रेलवे की साजिशाना लूट

 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा

अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार क़ानून जनता जनता को कोई नया अधिकार नहीं देता, अपितु सूचना पाने के अधिकार को प्रयोग करने का सही तरीका बताता है और जनसेवक (जिन्हें आम जनता सरकारी अधिकारी कहती है) के ऊपर यह जिम्मेदारी डालता है कि वह मांगी गयी जानकारी समुचित रूप से प्रदान करे|

सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को शक्ति प्रदान करता है कि वो:

  • सरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे,
  • किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले,
  • किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण करे,
  • किसी भी सरकारी कार्य के पदार्थों के नमूने ले|

सभी इकाइयां जो संविधान, या अन्य कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के अधीन बनी हैं या सभी इकाइयां जिनमें गैर सरकारी संगठन शामिल हैं जो सरकार के हों, सरकार द्वारा नियंत्रित या वित्त- पोषित किये जाते हों| एक जन सूचना अधिकारी, सूचना देने से मना उन 11 विषयों के लिए कर सकता है जो सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 8 में दिए गए हैं. इनमें विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय सूचना, देश की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों की दृष्टि से हानिकारक सूचना, विधायिका के विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाली सूचनाएं आदि. सूचना का अधिकार अधिनियम की दूसरी अनुसूची में उन 18 अभिकरणों की सूची दी गयी है जिन पर ये लागू नहीं होता| हालांकि उन्हें भी वो सूचनाएं देनी होंगी जो भ्रष्टाचार के आरोपों व मानवाधिकारों के उल्लंघन से सम्बंधित हो|

सूचना प्राप्ति के लिए हर विभाग एवं संस्था में जन सूचना अधिकारी का पद सृजित किया गया है| केंद्र सरकार के विभागों के मामलों में, 629 डाकघरों को उप जन सूचना अधिकारी बनाया गया है, अर्थात् आप इन डाकघरों में से किसी एक में जाकर सू. अ. पटल पर अपनी अर्जी व फीस जमा करा सकते हैं| वे आपको एक रसीद व आभार जारी करेंगे और यह उस डाकघर का उत्तरदायित्व है कि वो उसे उचित ज. सू. अ. के पास भेजे|

केंद्र सरकार के विभागों के लिए, सूचना प्राप्ति कि अर्जी का कोई प्रारूप नहीं है| आपको एक सादा कागज़ पर एक सामान्य अर्ज़ी की तरह ही अर्ज़ी देनी चाहिए| हालांकि कुछ राज्यों और कुछ मंत्रालयों व विभागों ने प्रारूप निर्धारित किये हैं| मैं सामान्यतः इस प्रारूप का प्रयोग करता हूँ:

१.      मेरा नाम:

२.      मेरा पता, संपर्क सूचनाएं

३.      मांगी गयी सूचना का विवरण:

  • विषय वस्तु
  • समयावधि जिससे सूचना सम्बंधित है
  • मेरे प्रश्न
  • सूचना प्राप्ति का तरीका, डाक/ इ-मेल/व्यक्तिगत

४.      क्या में गरीबी रेखा से नीचे हूँ?

५.      देय शुल्क का विवरण

 मैं सामन्यतः पोस्टल आर्डर या डिमांड ड्राफ्ट से शुल्क देता हूँ|