प्रभावहीन भारतीय विपक्ष

नाकारा – 21वीं शताब्दी के भारतीय विपक्ष के लिए यह शब्द सम्मानपूर्वक प्रयोग किया जा सकता है|

24 फरवरी 2016 का दिन संसद में भारतीय विपक्ष द्वारा दिशाहीन, प्रभावहीन, तर्कहीन, विचारहीन, विमर्शहीन, इच्छाशक्तिविहीन, सामंजस्यवादी बहस के लिए याद किया जायेगा| परिश्रम से बचने के लिए तथ्य इकट्ठे नहीं किये गए, तर्कों और तथ्यों में सामंजस्य नहीं बिठाया गया| विपक्ष प्रति – आक्रमण के डर से बहस की आड़ में बहस से ही बचता रहा| विपक्ष के नेता अपनी धारदार – ओजस्विता के अभिमानित मोह में इतना मुग्ध हुए कि उन्होंने अपने तथ्य कौशल, विचार कौशल, वाक् कौशल, नेतृत्व कौशल और राजनीतिक कौशल का परिचय देना भी उचित न समझा|

एक ऐसा समय जब सत्ता जन – विमर्श के भंवर में डोल उठी थी; अपनी जबावदेही के लिए तैयारी कर रही थी, भारतीय विपक्ष जनता को किसी भी प्रकार का नेतृत्व देने की कोशिश करने में भी नाकाम रहा|

भारत में अंतिम मजबूत, मेहनती, विचारवान विपक्ष शायद प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के समय था, जब देश में एक कमज़ोर सत्ता को मजबूत प्रधानमंत्री सम्हाल रहा था और एक प्रभावी विचारवान परिश्रमी विपक्ष भारतीय राजनीति में मजबूत पकड़ बनाये हुए था| स्वाभाविक लोकतान्त्रिक विचारात्मक मतभेद के बाद भी, विपक्ष सत्ता जबाबदेह बनाये रखने में सक्षम था|

प्रधानमंत्री बाजपेयी के समय भारत में कमजोर विपक्ष का दौर शुरू हुआ| मजबूत सत्ता और मजबूत प्रधानमंत्री के सामने विपक्ष फ़ीका लगे यह स्वाभाविक है मगर भारतीय विपक्ष ने कमज़ोर होना स्वयं चुना था| भारतीय विपक्ष उस समय पूरी तरह से व्यक्ति केन्द्रित होकर रह गया और विचार का उसमें कोई स्थान नहीं बचा| साम – दाम सत्ता सुख भारतीय विपक्ष की न सिर्फ लालसा रही विपक्ष में रहकर भी उसने अपने को सत्ता से दूर नहीं किया| निसंदेह, ऐसा करते हुए वह जनता से नहीं जुड़ पाया| सत्ता से दूरी का यह समय अध्ययन, विचार, विमर्श, जन – संपर्क, व्यापक राजनीतिक समझ आदि के लिए नहीं किया गया| विपक्ष संसद में बाजपेयी सरकार को जबाबदेही की चुनौती नहीं दे पाया| इंडिया – शाइनिंग का मतिभ्रम चुनौती – विहीन बाजपेयी सरकार को ले डूबा|

कमज़ोर बूढ़े उच्च नेतृत्व के साथ विपक्ष में आई युवा बहुल भाजपा ने वही गलतियाँ शुरू कीं जो बाजपेयी सरकार के समय में कांग्रेस कर रही थी| उन्हें न सरकार से प्रश्न करने की इच्छा थी न जबाब की उम्मीद| संसद में प्रश्नकाल मजाक के रूप में स्थापित होता गया| बहसें शोर बनकर रह गयीं| सदन से बहिर्गमन विरोध न होकर बहस न कर पाने की कमजोरी का पर्दा बन गया| कांग्रेस और भाजपा विचार, कार्य और शैली में एक दूसरे का प्रतिबिम्ब मात्र बन गए|

प्रथम यूपीए सरकार को विपक्ष ने गैर जबाबदेही प्रदान की वह दूसरे कार्यकाल में निरंकुशता में बदल गई| यह निश्चित था कि यह सरकार अपने गैर जिम्मेदार बोझ के साथ सत्ता ज्यादा दिन नहीं संभाल पायेगी| उस समय में विपक्ष के राजनीतिक शून्य को केंद्र में नरेन्द्र मोदी और राज्य में अरविन्द केजरीवाल ने भरा| विपक्ष में मजबूत केंद्रीय नेतृत्व न होना तत्कालीन भाजपा और वर्तमान में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है|

कम अध्ययन, कम विचार – विश्लेषण, अल्पविचारित त्वरित प्रतिक्रिया, क्षणिक लोकप्रियता लाभ, आदि उस समय से भारतीय विपक्ष के मूल आधार बन गए है| भारतीय विपक्ष का व्यक्तिवादी बिखराब वैचारिक गिरावट का कारण बन रहा है| भारतीय राजनीतिक दलों का यह भ्रम कि जनता भावनात्मक मुद्दों पर मूर्ख बनते रहना पसंद करती है भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक बन कर उभरी है|

यह भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का निराश समय है, जिसके गर्भ से युवा आशाजनक नेतृत्व का जन्म अवश्यंभावी है|

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बहुमत

 

हम संविधान के वैधानिक परिभाषाओं से हटकर किस प्रकार से “बहुमत” शब्द को देखते हैं?

  • क्या सदन में अधिकांश सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना?
  • क्या पाँच वर्ष तक सत्ता में बनाये रखने वाला पूर्ण बहुमत?
  • क्या पाँच वर्ष के लिए पूर्ण वैधानिक निरंकुशता देने वाला दो तिहाई बहुमत?
  • क्या सिर्फ सत्ता देने का बहुमत या सरकार के मन मुताबिक हर काम को होने देने का बहुमत?

पिछले कुछ दशक से भारतीय सदनों में विधायी कामकाज नहीं के बराबर हो रहा है| जो हो भी रहा है उसमें विचार विमर्श लगभग समाप्त हो गया है और राजनितिक आकाओं के मन मुताबिक कागज पढ़ कर काम चलाया जा रहा है| बहुत सारे लोग भारतीय राजनितिक प्रणाली को दो या तीन दलीय व्यवस्था में बदलना चाहते है| भले ही संसद में ऐसा नहीं हो पा रहा हो, परन्तु दो तथाकथित प्रमुख दलों के लोग जनसाधारण के बीच इसी प्रकार का प्रचार या दिखावा कर रहे है| उनमें सहमति है कि जो मेरा विरोध करता है उसे तेरा आदमी बताया जायेगा और तेरे विरोधी को मेरा| किसी भी तीसरे चौथे दसवें पचासवें विचार को जबरन नाकारा जा रहा है|

इस प्रकरण में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन राज्यों में यह तथाकथित प्रमुख दल कोई अस्तित्व नहीं रखते उन राज्यों के बारे में या तो बात ही नहीं की जाती या उन्हें राष्ट्रीय राजनैतिक मुख्यधारा से बाहर खड़ा कर दिया जाता है| जैसे कश्मीर, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु| कश्मीर को किसी ज़माने में रहे आतकवाद के नाम पर किनारे कर दिया जाता है तो उत्तर प्रदेश पिछड़ा मूर्ख गंवार बता कर और तमिल नाडू सांस्कृतिक भिन्नता की भेंट चढ़ जाता है||

परन्तु क्या सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से बहुआयामी भारत में यह विचार उचित हैं? क्या हमारे प्रमुख दल अपने देश के बहुत बड़े हिस्से से कट तो नहीं गए हैं? क्या बहुमत के नाम पर “अनेकता की एकता” को जाने अनजाने छिन्न भिन्न तो नहीं कर दिया जा रहा है?

देश की सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनितिक भिन्नता को परखने समंझने और उसके बारे में जागरूक होने में कोई कमी तो नहीं रह गयी है?

सराजकता का अंत

दिल्ली में पंद्रह साल की सराजकता अभी हाल में लहूलुहान हो गयी और सत्ता के राजपथ पर इसकी आनंद – सभा का आयोजन सड़कछाप भीड़ ने कर दिया| यद्यपि मरण और तर्पण अभी शेष है|

भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा के मूल में संसदीय लोकतंत्र और अनेकता के संस्कृति है| जिसमें सत्ता का प्रवाह पदबिंदु के प्रारंभ होकर शीर्ष – ध्वजा तक जाने की परिकल्पना जनमन में निहित है| परन्तु तात्कालिक विवशता के कारण सामंत – कुलीन – विशिष्ठबुद्धि वर्ग इसे अपनी सुविधा अनुरूप चलाता आ रहा है|

कुलीनलोकतंत्र में चुनावी घोषणापत्र और नामधारी योजनायें खजूर के पेड़ से लटकी और टपकती प्रतीत होतीं हैं| यहाँ समाज के निम्न पायदान का व्यक्ति परिपाटी की अग्नि और कुलीनता की कसौटी के बाद लालकिले की प्राचीर छूने की बात सोच सकता है| यह वही पगडण्डी है जिसपर मोदी जी चल रहे है| इसमें सत्ता परिवर्तन तो है मगर व्यवस्था परिवर्तन…

नहीं मित्र! व्यवस्था परिवर्तन के कई अवसर इस मार्ग पर आये और गुपचुप चले गए| हाँ; इस रेशमी – टाट पर कुछ सूती पैबंद अवश्य लगे|

कुलीनलोकतंत्र की विवशता रही कि समय के साथ इसमें संसदीयता के स्थान पर अध्यक्षता का प्रत्यारोपण हो गया| संसदीय विमर्श हवा हो गए| संसद में सचेतक वैचारिक संचेतना पर हावी हो गए| संसदीय मार्गदर्शन क्षेत्र की जनता के मनमंथन के स्थान पर कुलीन दिवास्वप्नों से अवतरित होने लगे| क्या मुझे युवा- गाँधी, अधेड़ – मोदी और उनके सिपहसालारों का उदहारण देने की आवश्यकता है?

विपक्ष का काम सदन में अन्दर शोर – सन्नाटा फ़ैलाने का रह गया है| शासन को इस चुनाव से उस चुनाव तक की निरंकुशता उपहार में मिल रही है| सफलता –  असफलता देश और संसद की सांझी परिणति न रहकर सत्ताधारी कुल विशेष कार्यव्यवहार बताई जाने लगी है| विपक्ष का यही अवकाश दिल्ली में अनगढ़ता के लिए अवसर बन गया है|

पिछले दशकों में विचार के स्थान पर व्यक्ति के नाम पर चुनाव लड़ें लादे जा रहे है| भारतीय लोकतंत्र के कुलीनतंत्र को अब निर्वाचित निरंकुशता में बदला जा रहा है| यह चाहे गाँधी के नाम पर हो रहा हो या मोदी के नाम पर|

मुझे यह तथ्य भी आशंकित करता है कि “अनगढ़ अराजकता” भी एक व्यक्ति के नाम पर सिमटती और विमर्श बिछुड़ता दिखाई देने लगता है| मुझे कुछ आशा बंधती है जब यह व्यक्ति मात्र एक प्रतीक बनकर जनपथ पर गण – गणेश के बीच ठण्ड में ठिठुरता है|

संसद और संसदीय लोकतंत्र के अन्दर पसरी रहने वाली अव्यवस्था यदि सराजकता है, तो मुझे वर्तमान अराजकता से पंचायती लोकतंत्र की आशा है|

भारत की अबला नारी

 

भारत का समाज और क़ानून मात्र दो प्रकार की अबला नारियों की परिकल्पना करता है:

१.      नवविवाहिता स्त्री, विवाह के पहले ३-४ वर्ष से लेकर सात वर्ष तक (नवविवाहित अबला); और

२.      भारतीय परिधान पहनने और अपने पिता या भाई की ऊँगली पकड़ कर चलने वाली २४ वर्ष की आयु अविवाहिता स्त्री (अविवाहित अबला)|

जो भी स्त्री इस दोनों निमयों से बाहर है वह प्रायः समाज और कानून द्वारा कुलटा स्त्री मानीं जाती है| (ध्यान दें, भारत में सबला स्त्री का कोई प्रावधान नहीं है|)

और जब तक किसी भी स्त्री को कुलटा घोषित नहीं किया जाता उसे भाभीजी और माताजी जैसे शब्दों से पुकारा जा सकता है|
(पुनः ध्यान दें, बहनजी शब्द का प्रयोग उचित नहीं माना जाता है, अविवाहित स्त्रियों के लिए भी भाभीजी शब्द का धड़ल्ले प्रयोग किया जा सकता है|)

आईये; विस्तृत अध्ययन करते हैं:

नवविवाहित अबला:

नवविवाहिता अबला, सामाजिक समर्थन प्राप्त कानूनी अबला है, जिसे होने वाले किसी भी कष्ट के भारतीय समाज में आराजकता की उत्पत्ति होती है| इस श्रेणी में आने के लिए किसी भी स्त्री को नवविवाहित होना ही एक मात्र शर्त नहीं है| प्रेम- विवाह के नवविवाहित हुईं स्त्रियाँ, सामान्य नियम के अनुसार इस श्रेणी से बाहर ही रखीं जातीं हैं| गरीब और निम्न जाति की स्त्रियाँ भी, राजनितिक दबाब  का अभाव होने पर इस श्रेणी से बाहर मानीं जा सकतीं हैं| जिन स्त्रियों का विवाह, ३५ वर्ष की आयु के बाद हुआ हो, उन्हें इस श्रेणी में काफी संशय के साथ रखा जाता हैं|

सामाजिक नियम के अनुसार इस श्रेणी में स्त्री विवाह के बाद के पहले दो – चार वर्ष ही रहती है, परन्तु कानून के आधार पर यह अवधि विवाह के बाद के पहले सात वर्ष रहती है| उस समय सीमा के बाद कोई भी स्त्री अबला नहीं रह जाती|

अपवाद स्वरुप, अश्रुवती स्त्रियाँ अपने अबला काल को अधिक समय तक बना कर रख सकतीं हैं| सुन्दर, आकर्षक, समझदार, मिलनसार (अति – मिलनसार नहीं), होना उन अश्रुवती स्त्रियों के लिए अतिरिक्त लाभदायक हो सकता हैं|

हमारे भारतीय समाज और कानून में नन्द, सास, जेठानी, पड़ोसन और किसी भी अन्य स्त्री जिसका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ससुराल या पति से हो, नवविवाहिता अबला के लिए प्राण-घातक मानी जाती है|

दहेज़, सती, आत्महत्या, गर्भपात और घरेलू हिंसा आदि के लिए पति को दोषी माना जाए या न माना जाए, इन में से किसी न किसी स्त्री को ढूंढ कर अवश्य ही दोषी मान लिया जाता है|

इस प्रकार की अबला को पति नाम की चिड़िया और ससुराल नाम के चिड़ियाघर से सुरक्षा की विशेष आवश्कयता हमारे कानून में हमेशा से महसूस की है और आज भी कर रहा है| नए तलाक कानून इस  श्रंखला में एक और कड़ी हैं और हम ऐसी ही अनेकाने क्रांतिकारी कड़ियों की सम्भावना से रोमांचित हो उठते हैं| नव विवाहिता अबला की सुरक्षा के लिए कई प्रकार के कानून बनाये गए हैं, उनके उदहारण इस प्रकार से हैं[i]:

  1. The Dowry Prohibition Act, 1961 (28 of 1961) (Amended in 1986)
  2. The Commission of Sati (Prevention) Act, 1987 (3 of 1988)
  3. Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005
    1. The Indian Christian Marriage Act, 1872 (15 of 1872)
    2. The Married Women’s Property Act, 1874 (3 of 1874)
    3. The Guardians and Wards Act,1890
    4. The Child Marriage Restraint Act, 1929 (19 of 1929)
    5. The Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
    6. The Special Marriage Act, 1954
    7. The Protection of Civil Rights Act 1955 
    8. The Hindu Marriage Act, 1955 (28 of 1989)
    9. The Hindu Adoptions & Maintenance Act, 1956
    10. The Hindu Minority & Guardianship Act, 1956
    11. The Hindu Succession Act, 1956
    12. The Foreign Marriage Act, 1969 (33 of 1969)
    13. The Indian Divorce Act, 1969 (4 of 1969)
    14. The Muslim women Protection of Rights on Dowry Act 1986
    15. National Commission for Women Act, 1990 (20 of 1990)

यदि इन कानूनों के बारे में विस्तार से चर्चा बाद में कभी करेंगे|

अभी पहले अविवाहित अबला के बारे में बात करते हैं|

 

अविवाहित अबला:

यह प्रायः सामाजिक किस्म की अबला है, जिसके अबला होने के बारे में माना जाता है कि कानूनी विद्वानों में केवल किताबी सहमति है| अविवाहित अबला, वह अविवाहित स्त्री है जो गैर – भारतीय परिधान न पहनती हो, अपने पारिवारिक स्व – पुरुष जन ( और कभी कभी माता बहनों) के अतिरक्त किसी अन्य प्राणी के साथ न पाई जाती हो, शरीर से सर्वांग – स्वस्थ होने के बाद भी गूंगी, बहरी और अंधी हो और किसी भी पुरुष के द्वारा उसके अबला होने से अधिकारिक रूप से इनकार न किया गया हो|

सामान्यतः स्थानीय नियमों के अनुसार २० से २४ वर्ष की आयु पार करने के बाद किसी भी स्त्री को इस श्रेणी से निकला हुआ मान लिया जाता है|

इस श्रेणी में बने रहना हर स्त्री के लिए एक चुनौती है और विवाह की प्रथम शर्त है| अबलाओं के हितों की रक्षा के लिए एक रोजगार परक राष्ट्रीय आयोग भी है जिसका नाम आपको पता है|

 

अन्य विचार बिन्दु:

हर स्त्री को अबला श्रेणी के निकाले जाने का भय हमेशा बना रहता है| पहले किसी समय में हर स्त्री को अबला माना जाता था परन्तु अब ऐसा नहीं है| आज इस बाबत, कई वैधानिक सिद्धांत हैं|

पहला वैधानिक सिद्धांत है; “गरीब की लुगाई, गाँव की भौजाई|” इस सिद्धांत में गरीब का अर्थ किसी भी रूप में निम्न स्तरीय परिवार के होना है और लुगाई का अर्थ गरीब घर की किसी भी स्त्री से लिया जाता है| निम्नता को धर्म, जाति, क्षेत्र, आय, सम्पन्नता, राजनितिक अलोकप्रियता और भीड़ इक्कठा न कर पाने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है|

दूसरा वैधानिक सिद्धांत है, “भले घर की लड़कियां मूँह नहीं खोलतीं”| यदि कोई स्त्री अपने साथ हुई किसी भी छेड़छाड़, या यौन शोषण की शिकायत करती है तो उसे समाज अबला के दर्जे से बाहर कर देता है| यदि वह फिर भी कोई कोशिश करती है तो हमारा न्यायतंत्र ( न्यायलय और समाचार माध्यम दोनों ही) उसके साथ इतना विचार – विमर्श करता है कि उसे अपने सही श्रेणी का ज्ञान हो जाता है, भले ही यह ज्ञान मरणोपरांत ही क्यों न हो| इस सिद्धांत का एक विपरीत सिद्धांत भी है, “अति भले और बलशाली घरों की लडकियां जब भी मूँह खोलती है, सत्य और उचित ही बोलतीं हैं” परंतु इस सिद्धांत का प्रयोग अपवाद स्वरूप ही हो सकता है|

अंतिम निष्कर्ष:

एक स्त्री के अबला श्रेणी से बाहर कर दिए जाने से उसके लिए हर प्रकार की सामाजिक, वैधानिक और न्यायायिक सुरक्षा का अंत हो जाता है| परन्तु, अबला के साथ हल्की की भी ऊँच – नीच करने वाले का सात पुश्त, माँ – बहन, हड्डी – पसली और कुत्ते की जिन्दगी और मौत वाला हाल किया जा सकता है|

कुल मिला कर मौत के कूएँ में सांप – छछूंदर का खेल है और मदारी गोल महल में बीन बजा रहे हैं|

मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)

 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!

गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४

क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???

 

 

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

क्या कहा जाए? जो कहना है ज़रा जल्दी कहना है, जल्दी जल्दी कहना है| बाद में क्या बोलेंगे जब होगा बंद मुँह, कटी जुबान|

पहले *** जनसंघी लोग लठ्ठ लेकर खड़े थे, उनकी सी न बोलो तो बोलने नहीं देते थे और खुद बहुत खूबी के साथ खूब बोलते थे| अब ये *** कांग्रेसी भी आ गए है मैदान में| नहीं नहीं दिशा-मैदान के लिए मैदान में नहीं आये मगर कर वही सब रहे है| *** टोपी वाले भी आधे भारत में रायफल लिए खड़े है| माफ कीजियेगा! इससे ज्यादा हम बोलेंगे नहीं वरना वो हमारे लिए बोल देंगे|

इन सब ** ** लोंगो की क्या कहे; पहले ये अपने निचले ** से ही *** फैलाते थे, मगर अब तो इनका मुखारविंद भी ** फैलाता है| कुछ *** लोंगो को महारत ही हासिल है उनके नाम *** **** **** **** *** अदि है| इन *** को अपने ** में कन्नौज की इत्र की गंध आती है और हमारे गुलाब जल में इन्हें अपने ** से भी अधिक बदबू आती है|

ये *** लोग खुद तो बहुत लिखते-बोलते है और इनता लिखते-बोलते है कि बस रामचरित वाले गोसाईं जी क्या और टीवी वाले गोसाईं जी भी क्या? मगर कुल मिला कर इन *** को कोई भी काम कि बात नहीं बोलनी| बाबासाहेब आंबेडकर इन ** को बोलने चालने के लिए संसद की पूरा आलिशान इमारत दे गए है मगर ये ** वहाँ पर अपनी ***** चिल्ल-पों करते है और कोई बात नहीं करते| वहाँ पर ये बस एक दूसरे की तरफ ऊँगली करते है और एक दूसरे * *** करते है| ये दोनों तीनों *** का अप्राकृतिक *** है जो खुले आम मेल मिलाप के साथ चल रहा है| अगर संसद चलेगी तो कुछ तो बोला जाएगा, बोलेंगे तो कुछ तो सच उगलेगा, सच उगलेगा तो बबाल मच जायेगा और इनके ** ** हो जायेगी| देश इनकी * *** एक कर देगा|

पहले तो जनता के हाथ बंधे थे और वो बूढी हो चली बाल विधवा की तरह सब कुछ सह रही थी| इन् ****** ने आजादी से लेकर आज तक जनता के साथ इनता ****** किया कि भारतीय दंड संहिता कि धारा 376  में इनके दी जा सकने वाली सजा का प्रावधान ही नहीं मिल सका| आज जब जनता कुछ बोलने की स्तिथि में आई तो ये बिलबिला गए है| पहले एक दो अखबारों में जनता की चिठ्ठी पत्री छप जाती थी और अगले दिन रद्दी हो जाती थी| अब कुछ लोग पढ़ लिख गए है और कुछ नए हथियार आ गए है| ट्विट्टर, फ़ेसबुक, ब्लॉग, एस एम् एस, पता नहीं क्या क्या| लोग हर तरह से अपना गुस्सा उतार है| अब लोगों को पता है कि हमारी बन्दूक इनकी तोप से कमजोर है, और लोग इन ** का ** ** नहीं ** सकते|

सीमान्त प्रदेश में कुछ बोला आये तो आतंकवादी; काले क़ानून उनके * *** करने के लिए|
आदि वासी कुछ बोलते है तो माओवादी; मार दो ** को|
जब शहरी युवा कुछ बोलें तो जेल दो *** और उनपर विदेशी हाथो में खेलने का इल्जाम लगा दो|
ये देश को लूट लें तो देश भक्त; आवाज उठाने वाले युवा पाकिस्तानी ***|
अन्ना को जेल और राजा को महल – दुमहले|

अब कलम की ताकत का नया पर्याय है इन्टरनेट| देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर| हालात ये है कि घाव भी सीधे इन *** के **** पर हो रहा है और इनकी *** ** है| अब बिलबिलाई जनता ने नए साधनों का इस्तेमाल कर कर हल्ला मचाना शुरू किया तो इनको वहाँ पर सारी गंद दिखाई दे गयी| असलियत में इनकी **** गई है|मानते है कि कई बार लोग गुस्सा में इन *** की थोड़ा ज्यादा ही *** देते है मगर गुस्सा में किसको होश| मैं मानता हूँ कि लोंगो को गुस्सा शांत रखना चिहिये, मगर क्या करें पिछले पचास सालो में इन ** ने कुछ ढंग का पढ़ने लिखने ही नहीं दिया तो तमीज कहा से आती|

पहले इन *** के पाकिस्तानी भैया लोगो ने एक लंबी फेहरिश्त निकाल दी काफी शब्दों की| अगर मोबाइल पर उनमे से कुछ भी लिखा तो बस गए आप काम से| आपके चरित्र का पूरा चित्रण कर दिया जायेगा| हिंदी – उर्दू वाले *** *** * आप जानकारी बढ़ने की लिए पढ़े और पढाए http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-URDU-tsk-tsk-PTA-why-oh-why.-courtesy-of-shobz.pdf और अंग्रेज के *** पढ़े: http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-ENGLISH-made-me-LOL-courtesy-of-shobz.pdf | अगर आपको न अर्थ समझ आये http://www.urbandictionary.com/ पर सबके मायने दिए है, समझे और गलती न दुहरायें| हमें तो लगता है कि इन शब्दों पर सभी दक्षिण एशियाई सरकार लोग सहमत है इसलिए किसी भी जन मोर्चा पर इन शब्दों का प्रयोग कतई न करें|

हाँ! अब हमारे *** साहब को लगा कुछ तो बड़ा किया जाय, आखिर उनका *** किसी **** से छोटा थोड़े ही है| अब देखिये, ये विलायत के पढ़े लिखे *** लोग, अपने दफ्तर में विलायती बाबू लोग को बुला लिया और घर कि औरत का फोटो दिखा कर स्यापा कर डाला, बोला मेरे लोग आपकी वेबसाइट और फोरम पर हमारी *** की *** *** कर रहे है और उसका ***, उनका ***, उसकी *** कर रहे है| देखो मेरी तो *** कर कर रख दी है| इन *** सड़क छाप **** की जीभ काट दो, इनकी *** कर दो| इन ***** की पहचान मिटा दो अपने प्लेटफोर्म, फोरम, वेबसाइट पर से|

पहले ही आम जनता परेशान है, अपनी परशानी और भड़ास कैसे निकाले| बन्दूक उठाए या इस दुनिया से अपना संदूक उठाये| अब कलम पर भी जनता का जोर नहीं रहा| अगर कोई गलत बात हो रही है तो उस गलत बात करने वाले को पकड़ो न  सरकार, सबकी ***** क्यों करते हो; ****| अगर आपकी आदरणीय ***** की मानहानि होती है तो अदालत का दरवाजा देखो न, मेरे पीछे ******* कर क्यों पड़े हो| मानते है कि मुक़दमे में “मान हानि” से पहले “मान” को साबित करना पड़ेगा, तो करो न| अब आप विलायत में अपनी ****** *** क़ानून की उपाधि हासिल की है (अगर खरीदी हो तो माफ करें, मुझे हो सकता है की सही जानकारी न हो), आप कोई ***** थोड़े है|

वैसे भी आप क़ानून के *** है, जो चाहे वो क़ानून पैदा कर दें| आप अपने सुचना तकनीकी क़ानून को देख लीजिए| नियम उपनियम बनाए है, उन्हें देख लीजिए| मगर साहब-ए- आलम! आप इस मुल्क के सारे फोन टेप करते है, तो क्या आपको आतंकवादी, तस्कर और अपने और किसी भाई बंधू की कोई खास खबर मिल पाई? आप अपनी सरकार ठीक से चला पा रहे है, जो इस इंटरनेट को ठीक से चला लेंगे? क्या आप इस देश में रोज रोज जहर खा कर मर रहे किसान की कोई सुध बुध ले पा रहे है, जो इस देश के सभी इन्टरनेट उपयोग की निगरानी कर पायेंगे? आपकी सीमा को पार कर आतंकवादी इसे आ रहे है जैसे गली का कोई खुला सांड, क्या आप उन्हें रोक पा रहे है?

तो भैया! अभी तो हाथ जोड़ कर समझा रहे है कि ढंग से देश चला तो, फसबूक, ट्विट्टर को पढकर अपने काम के बारे में हो रहे असंतोष को समझो और उसे सुधारो| मैया की आरती से वोट नहीं मिलेगा, न ही भैया की पाँय लागी करने से|

भगवान की लाठी और जनता के वोट में आवाज नहीं होती मगर चोट बहुत लगती है| अपने सीधे और उलटे भाई लोग को भी बता देना|

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|