विश्व- बंदी ५ अप्रैल


उपशीर्षक – करोना बाबा की जय 

बचपन में एक झोली वाला बाबा होता है जो बच्चे पकड़ कर ले जाता है| मेरी छोटी सी बेटी को लगता है उसका नाम है कोविड| मुडगेली (बालकनी) से खड़ी होकर वो उस गंदे बाबा को पत्त्थर मार कर भागना चाहती है| वो चाहती है कि कार्टून की दुनिया के सभी सुपरहीरो आ जाये और उस गंदे बाबा को मार भगाए| उसे भगवान राम और भगवान कृष्ण से भी ऐसी ही चमत्कारिक उम्मीद है| मेरे बेटे को लगता है कि शिव जी से बात की जाए – ताण्डव बंद करो भोले| उसके पास बहुत सारी बीमारियों के चीन से शुरू होने के एक बढ़िया तर्क भी है – संहारकारी भगवन शिव का आवास मानसरोवर भी तो चीन में है| वायरस शिवजी के बजते हुए डमरू से निकल रहा है| शायद कोई बालक शिव जी की बारात में करोना बाबा को भी पहचान ले|

इसी प्रकार के बाल्य विश्लेषण शायद यहूदी इसाई और मुस्लिम बच्चे भी दे रहे होंगे| अहिंसक समुदाय हिंसा के बचने के लिए शायद देर तक हाथ धोने से कतरा रहे हों| परन्तु कर्म पर ध्यान देना ही होगा|

आज मेरा मन उदास रहा| भविष्यतः की चिंता सताती है| मैं जानता हूँ कुछ मेरे हाथ में नहीं| मगर कर्म तो करना है|  मैं रहा सरस्वति का दास – जब कष्ट हो माँ की शरण में| मुझे आराधना करना नहीं भाता – मैं तो साधक ठहरा|

आज रात नौ बजे नौ मिनट तक बिजली के रोशनियाँ बंद करने को लेकर गजब माहौल है| किसी को नहीं पता कितना और क्या बंद करें या न करें| कुल जमा समझ दिया या मोमबत्ती जलाने को लेकर है| इस बात का भी चर्चा रहा कि थाली बजाने और मोमबत्ती जलाने के लिए तो दो चार दिन मिलते हैं मगर इक्कीस दिन के लॉक डाउन की तैयारी के लिए घंटा भी मुश्किल पड़ जाता है|

नौ बजते ही मोदी भक्तों ने उनके आग्रह का सत्यानाश करना शुरू कर दिया| पडौस में सामूहिक रूप से पटाखेबाजी शुरू हो गई| अल्प संख्या में लोग प्रार्थना या सामूहिक प्रार्थना करते हुए भी देखे गए| मगर इस बार घंटा बजाने के मुकाबले गंभीरता और अनुशासन शायद अधिक था| आजकल करोना की आड़ में तथाकथित भारतीय संस्कृति का विजय उत्सव चल रहा है| ख़ासकर उस तबके के बीच जिसे भारतीय संस्कृति का पूरा भान भी नहीं|

ज़ूम पर मीटिंग तो मैं भी कर ही रहा हूँ मगर जिस प्रकार की ख़बरें आ रहीं हैं ज़ूम का हाल जल्दी ही ख़राब हो सकता है| प्रायवेसी का बड़ा सवाल है| खासकर जूम पर व्यापारिक और सरकारी कार्य संपन्न करने को लेकर| लगता है सुरक्षित विकल्प की तलाश जल्दी करनी होगी|

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विश्व- बंदी ४ अप्रैल


उपशीर्षक – निशानदेही 

आज लोदी रोड पुलिस थाने से फ़ोन आया| पति-पत्नी से पिछले एक महीने आने जाने का पूरा हिसाब पूछा गया| पूछताछ का तरीका बहुत मुलायम होने के बाद भी तोड़ा पुलिसिया ही था| कुछ चीज़े शायद स्वाभाव से नहीं निकलतीं या शायद मेरे मन में पुलिस कॉल की बात रही हो तो ऐसा महसूस हुआ| मेरा अनुभव है कि दिल्ली पुलिस शेष उत्तर भारत की पुलिस से कहीं अधिक जन सहयोगी है| मेरे जबाब में बस्ती निज़ामुद्दीन का ज़िक्र तक नहीं था तो उसने सीधे ही मुझ से पूछ लिया| मैंने अपना आवागमन मार्ग समझा दिया तो उसे थोड़ी संतुष्टि हुई| मगर फिर भी शंका के साथ उसने हालचाल और अतापता पूछ लिया| फिर भी उसे चिंता थी कि मेरा मोबाइल उस टावर की जद में कैसे आया तो तकनीकि और भौगोलिक जानकारी के साथ संतुष्ट करना पड़ा|

वैसे परिवार में सब पंद्रह दिन से घर में ही बंद हैं| मेरे अलावा कोई भी दूध सब्जी लेने के लिए भी सीढ़ियाँ नहीं उतरा| मोहल्ले के बाहर मेरी अंतिम यात्रा भी २० मार्च को हुई थीं| वह तारीख भी पुलिस वाले के रिकॉर्ड में भी थी| ऐसा इसलिए हुआ कि मैं बस्ती निज़ामुद्दीन से मात्र कुछ सौ मीटर से ही तो गुजरा था| मोबाइल टावर आपकी मौजूदगी तो दर्ज करते ही हैं| घर भी तो बहुत दूर नहीं है निजामुद्दीन से|

मोबाइल फोटोग्राफी का एक वेबीनार देखा| जोश में दो तीन फ़ोटो खींचे गए और विडियो बनाए गए| तो

मकान मालिक रोज हालचाल के लिए फ़ोन करते हैं| आज बैंक तक गए थे| पूछा तो कहने लगे बहुत जरूरी काम था| क्या दिन आए हैं – बैंक जाने के लिए भी सफाई देनी पड़ती है| वो घर के प्रांगण में ही टहलने का उपक्रम करते हैं वर्ना रोज लोदी गार्डन जाते थे|

घर में लिट्टी-चोखा बनाया गया| यहीं समय है कि नए नए पकवान बनाए खाए जाएँ| परन्तु घुमने फिरने की कमी के कारण अतिरिक्त व्यायाम का भी ध्यान रखना पड़ रहा है|

इन दिनों आसमान का नीलापन दिल चुरा लेने वाला है| चाँद पूरे रंग ढंग में चमकता है| तारों ने भी अपनी महफ़िल मजबूती से जमा ली है| हल्की ठंडक में बाहर ही सो जाने का मन करता है| बचपन के वो दिन याद आते है जब हम छत पर सोते थे| अभी समझ नहीं आता कि छत पर सोना उचित हैं या नहीं| अजीब सी बेचैनी महसूस होती है|

विश्व- बंदी ३ अप्रैल


उपशीर्षक – मोमबत्ती 

मुग़ल काल में एक प्रथा थी जो सल्तनत में ज्यादा उत्पात मचाता था उसे जबरन हज पर भेज देते थे| अगर औरंगज़ेब भी जिन्दा होता तो तब्लिग़ वालों को किसी जहाज में चढ़ा कर हज के लिए भेज देता और कहता कि जब मक्का और हज खुलें तब पूरा करकर ही लौटना|

जिन्हें इलाज़ नहीं कराना उनके लिए आम समाज से दूर अलग मरकज़ खोल देने चाहिए| वहीं रहें, अपना बनायें खाएं, मरें या ठीक हो जाएँ| सरकार, चिकित्सकों, समाज सेवियों, मिडिया और गैर मुस्लिमों को उनकी चिंता से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए| ईश्वर का दिया कष्ट भोगने से शायद उनके इस जन्म के अलाल्ही कर्त्तव्य और अगर गलती से पिछला जन्म रहा हो तो पिछले जन्म के पाप का प्रायश्चित हो जाएगा| अन्य धर्मों में भी जिन्हें अपने इस या उस जन्म के पाप का प्रायश्चित करना हो उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए| धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि हर किसी को दूसरों को परेशां किए बिना अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म का पालन करने की छूट होनी चाहिए|

इधर प्रधानमंत्री जी ने फिर नीरो साम्राज्य के दिनों को याद लिया| अब इटली की तर्ज पर मोमबत्ती जलेगी रविवार को| भारतीय कारण करने के लिए दीपक और लॉक डाउन में कहाँ खरीदने जाओगे इसके लिए मोबाइल की लाइट का विकल्प दिया गया है| मोदी जी का यह घटना प्रबंधन प्रायः चिंतित करता है कि असली समस्या से ध्यान हटाया तो नहीं जा रहा| परन्तु जनता का हौसला बनाये रखना जरूरी है|

 वैसे प्रधानमंत्री ने दूरी बनाए रखने की बात कहकर भक्तों को मूर्खता न करने का सन्देश भी दिया है|

घर को बच्चों को लग रहा है कि दुनिया भर की छुट्टी चल रहीं हैं| वैसे यह भी ठीक है कि अगर घर में दो एक लोग साफ सफाई, रसोई और बच्चे संभाल लें तो बाकि दस लोग घर से आराम से काम कर सकते हैं| दफ्तर, आवागमन, और ऐसे ही तमाम खर्च बच सकते हैं| अर्थव्यवस्था के आंकड़े में जरूर कमी आएगी परन्तु पर्यावरण, सड़कों की भीड़ भाड़ कम हो जाएगी|

शायद प्रकृति हमारे धर्मों और अर्थव्यवस्थाओं को सुधरने का मार्ग स्पष्ट कर रही है|