विश्व-बंदी ३ मई


उपशीर्षक – आरोग्य सेतु, खुली शराब

मैं हर बात पर मोबाइल एप बना दिए जाने में कोई तर्क नहीं देखता| परन्तु जिन गिने चुने कार्यों के लिए एप बढ़िया सेवा प्रदान कर सकते हैं उनमें निश्चित रूप से “असुरक्षित संपर्क चेतावनी” और “असुरक्षित संपर्क पुनर्सूचना” निश्चित ही आते हैं| परन्तु आरोग्य सेतु के बारे में बहुत से प्रश्न हैं जो अनुत्तरित हैं| यह प्रश्न “घोषित” मूर्ख राहुल गाँधी द्वारा उठाने से मूर्खतापूर्ण नहीं हो जाते| प्राचीन संस्कृत साहित्य आज तक अपने समय के “घोषित” महामूर्खों का ऋणी है|

अधिकतर एप अनावश्यक सूचना मांगने और उनके दुरूपयोग का माध्यम रहे हैं| अगर यह एप कोई भी सूचना गलती से भी गलत हाथों में पहुँचा दे तो यह देश और सरकार के लिए खतरा बन सकता है| मैं इस मामले में मोदी जी या उनकी सरकार की निष्ठा पर प्रश्न नहीं उठा रहा, न ही एप विकसित करने वाले गुप्त समूह पर| परन्तु किसी भी सरकारी कार्यकलाप की पुनः जाँच होने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए|

करोनाकाल के प्रारंभ में कथित रूप से मोदी सरकार ने हवाई अड्डों पर निगरानी के आदेश दिए थे जिससे संकृमित व्यक्तियों की पहचान हो सके| जब भी इस काम के ठीक से न होने पर प्रश्न उठता है अंध-भक्त तर्क देते हैं कि यह काम मोदी खुद थोड़े ही करते, यह सब अधिकारियों की गलती है| यही तर्क मेरा भी है| मेरा आरोग्य सेतु के अंध-समर्थकों से यह ही निवेदन है कि आरोग्य सेतु मोदी जी ने खुद थोड़े ही बनाया है, इसकी सुरक्षा जाँच होने में क्या कठिनाई है?

आज दिन भर सोशल मीडिया में जिस तरह सरकार समर्थक बातें करते रहे उस से ऐसा भान होता है जैसे कि सरकार ताला बंदी को हल्का नहीं कर रही बल्कि करोना के आगे घुटने टेक रही है| मोदी भक्त सरकार का अनावश्यक बचाव करते नज़र आ रहे हैं| जबकि इस बात पर कोई बड़ा प्रश्न नहीं उठा है| वास्तव में लोग तालाबंदी पर अधिक प्रश्न उठाते रहे हैं| यह जरूर लगता है, सरकार तालाबंदी के समय का सदुपयोग उपकरणों, दवाइयों, योजनाओं आदि में करने में असफल रही है|

तालाबंदी जरूर जारी हैं पर कल से शराबबंदी खुलने के साथ|

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विश्व-बंदी १ मई


उपशीर्षक – करोना काल में पूंजीपतिवाद का दबाब

मेरे मन में कभी भी इनफ़ोसिस के किसी भी संस्थापक सदस्य के लिए कोई विशेष सम्मान नहीं रहा| यह लोग पूँजीपतिवाद (न कि पूंजीवाद) का उचित उदहारण मालूम देते हैं| जिस देश में बेरोजगारी व्याप्त हो और कर्मचारियों पर पहले से ही १२ घंटे काम करने का पूंजीपतिवादी दबाब हो वहां यह महोदय और अधिक काम करने का प्रवचन दे रहे हैं|

वास्तव में मैं पिछले कई दिनों में सरकार का इस बात के लिए ही धन्यवाद कर रहा हूँ कि सरकार पूंजीपतिवाद के दबाब में आकर लॉक डाउन को न लागू करने या उठाने पर आमादा नहीं हुई| प्रकृति ने पूंजीपतिवादी समझी जाने वाली सरकार से लोकहितकारी राष्ट्र का पालन करवाने ने कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है| करोना काल की सबसे बड़ी सीख अर्थव्यवस्था को सकल उत्पाद से नहीं बल्कि सकल प्रसन्नता से नापने में है|

शाम तक इस आशय की ख़बरें आ गई कि लॉकडाउन को दो हफ्ते के लिए बढ़ाते हुए इस में जबरदस्त परिवर्तन किए गए हैं| सरकारी अधिसूचनाओं को पढ़ना इतना सरल नहीं होता|  तमाम दबाब के बीच सरकार लोकहित, सकल प्रसन्नता, सकल स्वास्थ्य, सकल उत्पाद जैसी अवधारणाओं में उचित समन्वय बैठाने का देर दुरुस्त प्रयास कर रही है|

देश को पहले से ही लाल, संतरी, हरे मुख्य ज़ोन में बाँट दिया गया है| इन के अतिरिक्त राज्य सरकारों के आधीन कन्टेनमेंट ज़ोन भी है, जो सबसे गंभीर है| अब कुल मिला कर पूर्ण लॉक डाउन केवल कन्टेनमेंट ज़ोन में ही रह जाएगा| देश का हर बड़ा शहर नक्शे पर लाल रंग से रंगा हुआ दिखता है| अब कम महत्त्व के समझे जाने वाले पिछड़े इलाके हरे रंग में रंगते हुए ग्रामीण भारत के साथ देश की अर्थव्यवस्था संभालेंगे| विकास इस समय उत्तर नहीं प्रश्न है|

करोना काल कतई सरल नहीं| कोई आश्चर्य नहीं कि लॉक डाउन के टोन डाउन होते समय श्रेय लेने के लिए श्रेय-सुखी प्रधानमंत्री जनता के सामने नहीं आ रहे|

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विश्व-बंदी ३० अप्रैल


उपशीर्षक – वेतन कटौती का दिन

कोई  भी इस बार मई दिवस की शुभकामनाएं लेना देना नहीं चाहता|

इस बार किसी को वेतन का इन्तजार नहीं है, वेतन कटौती की बुरी तरह आशंका है| देश का हर अधिकारी कर्मचारी अपने मोबाइल में यह देखना चाहता है इस बार वेतन कितना कटकर आ रहा है| आज सुबह पहली चिंताजनक ख़बर यह थी की देश में १०० बड़ी कंपनियों में से २७ लम्बे समय वेतन देने की स्तिथि में नहीं हैं| दूसरी बुरी ख़बर तीसरे पहर आ चुकी थी, रिलायंस समूह वेतन कटौती कर रहा है| यह बात अलग है कि बड़ी कंपनियों की ख़बरें निचले स्तर पर वेतन कटौती अभी दर्ज़ नहीं कर रहीं हैं|

कठनाई सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों, दुकानदारों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए आने जा रही है| इन उद्योगों के पास न देने ले लिए पर्याप्त आय और जमा धन पूँजी है न कोई सरकारी सहायता| इन उद्योगों ने मार्च का आधा वेतन पुरानी आय और जमा धन पूँजी से दिया गया है| इसके बाद इनमें से अधिकतर उद्योगों की अप्रेल माह का पूरा वेतन देने की स्तिथि नहीं हैं| इनके कर्मचारी अघोषित रूप से बेरोजगार हैं ही, सरकारी कानूनी परिभाषा के परे अधिकतर सूक्ष्म और लघु उद्यमों के मालिक भी बेरोजगार की श्रेणी में हैं| लॉक डाउन को समर्थन देने से बाद भी यह कहना होगा कि अगर लॉक डाउन मई में जारी रहता है तो मध्यम उद्योग भी वेतन देने में अक्षम होंगे|

सरकार को यह गणना नहीं करनी कि उसे बीमारी से जीवन बचाना है या गिरती अर्थव्यवस्था से, बल्कि  यह गणना करनी है कि बीमारी से जीवन बचाने के लिए कितना खर्च उठा सकती है और कब तक| उतने दिन के भीतर बीमारी को काबू करना है और उसके बाद ही अर्थव्यवस्था को खोलना है|

निश्चित रूप से शुद्ध ग्रीन जोन में अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रूप से खोला जा सकता है| कठिनाई यह भी है कि पिछले बीस वर्ष की सरकारी अनीतियों के कारण देश की अर्थव्यवस्था कुछ खास बड़े शहरों के आगे पीछे घुमने लगी है| इसे यथासंभव रूप से शीघ्रतापूर्वक विकेन्द्रीयकृत करना होगा| परन्तु फिलहाल कुछ तो शुरू हो मगर जीवन से बिना समझौता किए और बीमारी से बिना हार माने|

अंत में इतना और कहूँगा, सच है या नहीं परन्तु बहुत से पूंजीपति अर्थव्यवस्था को जल्दी खुलवाने के लिए दबाब की नीति के रूप में भी प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं|

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