अकबर

अकबर का दौर अजीब हालत का दौर था| एक बदहवास सा मुल्क सकूं की तरफ बढ़ता है| अपनी लम्बी पारी से भी और बहुत लम्बी पारी खेलने की चाह में अबुल मुज़फ्फर जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर बादशाह ने अपनी हालत कुछ अजीब ही कर ली थी| यह उपन्यास उस “हालत –ए – अजीब” से शुरू होता है, जिसमें बादशाह सलामत कह उठे थे – “गाइ है सु हिंदू खावो और मुसलमान सूअर खावो|” यह वो शब्द है जिनको मूँह से निकलने पर तब और आज सिर्फ जुबां नहीं, सिर कट सकते हैं, और तख़्त बदल उठते हैं| यह वो बादशाह अकबर है, जिन्हें न सिर्फ पूर्व जन्म में शंकराचार्य के श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में जन्मे मुकुंद ब्राह्मण का अवतार बताया गया बल्कि जो खुद “अल्लाहो अकबर” को नए अर्थ देने की कोशिश में पाया गया| यह वो अकबर बादशाह है जो बाद में “दीन – ए- इलाही” की शुरुआत करता है और छोड़ सा देता है| वह बादशाह अकबर जो, “जैसे जिए वैसे मरे| ना किसी को पता किस दीन में जिए, ना किसी को पता किस दीन में मरे|”

यूँ; पुस्तक को पढ़ने और पसंद करने के बाद भी इसकी विधा के बारे में सोचना पड़ता है | हालांकि लेखक प्रकाशक इसे उपन्यास कहते हैं| मैं इसे ऐतिहासिक विवरण कहूँगा| हम सबको पढ़ना चाहिए| हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यास बहुत है| शाज़ी ज़मां का “अकबर” इतिहास का पुनर्लेख है जिसे औपन्यासिकता प्रदान करने का कठिन प्रयास लेखक ने किया है| वो कुछ हद तक सफल होते होते असफल हो जाते हैं| असफल इसलिए कि आप पाठक इस से ऊब जाता है| तमाम प्रसंगों में सन्दर्भों की भरमार है| बकौल शाज़ी ज़मां, “इस उपन्यास की एक-एक घटना, एक-एक किरदार, एक-एक संवाद इतिहास पर आधारित है|”

समय, सनक और समझ से जूझते अकबर बादशाह की टक्कर पर हिंदुस्तान में डेढ़ हजार साल पहले सम्राट अशोक का जिक्र आता है| इन दो से बेहतर नाम महाकाव्यों में ही मिल सकते हैं| अकबर की जिन्दगी के ऊँचे नीचे पहलू इस विवरण में आए है जिनमें से एक को, इस पुस्तक को बाजार में बेचने के लिए भी उछाला गया था – अकबर के मूंह से निकली एक गाली जिसे तमाम हिंदुस्तान आज भी देता है| पुस्तक अकबर को उसके समकालीन लेखकों और इतिहासकारों के नज़रिए से हमारे सामने रखती है| अकबर के समकालीन इतिहास की जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण विवरण प्रदान करती है| साथ है, हिंदुस्तान का अपना माहौल आज भी कुछ ज्यादा नहीं बदला है इसे समझा जा सकता है|

यह विवरण उपन्यास तो नहीं बन पाया है साथ ही उन महत्वपूर्ण बातों से नज़र चुराता सा निकल गया है जिन्हें इसके पत्रकार – इतिहासकार लेखक छु सकते थे| मसलन अकबर के हिंदुस्तान का फ़ारस, तुर्की, पुर्तगाल और पोप के साथ रिश्ता तो चर्चा में आता है; मगर उन हालत के बारे में टीस छोड़ जाता है जो तुर्की और इस्लाम के यूरोप और ईसाइयत से रिश्ते की वजह से पैदा हुए थे और नतीजतन हिंदुस्तान और दुनिया की तारीफ में बहुत उठापटक हुई| अकबर के जाने के बाद का दौर, धर्मतंत्र और राजतन्त्र के कमजोर होने का दौर भी था जिसने बाद में संविधानों और राष्ट्रों के लिए रास्ता खोल दिया था|

कुल मिला कर किस्सा यह शेख़ अबुल फ़ज़ल के अकबरनामा और मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूंनी के ख़ुफ़िया मुन्तखबुत्तावारीख के इर्द गिर्द बुना गया है और इसमें तमाम लेखकों और इतिहासकारों की लिखत को रंगतभरे खुशबूदार मसालों के साथ परोसा गया है|

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पुस्तक – अकबर

लेखक – शाज़ी ज़मां

प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2016

विधा – उपन्यास

इस्ब्न – 978-81-267-2953-1

पृष्ठ संख्या – 350

मूल्य – 350 रुपये

यह पुस्तक अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|

 

गूगल के बहाने कंपनियों के जन्मदिन पर

आज २७ सितम्बर २०१६ को गूगल अपना अठारहवां (18 वां) जन्मदिन मना रहा है| मगर लगता है की कुछ लोचा है|

यूनाइटेड किंगडम के प्रख्यात अखबार द टेलीग्राफ की इस ख़बर के मुताबिक सन २००५ में गूगल ने अपना सातवाँ जन्मदिन सत्ताईस सितम्बर को नहीं वरन छब्बीस सितम्बर दो हजार पाँच (२६ सितम्बर २००५) को मनाया था| जबकि गूगल का छठां जन्मदिन सात सितम्बर दो हजार चार (७ सितम्बर २००४) को था| लेकिन गूगल का पांचवां जन्मदिन आठ सितम्बर दो हजार तीन (०८ सितम्बर २००३) को हुआ| खुद गूगल के मुताबिक गूगल ने अपना इनकारपोरेशन एप्लीकेशन चार सितम्बर उन्नीस सौ अठान्वै (०४ सितम्बर १९९८ को सरकार के पास दाखिल की थी| उधर गूगल डॉट कॉम पंद्रह सितम्बर उन्नीस सौ सतानवे (१५ सितम्बर १९९७) को पंजीकृत हुई|

बहरहाल, अब गूगल हर साल २७ सितम्बर को ही अपना जन्मदिन मनाने का सोच रही है|

ऐसा नहीं है कि कंपनी के जन्म दिन का मसला अकेला गूगल का मसला है|

सिद्धांततः कम्पनी दो या अधिक लोगों के मन में कंपनी बनाने की इच्छा के जन्म लेने के साथ उन सबके मस्तिष्कीय गर्भ में उत्पन्न होना शुरू होती है| इस प्रक्रिया में उसका रंग रूप आकार प्रकार कद काठी आदि तय की जाती है| सिद्धान्तः कंपनी उस दिन बन जाती है जिस दिन यह सब तय हो जाता है| इसके बाद कंपनी के नाम पर सरकार सरकारी मुहर लगवाई जाती है जो तकनीकि रूप से उस नाम से कंपनी बनाने की अनुमति होती है| अगले चरण में कंपनी के जन्मदाता – प्रमोटर उस नाम से कंपनी के इनकारपोरेशन के लिए अर्जी दाखिल करते हैं| यह सभी चरण देश और काल के हिसाब से आजकल के दो घंटे से लेकर पुराने ज़माने के दो एक साल तक हो सकते हैं|

परन्तु कानूनन कंपनी का जन्म उस दिन माना जाता है जिस दिन सरकार से इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिलता है| परन्तु, कंपनी के प्रमोटर इस आधिकारिक जन्मदिन का प्रायः इन्तजार नहीं करते और नाम तय होते ही कंपनी का कुछ न कुछ काम धाम शुरू भी कर देते है|

उदहारण के लिए अभी हाल में एक कंपनी खोलने के लिए प्रक्रिया शुरू की गई| कंपनी के प्रमोटर अपने इस बच्चे के लिए पिछले तीन साल से योजना बना रहे थे| इस साल फरवरी में उन्होंने कंपनी की पूँजी, कार्यकलाप, नागरिकता, निवास स्थान (कार्यालय), लोगो, पञ्चलाइन आदि मसलों पर अपना विमर्श पूरा किया| तमाम कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन युवा प्रमोटरों पर संसाधन (कागजात – जैसे पहचान पत्र) नहीं थे तो उन्हें बनाने की कार्यवाही हुई| इसके बाद एक दिन उन्होंने कंपनी बनाने संबंधी औपचारिक अनुरोध किया गया | तीन चार दिन में कंपनी के लिए नाम विशेष की सरकारी अनुमति मिली| अब प्रमोटर अपनी कंपनी के नाम और लोगो को लेकर इतने उत्साहित थे कि कहा गया कि जब तक बढ़िया सा लोगो न बन जाए तब तक कंपनी इनकारपोरेशन की औपचारिक एप्लीकेशन न लगाईं जाए| वो कंपनी के जन्म के दिन शानदार कार्यक्रम करना चाहते थे| इसके बाद एक दिन शाम को एप्लीकेशन इस हिसाब से लगाईं गई कि अगले दिन कंपनी को इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिले| मगर सरकारी कार्यालय उस दिन अच्छे मूड में था और कंपनी उसी दिन यानि योजना से एक दिन पहले बन गई| पुराने समय में एक और दिक्कत थी| कंपनी बनने के लगभग दस दिन बाद प्रमोटर को अधिकृत रूप से पता लगता था कि कंपनी बन चुकी है|

अब आप कंपनी का वास्तविक जन्म दिन तय करते रहिये| कानून वही मानेगा जो वो मानता है – सनद की तारीख़|