रहा कि कर्म आधारित जाति व्यवस्था में जातियों के श्रेणीक्रम का क्या मापदंड था और क्यों था|

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में ज्ञान को सुरक्षा और अर्थ से पहले रखा गया है| ब्राहमण यानि ज्ञान का पहले स्थान पर रखने पर कोई प्रश्न नहीं हैं| आज हम सुरक्षा को हमेशा धन के बाद रखते हैं और मानते हैं की धन ही धर्म और सुरक्षा का संवाहक है| मानवता और देश का विकास धन और धनपतियों की धरोहर मन जाता है| मजे की बात यह है कि अधिकांश भारत में ब्राहमण और वैश्य खान – पान की शाकाहारी आदतों की बहुलता के चलते स्वाभाविक रूप से निकट जाति समूह लगते हैं| साथ ही दानजीवी ब्राह्मणों के लिए भी यह सरल था कि वो राजाओं का मूँह देखने की जगह धन स्रोत वैश्यों को सम्मान देकर जातिक्रम में दूसरे स्थान पर आसन्न करते|

आज जब पूँजीवाद का समय है और पूंजीपति के आते ही धर्म के तमाम देवता, पंडित, फ़कीर, सन्यासी आदि विशिष्ट क्रम (VIP Line) में लग कर उन्हें दर्शन देते हैं| सत्ता ज्ञानवान के स्थान पर धनवान से पूछकर नीति – निर्धारण करती हैं| कहा जाता है कि विश्व का एक बड़ा देश अपने हथियार निर्माता धनपतियों को ख़ुश करने के लिए अपनी सेना को नरक में भी भेजने के लिए तैयार रहता है| ऐसे समय में मुझे लगता है कि जातिक्रम निर्धारित करते समय वैश्यों को अगर पहले नहीं तो दुसरे स्थान पर अवश्य होना चाहिए था|

परन्तु ऐसा नहीं हुआ| क्यों?

पिछले सप्ताह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की संभावित विदाई और इस सप्ताह उनके पद पर न रहने के निर्णय के सन्दर्भ में क्रोनी – कैपिटलिज्म के सहारे भारतीय जाति व्यवस्था में वैश्यों यानि पूँजी को तीसरे सामाजिक पायदान पर रखने का निहित कारण समझ आया|

पूँजीपति पूँजीवाद के छद्म रूप बाजार और अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने लोभ – लालच की व्यवस्था चलता हैं| इस लोभवाद में पूँजीवाद कहीं नहीं रहता केवल पूंजीपति रहता है जो अपने लोभ के लिए पूंजीवादी सिद्धांतों का दुरूपयोग करता है| उसके लोभ के लाभ पर आश्रित लोग उसके लिए विकास और खुशहाली के गीत लिखते है और कुतर्क रचते हैं| जिस प्रकार मदमस्त हाथी अपने सामने आने वाली हर अच्छी बुरी चीज को कुचल देता है, उसी प्रकार यह लोभवाद धर्म, कर्म, सुरक्षा आदि को अपने कुहित में कुचलता चलता है| रघुराम राजन इसके पहले शिकार नहीं हैं| इस्रायल में बैंक ऑफ़ इस्रायल के गवर्नर प्रोफ़ेसर स्टैनले फिशर लगभग सात साल पहले इसके और कहीं अधिक सीधे शिकार बने थे|[i]

हमारे प्राचीन विद्वानों को उस समय में लगा होगा कि पूँजी, पूंजीपति और पूँजीवाद का साथ आसानी से लोभवाद को जन्म देता है| अगर अगर पूँजीसत्ता को धर्मसत्ता और राजसत्ता से पहले या किसी एक के साथ दे दिया जाता जाता तो यह लोभवाद भारत को बहुत पहले विकास के नाम पर बर्बाद कर चुका होता|

 

[i] https://promarket.org/raghuram-rajan-stanley-fischer/

मैला आँचल

प्रकाशन के साठ वर्ष बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय उपन्यास को पढ़कर आज की वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ पाना पता नहीं मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य| कुछेक मामूली अंतर हैं, “जमींदारी प्रथा” नहीं है मगर जमींदार और जमींदारी मौजूद है| कपड़े का राशन नहीं है मगर बहुसंख्य जनता के लिए क़िल्लत बनी हुई है| जिस काली टोपी और आधुनिक कांग्रेस के बीज इस उपन्यास में है वो आज अपने अपने चरम पर हैं, और सत्ता के गलियारे में बार बारी बारी से ऊल रहे हैं| साम्राज्यवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी बाजार के निशाने पर ग्रामीण समाजवादी मूर्खता का परचम लहराते कम्युनिस्ट उसी तरह से हैं जिस तरह से आज हाशिये पर आज भी करांति कर रहे हैं| विशेष तत्व भगवा पहन कर आज भी मठों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता उनका चरणामृत पाती है| गाँधी महात्मा उसी तरह से आज भी मरते रहते हैं…. हाँ कुछ तो बदल गया है, अब लोगों को ‘उसके’ मरते रहने की आदत जो पड़ गयी है|

पता नहीं किसने मुझे बताया कि ये क्षेत्रीय या आंचलिक उपन्यास है, शायद कोई महानगरीय राष्ट्रव्यापी महामना होगा| मैला आँचल भारत के गिने चुने शहरी अंचलों को बाहर छोड़कर बाकी भारत की महाकथा है; और अगर महिला उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाये तो आदिकालीन हरित जंगल से लेकर उत्तर – आधुनिक कंक्रीट जंगल तक की कथा भी है| पढ़ते समय सबकुछ जाना पहचाना सा लगता है|

पूर्णिया बिहार की भूमि कथा का माध्यम बनी है| दूर दराज का यह समाज एक अदद सड़क, ट्रेन और ट्रांसिस्टर के माध्यम से अपने को आपको राजधानियों की मुख्यधारा से जोड़े मात्र हुए है| समाचार यहाँ मिथक की तरह से आते हैं| हैजा और मलेरिया, उसी तरह लोगों के डराए हुए है जिस तरह साठ साल बाद नई दिल्ली और नवी मुंबई के लोग चिकिनगुनिया और डेंगू जैसी सहमे रहते हैं|

कथानायक मेडिकल कॉलेज के पढ़कर गाँव आ जाता है; धीरे धीरे गाँव में विश्वास, युवाओं में प्यार, देश में नाम और सरकार में सतर्कता कमा लेता है| नहीं, मैं डाक्टर विनायक सेन को याद नहीं कर रहा हूँ| गाँव जातियों में बंटकर भी एक होने का अभिनय बखूबी करता है| अधिकतर लोग अनपढ़ है और जो स्कूल गए है वो सामान्य तरीके से अधपढ़ हैं| जलेबी पूरी की दावत के लिए लोग उतना ही उतावले रहते है जिस तरह से आज बर्गर पीज़ा के लिए; मगर हकीकत यह है कि जिस तरह से देश की अधिसंख्य आबादी ने आज बर्गर पीज़ा नहीं खाया उस वक़्त पूरी जलेबी नहीं खायी थी|

बीमारी से लड़ाई, भारत की आजादी, वर्ग संघर्ष, जाति द्वेष, जागरूकता और स्वार्थ सबके बाच से होकर उपन्यास आगे बढ़ता है| यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर उकेरा गया रेखाचित्र है जिसमे तमाम बारीकियां अपने पूरे नंगेपन के साथ सर उठाये खड़ी हैं| ये सब अपने आप में लघुकथाएं हैं और आसपास अपनी अनुभूति दर्ज करातीं हैं|

पुनःश्च – मेरे हाथ में जो संस्करण है, उसमें विक्रम नायक के रेखाचित्र हैं| मैं विक्रम नायक को रेखाकथाकार के रूप में देखता हूँ| उनके रेखाचित्रों में गंभीर सरलता झलकती है| इस संस्करण में उनके कई चित्र सरल शब्दों में पूरी कथा कहते हैं| बहुत से चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे|

बहू बेटी, दामाद बेटा

भारत में स्तिथि कुछ इस तरह से मानी जाती है कि अगर आप किसी घर की बहू हैं तो आप इज्ज़त के पायदान में सबसे नीचे हैं और अगर आप किसी घर के दामाद हैं तो आप इज्ज़त में हर पायदान से ऊपर हैं|

मगर नई हवा शायद कुछ बदल रही है| क्या वाकई??

हमारे वृज क्षेत्र में बहू हर किसी के पैर छूती है तो दामाद हर किसी से पैर छुलवाता है| ध्यान रहे हमारे यहाँ बेटा सभी बड़ों के पैर छूता है, मगर बेटी किसी के पैर नहीं छूती|

अब से कुछ वर्ष पहले जब एक नए नवेले दुल्हे ने अपने ससुर के पैर छुए तो हम सबके दिल में इज्ज़त बढ़ गई| और अगले ही पल उसी परिवार के बहुत से लोगों ने उस थोड़ी सी पुरानी बहू को याद किया जिसने बड़ों के पैर नहीं छुए थे| कुल जमा निष्कर्ष था कि दामाद का पैर छूना अच्छी बात है मगर बहू का पैर न छूना बुरी बात है| सभी लोगों को पैर छूने वाले दामाद में बेटे के दर्शन हुए| मगर पैर न छूने वाली बहू में किसी को बेटी न दिखाई दी|

उसके बाद एक समारोह में मैंने पहली बार एक घर के दामाद को बेटे की तरह खाना परोसते देखा| मगर आधुनिकता को छटका तब लगा जब बेटा उस पूरे समय दोस्तों और रिश्तेदारों से गप्प मारता रहा| मुझे शक हुआ कि क्या दामाद को बेटा बनाने की कवायद में बेटे को दामाद बना दिया गया है| मगर ससुर साहब ने दामाद को समारोह के बाद गले लगाया, “आप तो हमारे बेटे ही हो, हमने तो बेटी देकर बेटा लिया है|” मेरा दिल थोड़ा खुश हुआ| मैंने पूछ लिया फिर तो दामाद को बेटों की तरह दौलत में हिस्सा मिलेगा| ससुर साहब ने जबाब न दिया| बस अगले दिन कोठी के आगे एक नामपट्ट और लग गया, सुपुत्र के नाम का|

एक बार एक सज्जन के मुलाकात हुई| उनकी कन्या के लिए वर की आवश्यकता थी| उनके शब्दों में बेटी देकर बेटा लेना था| दान – दहेज़ से परहेज था| मगर अगले वर्ष उनके सुपुत्र के लग्न- सगाई कार्यक्रम में जाने को मिला तो बोले, “गरीब घर की लड़की है, वर्ना बहुत से लोग थे जो सेडान कार दे रहे थे| हमने घर में क्या कमी है?” मन में आया बोलूं, “सदेच्छा की”| इन सज्जन ने अपनी बेटी की शादी में सिर्फ चालीस लोगों की बारात की अनुमति दी थी| मगर सुपुत्र के विवाह में चालीस का वादा करने के बाद भी बिना किसी पूर्व सुचना के पूरे डेढ़ सौ लोग लेकर पहुँच गए| बाद में फिर एक और बेटी के विवाह में रोने लगे, “सालों ने पहले पच्चीस लोग बोले थे और अब पिचहत्तर ले कर आ रहे हैं|

एक और सज्जन मिले| बहू की तारीफ करते थक न रहे थे| उसके काम, नौकरी, नाम, आचार – विचार सब सुनकर अच्छे लग रहे थे| यहाँ तक बोले, अब बेटी तो पराई लगती है| बहू ही जीवन है| उनके विदा लेकर बाहर निकला ही था कि साथ आये सज्जन ने उनको बेटी सम्बन्धी अपशब्द से सम्मानित किया बोले, जब बीमार हुए थे तो बेटी की ससुराल वालों ने इलाज में खूब खर्चा किया था, बेटी सेवा के लिए पड़ी रही| यहाँ तक कि बेटी का घर टूटने लगा| रिश्तेदारों ने समझा बुझा कर बेटी को उसके घर भेजा| आज जब बेटी घर से निकाली जाती है, तो पराई हो गई|

प्रेम निवेदन

यह बसंत – वैलेंटाइन का प्रेमयुग नहीं है जिसमे इश्क़ इबादत था| ये वो वक़्त है जिसमें लवजिहाद और प्रेमयुद्ध है| सरफिरो के लिए प्रेम पूजा नहीं असामाजिकता है, यौन है, वासना है, बलात्कार है|

एक हिन्दू – एक मुसलमान| एक कायस्थ – एक शेख़| एक शाक्त – एक शिया| एक मंदिर – एक मस्जिद| एक संस्कृतनुमा हिंदी – एक फ़ारसीनुमाउर्दू| एक भैया – एक भाई| एक गाय – एक बकरा| एक गोभी – एक गोश्त| एक नौकरी – एक धन्धा| एक कंप्यूटर – एक कॉमर्स| एक मूँछ – एक दाढ़ी| एक चाकू – एक छुरा| एक ये – वो| एक यहाँ – एक वहाँ| एक ऐसा  – एक वैसा|

हमारे बीच में एक सड़क है जो जिसके फुटपाथ कभी नहीं मिलते, न ही सड़क के किनारे बने घर|

दो घर आमने सामने, जिनका हर रोज सूरज निकलते आमना सामना होता है| उनके बीच सड़क पच्चीस फुट और पच्चीस साल चौड़ी है| हर सड़क के बीच डिवाइडर रहता है, कई बार एक ऊँची दीवार रहती है, जो किसी को दिखती नहीं है, हर किसी को महसूस होती है| यह दीवार दिल में बनती है और सड़क पर जा खड़ी होती है| हर सड़क के बीच डिवाइडर रहता है, कई बार गहरा समंदर रहता है| समंदर ख्यालों में रहता है और दिल उसमें डूब जाता है|

प्यार समर्पण है, प्यार त्याग है मगर प्यार न तो आत्म – समर्पण है, न भागना है|

मगर वो प्रेम क्या जिसे जाहिर भी न किया जाये| प्रेम में इंकार हो या न हो, इजहार तो होना ही चाहिए| हम जानते है कि हम एक दूसरे को प्रेम करते है| न बोलना कई बार बहुत ज्यादा होता है और बोलना कम| मगर समाज बहरा होता है, क़ानून अँधा|

कई बार लगता है दो घर बहुत दूर हैं और उनके बीच में जो समंदर है उसमें तैरते हुए और दूर चले जायेंगे| उनके बीच में एक पुल बना देना चाहिए| उन्हें रस्सी से बाँध दिया जाना चाहिए| उनके बीच में लक्ष्मण रेखा नहीं लक्ष्मण झूला चाहिए|

बस तय किया है, इस वैलेंटाइन तय किया दोनों घरों को मजबूत रस्सी से बाँध कस कर बांध दिया जाए, हमेशा के लिए|

अपने एनसीसी के दिन याद आ रहे हैं| उन दिनों सीखा था कि किस तरह से दो उंची बिल्डिंगों या पेड़ों के बीच में रस्सियों का पुल बनाया जाये, जिससे कि दोनों के बीच आना जाना हो सके| इस नेक काम में भरोसे के दो लोगों की जरूरत है जिन्हें इस तरह के पुल बनाना आता है और जो सामने वाले घर की छत पर जा कर इस नेक काम को अंजाम दे सकें| अब यह तय है कि तीन मंजिल ऊँचे दोनों घरों के बीच में एक रस्सी का मजबूत पुल बना दिया जाये, अपना एक लक्ष्मण झूला|

वैलेंटाइन डे के दिन सुबह अपनी खास शेरवानी पहने मैं| रस्सी के उस पुल के बीच, बीचों बीच मैं… एक छोटा सा छोटा सा गुलदस्ता हाथों में, ताजा सफ़ेद गुलाब और तरोताजा लाल गुलाब का गुलदस्ता| वहाँ से उनके मोबाइल पर एक कॉल.. अब प्लीज छत पर आ जाओ..| और आसमान में उड़ती हुई बहुत सारी लाल और सफ़ेद पतंगों के बीच हवा में झूलते हुए रस्सियों के मजबूत झूले पर एक प्रेम निवेदन|

टिपण्णी : यह पोस्ट http://cupidgames.closeup.in/. के सहयोग से  इंडीब्लॉगर द्वारा किये गए आयोजन के लिए लिखी गई है|

कुलनाम

अभी हाल में “ओऍमजी – ओह माय गॉड” फिल्म देखते हुए अचानक एक संवाद पर ध्यान रुक गया| ईश्वर का किरदार अपना नाम बताता है “कृष्णा वासुदेव यादव”| इस संवाद में तो तथ्यात्मक गलतियाँ है;

 

१.      उत्तर भारत में जहाँ कृष्ण का जन्म हुआ था वहां पर मध्य नाम में पिता का नाम नहीं लगता| वास्तव में मध्य नाम की परंपरा ही नहीं है, मध्य नाम के रूप में प्रयोग होने वाला शब्द वास्तव में प्रथम नाम का ही दूसरा भाग हैं, जैसे मेरे नाम में मोहन|

 

२.      उस काल में कुलनाम लगाने का प्रचलन नहीं था|

 

'Vamana Avatar' (incarnation as 'Vamana') of V...

‘Vamana Avatar’ (incarnation as ‘Vamana’) of Vishnu and King ‘Bali’. (Photo credit: Wikipedia)

 

 

 

जाति सूचक शब्द में नाम का प्रयोग शायद असुर नामों में मिलता है, जैसे महिषासुर, भौमासुर| यह भी बहुत बाद के समय में| प्रारंभिक असुर नामों में भी इस तरह का प्रयोग नहीं है, जैसे – हिरन्यकश्यप, प्रह्लाद, बालि, आदि|

 

ऐतिहासिक नामों में मुझे चन्द्रगुप्त मौर्य के नाम में ही कुल नाम का प्रयोग मिलता है, स्वयं मौर्य वंश में भी किसी और शासक ने कुलनाम का प्रयोग नहीं किया है| विश्वास किया जाता है कि वर्धनकाल तक भारत में जाति जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी| यदि उस समय जाति या कर्म सूचक कुलनाम लगाये होते तो हो सकता कि शर्मा जी का बेटा वर्मा जी हो| सामान्यतः, मध्ययुग तक कुलनाम का प्रयोग नहीं मिलता| हमें पृथ्वीराज चौहान का नाम पहली बार कुलनाम के साथ मिलता है|

 

 

स्त्रियों में कुलनाम लगाने की परंपरा बीसवीं सदी तक नहीं थी| स्त्रिओं में कुमारी, देवी, रानी आदि लगा कर ही नाम समाप्त हो जाता था| बाद में जब स्त्रिओं में कुलनाम लगाने की परंपरा आयत हुई तो बुरा हाल हो गया है| प्रायः सभी स्त्रिओं को विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलकर अपनी पहचान बदलनी पड़ती है अथवा अपनी पुरानी पहचान में पति की पहचान का पुछल्ला जोड़ना पड़ता है|

 

पाठकों के विचारों और टिप्पणियों का स्वागत है|

 

दो ऑटोरिक्शा चालक

अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru

Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|

 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न| 

भारत की अबला नारी

 

भारत का समाज और क़ानून मात्र दो प्रकार की अबला नारियों की परिकल्पना करता है:

१.      नवविवाहिता स्त्री, विवाह के पहले ३-४ वर्ष से लेकर सात वर्ष तक (नवविवाहित अबला); और

२.      भारतीय परिधान पहनने और अपने पिता या भाई की ऊँगली पकड़ कर चलने वाली २४ वर्ष की आयु अविवाहिता स्त्री (अविवाहित अबला)|

जो भी स्त्री इस दोनों निमयों से बाहर है वह प्रायः समाज और कानून द्वारा कुलटा स्त्री मानीं जाती है| (ध्यान दें, भारत में सबला स्त्री का कोई प्रावधान नहीं है|)

और जब तक किसी भी स्त्री को कुलटा घोषित नहीं किया जाता उसे भाभीजी और माताजी जैसे शब्दों से पुकारा जा सकता है|
(पुनः ध्यान दें, बहनजी शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है, अविवाहित स्त्रियों के लिए भी भाभीजी शब्द का धड़ल्ले प्रयोग किया जा सकता है|)

आईये; विस्तृत अध्ययन करते हैं:

नवविवाहित अबला:

नवविवाहिता अबला, सामाजिक समर्थन प्राप्त कानूनी अबला है, जिसे होने वाले किसी भी कष्ट के भारतीय समाज में आराजकता की उत्पत्ति होती है| इस श्रेणी में आने के लिए किसी भी स्त्री को नवविवाहित होना ही एक मात्र शर्त नहीं है| प्रेम- विवाह के नवविवाहित हुईं स्त्रियाँ, सामान्य नियम के अनुसार इस श्रेणी से बाहर ही रखीं जातीं हैं| गरीब और निम्न जाति की स्त्रियाँ भी, राजनितिक दबाब  का अभाव होने पर इस श्रेणी से बाहर मानीं जा सकतीं हैं| जिन स्त्रियों का विवाह, ३५ वर्ष की आयु के बाद हुआ हो, उन्हें इस श्रेणी में काफी संशय के साथ रखा जाता हैं|

सामाजिक नियम के अनुसार इस श्रेणी में स्त्री विवाह के बाद के पहले दो – चार वर्ष ही रहती है, परन्तु कानून के आधार पर यह अवधि विवाह के बाद के पहले सात वर्ष रहती है| उस समय सीमा के बाद कोई भी स्त्री अबला नहीं रह जाती|

अपवाद स्वरुप, अश्रुवती स्त्रियाँ अपने अबला काल को अधिक समय तक बना कर रख सकतीं हैं| सुन्दर, आकर्षक, समझदार, मिलनसार (अति – मिलनसार नहीं), होना उन अश्रुवती स्त्रियों के लिए अतिरिक्त लाभदायक हो सकता हैं|

हमारे भारतीय समाज और कानून में नन्द, सास, जेठानी, पड़ोसन और किसी भी अन्य स्त्री जिसका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ससुराल या पति से हो, नवविवाहिता अबला के लिए प्राण-घातक मानी जाती है|

दहेज़, सती, आत्महत्या, गर्भपात और घरेलू हिंसा आदि के लिए पति को दोषी माना जाए या न माना जाए, इन में से किसी न किसी स्त्री को ढूंढ कर अवश्य ही दोषी मान लिया जाता है|

इस प्रकार की अबला को पति नाम की चिड़िया और ससुराल नाम के चिड़ियाघर से सुरक्षा की विशेष आवश्कयता हमारे कानून में हमेशा से महसूस की है और आज भी कर रहा है| नए तलाक कानून इस  श्रंखला में एक और कड़ी हैं और हम ऐसी ही अनेकाने क्रांतिकारी कड़ियों की सम्भावना से रोमांचित हो उठते हैं| नव विवाहिता अबला की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के कानून बनाये गए हैं, उनके उदहारण इस प्रकार से हैं[i]:

  1. The Dowry Prohibition Act, 1961 (28 of 1961) (Amended in 1986)
  2. The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 (3 of 1988)
  3. Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
    1. The Indian Christian Marriage Act, 1872 (15 of 1872)
    2. The Married Women’s Property Act, 1874 (3 of 1874)
    3. The Guardians and Wards Act,1890
    4. The Child Marriage Restraint Act, 1929 (19 of 1929)
    5. The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
    6. The Special Marriage Act, 1954
    7. The Protection of Civil Rights Act 1955 
    8. The Hindu Marriage Act, 1955 (28 of 1989)
    9. The Hindu Adoptions & Maintenance Act, 1956
    10. The Hindu Minority & Guardianship Act, 1956
    11. The Hindu Succession Act, 1956
    12. The Foreign Marriage Act, 1969 (33 of 1969)
    13. The Indian Divorce Act, 1969 (4 of 1969)
    14. The Muslim women Protection of Rights on Dowry Act 1986
    15. National Commission for Women Act, 1990 (20 of 1990)

यदि इन कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा बाद में कभी करेंगे|

अभी पहले अविवाहित अबला के बारे में बात करते हैं|

 

अविवाहित अबला:

यह प्रायः सामाजिक किस्म की अबला है, जिसके अबला होने के बारे में माना जाता है कि कानूनी विद्वानों में केवल किताबी सहमति है| अविवाहित अबला, वह अविवाहित स्त्री है जो गैर – भारतीय परिधान न पहनती हो, अपने पारिवारिक स्व – पुरुष जन ( और कभी कभी माता बहनों) के अतिरक्त किसी अन्य प्राणी के साथ न पाई जाती हो, शरीर से सर्वांग – स्वस्थ होने के बाद भी गूंगी, बहरी और अंधी हो और किसी भी पुरुष के द्वारा उसके अबला होने से अधिकारिक रूप से इनकार न किया गया हो|

सामान्यतः स्थानीय नियमों के अनुसार २० से २४ वर्ष की आयु पार करने के बाद किसी भी स्त्री को इस श्रेणी से निकला हुआ मान लिया जाता है|

इस श्रेणी में बने रहना हर स्त्री के लिए एक चुनौती है और विवाह की प्रथम शर्त है| अबलाओं के हितों की रक्षा के लिए एक रोजगार परक राष्ट्रीय आयोग भी है जिसका नाम आपको पता है|

 

अन्य विचार बिन्दु:

हर स्त्री को अबला श्रेणी के निकाले जाने का भय हमेशा बना रहता है| पहले किसी समय में हर स्त्री को अबला माना जाता था परन्तु अब ऐसा नहीं है| आज इस बाबत, कई वैधानिक सिद्धांत हैं|

पहला वैधानिक सिद्धांत है; “गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई|” इस सिद्धांत में गरीब का अर्थ किसी भी रूप में निम्न स्तरीय परिवार के होना है और लुगाई का अर्थ गरीब घर की किसी भी स्त्री से लिया जाता है| निम्नता को धर्म, जाति, क्षेत्र, आय, सम्पन्नता, राजनितिक अलोकप्रियता और भीड़ इक्कठा न कर पाने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है|

दूसरा वैधानिक सिद्धांत है, “भले घर की लड़कियां मूँह नहीं खोलतीं”| यदि कोई स्त्री अपने साथ हुई किसी भी छेड़छाड़, या यौन शोषण की शिकायत करती है तो उसे समाज अबला के दर्जे से बाहर कर देता है| यदि वह फिर भी कोई कोशिश करती है तो हमारा न्यायतंत्र ( न्यायलय और समाचार माध्यम दोनों ही) उसके साथ इतना विचार – विमर्श करता है कि उसे अपने सही श्रेणी का ज्ञान हो जाता है, भले ही यह ज्ञान मरणोपरांत ही क्यों न हो| इस सिद्धांत का एक विपरीत सिद्धांत भी है, “अति भले और बलशाली घरों की लडकियां जब भी मूँह खोलती है, सत्य और उचित ही बोलतीं हैं” परंतु इस सिद्धांत का प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हो सकता है|

अंतिम निष्कर्ष:

एक स्त्री के अबला श्रेणी से बाहर कर दिए जाने से उसके लिए हर प्रकार की सामाजिक, वैधानिक और न्यायायिक सुरक्षा का अंत हो जाता है| परन्तु, अबला के साथ हल्की की भी ऊँच – नीच करने वाले का सात पुश्त, माँ – बहन, हड्डी – पसली और कुत्ते की जिन्दगी और मौत वाला हाल किया जा सकता है|

कुल मिला कर मौत के कूएँ में सांप – छछूंदर का खेल है और मदारी गोल महल में बीन बजा रहे हैं|

क्षमा – शीलता की धुर विरोधी: क्षमा-इच्छा

मेरे पिछले ब्लॉग के बाद कुछ मित्रों में मुझसे बातचीत करते हुए असहमति जताते हुए कहा है कि जब भी भावनाओं को आहात करने वाली कोई भी टिपण्णी सामने आती है तो प्रबुद्ध वर्ग क्षमा याचना की मांग तो करता है है|

प्रथमतः, मुझे यह बात समझ नहीं आई| एक पुराना दोहा पढ़ा था:

छिमा बड़न को चाहिये,   छोटन को उतपात।

कह रहीम हरि का घट्यौ,         जो भृगु मारी लात॥

पूरी कथा से तो आप सभी प्रबुद्ध जन अवगत होंगें ही| भगवान् विष्णू ने इस मिथकीय घटना क्रम में एक श्रेष्ठ उदहारण प्रस्तुत किया है| उन्होंने भृगु द्वारा हमला किये जाने के बाद क्षमा की मांग नहीं की न ही किसी अन्य प्रकार का दबाब नहीं डाला|

मैं यह नहीं कहता कि क्षमा की आशा नहीं करनी चाहिए; परन्तु क्षमा मंगवाने के लिए किसी भी प्रकार का दबाब डालना, बल प्रयोग की धमकी देना, चरित्रहनन करना, बल प्रयोग करना आदि गलत है|

क्षमा किसी के भी ह्रदय परिवर्तन का प्रतिफल होना चाहिए; गले पड़ी मुसीबतों, मूर्खों और मवालियों से पीछा छुड़ाने की गरज का परिलक्षण नहीं| इन दिनों तो हमारे लोकतंत्र का काम ही माफ़ी मंगवाना या प्रतिबंध लगवाना रह गया है| हालत यह है कि साधारण तथ्यों से भी लोगों की भावनाएं आहात हो जाती हैं| अगर आप कह दें की “सूरज पूरब से निकलता है” तो देश में हंगामा हो जाएँ| कहना चाहिए “सूर्यदेव पूर्व दिशा से उदय होते हैं”|

हम रोज ही किसी न किसी को “सॉरी” बोलते हैं; मुझे नहीं लगता ही दस में से एक बार भी हम यह याद रख पाते हैं कि हमने क्यूँ क्षमा प्रार्थना की| यह सिर्फ अपनी शालीनता प्रदर्शन का माध्यम होता है| हमारा कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं होता| क्या इस तरह के आदतन क्षमा याचने से कोई लाभ होता है?

इसी प्रकार, जब कोई गुंडा मवाली सामने से लड़ने आ जाता है तो भी हम क्षमा याचना कर लेते हैं| क्या हम उस गुंडे को गुंडा मानना बंद करते हैं|

कई बार कानूनी कार्यवाही की धमकी दी जाती हैं| यह कई बार हास्यास्पद हो जाती है जब कि सामने वाले की टिप्पणी, अपने सभी सन्दर्भ और प्रसंगों के साथ काफी हद तक सही प्रतीत होती है| हम केवल इसलिए न्यायलय में वाद नहीं कर सकते कि हमारी “आत्म – मुग्धता” को ठेस लगी है| न्यायालय “आत्म – सम्मान” के लिए वाद सुनता है, “आत्म – मुग्धता” के लिए नहीं| बहुधा, इन दोनों स्तिथियों में कोई विशेष अंतर नहीं होता, इसलिए बचना चाहिए| क्योंकि हर कोई न्यायलय के चक्कर काटने से नहीं डरता| खासकर तब जब, उसे पता हो की मुक़दमे की धमकी गीदड़ – भभकी है|

बहुमत का जबरदस्त दबाब आज की भीड़तंत्र में क्षमा मंगवाने का बड़ा तरीका हो गया हैं| क्या एक आदमी का सत्य १०० करोड़ के दबाब से झूठ बन जाता है| कभी नहीं| यह दबाब उस एक आदमी को यह बताता है कि उसका सामना १०० करोड़ जाहिल – गंवारों से हो गया है और न्याय कि अब आशा नहीं बची है| अपने को बचाने के लिए या तो भाग जाओ या हथियार उठा लो|

कई बार क्षमा मंगवाने के लिए मारपीट भी की जाती है| आज देश के सड़कछाप (और सोशल मीडिया छाप) राजनीतिज्ञ और टका – छाप अपराधी तत्वों के लिए यह बड़ा आसन तरीका हो गया है| लोग फर्जी नाम रख कर आये दिन ऐसा कर रहे हैं| हाल में विश्व भर के मिडिया में इस प्रकार की धमकियों के भारतवर्ष में चलन को लेकर काफी चर्चा है| कहा जा रहा है कि भारत में एक ऐसा कट्टरपंथी तबका है जिसे अपनी बात मनवाने के पिटाई करने से लेकर बलात्कार और हत्या करने की धमकी देने में लाज शर्म नहीं आती है| ऐसी भी जानकारियां आ रही हैं कि इसमें प्रबुद्ध कहे जाने वाले डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट जैसे लोग भी अपने नकली नामों के साथ शामिल हैं| विभिन्न संस्थाओं ने नकली नामधारी इन लोगों का डेटाबेस भी तैयार करना शुरू कर दिया है|

मेरी समझ में जबरन क्षमा मंगवाना आतंक फ़ैलाने का प्रथम पायदान है|

जैसा मैंने पहले ही कहा है कि क्षमा मंगवाने का एक ही उचित तरीका हैं, सामने वाले के ह्रदय परिवर्तन का प्रयास करना| ह्रदय परिवर्तन के कई माध्यम हो सकते हैं:

१.       हम सामने वाले के सामने अपने कृत्य से ऐसे उदहारण रखें कि उसे खुद से आत्मग्लानि हो|

२.       हम वह तथ्य भली प्रकार से सामने लायें जिन्हें वह शायद नजर अंदाज कर गया हो|

३.       आपस में बैठ कर एक दुसरे की बात समझें और अपने अपने पक्ष की गलत बातों को सुधारें|

४.       सामने वाले पक्ष की गलत बातों को नजर अंदाज करते हुए समस्त समाज को भली प्रकार से सही बातों की जानकारी दें| जब सामने वाला पक्ष देखेगा कि उसके दुष्प्रचार का सद्प्रचार से मुकाबला किया जा रहा है तो वह स्वमेव शांत हो जायेगा|

कुल मिला कर मेरे विचार से क्षमेच्क्षा (क्षमा मंगवाने की जबरदस्त इच्छा रखना) क्षमा-शीलता का धुर विरोधी है|

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साहित्य : समाज का दर्पण — समतल, अवतल या उत्तल

अभी कुछ दिन पहले माननीय साहित्यकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी जी का गाँव भरथुआ देशभर में बदनाम कर दिया गया| वैरागी राजा और मुनि भतृहरि जी तपोभूमि एक नरपिसाच की दरिंदगी की भेंट चढ़ गयी| दिखिए क्या लिखा है इन्होने और इन्होने. कैसे एक ही गाँव में हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का महानायक और आज का एक महाखलनायक पैदा हो गया?

अब किसे नहीं पता कि कौरव और पांडव एक ही गाँव और घर परिवार के थे? क्या क़ानून का कोई महापंडित भी ठीक से ये बता सकता है कि हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर किसका उचित अधिकार था? हम जानते है कि सिंहासन का निर्णय सत्य से नन्हीं, चरित्र से नहीं और वरन इस बात से हुआ था कि सत्य और चरित्र का अधिक झुकाव किधर है| (टिपण्णी: युद्ध में हुई हार जीत मात्र प्रासंगिक है, सत्य का निर्णय नहीं|)

हाल में भरथुआ का नाम उछलने से साहित्य और समाज के रिश्ते चर्चा में उतर आये हैं| यह अच्छी बात है| इस तरह के प्रसंग बहुत सार्थक प्रभाव छोड़ते हैं| हमारे भावनात्मक देश में आज कल लोग शास्त्रार्थ की बातें नहीं करते वरन शस्त्रार्थ, कुत्रर्कों से काम चलाने लगते हैं| सार्थक चर्चा कम ही हो पातीं हैं| माफ़ी मंगवाना, प्रतिबंद लगवा देना, मुंह तोड़ने से बलात्कार तक करने की धमकी दे देना, भारत बंद करवा देना आदि अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के हमारे प्रिय माध्यम बन चुके हैं| आज रोजगारी अक्षरज्ञान के समय में शिक्षा और शास्त्रार्थ का आभाव होना शायद स्वाभाविक है| ऐसे समय में मुझे असंतुलित भाषा में भोजपुरी लोकगीतों पर निशाना साधती एक टिपण्णी फेसबुक पर दिखाई दी| उसके विरोध और समर्थन में कई तर्क कुतर्क भी दिखाई दिए जिनमे मुद्दे से हट कर टिपण्णी लेखक के निजी संबंधों तक पर किये गए प्रहार तक शामिल हैं|

मैं आज समूचे भारतीय साहित्य में अश्लीलता (कामुकता स्वीकार्य है अश्लीलता नहीं) प्रचुरता से पाता  हूँ| निश्चित रूप से कोई भी साहित्य (भले ही वो पीत साहित्य ही क्यों न हो) समाज का दर्पण होता है परन्तु “दर्पण” पूरा सच नहीं होता| प्रथम तो दर्पण में दिखने वाला प्रतिबिम्ब हमेशा बिम्ब का आधा होता है| (खुद नाप कर देख लें, प्रयोगशाला में जाने की जरूरत नहीं है|) दूसरा उस दर्पण का खुद का क्या स्वरूप है: समतल, अवतल या उत्तल? यह सम्बंधित साहित्यकार पर निर्भर है कि वो क्या रूप चुनता है| यदि हम दर्पण को बिना समझे प्रतिबिम्ब को देखेंगे तो हमें कभी सही जानकारी नहीं मिलेगी| साहित्यकार क्या दर्पण चुनता है यह इस पर निर्भर है की उसकी प्रतिबद्धता क्या है? उसके साहित्य का पाठक, श्रोता और दर्शक कौन है?

आज हमारे लगभग सभी स्तरीय साहित्यकार कहते हैं कि उन्हें पाठक नहीं मिलते| आज गिने चुने हिंदी भाषी घरों में ही हिंदी साहित्य पुस्तकें और पत्रिकाएं आतीं हैं, मगर मनोहर कहानियां बिक जातीं हैं| आज कौन मधुर सार्थक संगीत सुनता है? कितने लोग सार्थक फिल्म, नाटक देखने जाते हैं? कई बार हम घटिया साहित्य के लिए प्रकाशकों, निर्देशकों और निर्माताओं को दोष देते हैं, मगर वो हमें हमारा गला पकड़ कर हमें कुछ भी पढने, सुनने और देखने को मजबूर नहीं करते हैं| हो सकता है कि वो बेहतर विज्ञापन करते हों, मगर क्या हमें अपनी समझ का प्रयोग नहीं करना चाहिए? क्या शराब की दुकानें लोग विज्ञापन के सहारे ढूंढते हैं? नहीं, इस देश में शराब खुद बिकती है और फलों के रस का विज्ञापन आता है| मेरा मंतव्य इतना है कि हम अपनी मानसिकता के अनुसार चीजे खोज लेते है| हमें अपनी मानसिकता पर लगाम रखने की जरूरत है|

सत्य यह है कि कुछ लोगों के लिए साहित्य एक आय का माध्यम भी है और उन्हें वही परोसना है जो बिक जाए| हर कोई महाकवि निराला नहीं है| हम – आप बढ़िया साहित्य खरीदें, सुनें और देखें तो क्या मजाल कि ख़राब साहित्य बिक जाए| घटिया पर प्रतिबन्ध का प्रश्न ही नहीं है, प्रश्न बढ़िया के प्रोत्साहन का है| मेरे लिए प्रोत्साहन का अर्थ कोई अकादमी की इमारत बनबा देना नहीं है वरन उसे घर घर लाने और पहुँचाने का है|

अगर हम किसी भी रचना को स्वीकारते हैं तो निश्चित ही हम उसमे वर्णित बातों का विरोध नहीं कर रहे होते, भले ही उसका समर्थन न करें| आज देश में हर भाषा में घटिया स्तरहीन साहित्य छाप रहा है| ये भोजपुरी, पंजाबी और मलयालम का प्रश्न नहीं है| यह हमारे द्वारा सही साहित्य को समर्थन न देने के कारण हैं|

आज हमारे साहित्य का मुख्यत लोक साहित्य का काफी पतन हुआ है| लोक भाषाएँ या क्षेत्रीय भाषाएँ अपने श्रेष्ठ रचनाकारों को अंग्रेजी के लिए खो रहीं हैं और कम श्रेष्ठ रचनाकार बढ़ी भाषाओँ में लिखना चाहते हैं| मगर दूर दराज के अंचलों में साहित्य, मुख्यतः मनोरंजक साहित्य की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कौन बचता है?  यहाँ पर एक बहुत बढ़ा शून्य है|

मेरे निजी विचार में देश का मजदूर तबका दूर दराज के इलाकों से आता है जो मुख्य रूप से आंचलिक और क्षेत्रीय भाषाओँ को प्राथमिक रूप से समझता है| इस वर्ग हो अपनी भाषा में ही मनोरंजन चाहिए होता है और उसकी मनोरंजक साहित्य शून्य को उन भाषाओँ का स्तरहीन साहित्य भर रहा है| प्रारंभ में उसे पढ़ते, देखते सुनते समय नहीं लगता कि कुछ गलत सुना जा रहा है मगर बाद में जब अर्थ समझ आने लगते है तो वही कुतर्क दिमाग में आते हैं: १. सब तो सुन रहे हैं,  २ सब जगह यही सब हो रहा है, ३. हम जो कर रहे है उस पर हमला मत कर, बहुत मारेंगे| इस सब से न सिर्फ स्तरहीन रचनाकारों का वरन स्तरहीन साहित्य पसंद करने वालों का होसला बढ़ रहा है|

कई वर्ष पहले से मुझे लोक साहित्य और संगीत को समझने का शौक चढ़ा था| हमारे व्रज में में रसिया होता है, रसिया – दंगल भी| एक मित्र मुझे अलीगढ़ नुमायश में रसिया दंगल में ले गए| अश्लीलता की वो हद थी कि हम दोनों न सिर्फ भाग खड़े हुए बल्कि डरते रहे की कोई देखा न ले| रसिया को इस सब स्तरहीनता से बचाने के उद्देश्य को सामने रख कर मैंने एक बड़ी कंपनी दारा प्रायोजित कार्यक्रम के लिए एक ब्लॉग आलेख भी लिखा था|

हमारे देश की एक और विचित्र मानसिकता है| हम भाषाओँ को विशेष अभिव्यक्तियों के लिए चुन लेते हैं| प्रेम मुहब्बत की बातें उर्दू में अधिक अच्छी लगतीं है और धर्म कर्म संस्कृत में; राम को अवधी ज्यादा भाती है और राधा कृष्ण प्रायः ब्रजभाषा में ही फंसे हैं| लड़के – लडकियों की शोखियाँ और मस्तियाँ पंजाबी की मोहताज हैं तो अश्लीलता प्रायः भोजपुरी के सर आ पड़ी है| ये सब क्या है? क्या भाषाएँ इन्हें चुनतीं हैं?

हमारे समाज की रचना कई तरह के राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और आंचलिक प्रभावों से मिलकर होती है| चाहे यह समाज दिल्ली में हो या भरथुआ में|

क्या पंजाबी गानों पर पूरा उत्तर भारत नहीं उछलता कूदता (कुछ लोग नृत्य भी कर लेते हैं)?

क्या भोजपुरी फिल्मों और तथा कथित लोकगीतों को सारे उत्तर भारत का मजदूर तबका नहीं सुनता?

क्या हनी सिंह के गाने सुनने वाले अधिकतर लोग सारे भारत से आये महानगरीय महामजदूर नहीं है?

जब हम भारतियों को अपनी बात पर जोर देना होता है तो हम प्रायः अंग्रेजी में बोलते है और जिन शब्दों को अपनी भाषा में बोलने पर लज्जा आती है, वो भी अंग्रेजी की गंगा में पवित्र हो जाते हैं| मैं यहाँ अंग्रेजी नहीं बोलूँगा| अंत में इतना ही कहूँगा, हमारे देश में देखे जाने वाली ज्यादातर पोर्न फ़िल्में शायद इंग्लिश में होतीं है तो क्या सारे अंग्रेजी भाषी अश्लील हो जाते हैं?

बलात्कार क्यों??

 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||