विश्व-बंदी १४ मई


उपशीर्षक – इस्तरी वाले कपड़े

तालाबंदी से ठीक पहले हमारे घर के लिए इस्तरी का काम करने वाली महिला जब आई तो बहुत डरी हुई थी| देश के अधिकतर इस्तरी का काम करने वालों की तरह वह भी पास गली में पार्क के किनारे ईंटों और बलुआ पत्थर के सहारे बनाए गए चबूतरे से काम करती है| इस प्रकार के सार्वजनिक स्थान पर खड़े होकर काम करने के कारण उसे भय था कि उसको संक्रमण का बहुत खतरा है| दिल्ली शहर में रहने तीन लोगों के इस परिवार के सभी सदस्यों के लिए काम करना जरूरी है| उस समय उसका एक बेटा मुंबई में था जो तालाबंदी वाली रात ही किसी तरह ट्रेन के शौचालय के सहारे बैठ का दिल्ली वापिस लौटा था| दूसरा एक निजी कंपनी के दफ्तर में हरकारे का काम करता था|

अचानक तालाबंदी हुई| आधे महीने का पैसा ख़त्म हो चुका था बाकि के लिए कोई आय नहीं थी| पहले पंद्रह दिन तो जैसे तैसे गुजर गए मगर उसके बाद कठिनाई शुरू हुई| बचत का पैसा कम हो चुका था और खाने की किल्लत हो रही थी| उसने अपने बंधे हुए ग्राहकों से सहायता मांगी और कुछ लोगों से सहायता की भी| परन्तु, अधिकांश लोगों के सामने खुद अपना ही नगदी का संकट सामने खड़ा था, तो कुछ को उस में अपना भविष्य दिखाई दिया| कुछ लोगों ने उसे सरकारी भोजन केंद्र पर जाने की सलाह दी| कहती है एक दिन बेटा गया भी, मगर उसे अच्छा नहीं लगा|

“मेहनत्त का न खाना तो चोरी या भीख लगता है, पिछले सप्ताह उसने मुझे कहा| लम्बी कतार में खड़े होने के बाद बीमार, भिखारी, मजदूर और कामगार में कोई फ़र्क नहीं लगता, साहब| वहां का खाना जैसा भी हो मगर गले से उतारने के लिए गैरत को घर पर रखना पड़ता है|”

वह उस दिन काम मांगने के लिए आई थी| सरकार ने धोबी आदि के काम की अनुमति दे दी है| हमें यह पता था कि उसकी मदद खैरात कर कर नहीं की जा सकती| कल इस्तरी के लिए हमने कपड़े दे दिए क्योंकि हम उसकी मदद करना चाहते थे| शाम तक कपड़े इस्तरी होकर आ भी गई| अब?

अब समस्या यह कि गली के नुक्कड़ पर चार घंटे रहे यह सुन्दर इस्तरी किए घरेलू कपड़े पहने जाये या नहीं| बेटे ने कहा, कपड़ों को संक्रमणमुक्त करने के लिए छिड़काव किया जाए| पत्नी बिना पहने धोने के पक्ष में थीं| पिता जी ने दो घंटे धूप में रखने की सलाह दी| आप क्या कहते हैं?

इस्तरी होकर आए कपड़े आज चार घंटे धूप में रखे गए, मगर पहनने से पहले की चिंता यानि भय जारी है|

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विश्व-बंदी १३ मई


उपशीर्षक – गाँव की ओर

भले ही इस वक़्त की हर सरकार बार बार करोना को मानव इतिहास की सबसे ख़तरनाक बीमारी कहे, मगर प्लेग और स्पेनिश फ्लू एक बड़ा कहर ढा चुके हैं| इन बीमारियों के समय में एक आम विचार पनपा था – गाँव की ओर पलायन| प्लेग के समय लोग बड़े गाँवों से निकल कर खेतों में रहने चले गए थे|

कारण: सामान्य बुद्धि कहती है, कम जनसँख्या घनत्व के इलाकों में बीमारी का फैलाव धीरे होगा – या शायद बीमारी वहाँ तक देरी से पहुँचे| दूसरा, शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में रहने का खर्च बहुत कम होता है| अपेक्षागत सुरक्षित पर्यावरण आपके स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता के लिए उचित है| सबसे महत्वपूर्ण कितनी भी ख़राब स्तिथि हो – कुछ न कुछ आप अपनी क्यारी या खेत में उगा लेंगे – जबकि बड़े शहरों को गांवों से आने वाले खाने पर ही निर्भर रहना है| कुल जमा, कठिन समय में शहरी जीवन के मुकाबले ग्रामीण जीवन सरल रहता है| हालाँकि आजकल के दिनों में गांवों और शहरों के विकास की जो खाई पैदा हुई है उसके चलते ग्रामीण जीवन उतना भी सरल नहीं है|

पिछले एक माह में में प्रवासी मजदूरों का अपने जन्मस्थानों की तरफ़ लौटने की बातें सामने आई हैं| न सड़कों पर पैदल जाने वालों की भीड़ कम हुई हैं न रेल गाड़ियों का इन्तजार करने वालों की| अब जब गाड़ियाँ चलने लगीं हैं – रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत भीड़ है| परन्तु विशेष बात यह है कि पैसे वाले जो लोग अपने ग्रीष्मकालीन घरों और फार्म हाउस में पैसा लगा रहे थे वह भी खेती और अन्य कृषिपरक कार्यकलापों के बारे में बात कर रहे हैं| शहरों में घटते वेतन, कम न होते खर्च, तंगहाल अर्थव्यवस्था कुछ कारक हैं ही| साथ ही अगर गाँव और पुराने शहर वापिस साल दो साल के लिए भी आबाद होते हैं तो वहां का आर्थिक पर्यावरण सुधर सकता है और जन प्रदत्त विकास हो सकता है| पढ़े लिखे लोगों का वापिस पहुंचना और विकास की चाह स्थानीय प्रशासन पर भी विकास के लिए दबाब बनाएगी| किसी भी सरकार के लिए घटती जनसँख्या और अर्थव्यवस्था वाले इलाके के मुकाबले बढ़ते इलाके में धन लगाना सरल ही नहीं बल्कि परिणाम देने वाला है| मोर अगर जंगल में नाचेगा तो कौन देखेगा?

इस सब कारणों से बहुत से मध्यवर्गीय लोग भी गाँवों और छोटे शहरों की ओर लौटने पर विचार कर रहे हैं|

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विश्व-बंदी १२ मई


उपशीर्षक – वसीयतें लिख ली जाएँ

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

नहीं, मैं नकरात्मक नहीं हूँ| मेरे लिए न मौत नकरात्मक है न वसीयत, बीमारी को जरूर मैं नकारात्मक समय समझता हूँ और मानता हूँ| वसीयत अपने बच्चों और शेष परिवार में भविष्य में होने वाले किसी भी झगड़े की सम्भावना को समाप्त करने की बात है|

इस समय वसीयत का महत्त्व बढ़ जाता है| किसी भी होनी-अनहोनी से समय परिवार के लिए बहुत कुछ जानना समझना और बचाना जरूरी है| साथ ही यह भी जरूरी है कि अपना जीवन भी ख़तरे में न पड़े|

सबसे पहले एक अपनी सारी संपत्ति और उधारियों का हिसाब लगाएं| अगले एक वर्ष के हिसाब से उधारियों के चुकाने का इंतजाम करने और घर खर्च का हिसाब करें| इस के साथ अन्य जरूरी जिम्मेदारियों के खर्च का बजट तैयार कर लें| बची संपत्ति के स्वमित्व तय कर दें| मैं सिर्फ़ सामान्य जानकारी लायक बात ही यहाँ कह रहा हूँ| अगर आप किसी प्रकार की दुविधा में हैं तो किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं| यह भी तय करें वसीयत का पता किसे हो और किसे न हो|

ध्यान दें आपके सभी ईमेल, सोशल मीडिया आदि एकाउंट्स भी आपकी संपत्ति हैं| आपकी मृत्यु के बाद इनका क्या करना है, यह बहुत जरूरी है| सभी सेवा प्रदाता आपके निर्णय को सुरक्षित रखते हैं और आपके अकाउंट को आपके जाने के बाद आर्काइव या बंद करने जैसे विकल्प आपके सामने रखते हैं| ध्यंद दें आपके एकाउंट्स में बहुत सी ऐसी जानकारी होती हैं जो बात में घर परिवार के लिए जरूरी हो|

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