समर्पण और सतीत्व

भारतीय पुरुष सत्ता स्त्री को समर्पण का प्रतीक ही नहीं समर्पण को उसका परम पवन कर्तव्य मानती आई है| स्त्री के समर्पण का मुहावरा इस कदर पुरुष सत्ता के सर पर सवार है कि हमारे बलात्कारी भाई भी यह चाहते हैं उनकी शिकार पवन पावन स्त्री उसके सामने थोड़े बहुत विरोध के बाद अपने सतीत्व का समर्पण कर दे|

समर्पण का यह मुहावरा ब्रिटिश द्वारा थोपे गए भारतीय कानून में भी शामिल है जहाँ यह माना जाता है कि स्त्री को हर समय पति के सामने समर्पण किये रहना चाहिए| इस क़ानून के अनुसार पति की (कामेच्छा ही नहीं) वासना की पूर्ति को पत्नी द्वारा अपना ईश्वरीय कर्तव्य समझना चाहिए|

क्या यौन सम्बन्ध भारतीय परंपरा के अनुसार विवाह की आवश्यक शर्त या कर्तव्य हैं? यदि किसी भी धर्म की बात करें तो प्रजनन के लिए बनाये गए यौन संबंधों के अतिरिक्त अन्य सभी यौन सम्बन्ध छाए वो पत्नी के साथ बने हो या वैश्या के, पाप हैं| ऐसे में पत्नी का “यौन समर्पण” धर्म/ ईश्वरीय आदेश कैसे हो सकता है? बल्कि प्रजनन – इतर सभी संबंधों को रोकना पति – पत्नी का प्रथम कर्म होना चाहिए था|

प्रसंगवश कहता चलूँ; भारतीय परंपरा के अनुसार, विवाह यौन सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध और  मानसिक सम्बन्ध नहीं है अपितु जन्म जन्मान्तर का आत्मिक सम्बन्ध है| तो इसमें यौन समर्पण की बाध्यता का प्रश्न कहाँ से आ सकता है? यौन शुचिता और ब्रह्मचर्य के प्रश्न भी मात्र आत्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए ही आते हैं|

परन्तु यौन समर्पण की बाध्यता इस तरह भारतीय स्त्री मानस पर भी इस तरह से अंकित है कि उसे यौन क्रिया में एक समर्पित निष्क्रियता का प्रदर्शन करना होता है| यदि आप बात करें तो पाएंगे कि बहुत से पुरुष निजी क्षणों में स्त्री की सक्रियता, समर्पण के अनुरूप को सही नहीं मानते| उन्हें लगता है कि स्त्री समर्पण करने की जगह उनको भोगने का प्रयास कर रही है| समर्पण की यह मूर्खतापूर्ण इच्छा उनकी पुरुषसत्ता के अहम् को तो शांत कर देती है परन्तु वास्तव में उनके पुरुष की तृप्ति नहीं हो पाती|

यह पुरुष, पुरुषसत्ता के अहम् के साथ घर की “सभ्य सुशील समर्पित घरेलू” स्त्री को छोड़ कर बाहर की “फुलझड़ी – पटाखा” स्त्री को दबोचने में लग जाते हैं| जब भी यह “फुलझड़ी – पटाखा” स्त्री समर्पण नहीं करती तो पुरुषसत्ता बलात्कार के रूप में अपना घिनोना रूप दिखाती है| क्या यह कारण नहीं है कि सभ्य समर्पित पत्नियों के इस देश को सारा विश्व असभ्य बलात्कारियों का देश समझता हैं? क्यों काम–सूत्र का देश बलात्कारी-पुत्र का देश हो गया है?

क्या तुम पुरुष विश्ममित्र??

परिहास हास, विनय अनुनय,
गायन वादन, नृत्य अभिनय|

हे तपस्वी तेजोमय व्यवहारी,
मेनका बारम्बार हार कर हारी||१||

किया न तुमने सम्मान सत्कार,
दिया न नासिका कर्तन उपहार|

क्रोध काम संसार लोभ मोह,
किस किस का किया विछोह||२||

तुच्छ नीच स्त्री अधर्म,

देव लोक का वैश्या कर्म|

इन्द्र दूती सर्वनाश तुम्हारी,
विश्वामित्र इन्द्र[i] पर भारी||३||

स्त्री पड़ी तपस्या पर भारी,
मान श्रम परिश्रम सब संहारी|

छोड़ तपस्या तप पदवी भारी,
विश्वामित्र मुनि बने संसारी||४||

मेनका विश्वामित्र

मेनका विश्वामित्र

यह स्त्री भी क्या प्रेम पात्र,
ताडन तोडन, मरण वज्रपात|

प्रेमपाश में पड़े पुरुष मात्र,
कर न सके तुम घात आघात||५||

कपट कूट, धोखा षड़यंत्र,
देवलोक दिव्य यन्त्र मन्त्र|

इन्द्राचार छोड़ भूल मेनका,
भूली हाल मन का तन का||६||

नव जीवन ने ली अंगड़ाई,
पुत्री शकुंतला घर में आई|

कटु जीवन की कटु सच्चाई,
माता पिता का संग न पाई||७||

क्या जीवन सन्देश तुम्हारा,
पुरुषीय अहंकार सब हारा|

स्त्री वैश्या भोग निमित्त,
परन्तु लगाया तुमने चित्त||८||

काम पीड़ा का व्याधि अतिरोग,
विषद बल वासना बलात्कार|

विश्वास श्रृद्धा स्त्री जीवन सार,
आमोद प्रमोद आहार विहार||९||

कर न सके एक बलात्कार,
तुमने चुना कौन सा चित्र?
नव भारत का प्रश्न एक,
क्या तुम पुरुष विश्ममित्र||१०||

(कुछ दिन पहले मैंने पौरुष का वीर्यपात लेख लिखा था, आज लोग रावण ही हो जांये तो भी बहुत कुछ सुधर सकता है|  लोगों ने रावण का चरित्र हनन तो कर लिया पर आशय नहीं समझा| अभी हाल में बलात्कार क्यों में इन्द्र का जिक्र कुछ लोगों को क्रुद्ध कर गया, मगर वो तथ्य मैंने पैदा नहीं किया; बड़े बड़े ग्रंथों में लिखा है| देश भर में बहुत सारा मंथन चिंतन हो रहा हैं और मैं भी अलग नहीं हो पाता हूँ| मैंने ब्रह्मचर्य का मुद्दा कई बार उठाया हैं, ब्रह्मचर्य का अर्थ पौरुषहीन या प्रेमहीन हो जाना नहीं हैं| जिस देश काल में लोग प्रेम, कामुक प्रेम, प्रेम वासना और बलात्कार में अंतर नहीं कर पा रहे हों, वहाँ सिर खपाना कहाँ तक उचित है?)

रेखाचित्र http://vintagesketches.blogspot.in/2009/09/menaka-vishwamitra.html से लिया गया है|


[i]  सामान्यतः इन्द्र का तात्पर्य देवराज इन्द्र से ही है परन्तु शरीर की समस्त इन्द्रियों से स्वामी मन अथवा हृदय को भी इन्द्र कहा गया हैं| यहाँ पर दोनों अर्थ उचित हैं परन्तु मेरा इस स्थान पर इन्द्र शब्द का प्रयोग मन के लिए है| प्रसंगवश, बता दूँ कि कुछ लोग कामेन्द्रिय को भी इन्द्र के रूप में निरुपित करते हैं|