ठोड़ी चढ़ा नक़ाब

विश्वबंदी ५ मई २०२० – ठोड़ी चढ़ा नक़ाब

कौन डरा है करोना से? लगता तो नहीं कोई भारतीय करोना से डरता है| बाजार में निकल जाए साठ प्रतिशत से अधिक लोग करोना से कम चालान से अधिक डरते हैं| चालान से डरने वाले इन लोगों को लगता है कि बस ठोड़ी पर नकाब चढाने मात्र से ये बच जायेंगे| अगर पुलिस वाला कह दे कि मैं तुम्हारा चालन नहीं काटूँगा क्योंकि दो चार दिन में यमराज तुम्हारा चालन काटेंगे तो यह पुलिस वाले को ठीक से अपना काम न करने का दोष देने लगेंगे| जैसे इन का खुद के प्रति कोई कर्त्तव्य न हो|

तबलीगी जमात वाले अल्लाह की मर्जी का तर्क दे रहे थे आज हर कोई दे रहा है| हर कोई पूछ रहा है कि क्या घर पर बैठे रहें| कोई यह नहीं समझना चाहता कि घर में रहने और घर से काम करने की सुविधा उठाना जरूरी है| जब तक हम काम करने की आदत नहीं बदलेंगें कोई फ़ायदा नहीं होगा| लेकिन सबसे बड़ी बात है कि हम तो छोटी छोटी चीजें नहीं बदलना चाह रहे हैं| जैसे ठीक से नक़ाब पहनने की आदत|

नक़ाब केवल करोना का बचाव नहीं है| यह बेहद आम बीमारी खाँसी जुकाम से लेकर करोना तक से बचाता है| नक़ाब हमें सैंकड़ों प्रकार के प्रदूषण से बचाता है| मुझे चिकित्सक ने बचपन में धूल से बचने के लिए नाक पर रूमाल रखकर चलने के लिए कहा था| इसके बाद  करीब तीन साल पहले मुझे प्रदूषण से बचने के लिए मास्क यानि नक़ाब लगाने के लिए बोला गया| कुल मिला कर नक़ाब के बहुत से लाभ है|

मैं यह नहीं कहता कि हमें हर समय नक़ाब नाक पर चढ़ाए रखना चाहिए| परन्तु कम से कम जब भी चढ़ाएं तो ठीक से चढ़ाए| पुलिस वाले के लिए लगाएं न लगाए पर ध्यान रखे इसकी आवश्यकता आपको और हमें खुद है|

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सुरा

विश्वबंदी २९ मई – सुरा 

सोमरस यानि शराब यानि अल्कोहल यानि आसव को अधिकतर एशियाई लोग गंभीरता से नहीं देते| हम एशियाई तो खैर किसी बात पर गंभीर नहीं हैं, हमें लगता है कि बस शांति के नशे में जिन्दगी बिताओ और यमराज के घर जाओ या किसी क़ब्र में लम्बा वाला आराम करो| गंभीरता तो सुरा सेवन से ही आती है| कभी ईमानदारी से लिखा जाए तो यूरोप के विकास में सुरा के योगदान को नकारा नहीं जा सकेगा| प्राचीन भारत के स्वर्णयुग में भी सुरा का महत्व दृष्टिगोचर होता है| अम्बेडकर जी ने रामराज्य की सफलता के पीछे सुरा के महत्त्व को पहचाना था पर विस्तार से उन्हें चर्चा नहीं करने दी गई| सुरा-विरोधियों को लगता है कि सुरा सेवन की बात एक गलत आरोप है जबकि यह तो वास्तव में गुणवत्ता है|

जिस प्रकार से सुरा आम मानव को आपस में जोड़ती है उसी प्रकार सुरा-विरोध धार्मिक कट्टरपंथी समुदायों को जोड़ता है – हिटलर से लेकर गाँधी तक सभी कट्टरपंथी मनुष्य, मुस्लिम से लेकर वैष्णव से लेकर जैन तक सभी कट्टरपंथी पंथ सुरा विरोध से जुड़े हुए है| कुल मिलाकर सभी असुर समुदायों में सुरा के प्रति घृणा का भाव रहता है| भारत में भी इसके प्रति अच्छी भावना का न होना लम्बे कट्टरपंथी दुष्प्रचार का परिणाम है| भारत के कट्टर पूंजीवादी गुजरात और कट्टर श्रमवादी बिहार में सुरा पर प्रतिबन्ध है|

करोनाकाल न होता तो मैं भी सुराविरोध के दुष्प्रचार में फंसा रहता और इसके आर्थिक-सामाजिक-शारीरिक-धार्मिक-आध्यात्मिक महत्त्व को नहीं पहचान पाता| मुझे लगता है कि मैंने अमरत्व के मूल को नहीं पहचाना| जल्दी ही मैं भारतीय सुरापंथ के प्रमुख ग्रन्थ मधुशाला का पाठ-मनन-चिंतन करूंगा|

करोनाकाल में सुरा के बारे में जो ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ – इस प्रकार है;

  • सुरा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल स्रोत व् संरक्षक है|
  • सुरा सेवन से कई कठिन विषाणु खासकर करोना दम तोड़ता है|
  • शरीर को साफ़ रखने के लिए विशिष्ठ प्रकार सुरा का शरीर पर छिडकाव और मर्दन करना होता है|
  • शैव व् शाक्त पूजा-हवन में सुरा का विशेष महत्त्व और धार्मिक लाभ है|
  • ध्यान- साधना से पहले योगीजन यदि अल्पमात्रा में सुरा सेवन करें तो ध्यान- साधना सरलता व् तरलता से संपन्न होती है|
  • काम साधना के लिए भी योग साधना जिंतनी अल्पमात्रा में सुरा सेवन करने की व्यवस्था मान्य है|
  • दुर्जन सुरा का अतिसेवन करकर अपनी योगसाधन और कामसाधना को नष्ट कर लेते हैं और समाज में सुरा विरोध का अंधआन्दोलन खड़ा करते हैं|
  • अति सदा वर्जनीय हैं| इस आलेख पर भी अतिगंभीर न हों|

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घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

विश्व-बंदी २8 मई – घटते वेतन की अर्थ-व्यवस्था

जब भी आर्थिक चुनौती सामने आती है तो सामान्य मानवीय स्वाभाव से यह अपेक्षा की जाती है कि खर्च में कटौती करे| आप अपनी चादर के अधिक पैर नहीं फैला सकते – भले ही आप कितना भी उधार लें या अपना दिवालिया पिटवा लें|

परन्तु सरकार के लिए यह स्तिथि इतनी सरल नहीं होती| उनकी जबाबदेही बहुत सी कठिन गणनाओं और निर्णय से उन्हें पीछे खींचती है| न सिर्फ़ भारत सरकार बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की गई घोषणाएं इस प्रकार के सामान्यीकृत गणित से प्रेरित हैं| बाजार आधारित वर्तमान अर्थव्यवस्था मूलतः खर्च करने की प्रवृत्ति और क्षमता पर आधारित है| खर्च न हो तो अर्थ व्यवस्था नहीं बचेगी| सामान्य घरों और विराट कंपनियों की अर्थ व्यवस्था को आप खर्च कम कर कर बचा सकते हैं परन्तु सरकार खर्च कम कर कर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बचा रही हैं या डुबा रही है यह सरल प्रश्न नहीं है|

इसलिए मैं वेतन घटाने के प्रश्न पर आशंकित हूँ| सरकार द्वारा वेतन घटाने से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है| खासकर जब आप छोटे और मझौले उद्योगों और दैनिक कामगारों को रोजगार देना चाहते हों|

  • वेतन घटाने सेवेतनभोगी के आयकर योग्य आय में कमी आती है और प्रत्यक्ष कर की कम वसूली होती है|
  • सामान्य वेतनभोगी को अपने खर्च कम करने होते हैं| वह ऐसे खर्च सबसे पहले कम करेगा जिनके लिए घर में विकल्प मौजूद हैं – जूता पोलिश, प्रेसवाला, धोबी, सफाईवाला, सहायक दर्जी, कपड़ों की मरम्मत, फल, गैर मौसमी सब्जियाँ, प्रोटीन भोजन, बेकरी और बाजार के अन्य मिठाई-पकवान, घर की बहुत से गैर जरूरी मरम्मत, छोटे बच्चों की शैक्षिक सहायता, अखबार, पत्रिकाएं, गैर विद्यालय पुस्तकें, पर्यटन, वैद्य, हकीम, चिकित्सक, डिजायनर कपडे आदि बहुत लम्बी सूची हो सकती है| भले ही इनमें से अधिकतर वस्तु और सेवा कर के दायरे से बाहर रहेंगे परन्तु अर्थव्यवस्था में इस सब की गणना होती है|
  • जब इन सब लोगों और उद्योगों को इस प्रकार की समस्या आएगी तो इन सब के सेवा-प्रदाता और सामान विक्रेता (suppliers) आदि के व्यवसाय भी प्रभावित होंगे|
  • यह सभी लोग मिलकर बाजार बनाते हैं और इनके डूबने से बाजार डूबता है|
  • मेरा मोटा अनुमान, बिना किसी आँकड़ेबाजी, यह है कि अगर सरकार वेतन में ३०% प्रतिशत कटौती करती है तो निजी उद्यम भी इसी प्रकार की कटौती के लिए प्रेरित होंगे और यह कटौती अपने अंतिम परिणाम के रूप में अर्थव्यवस्था में ३० % तक की कमी कर देगी|
  • पुराने समय में राजे महराजे इसलिए अकाल आदि के समय में परोपकार के लिए बड़ी घोषणा की जगह बड़ी इमारत आदि की घोषणा करते थे – लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा हो या राजस्थान और गुजरात को बड़ी बड़ी बावड़ियां सभी सरकारी सहायता के उचित उदाहरण है| वर्तमान में मनरेगा भी इसी प्रकार की योजना है|

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पलायन हेतु दबाब

विश्व-बंदी २७ मई – पलायन हेतु दबाब

मध्यवर्ग के पूर्वाग्रह सदा ही चिंतित करने वाले रहे हैं परन्तु करोना काल में यह अपने वीभत्स रूप में सामने आया है| गरीब तबके के तो मध्यवर्ग का वर्गभेद पहले से जगजाहिर रहा ही था परन्तु इस बार यह अपने खुद के लिए समस्या खड़ी करता रहा है| चिकित्सकों और चिकित्साकर्मीयों के साथ दुर्व्यवहार के समाचार आये दिन देश भर से सामने आए| इसके अतिरिक्त पुलिसवालों, घरेलू कामवालियों, आदि को भी इसका सामना करना पड़ा| परन्तु वर्ग संघर्ष का सबसे दुःखद पहलू एक बार फिर से निम्नवर्ग को झेलना पड़ा| मजदूरों का पलायन मुख्यतः इसी वर्ग संघर्ष और कई प्रकार के पूर्वाग्रह का परिणाम है|

कई दिन तक मजदूरों के पलायन के बारे में अच्छे या बुरे विचार जानने के बाद यह समझ आता है कि सरकार के प्लान अ के असफल होने से अधिक यह जनता के प्लान अ की सफलता है|

जिस दिन तालाबंदी की घोषणा हुई तब न तो सरकार ने और न ही मेरे जैसे आलोचकों ने इस बात की कोई बड़ी सम्भावना देखी थी कि मजदूरों को इतना कठिन कदम उठाना पड़ेगा| तालाबंदी के चार घंटे के नोटिस पर मेरी चिंता भिखारियों, बेघरों और नशेड़ियों को लेकर तो थी परन्तु ईमानदारी से कहता हूँ कि मैंने मजदूरों के बारे ने कुछ बड़ा नहीं सोचा|

परन्तु मेरे सामने अगली सुबह बड़ा प्रश्न था – क्या मैं अपनी घरेलू कामगार को उसका मासिक वेतन देने जा रहा हूँ और कब तक? निश्चित रूप से मेरी पत्नी ने उसे पहले शुक्रवार को पूरे महीने के वेतन के वादे के साथ पंद्रह दिन की छुट्टी पर भेज दिया था| परन्तु चिंता यह थी कि क्या होगा जब लॉक बढ़ेगा| दूसरा प्रश्न यह कि क्या हम अपने प्रेस वालों, मालियों बिजली की मरमम्त करने वालों आदि कामगारों को जो काम के आधार पर पैसा लेते हैं कुछ काम देने वाले हैं या कोई और मदद करने वाले हैं? एक हफ्ते में यह साफ़ हो चुका था मेरी आय अगले साल दो साल के लिए घटने वाली है| एक सफ़ेदपोश स्व रोजगार में लगा हुआ मैं अगर अर्ध-बेरोजगार होने वाला हूँ तो यह दैनिक रोजगार वाले श्रमिक क्या करेंगे| इनके काम और दाम जा चुके थे और यह लोग अपने यजमानों और आसामिओं के सामने लाचार खड़े थे| जब मैं निराश था तो इनका क्या हाल रहा होगा|

दो दिन बीतते बीतते समाचार चिकित्सकों आदि के प्रति दुर्व्यवहारों की खबर ला रहे थे| यह मध्यवर्ग के भीतरी जीवन संघर्ष था| उन्हें घरों के निकला गया था| यहाँ तक कि माँ – पत्नी- पति और पिता तक ने उन्हें घर न आने की कसम दे दी थी|

जो समाचार नहीं आए – वो इन मजदूरों के बारे में थे – बेरोजगार किरायेदार जब खैराती खाने के कतार में सपरिवार खड़ा होगा तो क्या लाएगा – करोना| यह सामान्य तर्क था जिसे किसी ने सामने नहीं रखा – सिर्फ़ अमल किया| यह पलायन का एक प्रमुख कारण है| बाकि भेड़चाल तो है ही|

मैं इसमें राजनैतिक दांव पेंच नहीं देखता क्योंकि हर दल किसी न किसी राज्य में सत्ता में है और विपक्ष में भी|

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भीषण लू-लपट और करोना

विश्व-बंदी २६ मई – भीषण लू-लपट और करोना

जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब भारत में करोना के डेढ़ लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी होगी| कोई बुरी खबर नहीं सुनना चाहता| मुझे कई बार लगता है कि लोग यह मान चुके हैं कि यह सिर्फ़ दूसरे धर्म, जाति, वर्ग, रंग, राज्य में होगा| सरकार के आँकड़े कोई नहीं देखता न किसी को उसके सच्चे या झूठे होने का कोई सरोकार है| आँकड़ों को कलाबाजी में हर राजनैतिक दल शामिल है हर किसी की किसी न किसी राज्य में सरकार है| कलाबाजी ने सरकार से अधिक समाचार विक्रेता शामिल हैं जो मांग के आधार पर ख़बर बना रहे हैं| जनता शामिल है जो विशेष प्रकार कि स्वसकरात्मक और परनकारात्मक समाचार चाहती है|

इधर गर्मी का दिल्ली में बुरा हाल है| हार मान कर कल घर का वातानुकूलन दुरुस्त कराया गया| चालीस के ऊपर का तापमान मकान की सबसे ऊपरी मंजिल में सहन करना कठिन होता है| खुली छत पर सोने का सुख उठाया जा सकता है परन्तु सबको इससे अलग अलग चिंताएं हैं|

मेरा मोबाइल पिछले एक महीने से ख़राब चल रहा है परन्तु काम चलाया जा रहा है – इसी मैं भलाई है| तीन दिन पहले एक लैपटॉप भी धोखा दे गया| आज मजबूरन उसे ठीक कराया गया| उस के ख़राब होने में गर्मी का भी दोष बताया गया|

इस सप्ताह घर में गृह सहायिका को भी आने के लिए कहा गया है| क्योंकि पत्नी को उनके कार्यालय ने सप्ताह में तीन दिन कार्यालय आने का आदेश जारी किया है|

यह एक ऐसा समय है कि धर्म और अर्थ में सामंजस्य बैठना कठिन है – धर्म है कि जीवन की रक्षा की जाए अर्थ विवश करता है कि जीवन को संकट मैं डाला जाए| मुझे सदा से घर में कार्यालय रखने का विचार रहा इसलिए मैं थोड़ा सुरक्षित महसूस करता हूँ| मैं चाहता हूँ कि जबतक बहुत आवश्यक न हो घर से बाहर न निकला जाए| मैं अति नहीं कर रहा चाहता हूँ कोई भी अति न करे| न असुरक्षित समझने की न सुरक्षित समझने की| गर्मी और करोना से बचें – भीषण लू-लपट और करोना का मिला जुला संकट बहुत गंभीर हो सकता है|

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विश्व-बंदी २५ मई – फ़ीकी ईद

ईद कैसी, ईद ईद न रही| उत्साह नहीं था| कम से कम मेरे लिए| देश क्या दुनिया में एक ही चर्चा| क्या सिवईयाँ क्या फेनी क्या कोई पकवान क्या नाश्ते क्या मुलाक़ातें क्या मिलनी? इस बार तो कुछ रस्म अदायगी के लिए भी नहीं किया| बस कुछ फ़ोन हुए कुछ आए कुछ गए|

न होली पर गले मिले थे न ईद पर| कोई संस्कृति की दुहाई देने वाला भी न रहा – जो रहे वो क्रोध का भाजन बन रहे हैं| कोई और समय होता तो गले मिलने से इंकार करने वाला पागल कहलाता| दूर का दुआ-सलाम प्रणाम-नमस्ते ही रह गया| चलिए गले मिलें न मिलें दिल तो मिलें| मगर हर मिलने वाला भी करोना विषाणु दिखाई देता है| बस इतना भर हुआ कि लोगों की छुट्टी रही| शायद सबने टीवी या मोबाइल पर आँख गड़ाई और काल का क़त्ल किया|

हिन्दू मुसलमान सब सहमत दिखे – जिन्दगी शुरू की जाए| कोई नहीं पूछना चाहता कितने जीते हैं कितने मरते हैं, कितने अस्पताल भरे कितने खाली| मुंबई में मरीज प्रतीक्षा सूची में स्थान बना रहे हैं – मरीज क्या चिकित्सक चिकित्सा करते करते प्रतीक्षा सूची में अपना नाम ऊपर बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| देश और दिल्ली की हालत क्या है किसी को नहीं समझ आता| बीमार हो चुके लोगों का आँकड़ा डेढ़ लाख के पार पहुँचने वाला है| मीडिया और सरकार गणित खेल रही है| मगर बहुत से लोग हैं जो इस आँकड़े से बाहर रहना चाहते हैं या छूट गए हैं| सरकारी तौर पर खासकर जिनमें कि बीमारी मिल रही है पर कोई लक्षण नहीं मिल रहा|

आज छुट्टी थी, मगर जो लोग सुबह ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली आये या गए शायद शाम को न लौट पाएं – सीमा फिर नाकाबंद हो चुकी है| घर से निकलें तो लौटेंगे या नहीं कोई पक्का नहीं जानता| नौकरानी को बुलाया जाए या न बुलाया जाए नहीं पता| न बुलाएँ तो न उसका काम चले न हमारा|

पीछे मंदिर में लोग इस समय शाम की आरती कर रहे हैं| मुझे मंदिर के घंटे हों या मस्जिद की अज़ान मुझे इस से अधिक बेमानी कभी नहीं लगे थे| मगर उनके अस्तित्व और प्रयोजन से मेरा इंकार भी तो नहीं है|

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विश्व-बंदी २३ मई

उपशीर्षक –  तर्कपूर्ण और समझदारी वाले पूर्वाग्रह

मेरे मित्र हैं जिन्हें विश्वास था कि उनका महान और समझदार नेता लॉकडाउन-४ को बहुत सख्त रखेगा क्योंकि मुस्लिम समुदाय के त्यौहार के समय कोई समझदार आदमी मूर्खता पूर्ण जोखिम नहीं उठाएगा| मैं उस समय जोर से हंसा और उन्हें वादा किया कि सरकार लॉकडाउन-४ को मॉक-डाउन बनाने जा रही हैं| इसके बाद जैसा कि हमेशा होता हैं तो मुझे तर्कपूर्ण और समझदारी की बात करने की सलाह देने लगे| मजे की बात यह है कि जब भी यह इस प्रकार के मित्र तर्कपूर्ण और समझदारी की बात काम धंधे से इतर प्रयोग करते हैं तो मेरा विश्वास प्रबल रहता है कि अपने पूर्वाग्रह को थोपने का प्रयास हो रहा है|

खैर उनकी तर्कपूर्ण और समझदारी वाली बातें न मैं सुनता न कोई और|

इस बार तो एक मजे की बात भी हुई| उन्होंने के वास्तविक तार्किक विचार रखा| मैंने सूचित किया कि कांग्रेस नेता चिदंबरम पहले ही इस आशय का ट्वीट कर चुके हैं| वो परेशान होकर बोले – अरे, अब इस विचार को कोई नहीं सुनेगा| इस प्रकार उनके तर्क-संगत विचार को उनके समझदार नेताओं के मस्तिष्क में जगह नहीं मिली|

वैसे वह प्रधानमंत्री मोदी को बहुत तर्कपूर्ण और समझदार मानते हैं परन्तु जिस बातों के लिए मोदीजी को वह धन्यवाद कर देते हैं वह खुद उल्टी पड़ जातीं हैं| उनका परम विश्वास था कि मोदी जी आधार और वस्तुसेवाकर जैसे कुत्सित कांग्रेसी विचारों को प्रधानमंत्री बनते ही दमित कर देंगे| उस दिन मजे लेने के लिए मैंने कहा कि कांग्रेस जिनकी दुकान हैं मोदी जी उनके पुराने ग्राहक हैं| आधार और वस्तुसेवाकर ऐसा आया कि मित्र प्रवर को उसके समर्थन में बहुत तीव्र श्रम कर कर ज्ञान प्राप्त करना पड़ा| हाल में यही हाल मनरेगा मामले में भी हुआ – इस कांग्रेसी घोटाले के भांडाफोड़ करने की उम्मीद में वो मई २०२० में निर्मला जी का भाषण देख रहे थे| पता चला निर्मला जी ने खुद बाबा मनरेगा की शरण ली| दरअसल मित्र महोदय को लगता था कि मजदूरों के पलायन में मनरेगा का हाथ है|

खैर थाली बजाने मोमबत्ती जलाने और गाल बजाने के सभी काम करने के बाद आजकल उन्हें किसी नए टास्क की तलाश है|

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विश्व-बंदी २२ मई

उपशीर्षक –  नकारात्मक विकास – नकारात्मक प्रयास

लम्बी दूरी की बस नहीं चल रहीं, पर ट्रेन चलने लगी हैं| सबसे जरूरी वाहन हवाई जहाज भी चलने की तैयारी में हैं|

कुछ दिन में सब कुछ चलने लगेगा| नहीं, चलेगा तो सुरक्षा और स्वास्थ्य| चिंता और भय सुबह सबेरे खूंटे पर टांग कर हम घर से निकलेंगे| मरेंगे तो कोविड वीर कहलायेंगे| यह मध्यवर्ग की कहानी है, मजदूर की नहीं| मजदूर का जो होना था हो चुका| उसकी स्तिथि तो सदा ही मौत के आसपास घूमती रही है|

पहली बार यह आग मध्यवर्ग तक आएगी| अंग्रेजों के काल के पहले और बाद के भारतीय इतिहास में पहली बार अर्थव्यवस्था की अर्थी निकल गई है| विकास के बड़े नारों के बाद भी विकास का कीर्तिमान नकारात्मक दर पर आ टिका है| कोविड मात्र बहाना बन कर सामने आया है वरना विकासदर तो कोविड से पहले ही शून्य के पास चुकी थी|

जिस समय भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर नकारात्मक अर्थव्यवस्था का आंकड़ा दे रहे थे, उसी समय सामाजिक माध्यम में सत्ता के अंधभक्त राहुल गाँधी के मूर्ख होने की चर्च में वयस्त थे| अर्थात सरकार और उसके गुर्गों के अपनी असफलता का अहसास तो है परन्तु उसपर चर्चा नहीं चाहिए| सरकार भूल रही है कि चर्चा होने से ही उसे सुझाव मिल सकेंगें| ज्ञात इतिहास में सरकारों के चाटुकारों ने को कभी भी कोई रचनात्मक सुझाव नहीं दिए हैं – बल्कि सरकार के आलोचकों और आम जनता की तरफ से आने वाले सुझावों में भी नकारात्मकता फैलाई है|

आज फेसबुक देखते समय गौर किया – एक मोदीभक्त ने कार्यालय खोलने की घोषणा की, तो किसी ने सलाह दी कि घर से काम करने में भलाई है| मोदीभक्त ने सलाह देने वाले को राष्ट्रविरोधी कह डाला| अब राष्ट्रविरोधी सज्जन ने सरकारी अधिसूचना की प्रति चिपकाते हुए कहा कि घर से काम करने की सलाह उनकी नहीं बल्कि खुद मोदी सरकार की है| इस पर मोदीभक्त ने समझाया कि भगवान मोदी मन ही मन क्या चाहते हैं यह भक्तों को समझ आता है| राष्ट्रद्रोही कामचोर लोग ही इस अधिसूचना की आड़ में देश का विकास रोकने के घृणित प्रयास कर रहे हैं|

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विश्व-बंदी २१ मई

उपशीर्षक –  परदेशी जो न लौट सके

इस से पहले कि अर्थव्यवस्था चले, उसका आधार डोलने लगा है| जिन्हें कुछ माह पहले तक मानव संसाधन कहा जा रहा था – अपनी असली औकात यानि मजदूर के रूप में औद्योगिक परिदृश्य से दूर हो चुके हैं| जो मजदूर दो जून की रोटी की आशा में बंधुआ की तरह जीता मरता है – लौटा है|

अब इस बात पर बहस की गुंजायश नहीं रह गई है कि मजदूर अपने मूल स्थानों की ओर क्यों लौटे? सब जानते हैं उनकी मातृभूमि कम से कम तुरंत उनका स्वागत नहीं करेगी| उनके गाँव और उनके परिवार उन को शायद तुरंत न अपनाएँ| जिस गाँव कुल चार रोटी हैं वहां खाने वाले चार से बढ़कर सोलह हो गये हैं|

परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लौटा कौन कौन नहीं है?

जिनके पास जमीन में गड़ी अपनी नाल का पता है – वो लौट गए हैं| जिनके पास माँ – बाप – भाई – भाभी गाँव घर है लौटे हैं भले ही यह सब नाम मात्र की आशाएं हैं| वो लौट गये हैं जिनकी जड़ों में अभी जुड़ाव की आशा है| मगर क्या उन्होंने रोज़ी- रोटी वाले अपने नए वतन से जुड़ाव नहीं महसूस किया| किया तो मगर जुड़ाव में आसरा और आश्वस्ति की कमी थी| जिन्होंने किसी पुराने राहत शिविर की काली कहानियाँ सुनी थीं और जिन्हें रेन बसेरों के बास अपनी नाक में आज भी सुंघाई देती थी – लौट गए|

वो लोग नहीं लौटे जिनके पास अपना एक कमरा – एक छप्पर – एक झौपड़ – एक टपरी – एक चाल थी| नौकरी की आस थी| सड़क पर फैंक दिए जाने का भय न था|

वो नहीं लौटे जिनके पास जड़ें नहीं थीं – जिनके नाम कुछ भी हों मगर पुराने धाम देश के नक़्शे के बाहर हैं| नेपाली लौटे – बंगाली नहीं| वो नहीं लौटे जो घर से भाग कर आये थे| वो लडकियाँ नहीं लौंटी जिन्हें कोई घर नहीं अपनाएगा| वो भाई भी नहीं लौटे जिनके भाई के हाथ में खंजर हैं|

पाठकों से अनुरोध हैं बताएं उनके बारे में हो नहीं लौटे|

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विश्व- बंदी ३ अप्रैल

उपशीर्षक – मोमबत्ती 

मुग़ल काल में एक प्रथा थी जो सल्तनत में ज्यादा उत्पात मचाता था उसे जबरन हज पर भेज देते थे| अगर औरंगज़ेब भी जिन्दा होता तो तब्लिग़ वालों को किसी जहाज में चढ़ा कर हज के लिए भेज देता और कहता कि जब मक्का और हज खुलें तब पूरा करकर ही लौटना|

जिन्हें इलाज़ नहीं कराना उनके लिए आम समाज से दूर अलग मरकज़ खोल देने चाहिए| वहीं रहें, अपना बनायें खाएं, मरें या ठीक हो जाएँ| सरकार, चिकित्सकों, समाज सेवियों, मिडिया और गैर मुस्लिमों को उनकी चिंता से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए| ईश्वर का दिया कष्ट भोगने से शायद उनके इस जन्म के अलाल्ही कर्त्तव्य और अगर गलती से पिछला जन्म रहा हो तो पिछले जन्म के पाप का प्रायश्चित हो जाएगा| अन्य धर्मों में भी जिन्हें अपने इस या उस जन्म के पाप का प्रायश्चित करना हो उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए| धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि हर किसी को दूसरों को परेशां किए बिना अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म का पालन करने की छूट होनी चाहिए|

इधर प्रधानमंत्री जी ने फिर नीरो साम्राज्य के दिनों को याद लिया| अब इटली की तर्ज पर मोमबत्ती जलेगी रविवार को| भारतीय कारण करने के लिए दीपक और लॉक डाउन में कहाँ खरीदने जाओगे इसके लिए मोबाइल की लाइट का विकल्प दिया गया है| मोदी जी का यह घटना प्रबंधन प्रायः चिंतित करता है कि असली समस्या से ध्यान हटाया तो नहीं जा रहा| परन्तु जनता का हौसला बनाये रखना जरूरी है|

 वैसे प्रधानमंत्री ने दूरी बनाए रखने की बात कहकर भक्तों को मूर्खता न करने का सन्देश भी दिया है|

घर को बच्चों को लग रहा है कि दुनिया भर की छुट्टी चल रहीं हैं| वैसे यह भी ठीक है कि अगर घर में दो एक लोग साफ सफाई, रसोई और बच्चे संभाल लें तो बाकि दस लोग घर से आराम से काम कर सकते हैं| दफ्तर, आवागमन, और ऐसे ही तमाम खर्च बच सकते हैं| अर्थव्यवस्था के आंकड़े में जरूर कमी आएगी परन्तु पर्यावरण, सड़कों की भीड़ भाड़ कम हो जाएगी|

शायद प्रकृति हमारे धर्मों और अर्थव्यवस्थाओं को सुधरने का मार्ग स्पष्ट कर रही है|