विश्व-बंदी ३१ मार्च


उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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विश्व-बंदी २९ मार्च


उपशीर्षक – सरकारी क्षमा प्रार्थना 

ट्रेन के डिब्बों को १० हजार आइसोलेशन कैंप में बदला जा रहा है? क्या अस्पताल इतने कम पड़ने वाले हैं? बिस्तरों की कमी होने पर यह उचित हो सकता हैं – परन्तु बेहद चिंताजनक है| इस समय तक हजार लोग बीमार हो चुके हैं और सौ करीब ठीक हुए हैं| करोना से दोपहर तक २५ लोग मरे, इसके अतिरिक्त २२ लोग सरकार द्वारा किये गए आक्रामक लॉक डाउन से मारे गए हैं| 

प्रधानमंत्री ने निर्लज्ज होकर जनता से “इस उचित निर्णय से होने वाली कठिनाई” के लिए माफ़ी मांगी है|

इतिहास इस माफ़ी को उसी तरह याद रखेगा जिस तरह माता कुंती द्वारा अपने परित्यक्त पुत्र कर्ण से मांगी गई माफ़ी को याद करता है| उचित निर्णय यदि गलत तरीके से लिए जाये तो उचित नहीं रहते| लक्ष्य ही नहीं साधन, साध्य और समय का भी महत्त्व है| आपातकालीन निर्णय लेने में त्रुटियाँ हो सकती हैं, परन्तु यह निर्णय बीस दिन देर से लेने के बाद भी बिना योजना बनाये लिया गया| बिना गलती सुधारे मांगी गई माफ़ी का कोई मतलब नहीं| अब तो गलती सुधारने का समय भी निकलता जा रहा है| तत्काल ट्रेन चला कर फँसे हुए नागरिकों को उनके घर तक पहुँचाना चाहिए था| बसों के भरोसे यह काम देरी करेगा|

आज खुद प्रधानमंत्री ने कहा है परन्तु अमल करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता के सिर पर डाल दी:

किसी को नहीं पता क्या पिछले चार साल से हर दिन लगाये जाते इस आपातकाल में जनता को जीने का अधिकार कब ख़त्म हुआ? बीमारी का बहाना बनाकर लम्पटता को न छिपाया जाए तो बेहतर है| ठीक है कि घर से बाहर निकलना ख़तरनाक है| मगर हालत इतने क्यों बिगड़ने दिए गए?

एक मित्र से बात हुई| पति-पत्नी दौनों उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं में हैं| पुलिस नाम पता और घर से निकलने की वजह की जगह पूछने डंडा चलाती है|

कोई भी तानाशाह हो, उसके पास हर समस्या का सबसे मानवीय समाधान भी सिर्फ़ डंडा है|

विश्व-बंदी २८ मार्च


उपशीर्षक – प्रसन्न प्रकृति के दुःख 

कौन कहता है कि यह दुःखभरा समय है? प्रकृति प्रसन्न है| दिल्ली के इतिहास में मार्च में कभी इतनी बारिश दर्ज नहीं दर्ज़ की गई| बसंत और वर्षा की प्रणय लीला चल रही है| यति और रति दोनों के लिए उचित समय है| इन्हीं फुर्सत के रात-दिन ढूंढने के लिए पिछली सात पुश्तें परेशां थीं|

पर्यावरण प्रदूषण का स्तर विनाशकारी चार सौ से घट कर चालीस पर आ चुका है| मेरे फैफड़े पिछले तीस साल ने पहली बार इतना प्रसन्न हैं| बार बार बदलते मौसम के बाद भी शायद ही कोई प्रदूषण से खांस रहा है|

परन्तु सावधानी हटने का ख़तरा हर घर के दरवाज़े पर खड़ा है| आजकल सब्ज़ी तरकारी भी घर के दरवाज़े पर ही शुद्ध की जा रही है – गंगाजल का स्थान एंटीसेप्टिक सेनिटाइजर ने ले लिया है| कुछ घरों में दरवाजे पर नहाने का भी इंतजाम है – जैसे शव-यात्रा से लौटने के समय होता है|

लोग भूले-बिसरों को फ़ोन कर कर हालचाल पूछ रहे हैं| चिंता नहीं भी है, कोई मलाल नहीं रखना चाहता|

बीमारी का आंकड़ा बढ़ रहा हैं| सरकार भी तो धर्मग्रन्थ के सहारे आ टिकी है| सरकारी दूरदर्शन “रामायण” “महाभारत” से सहारे जनता को घर में रोकना चाहती है| क्या पता गीता-पाठ (क़ुरान और बाइबिल) भी शुरू हो जाए? सब जिन्दा सलीब पर लटके हैं| देश भर के भूखे प्यासे गरीब अपने घरों के बड़े बूढों की चिंता में पैदल ही घर की दिशा में बढ़ रहे हैं| आजादी के बाद, कश्मीर के बाहर यह सबसे दुःख भरा पलायन है|

धृतराष्ट्र ने राज्य सरकारों से कहा है कि पलायन करने वालों को भोजन – पानी देकर रोका जाय| मगर उस बूढ़ी माँ – पिता का क्या जो आसराहीन गाँव में बैठे हैं| रोकेंगे कहाँ, कैम्पों में?? अगर अनहोनी हुई तो यह हिटलर के कैंप साबित होंगे|

सामान से भरे ट्रकों को लिए लाखों ट्रकचालक भूखें प्यासे सड़कों पर पड़े हैं? क्या मगर अमीरों और मध्यवर्ग को अपने गाल फुर्सत नहीं| पहले सत्ता नाकारा और  निकम्मी हुआ करती थी| अब जनता भी ऐसी ही है – सत्तर साल में यथा राजा, तथा प्रजा का चक्र पूरा हुआ|

शाम देश के सबसे बड़े टैक्सी ऑपरेटर ओला का सन्देश मिला, उनके ड्राइवर बिना काम के घर में बैठे हैं, सिर पर कार लोन भी है| उनके खाने का इंतजाम करने के लिए दान का अनुरोध किया जा रहा है|